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रविवार, 4 अक्टूबर 2020

मच्छर, वाल्मीकि भी जिसे नजरंदाज नहीं कर पाए

इसी आताताई से बचने की  खातिर ऋषि-मुनि ज्यादातर पहाड़ों में या गुफाओं में जा कर, विघ्न-बाधा रहित हो, तपस्या करना पसंद करते थे ! इस मच्छारासुर से बचने के लिए ही श्री विष्णु ने सागर में और भोले नाथ ने हिमगिरि को निवास बनाया ! लक्ष्मण जी ने यूं ही चौदह साल जाग कर नहीं बिताए, वे चाहते थे कि प्रभु राम इससे राहत पा आराम से रात में सो सकें ! श्री राम ने भी रीछ-वानरों की सेना इसीलिए बनाई, क्योंकि उन पर मसक का असर न के बराबर होता है। यदि मानवों की सेना होती, तो तटीय प्रदेश के नमी युक्त वातावरण में इसके प्रकोप से ही कई सैनिक परलोक गमन कर जाते ! फिर रावण की तो मौंजा ही मौंजा हो जातीं ................!

#हिन्दी_ब्लागिंग   

अभी-अभी आए कोरोना का आतंक तो है, जो शायद कुछ समय पश्चात् काबू में भी आ जाएगा ! पर क्या उसकी तुलना हमारे पीढ़ी दर पीढ़ी के हमसाया रहे मच्छर के साथ हो सकती है ! तुलना तो दूर वह तो इसके पासंग भी नहीं है ! कहां कोरोना, वंश-हीन, आकार हीन, मृत्यु हीन, दिशा हीन, असामाजिक, निर्मम वायरस ! भले ही उसके आतंक से दुनिया भर में तहलका मचा हुआ है ! अत्यंत दुःख की बात है कि इसकी वजह से लाखों लोग काल के गाल में समा चुके हैं ! फ़िलहाल जिसका प्रकोप थमता भी नहीं दिखता ! पर आशा है और लगता है कि इस पर जल्द ही काबू पा लिया जाएगा।

उधर हमारा मच्छर, अदना सा, नश्वर, वंश युक्त, साकार, सामाजिक, क्षुद्र कीट ! पर जिसका अस्तित्व प्राचीन काल से ही इस धरा पर बना हुआ है ! जिसको रामायण की रचना के दौरान महर्षि वाल्मीकि भी नजरंदाज नहीं कर पाए, ''मसक समान रूप कपि धरी, लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी !'' जो लाखों सालों से मानव का सहगामी रहते हुए भी उसके खून का प्यासा है ! जिसके कारण हर साल तकरीबन दस लाख लोगों की मौत हो जाती है ! जिसका आंकड़ा दुनिया के इतिहास में हुए युद्धों में हताहत लोगों से भी कई गुना ज्यादा है ! उस पर कभी भी काबू नहीं पाया जा सका है, और ना हीं आशा है ! तो डरना किससे है ? कौन ज्यादा खतरनाक है ? कौन ज्यादा मारक है ?  

वैसे इनकी नई पीढ़ी को पहले की बनिस्पत रक्त की आपूर्ति बहुतायाद में और वह भी कम खतरे के साथ होने लगी है। जिसका सारा श्रेय हमारी रहम दिल, परोपकारी, सूक्ष्म वस्त्र धारी ललनाओं को जाता है, जिन्होंने बारहों महीने अपने वस्त्रों में कटौती कर इन मासूम जीवों की जरूरत को पूरा करने का संकल्प ले रखा है

दुनिया भर में मच्छरों की करीब 3500 से ज्यादा प्रजातियाँ पाई जाती हैं ! जिनमें मादा की उम्र दो महीने और नर की 15 दिनों की ही होती है। मादा एक बार में तीन सौ, पर जीवन भर में सिर्फ पांच सौ अंडे ही दे सकती है। इन में सिर्फ 6% प्रजातियों की मादाएं ही इंसानों का खून चूसती हैं, वह भी ज्यादाकर समलिंगियों का, यहां भी ''नारि न मोहे नारि के रूपा", चरितार्थ होता है ! खून भी कितना, सिर्फ .01 से .1ml ! नर मच्छर इस खून-खराबे से अलग ही रहता है ! बाकी प्रजातियों की ज्यादातर नस्लें शाकाहारी होती हैं, जो पौधों, फूलों और वनस्पतियों के रस से ही अपना गुजारा कर लेती हैं ! इनमें भी करीब सौ ही ऐसी प्रजातियां हैं, जिनसे बिमारी फैलती है ! वह तो भला हो कायनात का जिसने इनको कुछ हद तक काबू कर नकेल कस दी, वर्ना यदि सारे मच्छर-मच्छरियाँ रक्त-पिपासू हो जाते तो इंसान इस धरा से कब का गो-वेंट-गॉन हो गया होता ! 

अब यह सब देख-सुन कर जब पुरानी कथाओं, किस्से-कहानियों पर ध्यान जाता है, तो मच्छर की उपस्थिति और भी प्रामाणिक और पौराणिक हो जाती है। अब जा कर यह समझ में आता है कि इसी आताताई से बचने की  खातिर ऋषि-मुनि ज्यादातर पहाड़ों में या गुफाओं में जा कर, विघ्न-बाधा रहित हो, तपस्या करना पसंद करते थे ! वन में रहने वाले तपस्व्वी, गुरूकुल के आचार्य भी हवन, यज्ञ कर इसे दूर रखने की चेष्टा करते रहते थे ! राजाओं-महाराजाओं पर चंवर क्यों डुलाए जाते थे ! आज भी अदालतों में चोबदार मुस्तैद रहते हैं कि इसके कारण जज साहब का ध्यान न्याय से ना भटक जाए ! इसका आतंक ही ऐसा है !  इसी "मसकासुर" से बचने के लिए ही श्री विष्णु ने सागर और भोले नाथ ने हिमगिरि को निवास बनाया ! लक्ष्मण जी ने यूं ही चौदह साल जाग कर नहीं बिताए, वे चाहते थे कि प्रभु राम इससे राहत पा आराम से रात में सो सकें ! श्री राम ने भी रीछ-वानरों की सेना इसीलिए बनाई, क्योंकि उन पर मसक का असर न के बराबर होता है। यदि मानवों की सेना होती, तो तटीय प्रदेश के नमी युक्त वातावरण में इसके प्रकोप से ही कई सैनिक परलोक गमन कर जाते ! रावण की तो मौंजा ही हो जातीं !

इस छुद्र कोटि के निम्न जीव से तो विश्विजेता का ख्वाबधारी सिकंदर तक नहीं बच पाया, तो बाकियों की क्या बिसात है ! चाँद-मंगल को फतह कर लेने वाला इंसान, इस बिना रीढ़ वाले जीव के सामने विवश इसलिए है, क्योंकि समय के साथ इसने अपनी आदतें बदली हैं ! यह दिनों-दिन समझदार और हाई-टेक होता चला गया है ! प्रमाण की क्या जरुरत है आप खुद ही देख लीजिए ! अब यह पहले की तरह ज्यादा गुंजार नहीं करता। कान के पास आने से परहेज करने लगा है ! जींस में बदलाव ला अपना आकार भी कुछ छोटा कर लिया है। उड़ने की शैली भी कुछ बदल कर सुरक्षात्मक हो गयी है। रक्त रूपी आहार भी कम लेने लगा है। इन सब परिवर्तनों का फायदा इस प्रजाति को मिलने भी लगा है। पहले गले तक रक्त पी, खुमार में आ आस-पास ही पड़ा रहता था, चाहे बिस्तर पर या फिर तकिए पर या फिर पास की दिवार पर और देखते-देखते हाथ के एक ही प्रहार से वहीं हार पहनने लायक रह जाता था। पर अब बदलाव के कारण यह जरुरत के अनुसार भोग लगा.. यह-जा ! वह-जा ! वैसे इनकी  नई पीढ़ी को पहले की बनिस्पत रक्त की आपूर्ति बहुतायाद में और वह भी कम खतरे के साथ होने लगी है। जिसका सारा श्रेय हमारी रहम दिल, परोपकारी, सूक्ष्म वस्त्र धारी ललनाओं को जाता है, जिन्होंने बारहों महीने अपने वस्त्रों में कटौती कर इन मासूम जीवों की जरूरत को पूरा करने का संकल्प ले रखा है।

एक-डेढ़ मिलीग्राम के इस दंतविहीन कीड़े ने वर्षों से हमारे नाक में दम कर रखा है। करोड़ों-अरबों रूपए इसको नष्ट करने के उपायों पर खर्च करने के बावजूद इसकी आबादी कम नहीं हो पा रही है। जितना पैसा दुनिया भर की सरकारें इस कीट से छुटकारा पाने पर खर्च करती हैं; वह यदि बच जाए तो दुनिया में कोई इंसान भूखा नंगा नहीं रह जाएगा। इससे बचने का उपाय यही है कि खुद जागरूक रह कर अपनी सुरक्षा आप ही की जाए। क्योंकि ये महाशय "देखन में छोटे हैं पर घाव करें गंभीर"।  

मंगलवार, 1 सितंबर 2020

बोया पेड़ बबूल का तो.....!!

क्या बबूल का पेड़ लगाने वाला इतना मूर्ख था और उसे पौधे की ज़रा सी भी पहचान और इस बात का एहसास नहीं था कि वह क्या रोपने जा रहा है ! हो सकता है, उसने सोच-समझ. देख-भाल कर, इस पेड़ को ही चुन कर लगाया हो ! उसे भलीभांति इस बात का ज्ञान हो कि यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण वृक्ष है, जिसका प्रत्येक भाग पत्तियों से लेकर फल-फूल-छाल-गोंद व जड़ तक औषधिय गुणों से भरपूर हैं और इससे अनेक आयुर्वेदिक दवाइयां बनाई जा सकती हैं। हो सकता है कि वह कोई वैद्य ही हो.....!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

एक बहुत पुरानी कहावत है, बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां ते होय ! भले ही इसकी अन्तर्निहित सीख यही है कि बुरे काम का अच्छा नतीजा नहीं मिल सकता। पर दूसरी तरफ इस मुहावरे को सुन कुछ ऐसा नहीं लगता कि जैसे बबूल का पेड़ लगाने वाले ने कोई बहुत बड़ी गलती कर दी हो और आम जैसे महत्वपूर्ण, फलदार वृक्ष की जगह इस बेकार, कंटीले व अनुपयोगी से पेड़ को लगा दिया हो ! चलो, यदि लगा भी दिया, तो फिर वह इससे आम की उम्मीद क्यों करेगा ! फिर सवाल यह भी उठता है कि ऐसा कह कौन रहा है, और किससे कह रहा है, और वह कौन है जो चुपचाप सुने जा रहा है ! कहता क्यों नहीं कि बबूल अपनी जगह आम के पेड़ से किसी भी तरह कमतर नहीं है ! 

सोचने की बात है, क्या बबूल का पेड़ लगाने वाला इतना मूर्ख था और उसे पौधे की ज़रा सी भी पहचान और इस बात का एहसास नहीं था कि वह क्या रोपने जा रहा है ! हो सकता है, उसने सोच-समझ. देख-भाल कर, चुन कर ही इस पेड़ को ही  लगाया हो ! उसे भलीभांति इस बात का ज्ञान हो कि यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण वृक्ष है, जिसका प्रत्येक भाग, पत्तियों से लेकर फल-फूल-छाल-गोंद व जड़ तक औषधिय गुणों से भरपूर हैं और इससे अनेक आयुर्वेदिक दवाइयां बनाई जा सकती हैं। हो सकता है कि वह कोई वैद्य ही रहा हो ! जिसने इंसान, समाज और पशुओं तक की भलाई को ध्यान में रख अपनी दूरदर्शिता का उपयोग करते हुए इस बहूपयोगी वृक्ष का रोपण किया हो ! अगर ऐसा है तो वह इस वृक्ष से आम की उम्मीद क्यों करेगा ! 

 
यदि मान लें  कि पौधा लगाने  वाला  कोई भोला बंदा था. जिसे  वनस्पतियों के  बारे में कोई जानकारी नहीं थी,  इसी  लिए वह अपने बबूल के पेड़ से  आम के फल की आस लगाए बैठा रहा  तो  उसे आम का  बतला कर बबूल का पौधा  किसने थमाया !  फिर वर्षों उसे  जलील  कर नसीहतें देता रहा !  इस पर  भी यदि  वह भोला बंदा अपने बबूल के पेड़ से आम की उम्मीद लगाए बैठा रहा,  तो उसके आस - पास के  किसी  भलेमानुष  ने  उसे  सच्चाई क्यों  नहीं बताई !  क्यों उसे  प्रताड़ित  करवा, उदाहरण बना  दूसरों को ज्ञान बांटना शुरू कर दिया गया ! 

                                      
वैसे तो दोनों की पेड़ों की तुलना करना ही उचित नहीं है। दोनों वृक्षों की अपनी-अपनी खूबियां हैं, अपनी-अपनी विशेषताएं हैं ! बबूल में जो औषधीय गुण हैं वे आम में नहीं हैं और जो स्वाद, मिठास व दूसरी खूबियां आम में हैं वे बबूल में नहीं हैं। कायनात ने बनाया ही इस तरह है कि जो बात आम में है वह बबूल में नहीं हो सकती और जो खासियतें बबूल में हैं उन्हें किसी दूसरे वृक्ष में खोजना तो नासमझी ही होगी ! मरू-भूमि में उगने वाले काँटेदार बबूल की अहमियत जाननी हो तो वहाँ के स्थानीय निवासियों से इसके बारे में पूछ कर देखें, जिनके लिए यह प्रकृति की बेहतरीन सौगात है।फिर आम और बबूल ही क्यों, संसार की किसी भी वनस्पति की एक दूसरे से तुलना करना या किसी को कम आंकना, किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। सब अपनी-अपनी विशेषताएं, गुण तथा उपयोगिताएं लिए होते हैं। सबकी अपनी अलग-अलग पहचान होती है ! 

                           
ऐसी मान्यता है कि बबूल के पेड़, जिसे कीकर भी कहा जाता है, पर देवताओं का वास होता है। प्राचीन काल में इसकी पूजा की जाती रही है। इसको अत्यंत शुभ, पावन और वैभवदाई माना जाता है। इसका प्रत्येक भाग किसी न किसी उपयोग में जरूर आता है। इसकी लकड़ी औरों की बनिस्पत काफी मजबूत व क्षयरोधी होती है। चाहे मरुभूमि का फैलाव हो या पानी का कटाव इसके होते इन दोनों से बचाव हो जाता है। इसीलिए इसको काटना या नष्ट करना निषेद्ध माना गया है। ऐसे पेड़ की किसी दूसरे वृक्ष से तुलना कर इसे हेय करार देना नादानी ही मानी जानी चाहिए ! अब यह दूसरी बात है कि महान संत, समाज सुधारक को बुराई की तुलना के लिए यही पादप मिला ! 

गुरुवार, 30 जुलाई 2020

तब मैं भी उतने में बेचता हूँ

शीत युग की आहट से आशंकित गांव के सरपंच ने पूरे गांव की सुरक्षा के लिए फर्रुखाबाद का जरदोजी रफ़ल (शॉल) लेने की सोची। एक विश्वसनीय दूकान से 1670/- की दर से उसने अपनी जरुरत के हिसाब से खरीदी कर ली, जिसमें अतिरिक्त कलाकारी, कीटों से सुरक्षा तथा घर-पहुंच सेवा जैसी कई सुविधाएं भी सम्मिलित थीं..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
एक समय कहीं एक सुखी, समृद्ध व खुशहाल गांव हुआ करता था। पर वक्त की मार और अपनों की रार ने उसे बदहाली के रास्ते पर धकेल दिया। फिर समय ने करवट ली ! लोगों में जागरूकता आई ! अपने पैरों पर खड़े होने की ठानी गई ! परिवेश सुधरने लगा ही था कि प्राकृतिक व ईर्ष्यालु और द्वेषी पड़ोसियों जनित संकट सर पर आ खड़े हुए ! ऐसी घडी में भी कुछ बार-बार मुंहकी खाए, समाज से नकार दिए गए कुंठित लोग, अपनी धरती और अपने लोगों की सहायता करने की बजाए अपनी नाजायज हरकतों से बाज नहीं आ रहे थे। उन्हीं की एक आत्मघाती हरकत की बानगी !

''शीत युग'' की आहट से आशंकित गांव के सरपंच ने पूरे गांव की सुरक्षा के लिए फर्रुखाबाद का जरदोजी रफ़ल (शॉल) लेने की सोची। एक विश्वसनीय दूकान से 1670/- की दर से उसने अपनी जरुरत के हिसाब से खरीदी कर ली, जिसमें अतिरिक्त कलाकारी, कीटों से सुरक्षा तथा घर-पहुंच सेवा जैसी कई सुविधाएं भी सम्मिलित थीं। पर वर्षों से उसके एक दिग्भ्रमित विरोधी को, अपनी आदतानुसार इस सौदे में भी ठगाई और मूर्खता की बू आने लगी ! उसने हो-हल्ला मचाया कि रफ़ल की कीमत सिर्फ 526/- होनी चाहिए थी। सरपंच गड़बड़ कर रहा है ! अपनी बात सिद्ध करने वह उस दुकानदार के पास गया और पूछा कि कुछ दिनों पहले तुम्हारे बगल वाला विक्रेता इसे 526/- में बेच रहा था तुम तिगुनी कीमत ले रहे हो ! विक्रेता ने पलट कर पूछा, तो आपने उसी समय उससे क्यों नहीं ले लिया था ? वह बोला, उस समय उसके पास माल नहीं था ! दुकानदार ने हस कर कहा, ''सर जी ! जब मेरे पास भी माल नहीं होता तो मैं भी 526/- में ही बेचता हूँ !'' बार-बार लज्जित होने और हास्य का पात्र बनने के बावजूद ऐसे लोग अपनी कुंठा और पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हो पाते ! द्वेषवश, अपने मान-सम्मान की चिंता छोड़ दूसरे को बदनाम करने के लिए कोई नया शगूफा तलाशने लगते हैं।  काश, ये अपनी बुद्धि, कौशल और अनुभवों को जनहित के लिए उपयोग में ला अपने गुम होते नाम, सम्मान और स्थान को फिर से पाने में अपने समय का सदुपयोग कर पाते !!  

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

आदमी तो पहले से ही कन्फ्युजियाया हुआ है

पुराने मुहावरों लोकोक्तियों या उद्धरणों को, जो अलग-अलग समय में अलग-अलग विद्वानों द्वारा अलग-अलग समय और परिस्थितियों में दिए गए थे, यदि अब एक साथ पढ़ा जाए, तो कई बार विरोधाभास तो हो ही जाता है साथ ही कुछ हल्के-फुल्के मनोरंजन के पल भी उपलब्ध हो जाते हैं। ऐसे ही कुछ उद्धरण, बिना किसी पूर्वाग्रह या कुंठा के, उन आदरणीय व सम्मानित महापुरुषों से क्षमा चाहते हुए पेश हैं ! आशा है सभी इसे निर्मल हास्य के रूप में ही लेंगे ...........................!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग     
''तूने रात बिताई सोय कर, दिवस बितायो खाय,......जन्म अमोल था कौड़ी बदले जाए !''   
* डॉक्टर कहते हैं कि स्वस्थ रहने के लिए सोना बहुत जरुरी है ?
:
"साईं इतनी दीजिए, जा में कुटुंब समाए, मैं भी भूखा न रहूं, साधू न भूखा जाए।"
वसुधैव कुटुम्बकम् ! तो कितने में कुटुंब समाएगा ? 
:
''करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान, रसरी आवत जात ते, सिल पर पड़त निसान।''
* पता नहीं कौन सुजान हुआ, सिल या रस्सी ?   
:
''काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में परलय होएगी, बहुरी करोगे कब।"
* जल्दी का काम तो शैतान का कहलाता है ?
:
"धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब-कुछ होए, माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होए।"
* फिर बहुरी कब होगी ?
:
"जो। ...उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसंग. चन्दन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग।''
* जैसी संगति वैसा ही फल ! ओछे का संग तो अंगार जैसा होता है जो जलाता भी है और दाग भी छोड़ जाता है ? 
:
''बूढे तोते भी कहीं पढ़ते हैं।''
* सीखने की कोई उम्र नहीं होती ?
:
''भूखे भजन न होय गोपाला।''
* भगवान भी पेट भरा होने पर सूझता है ?
:
"बूँद-बूँद से घड़ा भरता है।''
* समय कहां है, इंसान का जीवन तो बुलबुले के समान है ?
:
''You are what you eat.''
* आलू, प्याज, पालक, पनीर ?
:
''It takes two to make a quarrel.'' 
* एक से दो भले ?
:
''A honey tongue, a heart of gall.''
* मीठी बानी बोलिए ?
:
''Cut your coat according to your cloth."
* बे-माप, पहना कैसे जाएगा ?
:
''Silence is the best.''
* बिना रोए तो माँ भी दूध नहीं पिलाती ?
:
''A Little Knowledge Is a Dangerous thing."
* ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होए ?

सोमवार, 18 मई 2020

मैं और माइक, माइक और मैं !

लोग "कैमरा कॉन्शस" होते हैं पर मैं तो "माइक कॉन्शस" हूँ। होता क्या है कि जब किसी जुगाड़ु मौके पर कुछ बोलने के लिए खड़ा होता हूँ, तो अपने दाएं-बाएं-पीछे भी नजर  डालनी पड़ती है कि  सब सुन भी रहे हैं या मुझे हल्के में ले अपने मोबाईल में घुसे  बैठे हैं और इस कसरत में ये जनाब यदि  माइक स्टैंड  में अपनी  जगह  जड़ - मुद्रा में  एक ही जगह फिक्स हों  फिक्स हों तो अपनी आवाज,  चेहरे के लगातार  चलायमान रहने  और इनसे तालमेल  न बैठने के  कारण लोगों को मिमियाती सी लगने लगती है.........!   


#हिन्दी_ब्लागिंग

यहां मैं सिर्फ अपनी बात कर रहा हूँ, कोई अपने पर ना ले, आगे ही क्लेश पड़ा हुआ है। हाँ तो मैं कह रहा था कि इस दुनिया में बहुत सारी चीजें ऐसी हैं जिनके आप कितने भी  "used to" हो जाओ, तो भी वे आपको घास नहीं डालेंगी। अब जैसे माइक को ही लें, अरे ! वही माइक्रोफोन ! जिसे बोलते समय मुंह के सामने रखते हैं, जिससे म्याऊं जैसी आवाज भी दहाड़ में बदल जाती है ! जिससे जो नहीं भी सुनना चाहता हो उसे भी जबरिया सुनना पड़ता है ! 
इस नामुराद यंत्र को थामने का मैंने दसियों बार अवसर जुगाड़ा है, 15-20 से ले कर 100-150 तक झेलने वाले श्रोताओं के सम्मुख ! पर आज तक यह मुझसे ताल-मेल नहीं बैठा पाया है ! मुझे तो पसीना आता ही है वह तो अलग बात है !! होता क्या है कि जब किसी मौके पर कुछ बोलने के लिए खड़ा होता हूँ, तो अपने दाएं-बाएं-पीछे भी नजर डालनी पड़ती है कि सब सुन भी रहे हैं या मुझे हल्के में ले अपने मोबाईल में घुस बैठे हैं और इस कसरत में ये जनाब यदि अपनी जगह जड़-मुद्रा में एक ही जगह फिक्स हों तो अपनी आवाज, चेहरे के लगातार चलायमान रहने और इनसे तालमेल न बैठने के कारण लोगों को मिमियाती सी लगने लगती है ! यदि काबू में रखने के लिए इन्हें हाथ में जकड़ लेता हूँ तो ध्यान इसी में रहता है कि बोलते समय ये कहीं नाक या चश्में के सामने ना जा खड़े हों ! लोग "कैमरा कॉन्शस" होते हैं पर मैं तो "माइक कॉन्शस" रहता हूँ। इनका एक और भी अवतार है जो बदन पर सितारे की तरह टांक लिया जाता है पर उनसे मिलने का मुझे कभी मौका नहीं मिला। 

यह सही है कि इसका मेरा दोस्ताना रिश्ता नहीं बन सका, पर फिर भी कभी-कभी मेरे दिल में यह ख्याल आता है कि यदि ये ना होता तो क्या होता, क्या होता यदि ये ना होता ? कैसे नेता-अभिनेता जबरन जुटाई भीड़ के अंतिम छोर पर मजबूरी में खड़े व्यक्ति को अपने कभी भी पूरे न होने वाले वादों से भरमाते ! कैसे धर्मस्थलों से धर्म के ठेकेदार अपनी आवाज प्रभू तक पहुंचाते ! शादियों की तो रौनक ही नहीं रहती ! कवि तो ऐसे ही नाजुक गिने गए हैं सम्मेलनों में तो अगली पंक्ति तक को सुनाने के लिए उन्हें मंच से नीचे आना पड़ता ! गायकों के गलों की तो ऐसी की तैसी हो गयी होती ! ऐसे ही छत्तीसों काम जो आज आसान लगते हैं, हो ही नहीं पाते !  
ना चाहते हुए भी तारीफ़ करुं क्या उसकी, जिसने इसे बनाया ! 1876 में, एमिली बर्लिनर (Emile Berliner)  से जब इसकी ईजाद हो गयी होगी तब उसे क्या पता था कि उसने कौन सी बला. दुनिया को तौहफे में दे डाली है, जिसका आनेवाले दिनों में टेलिफोन, ट्रांसमीटरों, टेप रेकार्डर, श्रवण यंत्रों, फिल्मों, रेडिओ, टेलीविजन, मेगाफोनों, कम्प्यूटरों  और कहाँ-कहाँ नहीं होने लगेगा। उस बेचारे को तो यह भी नहीं पता होगा कि भविष्य में ध्वनि प्रदूषण जैसी  समस्या होगी जिसमें उसकी यह ईजाद मुख्य अभियुक्त हो जाएगी !  

अब जरुरी तो नहीं कि जिससे मेरी न पटती हो उसकी किसी से भी न पटे ! हमारा आपसी रिश्ता जैसा भी हो पर है तो यह गजब की चीज इसमें कोई शक नहीं है ! है क्या ? 

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

बंगाल में शतरंज के खेल में घटी थी एक अप्रत्याशित घटना

कोलकाता के श्याम बाजार इलाके से बी. टी. रोड पकड दक्खिनेश्वर पहुंच, डनलप ब्रिज पार करने के उपरांत आता है चिड़िया मोड़ का चौराहा। जहां से एक सड़क दायीं ओर निकल जाती है दमदम एयर पोर्ट की तरफ। यहीं से बाएं मुड़ने पर करीब साढ़े तीन सौ मीटर दूर भीम चंद्र नाग की मिठाई की दूकान से लगी सर्पाकार गली, जो गंगा किनारे तक चली गई है, के बीचो-बीच स्थित है छेनू बाबू का मोहल्ला ! जिसके मुहाने पर पंडित जी की चाय और देबू की छुट-पुट चीजों के खोखे से चार मकान छोड़ एक दुमंजिला इमारत के दालान को घेर कर एक बड़े कमरे का रूप दे उसी को क्लब का नाम दे दिया गया है। इसी मोहल्ले के इसी क्लब में घटी थी वह घटना, जो बंगाल के शतरंज के खेल के इतिहास में अनोखे शब्दों में दर्ज हो गयी............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
शतरंज  बड़ा अजीब खेल है ! इसमें खेलने वाले से ज्यादा, देखने वालों को चालें सूझती हैं। 
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बंगाल, यहां के बारे में मशहूर था कि बंगाल बाकी देश के पहले ही भविष्य भांप लेता है ! इसीलिए हर बंगवासी में एक उत्कृष्टता का भाव बना ही रहता था। 
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उन दिनों कलकत्ता (आज का कोलकाता) और उपनगरीय इलाकों के तक़रीबन हर ''पाड़े'' में एक क्लब हुआ करता था, जिसमें कैरम, ताश, शतरंज जैसे अंतरदरवाजीय खेलों के साथ ही हर प्रकार की बहस-मुसाहिबी का भी इंतजाम रहता था। जहां शाम घिरते ही इलाके के दादा (मुंबइया अर्थ से ना जोड़ें), दिन भर की एकरूपता से ऊबे भद्रलोक, समाज की विसंगतियों से आक्रोशित युवा,  विवाह रूपी बंधनों से मुक्त अधेड़, दिशाहीन कुंठित युवक, तथाकथित छुटभइए नेता आदि उस छोटे से कमरे में उधार की चाय पीने के लिए आ  जुटते थे। दुनिया भर की बातों पर धुंआधार गोष्ठियां होतीं, तीखी बहसें आग उगलने लगती, व्यवस्था के विरोध में तकरीरें सामने आने लगतीं। कभी-कभी तो लगता कि आज देश को नई दिशा और नेतृत्व मिल कर ही रहेगा। ऐसा माहौल तकरीबन बंगाल के सारे अड्डों में पाया जाता था। भड़ास निकल जाने के बाद बाबू लोग निकल पडते अपने-अपने घरों की ओर, भात खा, सुबह के दफ्तर की चिंता में चश्मा, छाता, सुंघनी, रुमाल, धोती-कमीज को सरिया, सोने के लिए ! यह दिनचर्या भी करीब-करीब सब जगह कमोबेस ऐसी ही होती थी। 
 पर इन सब के बीच कुछ लोग हर तरफ से निस्पृह रह, सिर्फ और सिर्फ अपने मनपसंद खेलों में ही आपाद-मस्तक डूबे रहते थे ! उन्हें आस-पास के शोर-शराबे से कोई मतलब नहीं हुआ करता था। लोकप्रियता में कैरम और ताश के बाद शतरंज का नंबर आता था। इसे चाहने वाले भी बहुत होते थे। पर एक समय में खेल सिर्फ दो जने ही सकते थे ! सो पहले आओ, पहले पाओ की तर्ज पर दो जने हक़ जमा लेते थे बिसात पर ! अपने को सर्वोपरि, विलक्षण, विश्वनाथन आनंद के समकक्ष मानने वाले बाकी लोग न खेल पाने की कुंठा लिए सिर्फ घेर पाते थे मेज को चारों ओर से दर्शक बन। ऐसा भी तक़रीबन सभी क्लबों में होता था। पर जो कभी किसी जगह नहीं हुआ, वह हो गया बेलघरिया के एक पाड़े के एक क्लब में ! जहां और जगहों की बनिस्पत शतरंज लोकप्रियता में पहले स्थान पर था। सुस्त व जोश रहित होने के बावजूद वहां इसकी जटिलता, सैंकड़ों व्यूह रचनाओं, त्वरित सोची जाने वाली हजारों-हजार चालों से बनते-बिगड़ते नक्शों की भूल-भुलैया के इंद्रजाल में गाफिल आत्मश्लाघि दिग्गजों और समर्पित आशिकों की मात्रा भी बेहिसाब थी।  
कोलकाता के श्याम बाजार इलाके से बी.टी. रोड पकड़ दक्खिनेश्वर पहुंच, डनलप ब्रिज पार करने के उपरांत आता है चिड़िया मोड़ का चौराहा। जहां से एक सड़क दायीं ओर निकल जाती है दमदम एयर पोर्ट की तरफ। यहीं से बाएं मुड़ने पर करीब साढ़े तीन सौ मीटर दूर भीम चंद्र नाग की मिठाई की दूकान से लगी सर्पाकार गली, जो गंगा किनारे तक चली गई है, के बीचो-बीच स्थित है छेनू बाबू का मोहल्ला ! जिसके मुहाने पर पंडित जी की चाय और देबू की छूट-पुट चीजों के खोखे से चार मकान छोड़ एक दुमंजिला इमारत के दालान को घेर कर एक बड़े कमरे का रूप दे उसी को क्लब का नाम दे दिया गया है। इसी मोहल्ले के इसी क्लब में घटी वह घटना, जो बंगाल के शतरंज के खेल के इतिहास में अनोखे शब्दों में दर्ज हो गयी। 

विश्व के शतरंज के खेल में विश्वनाथन के पदार्पण की धमक सुनाई देने लगी थी। जिसकी आहट से उसके कोच, साथी खिलाड़ीयों के साथ-साथ विश्व के दिग्गज भी अचंभित थे। जाहिर है इसका असर देश के सिखिए-नौसिखिए खिलाड़ियों पर पडना ही था सो पड़ा ! और ऐसा पड़ा कि गली-कूचे-मौहल्ले के सभी शतरंजिए अपने आप में आनंदित हो अपने को विश्वविजेता ही समझने लग गए। इसका असर हमारे छेनू बाबू वाले क्लब पर भी तो पड़ना ही था। सो वहां खेलने वाले दो और उन्हें चाल समझाने वाले पचीसों हो गए। खेल के दौरान तरह-तरह की सलाहें दी जाने लगीं। कभी-कभी तो सलाहकारों में आपस में ही अपनी सलाह और उसकी सटीकता पर बहसबाजी हो जाती। दिन ब दिन दर्शकों का हस्तक्षेप बढ़ता ही चला जाने लगा। ऐसे में खेलने वालों की एकाग्रता पर असर पड़ना ही था ! धीरे-धीरे खेलना दूभर होता जाने लगा। अति हो जाने पर किसी कड़े नियम के प्रावधान के होने की जरुरत शिद्दत से महसूस की जाने लगी ! इसीलिए एक दिन सभी मेम्बरों की आपात बैठक बुला कर इस समस्या पर विचार किया गया ! काफी  जद्दो-जहद के बाद सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पास कर दिया गया कि खेल के दौरान यदि कोई अनावश्यक हस्तक्षेप करेगा तो उसकी नाक क्षत कर दी जाएगी। प्रस्ताव की गंभीरता को दिखाने के लिए एक नया, तेज, नोकीला चाक़ू भी ला कर कप बोर्ड पर सजा दिया गया। 

उक्ति काम कर गई ! लोग कुलबुलाते तो बहुत थे पर सलाह देने की हिम्मत नहीं कर पाते थे। खिलाड़ी शांति के साथ, बिसात पर अपने हुनर का प्रदर्शन करने का सुख पाने लगे। पर वह जादू ही क्या, जो सर चढ़ कर ना बोले ! अभी महीना भी नहीं गुजरा था, पंद्रह-बीस दिन ही हुए थे कि एक शाम शांतनु चटर्जी और बिमल दा, जोकि यहां के बेमिसाल और सर्वमान्य विजेता थे और इसी कारण कुछ लोगों की ईर्ष्या का वायस भी, की बाजी फंस गई ! आज पहली बार शांतनु को बढ़त प्राप्त थी ! पर काफी देर से उसे खेल ख़त्म करने का रास्ता नहीं सूझ रहा था। घडी की सूई लोगों का रक्तचाप बढ़ाए जा रही थी। तभी एक अप्रत्याशित घटना घट गई ! अचानक कन्हाई ने आगे बढ़ कर कहा, भले ही मेरी नाक क्षत हो जाए पर यह शह और यह मात ! इतना कह उसने शांतनु के घोड़े से बिमल दा के ऊँट को विस्थापित कर दिया !

वहां फिर जो हुआ सो हुआ ! क्या हुआ इसका अंदाजा लगाते रहिए ! पर यह स्थापित हो गया कि शतरंज एक अजीबो-गरीब खेल था ! है ! और रहेगा !   

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