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रविवार, 10 मई 2020

माँ एक शब्द नहीं पूरी दुनिया है

वैसे माँ को कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके लिए कोई ख़ास दिन बनाया गया है कि नहीं। उसे न तोहफों की लालसा होती है नाहीं उपहारों की ख्वाहिश। मिल जाएं तो ठीक, ना मिलें तो और भी ठीक। भगवान से भले ही वह नाखुश हो जाए पर अपने बच्चों के लिए उसके मुख पर सदा आशीष ही रहती है। इसीलिए  ऊपर वाले से कुछ मांगना हो तो सदा हमें अपनी माँ की सलामती मांगनी चाहिए, हमारे लिए तो माँ हर वक़्त दुआ मांगती ही रहती है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
माँ एक शब्द नहीं पूरी दुनिया है, जो सिर्फ देना जानती है, लेना नहीं ! उसकी ममता का, निस्वार्थ प्रेम कोई ओर-छोर नहीं होता। सागर से गहरे, धरती से सहनशील और आकाश से भी विशाल उसके स्नेहसिक्त आँचल में तो तीनों लोक समाए रहते हैं। मनुष्य को प्रकृति प्रदत्त यह सबसे बड़ी नेमत है, जिसका कोई सिला नहीं ! माँ इस धरती पर ईश्वर का प्रत्यक्ष रूप है। जिस घर में माँ खुश रहती है, वहां खुशियों का खजाना कभी खाली नहीं होता। कोई कष्ट, कोई व्याधि, कोई मुसीबत नहीं व्यापति ! अपने बच्चों को खुश देख खुश रह लेने वाली माँ अपनी ख़ुशी के एवज में भी बच्चों की ख़ुशी ही मांगती है !
माँ, पिकासो की अमर कृति 
जिस माँ के बिना इस दुनिया की कल्पना नहीं की जा सकती; उसी के लिए हमने एक दिन निर्धारित कर दिया....! माँ या उसका ममत्व कोई चीज या वस्तु नहीं है कि उसके संरक्षण की जरुरत हो ! नाहीं वह कोई त्यौहार या पर्व है कि चलो एक दिन मना लेते हैं ! अरे ! जब भगवान के लिए कोई दिन निर्धारित नहीं है; तो फिर माँ के लिए क्यों ? भगवान भी माँ से बड़ा नहीं होता ! वह तो खुद माँ के चरणों में पड़ा रह खुद को धन्य मानता है !
वैसे माँ को कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके लिए कोई ख़ास दिन बनाया गया है कि नहीं। उसे न तोहफों की लालसा होती है नाहीं उपहारों की ख्वाहिश। मिल जाएं तो ठीक, ना मिलें तो और भी ठीक। वह तो निस्वार्थ रह बिना किसी चाहत के अपना प्यार उड़ेलती रहेगी। ख़ुशी में सबके साथ खुश और दुःख में आगे बढ़, ढाढस दे आंसू पोछंती रहेगी। भगवान से भले ही वह नाखुश हो जाए पर अपने बच्चों के लिए उसके मुख पर सदा आशीष ही रहती है। इसीलिए ऊपर वाले से कुछ मांगना हो तो सदा हमें अपनी माँ की सलामती मांगनी चाहिए, हमारे लिए तो माँ हर वक़्त दुआ मांगती ही रहती है।

सोमवार, 19 नवंबर 2018

विश्व टॉयलेट दिवस

यदि खुले में शौच जाना बंद हो जाए तो हर साल करीब सवा दो करोड़ जानें बचाई जा सकती हैं ! एक सर्वे के अनुसार सौ ग्राम इंसानी मल में करीब दो अरब हानिकारक परजीवी कीटाणु-जीवाणु पाए जाते हैं। अंदाज लगाया जा सकता है कि हम जाने-अनजाने कितना विष रोज वातावरण में घोलते जाते हैं। पहले की बात अलग थी आबादी काफी कम हुआ करती थी। लोग खेतों-जंगलों में निवृत हो आते थे तो प्रकृति संभाल लेती थी। पर अब जब जंगलात वगैरह खत्म हो रहे हैं, खेतों में रसायनों का चलन बढ़ रहा है तो उन्हें और दूषित कर हम अपराध ही तो कर रहे हैं..........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग    
आज  विश्व टॉयलेट दिवस है। इसे प्रत्येक वर्ष आज के ही दिन 19 नवंबर को इस उद्देश्य के साथ मनाया जाता है कि लोगों को गंदगी के खिलाफ जागरूक किया जाए, उन्हें स्वच्छता का महत्व बताया जाए जिससे असमय इंसानी गंदगी से होने वाली करोड़ों जानों को असमय कालल्वित होने से बचाया जा सके ! इसी दिन 19 नवंबर 2001 को सिंगापुर में जैक सिम नाम के एक जागरूक इंसान ने 15 सदस्य देशों के साथ एक
अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संस्था ''विश्व शौचालय संगठन'' की शुरूआत की थी। इसी संस्था ने दुनिया के कई देशों में लोगों को जागरुक करने के लिए विश्व शौचालय सम्मेलन आयोजित किए। जिससे प्रभावित हो कर बारह साल बाद संयुक्त राष्ट्र ने मान्यता दी। उन्हीं के अनुसार आज भी विश्व की तकरीबन ढाई अरब की आबादी को पर्याप्त स्वच्छता मयस्सर नहीं है ! इसके अलावा करीब एक अरब लोग खुले में निवृत होने को मजबूर हैं, जिनमें से लगभग आधे हमारे देश में ही हैं ! इस विवशता के कारण सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं और बालिकाओं को होती है।दुनिया में हर तीन में से एक महिला को सुरक्षित शौचालय की सुविधा उपलब्ध नहीं है। खुले में जाने से बीमारियां तो फैलती ही हैं पर्यावरण भी दूषित होता है। इसी कारण, देर से ही, सरकार द्वारा चलाए गए स्वच्छ भारत अभियान का स्वागत होना चाहिए ! पर उसके पूर्णतया सफल होने में कुछ दिक्कतें भी आ रही हैं। पहली तो सरकारी अमले की तरफ से ही है ! अपना ''टारगेट'' पूरा करने के लिए आधे-अधूरे शौचालयों का निर्माण, जो बने भी हैं उनमें पानी अनुपलब्धता, जल-मल का अनुचित प्रबंधन ! इसके साथ ही हमारे लोगों की मानसिकता भी एक अड़चन है, जिनके मुताबिक खुले में शौच जाना ज्यादा सुविधाजनक उपाय है।



यह तो बाहर-अंदर की बात हुई ! एक और बहस तकनिकी पर भी जोरों-शोरों से चल रही है और वह है कि कौन सा टायलेट या ढंग, शौच जाने के लिए बेहतर है, योरोपियन या भारतीय ! इसमें भारतीय पद्यति के पक्ष में कुछ बातें जाती हैं, जैसे उकडूँ बैठ कर निवृत होने की क्रिया प्राकृतिक मुद्रा है। इसमें तो दो राय नहीं है: प्रकृति ने भी माँ के गर्भ में जीव को उँकड़ू हो कर ही पलने दिया है। इस मुद्रा में जाघों का दवाब आँतों पर पड़ने से पेट ठीक से साफ़ होता है। इससे आँतों की क्रियाशीलता बढ़ती है। कब्ज की शिकायत नहीं रहती। पाचन ठीक से होता है और सबसे बड़ी बात आँतों के कैंसर की संभावना कम हो जाती है। कमोड से शरीर के ज्यादा हिस्से का सम्पर्क नहीं होने से यह स्वास्थ्यप्रद भी है। इसमें थोड़ी वर्जिश भी हो जाती है। गर्भवती महिलाओं के लिए भी यह लाभदायक होता है। इन बातों को तो अब योरोप के डॉक्टर भी मानने लगे हैं। हाँ एक बात इसके विरुद्ध यह जाती है कि ज्यादा उम या किसी रोग से कमजोर पुरुषों व महिलाओं को इस पर बैठ कर उठने में बहुत कष्ट होता है। ऐसे लोगों या उनके लिए जो किसी भी कारणवश सीट वाले टॉयलेट का उपयोग नहीं छोड़ना चाहते वे अपने पैरों के नीचे एक सात-आठ इंच ऊंचा स्टूल रख लें जिससे घुटने कुछ दवाब के साथ पेट से जा लगें। इससे सीट पर बैठने से होने वाली समस्याओं का कुछ हद तक निदान हो सेहोने वाली समस्याओं का कुछ हद तक निदान हो जाएगा।



एक सर्वे के अनुसार यदि खुले में शौच बंद हो जाए तो हर साल करीब सवा दो करोड़ जानें बचाई जा सकती हैं। उनके अनुसार सौ ग्राम इंसानी मल में करीब दो अरब हानिकारक परजीवी कीटाणु-जीवाणु पाए जाते हैं। अंदाज लगाया जा सकता है कि हम जाने-अनजाने कितना विष रोज वातावरण में घोलते जाते हैं। पहले की बात अलग थी आबादी का थी लोग खेतों जंगलों में निवृत हो जाते थे तो प्रकृति संभाल लेती थी। पर अब जब जंगलात वगैरह खत्म हो रहे हैं, खेतों में रसायनों का चलन बढ़ रहा है तो उन्हें और दूषित कर हम अपराध ही तो कर रहे हैं। 

इस बारे में लोगों की सोच तो बदलते-बदलते ही बदलेगी। पर अभी सभी का ध्यान ऐसे शौचालयों के निर्माण की ओर हैं जो पर्यावरण मित्र भी हों और उनमें पानी की खपत भी ना हो ! क्योंकि अभी दूर-दराज के क्षेत्रों में, जहां ना ''सीवरेज'' की सुविधा होती ही नहीं पाइपों द्वारा जल-मल को दूर भेजा जा सकता है ! गड्ढे इत्यादि बना कुछ तो हल निकलता है पर उसमें भी दसियों दिक्कतें रहती ही हैं। इसलिए शौचालय तो बन जाते हैं पर निस्तारण की समस्या खड़ी हो जाती है। सारे संसार में इस ओर कोशिशें हो रही हैं कुछ देशों ने अति आधुनिक व्यवस्था खोज भी ली है। आशा है जल्दी ही इस विश्व-व्यापी समस्या का निदान हो जाएगा। 

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अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...