माता के समान कोई छाया नहीं, माता के समान कोई सहारा नहीं, माता के समान कोई रक्षक नहीं, माता के समान कोई शिक्षक नहीं और माता के ममत्व के समान कोई चीज नहीं है। उसके बारे में जितना भी कहा जाए कम है, उसका ऋण कभी भी नहीं चुकाया जा सकता ! ऐसा कहा गया है कि भगवान हर स्थान पर मदद करने नहीं पहुंच सकते, इसलिए उन्होंने माँ को बनाया। इसीलिए माँ को भगवान का स्वरुप माना गया है 🙏🙏
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माँ ! जो सिर्फ देना जानती है, लेना नहीं ! उसकी ममता का, निस्वार्थ प्रेम का कोई ओर-छोर नहीं होता। सागर से गहरे, धरती से सहनशील और आकाश से भी विशाल उसके स्नेहसिक्त आँचल में तो तीनों लोक समाए रहते हैं। माँ इस धरती पर ईश्वर का प्रत्यक्ष रूप है। जिस घर में माँ खुश रहती है, वहां खुशियों का खजाना कभी खाली नहीं होता। कोई कष्ट, कोई व्याधि, कोई मुसीबत नहीं व्यापति ! अपने बच्चों को खुश देख खुश रह लेने वाली माँ अपनी खुशी के एवज में भी बच्चों की खुशी ही मांगती है !
माँ ! जिसके बिना इस दुनिया की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी के लिए हमने एक दिन निर्धारित कर दिया ! माँ या उसका ममत्व कोई चीज या वस्तु नहीं है कि उसके संरक्षण की जरुरत हो ! नाहीं वह कोई त्यौहार या पर्व है कि चलो एक दिन मना लेते हैं ! अरे ! जब भगवान के लिए कोई दिन निर्धारित नहीं है, तो फिर माँ के लिए क्यों ? भगवान भी माँ से बड़ा नहीं होता ! वह तो खुद माँ के चरणों में पड़ा रह कर खुद को धन्य मानता है !
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| ममत्व तो ईश्वर को भी चाहिए |
माँ ! उसको कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके लिए कोई खास दिन निर्धारित किया गया है कि नहीं ! उसे न तोहफों की लालसा होती है नाहीं उपहारों की ख्वाहिश। मिल जाएं तो ठीक, ना मिलें तो और भी ठीक। वह तो निस्वार्थ रह बिना किसी चाहत के अपना प्यार उड़ेलती रहती है ! खुशी में सबके साथ खुश और दुःख में ढाढस दे आंसू पोछंती ! वह भगवान से भले ही नाखुश हो जाए पर अपने बच्चों के लिए उसके मुख पर सदा आशीष ही रहती है। इसीलिए ऊपर वाले से कुछ मांगना हो तो सदा हमें अपनी माँ की सलामती मांगनी चाहिए ! हमारे लिए तो माँ हर वक़्त दुआ मांगती ही रहती है !.jpg) |
| ममता |
माँ ! जैसे विशाल, अद्वितीय, अप्रतिम, दैवीय व्यक्तित्व के लिए एक दिन का निर्धारण ! इस बात को लेकर कई बार हम भावुक और आक्रोशित भी हो जाते हैं ! पर मई माह के दूसरे रविवार को मातृ दिवस मनाने के पीछे भी एक बेटी की अपनी माँ के प्रति अटूट प्रेम, सम्मान और सामाजिक सुधार की भावना काम कर रही थी ! उस बेटी का नाम है, एना मारिया जार्विस ! एना की मां का निधन 9 मई 1905 को हुआ था, जो उस वर्ष मई का दूसरा रविवार था, इसीलिए मई के दूसरे रविवार को ही ''मदर्स डे'' मनाने की परंपरा शुरू हुई !
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| एना जार्विस |
माँ ! ऐन रीव्स जार्विस अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया में रहते हुए समाज सेवा से जुड़ी हुई थीं। वह महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए लगातार काम करती रहती थीं। एक तरह से उन्होंने अपना जीवन खपा दिया था, जरूरतमंद महिलाओं और बच्चों के लिए ! एना अपनी माँ से बहुत प्रभावित थीं और उनसे बेहद प्यार करते हुए अपना प्रेरणास्रोत मानती थी ! ऐसा कहा जाता है कि ऐन रीव्स की यह इच्छा थी कि माँओं के सम्मान में एक दिन मनाया जाना चाहिए। इसीलिए अपनी मां की इच्छा को पूरा करने के लिए एना ने एक अभियान चलाया, लोग जुड़ते गए और पहली बार 10 मई 1908 को मदर्स डे मनाया गया ! इसे आधिकारिक रूप देने के प्रयास चलते रहे और साल 1914 में अमेरिका के राष्ट्रपति ने मई के दूसरे रविवार को आधिकारिक रूप से मदर्स डे घोषित कर दिया। इसके बाद मदर्स डे पूरी दुनिया में मशहूर होता चला गया।
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| मातृदिवस का ऐतिहासिक चिन्ह |
माँ ! ऐन रीव्स जैसी माँओं के सम्मान के लिए निर्धारित दिन का बाजार के कारोबार का जरिया बनता देख खुद एना इस दिन के खिलाफ हो गईं थीं ! उन्होंने कई जगह विरोध प्रदर्शन भी किए और लोगों से अपील की कि मदर्स डे को केवल औपचारिक रूप या दिखावे के लिए ना मनाएं ! उनका मानना था कि माँओं को उपहार नहीं सिर्फ सच्चा प्यार और सम्मान चाहिए। बाद में मदर्स डे को खत्म करने तक की मुहिम शुरू कर दी थी !
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| ममत्व |
पर बाजार तो बाजार है, उसने हर पावन त्यौहार, समारोह, परंपरागत उत्सव सभी को अपनी गिरफ्त में ले लिया है और लेता जा रहा है............!
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से
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