pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: प्रणाम, एक प्रभावी प्रक्रिया

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

प्रणाम, एक प्रभावी प्रक्रिया

छोटे सदस्य सुबह उठते ही सबसे पहले अपने बड़ों का आशीर्वाद लें, तो विगत रात घर पर चाहे जैसा भी भारी माहौल रहा हो, किसी कारण कटुता फैल गयी हो, कुछ मनमुटाव ही क्यों ना हो गया हो, यदि दूसरी सुबह बच्चे, बड़ों का चरण स्पर्श करते हैं तो ऐसा कोई भी बुजुर्ग सदस्य नहीं होगा जो सब कुछ भूल निर्मल मन से उन्हें आशीर्वाद ना दे ! क्योंकि बड़े-बुजुर्ग कभी भी अपने बच्चों का जरा सा भी अहित नहीं चाहते ! बस इतने से ही सारी कटुता तिरोहित हो जाएगी और सब कुछ ''नार्मल'' भी हो जाएगा। सिर्फ प्रयास करना है, अपनी परंपराओं, अपनी संस्कृति, अपने प्रथाओं के पुनर्जागरण का .............!!

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प्रणाम का अर्थ होता है विनीत होना ! किसी के सामने सर झुकाना ! अपने से बड़ों को, अपने गुरुजनों को सम्मान देना ! प्राचीन काल से ही यह हमारी परंपरा रही है ! जब हम किसी के सामने झुक कर उसका चरण स्पर्श करते हैं तो हमारे में विनम्रता का भाव आ जाता है और सामने वाले की सकारात्मक ऊर्जा, आशर्वाद के रूप में हमारी नकारात्मक ऊर्जा का स्थान ले लेती है ! पर इसके लिए हमारे मन में सामने वाले के प्रति श्रद्धा और आदर का भाव होना भी जरुरी है !

प्रणाम 

प्रणाम कोई दैनिक मशीनी क्रिया नहीं है ! प्रणाम अनुशासन है, जो हमें विनम्र बनाता है, आदर करना सिखाता है, हमारे अंदर का अहम मिटाता है, सुविचारों को स्थान देता है। घर में सुख-शांति स्थापित करता है, आपसी प्रेम बढ़ाता है ! आज घर-बाहर जो बड़ों के प्रति अवहेलना, तिरस्कार, अपमान जैसी परस्थितियां देखने में आती हैं उसका एक कारण जाने-अनजाने की गयी उनकी उपेक्षा भी है। यदि बचपन से ही बड़ों के पैर छू कर उनका आशीर्वाद लेने के संस्कार बच्चों में डाले जाएं तो घरों में कभी भी अप्रिय स्थिति बनने की नौबत ही नहीं आएगी !

श्रद्धा 
यदि कोई व्यक्ति रोज बड़े-बुजुर्गों के सम्मान में प्रणाम और चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करता है, तो उसकी उम्र, विद्या, यश और शक्ति बढ़ती चली जाती है। पर चरण स्पर्श भी नियमानुसार करना चाहिए ! इसके लिए हमेशा शांत भाव से बिना किसी जल्दीबाजी के दोनों हाथों से अपने श्रद्देय के दोनों पैरों का स्पर्श करना चाहिए ! घुटने तक या एक हाथ से पांव छूने के तरीके को शास्त्रों में गलत बताया गया है। इसके साथ ही जिन्हें प्रणाम किया जा रहा हो, उनका भी फर्ज है कि जब भी कोई चरण स्पर्श करे वे उसे हाथ उठा कर या उसके सर पर हाथ रख कर आशीर्वाद जरूर दें। जब हम भगवान को याद करते हुए किसी को सच्चे मन से आशीर्वाद देते हैं तो उसे तो लाभ प्राप्त होता ही है, आशीर्वाद देने वाले का भी पुण्य बढ़ जाता है। 

परंपरा 
प्रणाम की महत्ता का तो रामायण हो या महाभारत सभी ग्रंथों में विवरण उपलब्ध है ! रामायण में तो खुद प्रभू ही गुरुजनों को आगे बढ़ प्रणाम कर एक आदर्श हमारे सामने रखते हैं। यहां तक की अपने सबसे बड़े बैरी रावण के अंतिम समय में लक्ष्मण जी को उसके पास ज्ञान-अर्जन के लिए, पहले प्रणाम करने की सीख दे कर भेजते हैं।  महाभारत में जब भीष्म अगले दिन पूरे पांडवों के वध की कसम लेते हैं तो श्री कृष्ण द्रौपदी को उनके पास ले जाकर प्रणाम करवा, उसे अखंड सौभाग्यवती होने के वरदान दिलवा, पांडवों की रक्षा करवाते हैं। साथ ही अत्यंत दुःख के साथ कहते हैं कि यदि दोनों परिवारों की स्त्रियां अपने और एक-दूजे के वरिष्ठ व गुरुजनों को प्रणाम किया करतीं, तो यह युद्ध कभी भी नहीं होता ! इसी प्रणाम की क्रिया के प्रभाव से ऋषि मार्कण्डेय जी का अल्पायु योग खत्म हो गया था। ऐसे असंख्य उदाहरण सर्व-सुलभ हैं !

नियम 
इसीलिए यदि हर घर का नियम बन जाए कि छोटे सदस्य सुबह उठते ही सबसे पहले अपने बड़ों का आशीर्वाद लेंगे, तो विगत रात घर पर चाहे जैसा भी भारी माहौल रहा हो, किसी कारण कटुता फैल गयी हो, कुछ मनमुटाव ही क्यों ना हो गया हो, यदि दूसरी सुबह बच्चे, बड़ों का चरण स्पर्श करते हैं तो ऐसा कोई भी बुजुर्ग सदस्य नहीं होगा जो सब कुछ भूल निर्मल मन से उन्हें आशीर्वाद ना दे ! बड़े-बुजुर्ग कभी भी अपने बच्चों का अहित नहीं चाहते ! बस इतने से ही सारी कटुता तिरोहित हो जाएगी और सब कुछ ''नार्मल'' भी हो जाएगा। अब सिर्फ जरुरत है अपनी परंपराओं, अपनी संस्कृति, अपने प्रथाओं के पुनर्जागरण की !

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

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