शुक्रवार, 29 मई 2026

कॉकरोच गाली के समान है

कुछ अति ज्ञानी लोग भूल गए कि दुनिया तिलचट्टों की नहीं, इंसानों की है ! इंसान दिवास्वपन नहीं देखते ! वे उद्यम करते हैं ! विध्वंस नहीं करते ! दूसरों की क्षति नहीं सोचते ! गंदगी से दूर रहते हैं ! जहां भी रहते हैं, उसकी रक्षा और स्वच्छता बनाए रखते हैं ! उनको इसका भी इल्म नहीं है कि जिस युवा वर्ग को लक्ष्य बनाने की नापाक कोशिश कर रहे हैं, उसके लिए राष्ट्र प्रथम है ! वह अब देश की प्रगति का हिस्सा बन चुका है ! वह समझदार है ! अच्छे-बुरे को पहचानता है ! कॉकरोच उसके लिए गाली के समान है...........😡

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

अभी पिछले दिनों कुछ पूर्वाग्रही, कुंठित, अराजक तत्वों ने अपनी तुलना उस 2.5x4x1.5cm के आकार के कीड़े से की जो इस दुनिया में करीब 35 करोड़ सालों से रेंग रहा है ! जो एक कीड़ा नहीं बल्कि चलता-फिरता जीवाश्म है ! तो क्या ऐसे लोगों ने सिर्फ इसलिए एक घृणित जीव को अपना आदर्श बना लिया क्योंकि वह करोड़ों वर्षों से ''सर्वाइव'' कर रहा है ? नहीं ! उनका मुख्य उद्देश्य उस जीव के ''सर्वाइवालपने'' के पैटर्न को अपने से जोड़, एक गलत नेरेटिव गढ़, देश के युवा वर्ग को गुमराह करना था ! पर उनके उस विलेन नुमा हीरो के चरित्र, उसका व्यवहार, उसकी कारस्तानियों ने इनके गुब्बारे के फूलने से पहले ही हवा निकाल दी ! 

एजेंडा 

वैसे तो इस कीड़े का हमारे ग्रंथों में कोई जिक्र नहीं मिलता, पर ऐसा तो नहीं कि इस राक्षसी प्रवृति के सर्वाहारी जीव को अपने दुराचार, पापों, कुकर्मों की वजह से, अश्वस्थामा की तरह ही कोई श्राप मिला हो, जिसकी वजह से इसे घृणा-वितृष्णा सहते हुए धरती पर गंदगी व मलिनता में वर्षों-वर्ष से रहना पड़ रहा हो ! उसी मलिनता के कारण दूषित हुए दिलो-दिमाग ने इसे ''वेक्टर'' बना दिया हो !

अनगिनत बीमारियों का वाहक 
पि छले दिनों देश में जो एक अराजक माहौल बनाया गया, जिसका आधार, वर्षों पहले विश्व-विख्यात उपन्यासकार फ्रांज काफ्फा का लोकप्रिय उपन्यास ''द मेटामॉफोर्सिस'' था ! जिसमें उन्होंने एक अकर्मण्य, आत्मश्लाघि, बरोजगार, परदोषी युवक की कहानी बयां की थी जो अपने को, लियाकत ना होते हुए भी सर्वगुणसम्पन्न समझता है ! एक दिन जब वह अपनी नौकरी जाने के बाद, गंदगी से भरे अपने कमरे में सुबह नींद से जागता है तो खुद को एक कीड़े के रूप में पाता है और वह कीड़ा था कॉकरोच यानी तिलचट्टा ! 

किताब का कवर 

इसी को आधार बनाया गया 

ले खक काफ्फा ने उस युवक को एक पीड़ित के रूप में दर्शाया था ! इन दिनों उसी भाव को ले उड़ा गया कि मैं पीड़ित हूँ ! मेरे ऊपर अत्याचार किया जा रहा है ! मुझे सताया जा रहा है ! सिस्टम दोषी है ! इसे बदलने के लिए क्रांति करनी होगी ! विडंबना यह है कि जो परजीवी खुद को पीड़ित दिखा रहे हैं, वे खुद कोई उपक्रम करना नहीं चाहते ! बस पड़े रहना, गंदगी फैलाना और जहां हैं उसी को बर्बाद करना उनका उद्देश्य है ! फिर भी उस उपन्यास के लड़के की तरह ये लोग चाहते हैं कि बिना कुछ किए, दूसरों की तरह उन्हें सम्मान मिले, उनकी बात सुनी जाए, उन्हें अधिकार भी दिए जाएं ! 

कपट 
ऐसा होने से पहले ही उपाय जरुरी 
कुछ अति ज्ञानी लोग भूल गए कि दुनिया तिलचट्टों की नहीं, इंसानों की है ! इंसान दिवास्वपन नहीं देखते ! वे उद्यम करते हैं ! विध्वंस नहीं करते ! दूसरों की क्षति नहीं सोचते ! गंदगी से दूर रहते हैं ! जहां भी रहते हैं, उसकी सुरक्षा और स्वच्छता बनाए रखते हैं ! उनको इसका भी इल्म नहीं है कि जिस युवा वर्ग कॉकरोच कह अपना लक्ष्य साधने की नापाक कोशिश कर रहे हैं, उसके लिए राष्ट्र प्रथम है ! वह अब देश की प्रगति का हिस्सा बन चुका है ! वह समझदार है ! अच्छे-बुरे को पहचानता है ! वह बेहद  क्षुब्ध हुआ है ऐसी हरकत से ! कॉकरोच उसके लिए गाली के समान है ! वह यह भी अच्छी तरह से जानता है कि यदि इन सर्वाहारी जीवों को जरा सी भी सहानुभूति दे पनपने दिया, तो एक दिन वे उसी को खा जाएंगे, समाज को नष्ट कर देंगे, देश को खतरे में डाल देंगे  !  इसलिए वह सावधान भी है ! 

जागरूकता 
 मय बदल गया है ! लोग अब अफवाहों, गलत नेरेटिव के बहकावे में नहीं आते ! समाज जागरूक हो चुका है ! उसके पास गंदे, घिनौने, चालाक, कीड़े की खाल ओढ़ धोखा देने वाले कपटी और कुटिलों की खातिर के लिए पुरातन उपाय चप्पल का तो है ही, साथ में आधुनिक हथियार ''हिट'' तो हइए है...........!

@चित्रों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

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