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मंगलवार, 6 जनवरी 2026

है अपनी ये तो रीत नहीं, है अपना ये व्यवहार नहीं

अभी-अभी पश्चिमी कैलेंडर ने नए साल का ऐलान किया और हम सब जुट गए उसके स्वागत समारोह में, कोई बुराई नहीं ! पर एक बार अपने नव वर्ष के समय और इस नए साल के समय का तुलनात्मक विश्लेषण कर लें तो साफ फर्क नजर आ आएगा कि नई परिस्थिति का उल्लास क्या होता है ! जब प्रकृति, कायनात, निसर्ग खुद अंगड़ाई ले आलस्य त्यागती है तो ऐसे प्रफुल्लित वातावरण में धरा का जर्रा-जर्रा उल्लसित नजर आने लगता है ! जड़ में भी जान आ जाती है ! एक बार पूर्वाग्रह त्याग, तुलना कर देखें तो सही.........🙏

#हिन्दी_ब्लागिंग 

मारा देश एक उत्सव-धर्मी देश है ! हमारी आत्मा बसती है, इन उत्सवों में ! इतने विविध त्यौहार दुनिया के शायद ही किसी और देश में मनाए जाते हों ! रंग-बिरंगे, उल्लासमय, खुशियां बिखेरते, प्रकृति, परंपराओं से, गाथाओं से जुड़े हुए, एक से एक बढ़ कर महोत्सव ! होना तो यह चाहिए था कि दुनिया हमारे समारोहों को मनाए, पर हुआ इसके ठीक विपरीत, हम जुट गए पाश्चात्य जश्नों को अपनाने में ! यही नहीं हम तो एक कदम और आगे बढ़ अपने मासूम से पर्वों को पश्चिमी रंगों से रंगने की धृष्टता करने से  भी बाज नहीं आए !

पावन, पवित्र 
ऐसा नहीं है कि किसी और के त्यौहार को मनाना गलत है ! त्यौहार तो खुशी का प्रतीक हैं ! खुशियां अपनानी ही चाहिए ! पर हमारे हमारे पर्व गौण क्यों होते चले गए ? ऐसा क्योंकर हुआ ? तो इसका एक कारण यह भी समझ में आता है कि सैकड़ों वर्षों की पराधीनता ने अधिकांश देशवासियों में जो एक हीन भावना का संचार कर दिया था, उसी से हम आक्रांताओं को अपने से बेहतर मानने लग गए, जिसका परिणाम यह रहा कि हमें अपने ऊपर ही विश्वास नहीं रह गया ! हमारी समृद्ध परिपाटी, परंपरा, इतिहास, सभी हाशिए पर सिमटते चले गए !   

जैसे अभी-अभी पश्चिमी कैलेण्डर ने नए साल का ऐलान किया और हम सब जुट गए उसके स्वागत समारोह में, कोई बुराई नहीं ! पर एक बार अपने नव वर्ष के समय और इस नए साल के समय का तुलनात्मक विश्लेषण कर लें तो साफ फर्क नजर आ आएगा कि नई परिस्थिति का उल्लास क्या होता है ! जब प्रकृति, कायनात, निसर्ग खुद अंगड़ाई ले आलस्य त्यागती है तो ऐसे प्रफुल्लित वातावरण में धरा का जर्रा-जर्रा उल्लसित नजर आने लगता है ! जड़ में भी जान आ जाती है ! एक बार पूर्वाग्रह त्याग, तुलना कर देखें तो सही ! 

इसी बात का उल्लेख वर्षों पहले अपनी कविता  ''यह नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं'' में हमारे राष्ट्र कवि श्री रामधारी दिनकर जी ने पूरे विस्तार के साथ किया था ! हम सभी को उसे पढ़ना चाहिए, वे कहते हैं कि -


ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं                                
है अपना ये त्यौहार नहीं                                                          


है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं

धरा ठिठुरती है सर्दी से,
आकाश में कोहरा गहरा है                                               
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर                                                                  
सर्द हवा का पहरा है                                                                             

सूना है प्रकृति का आँगन
कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं
हर कोई है घर में दुबका हुआ
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं

चंद मास अभी इंतज़ार करो
निज मन में तनिक विचार करो
नये साल नया कुछ हो तो सही
क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही                                                                                                  

उल्लास मंद है जन-मन का
आयी है अभी बहार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं

ये धुंध कुहासा छंटने दो
रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने दो
फागुन का रंग बिखरने दो

प्रकृति दुल्हन का रूप धार
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी
शस्य श्यामला धरती माता
घर-घर खुशहाली लायेगी

तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर
जय गान सुनाया जायेगा

युक्ति प्रमाण से स्वयंसिद्ध
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध                                                                                    
आर्यों की कीर्ति सदा -सदा
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा


अनमोल विरासत के धनिकों को
चाहिये कोई उधार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं                                                                                    

है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं                                                                                                                                           

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏🙏

सोमवार, 21 अगस्त 2023

सीख, अपने-अपने बापू की

व्यापारी का लड़का सोच मे पड़ गया कि क्या बापू ने झूठ कहा था कि बंदर नकल करते हैं ! उधर बंदर सोच रहा था कि आज बापू की सीख काम आई कि मनुष्यों की नकल कर कभी बेवकूफ मत बनना ! इसके साथ एक बात तो तय हो गई कि यदि आज संसार में जागरूकता बढ़ रही है, शिक्षा का प्रसार हो रहा है तो हमें किसी गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए कि सिर्फ हम ही समझदार हो रहे हैं.........😄😄

#हिन्दी_ब्लागिंग 


बहुत समय पहले की बात है ! तब नाहीं हर चीज की इतनी दुकाने हुआ करती थीं, नाहीं यातायात के इतने सर्वसुलभ साधन ! ज्यादातर व्यापारी अपनी सायकिल से या पैदल ही घूम-घूम कर अपने सामान की बिक्री किया करते थे ! उन्हीं दिनों एक वणिक, रोजमर्रा के काम आने वाले कपड़ों बेचने निकला ! उसकी गठरी में चमकीली रंग-बिरंगी  छोटी-बड़ी टोपियां भी थीं ! एक गांव से दूसरे गांव घूमते-घूमते दोपहर होने पर वह एक पेड़ के नीचे सुस्ताने के लिए रुक गया। भूख भी लग आई थी, सो उसने अपनी पोटली से खाना निकाल कर खाया और थकान दूर करने के लिए वहीं लेट गया। थका होने की वजह से उसकी आंख लग गई। कुछ देर बाद नींद खुलने पर वह यह देख भौंचक्का रह गया कि उसकी गठरी खुली पड़ी थी और उसकी सारी टोपियां अपने सिरों पर उल्टी-सीधी लगा कर बंदरों का एक झुंड़ पेड़ों पर टंगा बैठा था ! व्यापारी ने सुन रखा था कि बंदर नकल करने में माहिर होते हैं ! भाग्यवश उसकी अपनी टोपी उसके सर पर सलामत थी। उसने अपनी टोपी सर से उतार कर जमीन पर पटक दी। देखा-देखी सारे बंदरों ने भी वही किया ! व्यापारी ने सारी टोपियां समेटीं और अपनी राह चल पड़ा !


समय गुजरता गया ! व्यापारी बूढ़ा हो गया ! उसके बेटे ने अपना पुश्तैनी काम संभाल लिया ! वह भी अपने बाप की तरह दूर-दूर जगहों पर व्यापार के लिए जाने लगा !  दैवयोग से एक बार वह भी उसी राह से गुजरा जिस पर उसके पिता का सामना बंदरों से हुआ था। जैसे इतिहास खुद को दोहरा रहा हो, भाग्यवश व्यापारी का बेटा भी उसी पेड़ के नीचे सुस्ताने जा बैठा ! उसने भी वहीं अपना कलेवा कर थोड़ा आराम करने के लिए आंखें बंद कर लीं। कुछ ही देर बाद हल्के से कोलाहल से उसकी तंद्रा टूटी तो उसने पाया कि उसकी गठरी खुली पड़ी है और टोपियां बंदरों के सर की शोभा बढ़ा रही हैं। पर इससे वह जरा भी विचलित नहीं हुआ क्योंकि उसके बापू ने व्यापार के गुर बताते हुए उसके दौरान आने वाली ऐसी घटनाओं का तोड़ भी बतला दिया था ! पिता की सीख के अनुसार उसने अपने सर की एक मात्र टोपी को जमीन पर पटक दिया ! पर यह क्या !!! एक मोटा सा बंदर झपट कर आया और उस टोपी को भी उठा कर पेड़ पर चढ़ गया। 
व्यापारी का लड़का सोच मे पड़ गया कि क्या बापू ने झूठ कहा था कि बंदर नकल करते हैं ! उधर बंदर सोच रहा था कि आज बापू की सीख काम आई कि मनुष्यों की नकल कर कभी बेवकूफ़ मत बनना ! इसके साथ एक बात तो तय हो गई कि यदि आज संसार में जागरूकता बढ़ रही है, शिक्षा का प्रसार हो रहा है तो हमें किसी गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए कि सिर्फ हम ही समझदार हो रहे हैं.........😄

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