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गुरुवार, 4 जून 2026

अपनी औकात नहीं भूलनी चाहिए

बिना मेहनत के रोज पेट भर खाने और निश्चिन्तता के कारण वह मुफ्तखोर गीदड़ दिनों-दिन फलने-फूलने लगा। उसे शेर के साथ रहता देख, जंगल के बाकि जानवर उससे कतराने लगे, कौन पंगा ले ! इससे गीदड़ अपने-आप को सक्षम और ताकतवर समझने लगा। जंगल में उसकी दादागिरी चलने लगी ! सीधे-साधे जीवों को रोज तंग करने लगा ! किसी से कुछ भी छीन लेना उसके लिए आम बात हो गई ! अब इस कहानी से आपको अपने किसी आस-पास के नेता, अभिनेता, दबंग, किसी की शह पर नाचते किसी बड़बोले देश या किसी ताजा घटना की याद आ जाए तो.....................तो आने दीजिए ना, हर्ज क्या है.............  😊   

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

र इंसान के जीवन में कम से कम एक बार तो समय अनुकूल होता ही है ! उसी वक्त की मेहरबानी के चलते पिद्दी भी पहलवान बन जाती है ! पर कुछ पिद्दियां इतिहास से कोई सबक ना लेते हुए इस अनुकूलता को अपनी नियति, अपना शौर्य समझ इतनी अराजक, अहंकारी और धृष्ट हो जाती हैं कि खुद को ही भगवान समझने लगती हैं ! वे भूल जाती हैं कि समय कभी भी एक समान नहीं रहता ! ऐसी ही कुछ पिद्दियों का हश्र देख बचपन की एक कहानी याद आ गई, जो यही सीख देती है कि किसी को भी अपनी औकात, अपनी बिसात कभी भी नहीं भूलनी चाहिए ! कहानी कुछ इस प्रकार है :

भटकन 
क जंगल में एक गीदड़ रहता था। किसी तरह दूसरों के किए गए शिकार पर उसके दिन कटा करते थे। एक दिन भोजन की तलाश में जंगल में भटकते हुए अचानक उसके सामने एक शेर आ गया। गीदड़ के तो देवता कूच कर गए। थर-थर कांपते उसे अपनी मौत साक्षात नजर आने लगी ! पर वह बहुत काइयां था ! मौके की नजाकत को ताड़ वह तुरंत शेर के पैरों में लोट गया। शेर अभी शिकार से लौटा था, उसका पेट भरा हुआ था। इस नौटंकी को देख उसने पूछा, क्या हुआ ? क्या बात है ? शेर को शांत देख गीदड़ की जान में जान आई, बोला महाराज जंगल के जानवर मुझे बहुत तंग करते हैं। कुछ खाने जाता हूं, तो मार कर भगा देते हैं। बड़ी मुसीबत में हूं, मुझे अपनी सेवा में रख लीजिए। शेर ने कहा ठीक है, तुम मेरे साथ रहो। तुम्हें न खाने-पीने की चिंता रहेगी और ना किसी से ड़रने की।


ऐश 
गीदड़ के समय के अनुकूल होते ही उसके दिन फिर गए। बिना मेहनत के रोज पेट भर खाने और निश्चिन्तता के कारण वह दिनों-दिन फलने-फूलने लगा। उसे शेर के साथ रहता देख, जंगल के बाकि जानवर उससे कतराने लगे, कौन पंगा ले ! इससे गीदड़ अपने-आप सक्षम और ताकतवर समझने लगा। जंगल में उसकी दादागिरी चलने लगी ! सीधे-साधे जीवों को तंग करने लगा ! किसी से उसका कुछ भी छीन लेना आम बात हो गई ! धीरे-धीरे उसे लगने लगा की इन डरपोक जानवरों का तो मैं भी शिकार कर सकता हूँ !  ऐसा ख्याल आते ही अब वह शेर को शिकार करते हुए ध्यान देखने लगा। उसने पाया कि शिकार के पहले शेर की आंखें लाल हो जाती हैं, शरीर धनुष की तरह तन जाता है और वह जोर की दहाड़ मार बिजली की गति से शिकार की गर्दन पर झपट कर उसका काम तमाम कर देता है। 
समझाइश 
गीदड़ अपने गुमान में अपनी औकात भूल गया ! उसे लगने लगा कि शिकार करना तो बहुत आसान है, यह तो वह भी कर सकता है। सो एक दिन उसने शेर से कहा कि आप इतने दिनों से मेरे लिये भोजन का प्रबंध करते आए हैं, आज मैं आप के लिये शिकार कर लाउंगा। शेर ने उसे बहुत समझाया, खतरे बताए, पर गीदड़ जिद पर अड़ा रहा तो शेर ने उसे इजाजत दे दी। समय ने करवट ले ली थी !
मतिभृष्टता 
अंत 
दूसरे दिन सुबह वह मांद से निकला। जंगल में कुछ ही दूरी पर उसे एक हाथी नजर आ गया। आज तक उसने हाथी का मांस नहीं खाया था। पर उसे मालुम नहीं था कि ऐसा इसलिए था, क्योंकि शेर भी हाथी से कतराता था। गीदड़ ने सोचा आज इसे मार कर ले जाउंगा तो शेर खुश हो जाएगा। यह सोच वह हाथी के करीब गया, अपनी आंखें लाल करने की कोशिश की, शरीर को ताना और जोर से चिल्ला कर हाथी पर कूद तो गया, पर हाथी के विशाल शरीर से टकरा कर जमीन पर गिर पड़ा। हाथी ने उसकी हरकत पर झुंझला कर उसे सूंड में लपेट दूर उछाल दिया ! गीदड़ की हड़्ड़ियां चूर-चूर हो गयीं। हाथी ने जोर की चिंघाड़ भरी और जंगल में गुम हो गया। शेर ने एक बार उधर देखा फिर अपना मुंह मोड़ लिया !
ब इस कहानी से आपको अपने किसी आस-पास के नेता, अभिनेता, दबंग, किसी की शह पर नाचते किसी बड़बोले देश या कोई ताजा घटना याद आ जाए तो.....................तो आने दीजिए ना, हर्ज क्या है 😊  

@छवियों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

शनिवार, 17 जनवरी 2026

व्यक्तिगत कुंठा जब दंभ का चोला पहन, शब्दों का रूप अख्तियार करती है, तो अनर्थ ही होता है

कोई अपने अहंकार में यदि अपनी भूल को भूल ही नहीं मानता और ऐसे में जब उसकी कुंठा व सोच, दंभ का चोला पहन, शब्दों का रूप अख्तियार कर अवाम के सामने आती है, तब-तब जनता उसे सबक सिखाती है ! इसका कोई भी अपवाद नहीं है ! देश प्रेमी जनता कभी भी दुर्वचनों, दुर्भावनाओं या गलतबयानियों को प्रशय नहीं देती ! सामने वाले का मफलर, गमछा, टोपी, शॉल किस  रंग का है, इससे पब्लिक को कोई मतलब नहीं होता, उसके लिए सामने वाले के मनोभाव, उद्गार तथा देश के प्रति निष्ठा मायने रखती है.......................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

अभी बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए जब किसी ने अपने सबसे बड़े सहयोगी की जरुरत को ही नकार दिया था ! तब जनता ने उन्हें ही कुछ हद तक नकारा बना दिया था ! एक था, जिसने जन्मों-जन्मों तक की भविष्यवाणी कर दी थी, जनता ने उसी के सिम्बल से उसे बुहार कर किनारे कर दिया ! एक के लगातार विष-वमन से तंग आ लोगों ने उसका दायरा ही तंग कर डाला ! एक ने जातियों का व्यूह रचा, अवाम ने उसे पांति के ही लायक ना छोड़ा ! एक ने डर, हिंसा, खौफ का माहौल बना खुद को अजेय करना चाहा, उसे आज दर-दर भटकने को मजबूर होना पड़ रहा है ! देश प्रेमी जनता कभी भी दुर्वचनों, दुर्भावनाओं या गलतबयानियों को प्रशय नहीं देती ! सामने वाले का मफलर, गमछा, टोपी, शॉल किस  रंग का है, इससे पब्लिक को कोई मतलब नहीं होता, उसके लिए सामने वाले के मनोभाव, उद्गार तथा देश के प्रति निष्ठा मायने रखती है ! 

जनता जनार्दन 
फिर भी है कि लोग समझते ही नहीं, ताजा उदाहरण है, एक भाई साहब, जिनका नाम भी देश के अधिकांश लोगों ने नहीं सुना होगा, अचानक अपने सहयोगी दल को एक मजबूरी बता मिडिया की सुर्खियां बन गए ! अब वह लाख सफाई देते रहें, अपने कहे का अर्थ बदलते रहें, नुक्सान तो हो गया ! लातूर जिले में ऐसी ही बयानबाजी के चलते मिले विपरीत परिणामों से भी उन्होंने कुछ नहीं सीखा !  बोलना है कुछ भी भक्क से उगल दिया ! ऐसी ही हरकत सामने से भी कुछ दिनों पहले हुई थी, जिसने दोस्त, मित्र, साथी, अनुयायी सभी को सकते में ला दिया था !

याद आता है जब 1977 में इंदिरा जी चुनाव हारी थीं, तब जीतने के बाद जनता दल, देश और देशवासियों के हित में कुछ करने के बजाय सिर्फ इस बात पर जुट गया कि इस महिला को जेल भिजवाना है ! पब्लिक को यह सब रास नहीं आया और जनता दल को ही दलदल बना डाला ! 

खुद के गुमान में डूबे ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि जब आपका व्यवहार, बर्ताव, कथनी करनी का फर्क, ढोंग या उदण्डता लोगों को बार-बार दिखाई देती है, तो वे आपको नकार देते हैं ! आपका समाज को खंडित, विखंडित करने या देश को तनावग्रस्त या कमजोर करने का प्रयास जनता कतई बर्दास्त नहीं करती ! झूठे किस्से, कहानियों, आरोपों को वह समझने-पहचानने लगी है ! समय बदल रहा है, जितनी जल्दी हो समझ व संभल जाएं नहीं तो अप्रासंगिक होते देर नहीं लगेगी ! हाल ही के बहुतेरे उदाहरण सामने हैं ! बड़े-बड़े तीसमारखाँ निपटा दिए जनता ने ! क्योंकि अब देश के अवाम को राष्ट्रबोध, स्वयंबोध, शत्रुबोध, इतिहासबोध अच्छी तरह होने लगा है ! अब वह बहकावे में नहीं आती !

निष्कर्ष यही है कि कोई अपने अहंकार में यदि अपनी भूल को भूल ही नहीं मानता और ऐसे में जब उसकी कुंठा व सोच, दंभ का चोला पहन, शब्दों का रूप अख्तियार कर अवाम के सामने आई है, तब-तब जनता ने उसे सबक सिखाया है, इसका कोई भी अपवाद नहीं है ! पब्लिक सब बूझती है ! किसी नायक, नेता की नीयत और फितरत उससे छिपी नहीं रहती ! देर-सबेर वह सबक जरूर सिखाती है ! उसके लिए परिवार, जाति, भाषा, धर्म मायने जरूर रखते हैं, पर देश की सुरक्षा, देश की भलाई या देश की उन्नति की कीमत पर नहीं !    

जय हिंद 🙏

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