रविवार, 17 मई 2026

एक अनोखा मंदिर, श्रीकालहस्तीश्वर महादेव

मकड़ी शिवलिंग पर अपना जाल बना देती थी, जिससे वहां साफ- सफाई बनी रहे ! सांप मणियों को अर्पित कर लिंग से लिपट कर आराधना करता था और हाथी नदी से अपनी सूंड़ में पानी ला कर शिवलिंग का अभिषेक किया करता था ! पर हाथी के अभिषेक से सांप, उसकी मणियां और मकड़ी का जाल बह जाया करते थे ! इस बात पर उन तीनों में रोज झगड़ा-विवाद भी होता था ! प्रभु तो आशुतोष हैं, उन्होंने इनकी निष्काम भक्ति से प्रसन्न हो तीनों को अपने लोक बुलवा लिया..........! 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

मारे देश में हजारों-लाखों मंदिर, पूजा स्थान व धर्म-स्थल हैं ! उनकी भव्यता, उनकी संरचना, उनकी विलक्षणता विश्व प्रसिद्ध है ! इसके साथ ही उनके निर्माण और उनसे जुड़ी आस्था को लेकर कोई ना कोई कथा-कहानी भी जुड़ी हुई है। उनमें से कुछ कथा-कहानियां तो बहुत ही हैरतंगेज होती हैं ! ऐसी ही एक कथा जुड़ी हुई है आंध्रप्रदेश के एक कस्बे में स्थित अति प्राचीन श्रीकालहस्ती शिव मंदिर के साथ ! यहां श्री का मतलब है, मकड़ी ! काल शब्द सर्प के लिए प्रयुक्त हुआ है और हस्ती का अर्थ तो हाथी होता ही है !

श्रीकालहस्ति महादेव 

मंदिर का विहंगम दृश्य 
आं ध्रप्रदेश के चित्तूर जिले में पेन्नार दरिया की एक सहायक शाखा स्वर्णामुखी नदी के किनारे एक छोटा सा कस्बा है, कालाहस्ती ! जिसका नामकरण वहां स्थित करीब 2000 साल पुराने, तीन विशाल गोपुरम और सौ स्तंभों वाले श्रीकालहस्ती महादेव मंदिर के नाम पर ही हुआ है ! ये तीर्थ नदी के तट से लेकर मंदिर के पार्श्व में तिरुमलय पहाड़ी की तलहटी तक फैला हुआ है। इसे दक्षिण कैलाश या दक्षिण काशी के नाम से भी जाना जाता है। यहां भगवान कालहस्तीश्वर के संग देवी ज्ञानप्रसूनअंबा भी स्थापित हैं। देवी की मूर्ति परिसर में , मुख्य मंदिर के बाहर ही स्थापित है। 

गर्भगृह 
इस मंदिर के साथ जुडी हुई कथा हमारे उस विश्वास को स्थापित करती है जिसके अनुसार सृष्टि के कण-कण में ईश्वर का वास है यानी ईश्वरः सर्वभूतेषु ! इस स्थान का नाम तीन जीवों, श्री यानी मकड़ी, काल यानी सर्प एवं हस्ती यानी हाथी के नाम पर किया गया है। इन तीनों ने यहां शिवजी की आराधना कर अपनी योनि से मुक्ति पाई थी ! मान्यताओं के अनुसार मकड़ी शिवलिंग पर अपना जाल बना देती थी जिससे वहां साफ- सफाई बनी रहे ! सांप मणियों को अर्पित कर लिंग से लिपट कर आराधना करता था और हाथी नदी से अपनी सूंड़ में पानी ला कर शिवलिंग का अभिषेक किया करता था ! पर हाथी के अभिषेक से सांप, उसकी मणियां और मकड़ी का जाल बह जाया करते थे ! उनमें रोज विवाद होता था ! फिर आपस में तय पाया गया कि पहले हाथी अभिषेक कर ले, उसके बाद सर्प अपनी मणियां अर्पित करे तदुपरांत शिव-लिंग पर मकड़ी अपना जाल बन दे तो सभी की आराधना हो सकेगी ! उनके भक्तिभाव को देख प्रभु ने तीनों को अपने लोक बुलवा लिया ! इसके अलावा भी कई कथाएं यहां के लिए प्रचलित हैं ! 
 
मकड़ी, सांप और हाथी की मूर्तियां 

पूजारत तीनों जीव 
यहां पर इन तीनों जीवों की मूर्तियां भी स्थापित है। श्रीकालहस्ती का उल्लेख स्कंद पुराण, शिव पुराण और लिंग पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार एक बार इस स्थान पर अर्जुन ने प्रभु कालहस्तीवर के दर्शन किए थे। इसके अलावा कणप्पा नामक एक आदिवासी ने यहां पर भगवान शिव को अपनी आंख अर्पित कर आराधना की थी। ये मंदिर राहुकाल पूजा के लिए भी विशेष रुप से जाना जाता है।
गोपुरम 
मं दिर के परिक्रमा पथ में कई शिवलिंग, भगवान पशुपति, गणेश, कार्तिकेय, चित्रगुप्त, यमराज, धर्मराज, चण्डिकेश्वर, नटराज, सूर्य, बाल सुब्रह्मण्य, लक्ष्मी-गणपति, बाल गणपति, कालभैरव तथा धनुर्धर अर्जुन की मूर्तियां भी स्थापित हैं। मंदिर के आस-पास और भी बहुतेरे दर्शनीय स्थल मौजूद हैं ! 
स्तंभ 
यहां का नजदीकी हवाई अड्डा तिरुपति में है, जो यहाँ से करीब बीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। रेल द्वारा चेन्नई-विजयवाड़ा लाइन पर स्थित गुंटूर या चेन्नई से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। आंध्र प्रदेश परिवहन की बस सेवा भी तिरुपति से इस स्थान के लिए उपलब्ध है। यहां साल में कभी भी जाया जा सकता है पर सितम्बर से मार्च तक का समय उपयुक्त है। 

@अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏

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