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शनिवार, 1 फ़रवरी 2025

वर्षों से चुगलखोरी की सजा भुगतती, एक मजार

भोलू सैय्यद तो मर गया ! पर उसको दी गई वह अनोखी सजा, उसकी जर्जरावस्था तक पहुंच चुकी मजार आज भी भुगत रही है। जो ना जाने कब से दी जा रही है और ना जाने कब तक दी जाती रहेगी। उस समय तो राजाओं ने अक्लमंदी से काम ले एक बड़ी विपदा टाल दी थी ! पर आज के राजा तो खुद भोलू सैय्यद बने हुए हैं ! इनके द्वारा लाई गईं विपदाएं कौन टालता है, यही देखना है ! उस समय तो राजा ने प्रजा को सजा दी थी, आज प्रजा राजा को उसकी करनी का दंड दे दे, तो कोई अचरज नहीं.............!     

#हिन्दी_ब्लागिंग 

ईर्ष्या, द्वेष, वैमनस्य, प्रतिशोध जैसी भावनाऐं हर शख्स के मन में कमोबेश होती ही हैं ! बिरले संत-महात्मा ही इससे निजात पा सकते हैं ! इन्ही भावनाओं के तहत चुगली और झूठ जैसी आदतें भी आती हैं, जिनका सहारा अक्सर अपने व्यक्तिगत हित-लाभ के लिए लिया जाता रहा है ! इसके लिए किसी को कोई बड़ी सजा भी नहीं मिलती है। पर इतिहास में अपवाद स्वरूप चुगली के कारण दी गई एक अनोखी सजा का विवरण मिलता है जो दोषी के मरणोपरांत भी वर्षों से बाकायदा जारी है ! 

उपेक्षित, जर्जर इमारत 

मध्य प्रदेश के इटावा-फर्रुखाबाद मार्ग पर दतावली गांव के पास जुगराम जी का एक प्रसिद्ध मंदिर है। उसी से जरा आगे जाने पर खेतों में भोलू सैय्यद का मकबरा बना हुआ है। जो अपने नाम और खुद से जुड़ी प्रथा के कारण खासा मशहूर है। इसे चुगलखोर की मजार के नाम से जाना जाता है और प्रथा यह है कि यहां से गुजरने वाला हर शख्स इसकी कब्र पर कम से कम पांच जूते जरूर मारता है। क्योंकि यहां के लोगों में ऐसी धारणा है कि इसे जूते मार कर आरंभ की गयी यात्रा निर्विघ्न पूरी होती है। अब यह धारणा कैसे और क्यूँ बनी, कहा नहीं जा सकता। इसके बारे में अलग-अलग किंवदंतियां प्रचलित हैं !

वीरानगी 
ऐसा क्यों है इसकी कोई निश्चित प्रामाणिकता तो नहीं है पर जैसा यहां के लोग बताते हैं कि बहुत पहले इस विघ्नसंतोषी, सिरफिरे इंसान ने अपने किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए इटावा के राजा तथा अटरी के हुक्मरान को गलत अफवाहें फैला कर लड़वा दिया था। वह तो युद्ध के दौरान ही सच्चाई का पता चल गया और व्यापक जनहानि होने से बच गयी। इसे पकड़ मंगवाया गया और मौत की सजा दे दी गई। पर ऐसा नीच कृत्य करने वाले को मर कर भी चैन ना मिले इसलिये उसका मकबरा बनवा कर यह फर्मान जारी कर दिया गया कि इधर से हर गुजरने वाला इस कब्र पर पांच जूते मार कर ही आगे जायेगा। जिससे भविष्य में और कोई ऐसी घिनौनी हरकत ना करे।

दूसरों को दंडित करने की तत्परता 
इसके अलावा इसे 1129 में हुई राजा जयचंद और मुहम्मद गोरी की लड़ाई से भी जोड़ा जाता है ! कहते हैं उस समय यहां राजा सुमेर सिंह का राज था जिन्होंने इस युद्ध में राजा जयचंद का साथ दिया था ! युद्ध के दौरान उनकी खुफिया जानकारियां, वहां फकीर के रूप में रह रहे एक जासूस भोला सैय्यास ने गोरी तक पहुंचाईं थीं ! भेद खुलने पर राजा सुमेरसिंह ने उसे मृत्यु दंड दिया था, जिसमें उसकी जान जाने तक पत्थरों-जूतों से मारने की सजा थी ! उसके बाद उसकी मजार बनवा उस पर पत्थर लगवा कर उस पर चुगल खोर की मजार लिख, यह फर्मान जारी किया गया कि जो भी इधर से गुजरे वह इसको जूतों से मार कर ही आगे जाए ! तब से ऐसा ही चला आ रहा है ! पर अब बहुत कम हो चुका है !  

इंसानों के दिल-ओ-दिमाग का भी जवाब नहीं है ! मजार है ! इसलिए धीरे-धीरे लोग यहां मन्नत मांगने भी आने लगे हैं। हालांकि उसके लिए भी कब्र को फूल या चादर के बदले जूतों की पिटाई ही नसीब होती है ! इसके अलावा इधर से यात्रा करने वाले कुछ लोगों का मानना है कि यह रास्ता बाधित है इसलिए भी लोग खुद और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए मजार की जूतम-पैजार कर के ही अपनी यात्रा जारी रखते हैं ! 

भोलू सैय्यद तो मर गया, पर उसको दी गई वह अनोखी सजा, उसकी जर्जरावस्था तक पहुंच चुकी मजार आज भी भुगत रही है। जो ना जाने कब से दी जा रही है और ना जाने कब तक दी जाती रहेगी। उस समय तो राजाओं ने अक्लमंदी से काम ले एक बड़ी विपदा टाल दी थी ! पर आज के राजा तो खुद भोलू सैय्यद बने हुए हैं ! इनके द्वारा लाई गईं विपदाएं कौन टालता है, यही देखना है ! इतिहास खुद को दोहराता तो है पर कभी-कभी थोड़ी बहुत तबदीली भी तो हो ही जाती है ! उस समय तो राजा ने प्रजा को सजा दी थी, आज प्रजा राजा को उसकी करनी का दंड दे दे, तो कोई अचरज नहीं.............!     

@चित्र, संदर्भ, अंतर्जाल के सौजन्य से 

रविवार, 29 दिसंबर 2024

इतिहास किसी के प्रति भी दयालु नहीं होता

इतिहास नहीं मानता किन्हीं भावनात्मक बातों को ! यदि वह भी ऐसा करता तो रावण, कंस, चंगेज, स्टालिन, हिटलर जैसे लोगों पर गढ़ी हुई अच्छाईयों की कहानियां ही हम सुन रहे होते ! पर इतिहास तो इतिहास है ! इस मामले में वह निस्पृह होने के साथ-साथ निर्मम भी बहुत है ! ऐसे में अपने कर्मों को जानते हुए भी यदि कोई कहे कि इतिहास उसके प्रति दयालु होगा या दयालुता बरतेगा, तो यह तो उसकी नासमझी ही होगी.............!

#हिंदी_ब्लागिंग 

हमारे पुराणों में शनिदेव को न्याय का देवता माना जाता है ! मान्यता है कि वह संसार के सभी प्राणियों को बिना किसी किसी भेदभाव, बिना किसी पक्षपात, बिना किसी दया-माया के उनके कर्मों के अनुसार फल देते हैं ! उनकी इसी न्याय प्रक्रिया के कारण डरते हैं लोग उनसे ! उन्हें क्रूर माना जाता है। इतिहास भी कुछ-कुछ वैसा ही है। यह भले ही कर्मों का फल ना देता हो, पर हर हाल में उनको उजागर जरूर करता है,  बिना कुछ छिपाए ! इस मामले में वह बड़ी निर्ममता से शल्य चिकित्सा करता है ! किसी की नहीं सुनता। इसीलिए कहा जाता है कि उससे सबक लेना चाहिए ! सीखना चाहिए उससे !

इतिहास कभी भी भेदभाव नहीं करता, नाहीं वह किसी का पक्ष लेता है ! सत्ताधीश उसे विकृत करने की कितनी भी कोशिश कर लें ! कुछ समय के लिए भले ही उस पर अपना मुखौटा मढ़ दें ! उसे जमींदोज कर उस पर झूठ का प्लास्टर चढ़ा दें, पर उसके सच का बीज इतना ताकतवर है कि वह हर विपरीत परिस्थिति को दरकिनार कर अंकुरित हो कर ही रहता है, कुछ समय भले ही लग जाए !

हमारी अच्छी या बुरी जो भी कह लें परंपरा रही है कि किसी के निधन के बाद उसकी बुराई नहीं करनी चाहिए, पर इतिहास तो नहीं ना मानता ऐसी भावनात्मक बातों को ! यदि वह भी ऐसा करता तो रावण, कंस, चंगेज, स्टालिन, हिटलर जैसे लोगों पर गढ़ी हुई अच्छाईयों की कहानियां ही हम सुन रहे होते ! पर इतिहास तो इतिहास है ! इस मामले में वह निस्पृह होने के साथ-साथ निर्मम भी बहुत है ! ऐसे में अपने कर्मों को जानते हुए भी यदि कोई कहे कि इतिहास उसके प्रति दयालु होगा या दयालुता बरतेगा, तो यह तो उसकी नासमझी ही होगी ! 

आज यानी वर्तमान में जो लिखा-बोला जा रहा है वही समयानुसार इतिहास बनेगा ! परंपरानुसार दो-चार दिन की बात छोड़ दें, भले ही मजबूरीवश, तो उसके बाद शालीनता, मृदु भाषा, सहनशीलता की पूरी विवेचना तो होगी ही, साथ ही साथ लिप्सा, कमजोरी, लियाकत, आत्म सम्मान हीनता का भी पूरा लेखा-जोखा लिया जाएगा ! देश, समाज का कितना भला हुआ और कितना नुक्सान उसका आकलन होगा और फिर जो निर्मम सत्य सामने आएगा, वही आगे चल कर इतिहास बनेगा जो ना किसी के साथ दयालुता बरतता है ना हीं बिना बात कठोरता.........!

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