pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: हास्य-व्यंग्य
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रविवार, 31 मई 2020

अब यह तो जुगत पर है कि वह क्या गुल खिलाती है

किसी भी ब्लॉग में किसी की बेवजह आलोचना या निंदा नहीं की जानी चाहिए, ऐसा मेरा मानना है !पर कभी-कभी कुछ ख़ास लोगों द्वारा अपनाई गई तिकड़म, हथकंडा या कूटनीतिक चाल का, जो भविष्य में देश व समाज को प्रभावित कर सकती हो, जिक्र भी इस व्यक्तिगत डायरी में होना लाजिमी है, ताकि सनद रहे ...............!

#हिन्दी_ब्लागिंग
मानव स्वभाव है कि वह यादों  के सहारे भूतकाल में विचरण करता है या फिर तरह-तरह की आशंकाओं से भयभीत भविष्य को जानने की जुगत लगाता रहता है। फिर उसी जुगत में अपनी बुद्धिनुसार तरह-तरह की तिकड़मों को अंजाम दे कभी लोगों के सामने अपनी कुटिलता जाहिर करवा देता है या फिर हास्य का पात्र बन जाता है ! तेहरवीं शताब्दी में तुर्की में जन्में मुल्ला नसरुद्दीन ने अपने अनोखे अंदाज में ऐसे लोगों का मजाक बना अवाम को नसीहत देने की कोशिश की थी।

मुल्ला नसरुद्दीन अक्सर शहर में फटे-पुराने, जीर्ण-शीर्ण कपडे पहन घूमा करता था। उसके इस रंग-ढंग पर लोग उसका मजाक बनाते, उसकी कंजूसी का उपहास करते उस पर फब्तियां कसते रहते थे ! कुछ को समझ ही नहीं आता था कि माली हालत खराब ना होने के बावजूद वह ऐसे क्यों रहता है ! उसके
खानदान को जानने वाले कुछ लोग पुराने दिनों को याद कर उस पर तरस भी खाते थे ! पर इस सब का मुल्ला पर कोई असर नहीं होता था। वह अपनी ही धुन में रमा रहता था। अपनी हरकतों से सबक वह दूसरों को देता था पर लोग समझते थे कि नसीहत उसको मिल रही है ! 

एक दिन मुल्ला को उसके गधे ने दुलत्ती मार छत से गिरा दिया ! मुल्ला उसी के बारे में सोचता सड़क पर निकल आया कि कभी किसी गधे को ऊँचे मकाम पर नहीं ले जाना चाहिए ! ऐसा करने पर वह उसी जगह को बर्बाद करता है ! ले जाने वाले को भी लतिया कर गिरा देता है और सबसे बड़ी बात खुद भी सर के बल नीचे आ गिरता है। इसलिए दान, ज्ञान और सम्मान सुयोग्य पात्र को ही देना चाहिए ! वह इस इस नतीजे पर पहुंचा ही था कि उसको एक वृद्ध सज्जन ने आवाज दे रोक लिया। वह बुजुर्गवार काफी दिनों से मुल्ला के प्रति लोगों के व्यवहार और उसकी जबरदस्ती ओढ़ी हुई दयनीय अवस्था को देख व्यथित था ! वह हमदर्द, बुजुर्ग इंसान मुल्ला के खानदान से भी अच्छी तरह वाकिफ था। इसीलिए आज सड़क पर बेवजह बड़बड़ाते, मलिन कपड़ों में बावले से घूमते मुल्ला को देख उससे रहा  नहीं गया। सो उसने आवाज लगा मुल्ला को रोका और उसे समझाने के लिहाज से पूछा कि क्यों तुमने ऐसी हालत बना रखी है ! क्या तुम नहीं जानते कि इस शहर में तुम्हारे खानदान का कैसा रुतबा था ! लोग तुम्हारे पूर्वजों की कितनी इज्जत करते थे ! उनकी हैसियत की चर्चा दूर-दूर तक फैली हुई थी ! उनके पास बेहतरीन और बेशकीमती पोशाकें थीं ! वे जब उन्हें पहन कर निकलते थे तो अनजाने लोग भी उन्हें दूर से ही पहचान जाते थे।


मुल्ला ने ध्यान से बुजुर्ग की बातें सुनीं और शान्ति से जवाब दिया, चचाजान आप बिल्कुल सही फरमा रहे हैं, उसी का ख्याल रख मैं अपने दादाजी के बेहतरीन कपडे पहन घूमता रहता हूँ; ताकि हमारे खानदान का नाम सदा रौशन रहे ! इसीलिए तो मैंने यह जुगत अपनाई है ! 
यह सुन बुजुर्गवार अपनी राह लगे और मुल्ला इस नतीजे पर पहुंचते हुए अपनी कि दुनिया में पहचान बनाने के लिए सूरत-शक्ल, नाम या पहरावा काम नहीं आता ! काम आती है लियाकत !      

शनिवार, 2 मई 2020

गधे की गदहागिरी से मुल्ला नसीरुद्दीन को मिला सबक

आज के वेदव्यास अपने से ज्यादा दूसरे को विद्वान समझने की गलतफहमी नहीं पालते ! इसलिए सिर्फ अपना पढवाने की होड़ है ! इक्के-दुक्के अपवादों को छोड़, पढ़ता भी कौन है ! बस सब लिखे जा रहे हैं ! लिख्खाड़ों की भरमार हो गई है ! विश्वास ना हो तो कोई भी पत्रिका उठा उसमें पैवस्त रचनाओं को देख लें ! दौड़ में बने रहने की मारम-मार है ! अब थोक के प्रोडक्शन में माल कहां से आ रहा है इसकी चिंता नहीं है ! ऑरिजिनल मिलता नहीं ज्यादातर असेम्बलिंग होती है ! ऐसे में गुणवत्ता का क्या काम ! कोई अपेक्षा भी नहीं करता.............! ऐसी ही एक असेम्बल्ड गल्प; अब यह आप पर है कि आप इस गल्प को किस तरह लेते हैं  

#हिन्दी_ब्लागिंग     
कुछ दिनों पहले मुल्ला नसीरुद्दीन की एक कहानी को साझा करने चला तो अचानक आड़े-टेढ़े ख्यालों ने भरमा कर दिमाग को मुख्य पटरी से लूप लाइन पर धकेल दिया ! सो कहानी वहीं की वहीं रह गई। अब ख्याल भले ही आंके-बांके हों पर कुछ ना कुछ सच्चाई तो होती ही है उनमें भी, जो यह बता रही थी कि इस सीधी-सादी गल्प का भी आजकल के विद्वान कुछ का कुछ अर्थ निकाल इसको कहीं के कहीं ले जाएंगे ! फिर सोचा अपने यहां खुद को छोड़ बाकियों को कुछ भी समझने-समझाने की आजादी है..........! अब यह आप पर है कि आप इस गल्प को किस तरह लेते हैं।  तो कहानी कुछ इस प्रकार है कि -
एक दिन मुल्ला नसीरुद्दीन को बैठे-बैठे यह ख्याल आया कि जैसे मैं सांझ-सबेरे छत पर चढ़ कर दुनिया-जहान का लुत्फ़ उठाता हूँ, उसका जायजा लेने का हक़ उसके प्यारे गधे को भी है ! सो दूसरे दिन अल-सुबह वह गधे को छत पर चढ़ाने को तैयार हो गया। गधे के लिए यह एक नई मुसीबत थी, वह सीढ़ी पर पैर रखने तक को तैयार नहीं था ! काफी मेहनत-मशक्कत, लाड-प्यार, धक्कम-धुक्की, खींच-तान के बाद किसी तरह मुल्ला ने गधे को छत पर ला खड़ा कर ही दिया। अब गधा तो गधा वह इस मुकाम की अहमियत जाने बिना वहां भी सर झुकाए चुपचाप खड़ा रहा ! कुछ देर बाद जब मुल्ला ने देखा कि उसके गधे को छत से दिखती नियामतों में कोई रूचि नहीं है तो उसने नीचे उतरने के लिए जब गधे को पुचकारा तो वह अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। मुल्ला ने हर तरकीब आजमा ली पर गधे को हिलना तक गवारा नहीं था। जैसे बदला ले रहा हो अपने को छत पर चढाने का ! थक-हार कर मुल्ला उसको वहीं छोड़ नीचे चला आया। पर कुछ देर बाद ही ऊपर से अजीब सी आवाजें आने लगीं जैसे कोई कुछ तोड़ रहा हो ! मुल्ला जब दौड़ कर ऊपर पहुंचा तो उसने देखा कि उनका प्यारा गधा अपनी दुलत्तियों से छत तोड़ने को आमादा है ! छत कच्ची थी, कहीं टूट ही ना जाए इस डर से मुल्ला ने गधे को हटाना चाहा तो उसने दुलत्ती मार उसी को नीचे गिरा दिया ! जब तक मुल्ला संभले तब तक गधा भी छत तोड़ नीचे आ गिरा !

मुल्ला नसीरुद्दीन ने इस हादसे पर काफी दिमाग लड़ाया और इस नतीजे पर पहुंचे कि कभी भी गधे को ऊँचे मकाम पर नहीं ले जाना चाहिए ! ऐसा करने पर वह उसी जगह को बर्बाद करता है ! ले जाने वाले को भी लतिया कर गिरा देता है और सबसे बड़ी बात खुद भी सर के बल नीचे आ गिरता है। यानी दान, ज्ञान और सम्मान सुयोग्य पात्र को ही देना चाहिए।
@संदर्भ - भास्कर     

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