किसान आंदोलन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
किसान आंदोलन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 7 फ़रवरी 2021

कुछ हो तो जरूर रहा है

शुरुआत में  नौसिखिए खिलाड़ियों के मारे गए बेतरतीब शॉट्स के कैच लपक जो वाम पंथी पूरी तरह से मैच पर हावी हो, उद्दंडता, हठधर्मिता के बाउंसर फेंक रहे थे; दर्शक-दीर्घाओं से अपने लिए समर्थन जुटा रहे थे, वे मैदान के बाहर हो गए ! सारा परिदृश्य ही बदल गया। परिस्थियाँ बदल गईं।बागडोर अब टिकैत के हाथ में आ गई थी। पंजाब का आंदोलन अब यू पी के नाम हो गया। उसी पश्चिमी यू.पी. के नाम जिसने भाजपा को 44 में से 37 सीटें दीं ! लोकसभा की 9 में से  सात सीटों से नवाजा था ! अब जो सहमति होगी उसका सारा श्रेय भी उत्तर प्रदेश को ही मिलेगा .............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कुछ हो तो जरूर रहा है ! कोई जरुरी नहीं कि मैं सही ही होऊँ ! मैं गलत भी हो सकता हूँ ! पर पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि जो दिख रहा है वैसा हो नहीं रहा और जो हो रहा है वह दिख नहीं रहा ! यवनिका के पीछे बहुत ही सोच-समझ कर, समझदारी और चतुराई से समस्या का आकलन कर उससे पार पाने की तरकीब निकाली जा रही है। जिन्होंने वर्षों-वर्ष से चली आ रही अड़चनों को एक झटके में दूर कर दिया हो वे क्या देश की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने वालों की हरकतों पर हाथ पर हाथ धरे बैठे होंगे ! 

फिर सहमति का सारा श्रेय भी पंजाब के वामियों-कांगियों ने ले उड़ना था ! पर अब जो भी होगा उसका सारा श्रेय उत्तर प्रदेश को मिलेगा। उसके किसानों को मिलेगा 

करीब दो अढ़ाई महीने पहले जो किसान आंदोलन पंजाब से शुरू हुआ जिसे कुछ स्पोर्ट हरियाणा से मिला उसमें सबसे ज्यादा प्रतिशत पंजाब के वाम पंथी और उग्रवादी नेताओं का था ! जिनका मुख्य उद्देश्य शायद किसानों की सहायता से ज्यादा केंद्र सरकार को नीचा दिखाना था। इसीलिए दसियों बैठकें हुईं सरकार के साथ पर कोई नतीजा नहीं निकला या निकलने नहीं दिया गया ! फिर गणतंत्र दिवस पर जो हुआ उसे विश्व ने देखा !

26 जनवरी के कांड के दो दिन बाद एकबारगी तो लगा कि नौटंकी का पटाक्षेप हो गया है और सरकार ने पूरी तरह स्थिति पर काबू पा लिया है। पर अचानक नाटक में जुटे बीसियों किसान नेताओं में से एक, पश्चिमी उतर प्रदेश के राकेश टिकैत, जो अपने दल का मुख्य प्रवक्ता था, मुखिया नहीं, ने अपने अभिनय का कौशल दिखलाया और इस बार पंजाब के बदले उत्तर प्रदेश के किसानों के हुजूम को दिल्ली बार्डर पर ला, चरित्र अभिनेता से नायक बन गया ! यहीं से लगने लगा कि शतरंज पर एक नए व्यूह की रचना कर दी गई है !

शुरुआत में  नौसिखिए खिलाड़ियों के  मारे गए बेतरतीब शॉट्स के कैच लपक जो वाम पंथी पूरी तरह से मैच पर हावी हो, उद्दंडता,  हठधर्मिता के बाउंसर फेंक रहे थे;  दर्शक-दीर्घाओं से अपने लिए  समर्थन जुटा रहे थे वे मैदान के बाहर हो गए !  सारा परिदृश्य ही बदल गया।  परिस्थियाँ बदल गईं। बागडोर अब टिकैत के हाथ में आ गई थी। पंजाब का आंदोलन अब यू पी के नाम हो गया। उसी पश्चिमी यू.पी. के नाम जिसने भाजपा को 44 में से 37 सीटें दीं ! लोकसभा की 9 में से  सात सीटों से नवाजा था। जहां  वोट प्रतिशत क्रमश: 43.6 और 53.1 हो, वहीं के किसानों से बात होगी। हो सकता है कि इस बार सरकार दो कदम पीछे भी हटे !  किसानों को संतुष्ट किया जाएगा !  सरकार और  किसान दोनों का सम्मान बचा रहेगा ! उधर वामियों-कांगियों को, जो अभी तक मोदी जी को समझ ही नहीं पा रहे, फिर कहीं मुंह छुपाने की जगह खोजनी होगी। 

यदि 28 की रात को दिल्ली बॉर्डर खाली करवा लिया जाता तो उसका एक संदेश यह भी जा सकता था कि सरकार ने जबरदस्ती दमनकारी रुख अख्तियार कर आंदोलन ख़त्म करवाया। तानाशाही काआरोप जड़ दिया जाता। लुटे-पिटे विपक्ष को तो मौका चाहिए ही होता है। फिर सहमति का सारा श्रेय भी पंजाब के वामियों-कांगियों ने ले उड़ना था ! पर अब जो भी होगा उसका सारा श्रेय उत्तर प्रदेश को मिलेगा। उसके किसानों को मिलेगा ! अभी भले ही सरकार की मुश्किलें बढ़ी हुई लग रही हों पर मुझे लगता है कि बहुत जल्द इस समस्या का हल निकाल लिया जाएगा ! क्योंकि आगामी साल यू.पी. में फिर चुनाव हैं उन पर भी इस बात का सकारात्मक प्रभाव पडेगा। 

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

विदेशी ट्विटर वीरांगनाएं और देसी किसान

इन ट्विटर वीरांगनाओं में से एक तो किसी तरह की तवज्जो देने के लायक ही नहीं हैं ! रही थनबर्ग की बात, तो पता नहीं उसे क्या बताया या समझाया गया कि वह उबाल खा गई, पर लगता है कि उसे हकीकत जल्दी समझ आ गई कि उसे जिनका समर्थन देने के लिए उकसाया जा रहा है, वे तो खुद पराली जला कर उस पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाते हैं, जिसको बचाने की मुहीम वह चला रही है ! वैसे इन महान, जगत्प्रसिद्ध, ताकतवर, ज्ञानी हस्तियों के विपरीत एक अदने से देश अमेरिका ने तीनों किसान कानूनों का समर्थन किया है..............!  

#हिन्दी_ब्लागिंग    
दो-तीन दिन पहले अचानक रिहाना, ग्रेटा थनबर्ग और मिया खलीफा ये तीन नाम सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गए ! अलग-अलग क्षेत्रों की इन तीन महिलाओं से एक ही मंच से किसान आंदोलन के पक्ष में एक दो लाइने उगलवाई गईं थीं। उनके उगालदान को सर पर रख ऐसे लोग भी नाचने लगे जिनको यह भी पता नहीं था कि ये महिलाएं हैं कौन हैं और इनका धंधा क्या है ! आश्चर्य तो और भी हुआ जब फेस बुक पर बुद्धिजीवी, कवियित्री और लेखिका के रूप में पहचानी जाने वाली और खुद को प्रगतिशील मानने वाली महिलाएं भी उनके बयान से आत्मविभोर हो गईं !

यह सोचने की बात है कि जिन्हें शायद यह भी ना मालुम हो कि भारत दुनिया के किस कोने में है, उन्हें अचानक किस अलौकिक प्रेणना की वजह से ऐसा दिव्य ज्ञान हासिल हो गया ! बात साफ़ है कि वह अलौकिक प्रेणना उन्हें ''भौतिक प्रसाद'' के रूप में उपलब्ध हुई ! आजकल किसी मशहूर कलाकार से समय लेने के लिए उसके मैनेजर से ही बात करनी  पड़ती है ! वह जैसा चाहता है वैसा ही होता है ! सारा खेल पैसे का हो गया है ! 

खबर है कि रिहाना सिर्फ एक ट्वीट करने का साढ़े तीन करोड़ रूपए लेती है। अब कोई बड़ी या असंभव बात नहीं है कि उसे उसकी मुंहमांगी रकम दे कर कुछ भी कहलवा लिया गया हो ! अब बॉलीवुड के कलाकार अमीर घरानों के शादी-ब्याहों जो पैसे के बदले ठुमके लगाते हैं तो जरुरी नहीं कि उस परिवार के सुख-दुःख, मान्यताओं या रीती-रिवाजों के भी सहभागी हों ! उन्हें सिर्फ पैसे से मतलब होता है !

इन ट्विटर वीरांगनाओं में से एक तो किसी तरह की तवज्जो देने के लायक ही नहीं हैं ! रही थनबर्ग की बात, तो पता नहीं उसे क्या बताया या समझाया गया कि वह भी उबाल खा गई ! पर लगता है कि उसे हकीकत जल्दी समझ आ गई कि उसे जिनका समर्थन देने के लिए उकसाया गया है, वे तो खुद पराली जला कर उस पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाते हैं जिसको बचाने की मुहीम वह चला रही है ! और जिसके लिए शायद विश्व उसका सम्मान कर दे ! यह बात ध्यान में आते ही उसने अपना ट्वीट हटा लिया ! 

इन महान, जगत्प्रसिद्ध, ताकतवर, ज्ञानी हस्तियों के विपरीत एक अदने, नामालूम, कमजोर से देश अमेरिका ने तीनों कानूनों का समर्थन किया है ! वैसे भी इन पैसों के धागे पर नाचने वाली कठपुतलियों से क्या गिला करना, असली दोषी तो वह है जो अपने आकाओं के कुत्सित सपनों को पूरा करने के लिए, इनके अल्प ज्ञान का फ़ायदा उठा, अपनी ऊंगलियों पर नचा रहा है ! नाचने वालों को शायद भनक भी ना हो कि किस दुष्चक्र में फांसे जा चुके हैं ! अब तो साफ़ है कि यह किसान आंदोलन किसानों के हाथ से निकल उनके हाथ पहुँच गया है जो सोते-जागते, उठते-बैठते सिर्फ इस देश की बुराई चाहते हैं।

इन हरकतों के चलते इधर एक छींका फिर टूट गया बिल्लियों के भाग ! मक्खियों की तरह लोग भिनभिनाने लगे हैं इस तथाकथित आंदोलन के ठीयों पर ! जिनका नाम भी लोग भूल चुके थे वह भी प्रेतावतार में यहां नमूदार हो गए हैं। इतनी बेशर्मी, इतनी नफरत, इतनी लिप्सा कि जिस आदमी ने डंडे-सोटे ले कर लाल किले पहुँचने की साजिश की, देश के सम्मान को मिटटी में मिलाने का षड्यंत्र रचा ! उसी आदमी के गले मिल-मिल कर जबरन अपना समर्थन थोपने की हिमाकत कर रहे हैं ! क्या इन्हें देशवासियों से डर नहीं लगता या ये उन्हें निरा बुड़बक समझ बैठे हैं ! पर यह जनता है जो सब जानती है ! जवाब तो मिलेगा और शायद ऐसा कि इनकी पीढ़ियां याद रखेंगी ! 

शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

किसान आंदोलन या उसकी आड़ में कुछ और

शाम की भड़काऊ वार्ता का सीधा अर्थ था कि जमावड़े की मंशा हंगामा मचाने की है और यह बात सभी को मालुम थी, ऐसे लोगों पर तुरंत कार्यवाही होनी चाहिए थी ! दूसरे दिन और कहीं ना सही लाल किले की सुदृढ़ व्यूह रचना जरूर की जानी चाहिए थी ! क्यों ट्रैक्टर पर तिरंगे के होने भर से शान्ति भंग नहीं होगी, ऐसा विश्वास कर लिया गया ! क्या कोर्ट में पहले जो धार्मिक पुस्तकों पर हाथ रख सच के सिवा और कुछ ना कहने की कसमें खाते थे तो उन पर विश्वास किया जाता था.......!!   

#हिन्दी_ब्लागिंग 

गणतंत्र दिवस पर जो कुछ भी हुआ वो बेहद दुखद, कष्टकारक व अपमानजनक था ! आम आदमी अवाक और तिलमिला कर रह गया ! खासकर लाल किले की अस्मिता पर कुछ सिरफिरों के हुड़दंग को देख ! इसके साथ ही यह भी तय हो गया कि आदतानुसार कुछ निर्लज्ज लोग शाम को विभिन्न चैनलों पर आ विष्ठावामन करने लग जाएंगे ! ऐसा ही हुआ भी, आरोपों-प्रत्यारोपों का घिनौना दौर चलना ही था, सो चला ! पर इसके साथ ही कुछ सवाल भी सर उठा खड़े हो गए ! जब घटनोपरांत हर चैनल विभिन्न तथाकथित किसान नेताओं की एक दिन पहले की शाम की भड़काऊ वार्ता को उजागर करने लगा ! जिसका सीधा अर्थ था कि जमावड़े की मंशा हंगामा मचाने की है ! यह बात सभी को मालुम भी थी, तो समय रहते क्यों नहीं ऐसे लोगों पर तुरंत कार्यवाही हुई ! दूसरे दिन और कहीं ना सही लाल किले की सुदृढ़ व्यूह रचना तो जरूर की जानी चाहिए थी ! क्यों ट्रैक्टर पर तिरंगे के होने भर से शान्ति भंग नहीं होगी, ऐसा विश्वास कर लिया गया ! क्या कोर्ट में पहले जो धार्मिक पुस्तकों पर हाथ रख, सच के सिवा और कुछ ना कहने की कसमें खाते थे तो उन पर विश्वास किया जाता था ! 

अब जब किले पर तथाकथित झंडा टांगने वाले उस सिरफिरे का नाम, पता सब मालुम है तो उसे तुरंत गिरफ्तार किया जाना चाहिए ! यदि सभी मानते हैं कि उसने देश के गौरव क साथ खिलवाड़ किया है तो उसके परिवार का हुक्का-पानी बंद किया जाना चाहिए ! सरे-राह उनको धिक्कारा जाना चाहिए ! कुछ तो होना चाहिए जिससे न्याय-व्यवस्था की मर्यादा बनी रहे ! कुछ तो डर-भय होना चाहिए, जिससे कुछ भी गलत करते समय उसकी सजा के खौफ का ख्याल आ अपराधी के रौंगटे खड़े हो जाएं ! कब तक हम घर फूँक कर तमाशा देखते रहेंगे ! कब तक किसी राज्य का सीएम देश के प्रधान मंत्री को गाली देता रहेगा ! कब तक केंद्र के फरमानों की अवमानना होती रहेगी ! कब तक पूर्वाग्रही प्रवक्ता देश हित को किनारे कर स्वहित में अमर्यादित हो विषवमन करते रहेंगे ! क्योंकि ऐसी ही बातों से ओछे नेताओं और उनके पालित गुर्गों की हौसला अफजाई होती है ! उन्हें पता रहता है कि आका के रहते हमारा कुछ नहीं बिगड़ने वाला ! 

क्यों नहीं टिकैत, योगेंद्र, दर्शन पाल और उन जैसे अन्य लोगों पर नकेल कसी गई ! क्यों नहीं अन्य शर्तों के साथ यह जोड़ा गया कि अमन-चैन, जन-धन की हानि होने पर उन जैसे नेताओं की जिम्मेदारी होगी और उसकी भरपाई उन्हीं से होगी     

यह भी एक कारण है कि राजधानी की छवि गणतंत्र दिवस के दिन धूमिल हुई ! जब पुलिस को किसान का रूप धारण किए हुए एक-एक इंसान का कच्चा चिठ्ठा मालूम था, तो क्यों उन पर विश्वास किया गया ! टिकैत, योगेंद्र, दर्शन पाल और उन जैसे अन्य कुख्यात लोगों पर तुरंत नकेल कसी जानी चाहिए थी ! शुरू में ही अन्य शर्तों के साथ यह जोड़ देना चाहिए था कि किसी भी तरह अमन-चैन, जन-धन की हानि होने पर उन जैसे नेताओं की जिम्मेदारी होगी और उसकी भरपाई भी उन्हीं से होगी ! जिस गांधी के अनशन को अपने से जोड़ ये छद्म आंदोलनकारी खुद को गौरवान्वित करने की कोशिश करते हैं तब वे यह भूल जाते हैं कि गांधी जी ने हर आंदोलन की अगुवाई खुद की थी ! हर अभियान में खुद सबसे आगे रहते थे ! इनकी तरह दूसरों को आगे कर खुद बिल में नहीं दुबक जाते थे। हर परिणाम का जिम्मा खुद लेते थे ! दूसरों पर आरोप मढ़ किनारा करने की कोशिश नहीं करते थे।   

वैसे यह सोच कर आश्चर्य भी होता है कि बिना आजमाए, बिना उसका अंजाम जाने सिर्फ आशंका के चलते जो लोग इतने बड़े देश की शक्तिशाली सरकार का विरोध इतने बड़े पैमाने पर कर सकते हैं तो ये ही लोग भविष्य में यदि कुछ हुआ भी, तो क्या उस समय अपने विरोधी को दिन में तारे नहीं दिखा सकते ! तब क्यों नहीं आंदोलन हो सकता ! तब क्यों नहीं इनकी एकता काम आ सकती ! तब क्यों नहीं अपनी सुरक्षा की जा सकती ! तब तो अवाम भी इनके साथ कंधे से कंधा मिला खडा हो जाएगा ! इससे तो यही धारणा  बनती है कि अपने विदेशी आकाओं के निर्देशानुसार वर्षों से देश को खोखला बनाने वाली देश विरोधी ताकतों को अपने मनसूबों के लिए  फिर एक मौका मिल गया है ! जो देश की तरक्की व खुशहाली बर्दास्त नहीं कर सकते ! 

                                  
 कहते हैं कि ईश्वर जो करता है, अच्छा ही करता है ! किसान आंदोलन के नाम पर हुए इस हुड़दंग से कइयों के चेहरे बेनकाब हो गए हैं ! ये तो शीशे की तरह पहले ही साफ़ था कि इन कानूनों की आड़ ले कर लुटे-पिटे, हारे-थके, हाशिए पर सिमटा दिए गए कुछ दल बाहरी ताकतों की शह पर अपने अस्तित्व के लिए आखिरी लड़ाई जरूर लड़ेंगे ! वार्ता के बार-बार असफल करवाए जा रहे प्रयास इसके गवाह हैं। अब तक अवाम की जो थोड़ी-बहुत सहानुभूति आंदोलन के साथ थी. वह भी इनकी इस हिमाकत से तिरोहित हो चुकी है। अब तो हर आम नागरिक की ख्वाहिश यही है कि जब इनका असली सूरत ए हाल सबके सामने आ चुका है तो इनकी हर उद्दंडता का माकूल व कठोर जवाब दिया जाए। 

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

सरकार और किसान, जरुरी है विश्वास और भरोसा कायम होना

किसान आंदोलन कुछ भी हो, है तो दुखदाई ! कठिन परिस्थितियां  ! गहराती ठंड ! खुला आसमान ! हैं तो वे भी इंसान ही !कुछ लोगों का कहना है कि यह सिर्फ पंजाब के किसानों की बात है ! यदि ऐसा है भी तो वे भी तो हमारे अपने हैं ! उनकी दुःख-तकलीफ को दूर करने की जिम्मेदारी भी तो हमारी ही है ! यदि वहां विपक्ष का शासन है भी तो क्या उन्हें हक़ नहीं कि वे अपनी शंका-डर-गलतफहमी दूर करवा सकें ! यह काम समय रहते ही कर लिया जाता तो न इतना बखेड़ा होता, ना विघ्नसंतोषियों के कोई अवसर हाथ आता, ना ही हताश-निराश कुतर्कियों और तथाकथित बुद्धिजीवियों को वैमनस्य फ़ैलाने का मौका मिल पाता ..........!! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 
आम देशवासी की यही चाहत होती है कि सर्वत्र सुख-शांति, अमन-चैन बना रहे ! भले ही उनका एक अच्छा-खासा प्रतिशत राजनीती से दूर ही रहता हो पर वह देश-काल में घटते घटनाक्रमों से बिल्कुल निस्पृह नहीं रह सकता ! ऐसा ही हो रहा है सरकार और किसानों के बीच चल रहे विवादों से ! उठते बवाल, उलझते मसले, खिंचती समस्याएं, मचती अफरा-तफरी, उत्पन्न होते व्यवधान, अवाम के मन में भी सवाल उठाने  लगे हैं कि क्यों नहीं समय रहते इस सब का हल निकाल लिया गया ? क्यों किसानों को लम्बी-लम्बी यात्राएं कर सरकार के कान पर जूँ रेंगवानी पड़ी ? 

सबसे बड़ी बात, यह तो थाली में सजा कर मौका दे दिया गया हाशिए पर सिमटे, लुटे-पिटे-हारे-थके उन विरोधियों को जो ना संसद में लड़ पाते हैं नाहीं चुनावों में ! पर सड़क पर आ झूठ को सच में बदलना खूब आता है। जो माहिर हैं, जनता को बरगलाने में ! जो सिर्फ मौका तलाशते रहते हैं अराजकता फैलाने का ! उन्हें ही फिर अपनी दूकान खोलने का अवसर दे दिया गया ! विघटनकारियों को फिर एक मंच मिल गया !षड्यंत्रकारियों के लिए छींका ही तोड़ डाला गया ! जब जाहिर ही था कि बात कर के ही समस्या सुलझनी है, और यह काम समय रहते ही कर लिया जाता तो न इतना बखेड़ा होता, ना विघ्नसंतोषियों के कोई अवसर हाथ आता, ना ही हताश-निराश कुतर्कियों और तथाकथित बुद्धिजीवियों को वैमनस्य फ़ैलाने का मौका मिलता !  
सरकार भी यही चाहती है कि उगाने वाले को सही मूल्य मिल सके ! उपभोक्ताओं को सही कीमत पर जींस उपलब्ध हो सकें ! बीच के कमाने वालों पर नकेल कसी जा सके !  पर कहीं ना कहीं झोल तो जरूर है, नहीं तो अभी भी तय कीमत से आधी पर से भी कम पर क्यों और कैसे धान बिक रहा है 
सरकार के अनुसार उसके द्वारा लाए गए कानून से किसान का भाग्य बदल जाएगा ! यदि ऐसा है तो किसान ही, क्यों नहीं इस बात को मान रहा ? क्यों नहीं वह उस पर विश्वास कर रहा ? सरकार के अनुसार, क्यों वह विरोधियों के बहकावे में आ रहा है ? जब वे लोग उसे बरगला सकते हैं तो सरकार क्यों नहीं समझा पा रही ? जबकि सरकार में एक से एक उम्दा वक्ता और प्रचार विशेषज्ञ इस काम के लिए सिद्धहस्त हैं ?  यदि वर्षों से बार-बार ठगा गया किसान चाहता है कि ''मंडी व्यवस्था'' और ''एमएसपी'' बनी रहे, जिसका सरकार खुद भी दावा कर रही है, तो उसे अनिवार्य कर देने में संकोच क्यों ? इसके आड़े कुछ ''इफ-बट्स'', बिचौलियों के हथकंडे, माफियाओं के कुचक्र जरूर आ सकते हैं, जिनसे निपटना सरकारी महकमों का काम है। उन्हें काबू में किया जाए ! उनसे डर कर देश के अन्नदाता को क्यों तंग किया जाए ! क्यों उसे किसी भी बात के लिए मजबूर किया जाए ! एक-एक कर अलग होते सहयोगियों के बावजूद लगता है कुछ लोग इसको गंभीरता से नहीं ले रहे हैं, अभी किसी महानुभाव ने कहा है कि ''जो चाहे संबंध तोड़ ले हमें किसी की गरज नहीं है'' ! सत्ता के मद में कोई अपने अहम के चलते बात का बतंगड़ ना बना दे इस बात का ध्यान रखअपने सदस्यों को सरकार द्वारा ऐसी गर्वोक्तियों से तो निश्चित रूप से दूर रहने की चेतावनी जरूर मिलनी चाहिए ! 

कुछेक को छोड़ दें तो आम किसान सदा से ही हमारे सामाजिक ढाँचे का कोमल, कमजोर तथा उपेक्षित सा हिस्सा रहा है। सदियों से उसका मतलब के लिए ही उपयोग होता आ रहा है ! अभी स्थिति जरूर पहले से बहुत सुधरी है पर अभी भी बहुत सा काम बाकी है। जो इस किसानआंदोलन से साफ़ नजर आ रहा है। कुछ भी हो यह है तो दुखदाई ! कठिन परिस्थितियां ! गहराती ठंड ! खुला आसमान ! हैं तो. वे भी इंसान ही ! कुछ लोगों का कहना है कि यह सिर्फ पंजाब के किसानों की बात है ! यदि ऐसा है भी तो, वे भी तो हमारे अपने हैं ! उनकी दुःख-तकलीफ को दूर करने की जिम्मेदारी भी तो हमारी ही है ! यद्यपि वहां विपक्ष का शासन है, तो क्या सिर्फ इसीलिए उन्हें हक़ नहीं कि वे अपनी शंका-डर-गलतफहमी दूर करवा सकें ? ये तो केंद्र के लिए एक ऐसा सुनहरा मौका था जबकि उन के साथ प्रेम पूर्वक बात कर, उनकी शंका दूर कर, समस्या का हल निकाल उनका मन और विश्वास जीता जा सके।  

कई अति उत्साही लोग जोर-जबरदस्ती और दंड का उपयोग करने की सलाह देने लगे हैं जो कि निहायत ही गैर जिम्मेदाराना मश्विरा है ! ध्यान देने की बात है कि हजारों-हजार की संख्या में पंजाब से दिल्ली पहुँचाने वाले जत्थों द्वारा किसी भी तरह का उत्पात नहीं हुआ ! ना आगजनी की घटनाएं हुईं ना हीं पथराव  इत्यादि की ! तो पूरी तरह शांति और अहिंसक मार्च कर रहे सीधे-सादे लोगों पर क्यों बर्बरता बरती जानी चाहिए ! जबकि सरकार को बदनाम करने की मंशा वाले विरोधियों का ध्येय भी यही होगा ! यह भी तो सच है कि जब भी कोई सरकार विरोधी आंदोलन छिड़ता है तो वह विपक्ष के लिए राजनीती मांजने का मौका बन जाता है। यहां भी यही हो रहा है। तरह-तरह के हथकंडों का उपयोग शुरू हो गया है। पर आज के तकनीकी सक्षम समय में ऐसे लोगों की पहचान कोई बड़ी समस्या नहीं है ! जरुरत है भेड़ की खाल ओढ़े, बवाल मचाने की ताक में लगे भेड़ियों को सामने ला सबक सीखाने की ! 

क्या ही अच्छा होता कि माँ बिन रोए ही बच्चे को दूध उपलब्ध करवा देती ! बगावत के बीज अंकुरित होने के पहले ही उनका उपाय कर लिया जाता ! चिंगारी लपट ना बन जाए इसका ध्यान रखा जाता ! खासकर पंजाब को मद्देनजर रख, जहां बड़ी मुश्किल से अमन-चैन कायम हो पाया है ! अभी भी समय है कि तुरंत बिना किसी पूर्वाग्रह और कुंठा के इस विवाद का हल ढूंढ लिया जाए ! सरकार की नीतियां तुरंत और ढंग से लागू हो सकें ! उगाने वाले को सही मूल्य मिल सके ! उपभोक्ताओं को सही कीमत पर जींस उपलब्ध हो सकें ! बीच के कमाने वालों पर नकेल कसी जा सके ! भले ही सरकार भी यही चाहती है पर कहीं ना कहीं झोल तो जरूर है, नहीं तो अभी भी तय कीमत से आधी पर से भी कम पर क्यों और कैसे धान बिक रहा है ! किसान और सरकार जब दोनों एक दूसरे का विश्वास और भरोसा पा लेंगे तभी देश की खुशहाली संभव हो पाएगी।  

विशिष्ट पोस्ट

बरगलाए हुए "जेंजी'' 😞

अपने शूरवीरों, शहीदों, बलदानियों की तुलना क्या ऐसे पुतलों के साथ की जा सकती है, जिन्हें अपने लक्ष्य का ही पता ना हो ! जो किसी और के इशारों प...