सच मानिए उन बिस्कुटों का खौफ सा छा गया था मेरे दिल-ओ-दिमाग पर ! हफ्ते भर बाद लौटना हुआ तो यह भी संतोष था कि चलो उस रसहीन से पिंड तो छूटा ! पर ''अपने मन कछु और है कर्ता के कछु और'' नियति पर भी शायद उसी बिस्कुट की आत्मा का प्रभाव हावी था, जो मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी.............!
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
क हते हैं कि दुनिया की हर चीज में आत्मा होती है ! सजीव का तो ठीक है पर क्या निर्जीव में भी ? पर यह भी तो हो सकता है कि जो हमारे लिए निर्जीव हो, वह खुद में सजीव हो ! दुनिया में बहुत सारे लोग हैं जो पैरा-नेचुरल या पैरानॉर्मल बातों पर विश्वास करते हैं ! फिल्मों में भी पुतले, पेड़, कार आदि की आत्माओं के कारनामे सभी ने देख ही रखे हैं ! यदि ऐसा है तो क्या निर्जीव बिस्कुटों में भी ऐसा कुछ होता है ? मेरा तो अनुभव है कि ऐसा कुछ जरूर होता है ! आप माने या ना माने, पर भई मैं तो मानता हूँ, भुग्तभोगी जो हूँ !
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| यही थे वे |
च लिए पूरी बात बताता हूँ ! आजकल बाजार के डराने-धमकाने की वजह से हम सब कुछ ज्यादा ही स्वास्थ्य-जागरूक हो गए हैं ! उसी के निर्देशानुसार खाने-पीने की चीजें घरों में जगह बनाने लगी हैं ! भले ही वह आपको अच्छी लगें या नहीं ! अब बाजार ने बताया कि बाकि बिस्कुटों की बजाय फलानि कंपनी का फलाना डाइजेस्टिव बिस्कुट सेहत के लिए उत्तम है ! उसके बताने की देर थी कि अगली खेप में घर में उसी ब्रांड के ढेर सारे ''पैकेट्स'' आ गए ! अब आप ही बताइए एक ही चीज रोज-रोज कब तक खाई जा सकती है ? मैंने उसके खिलाफ विद्रोह किया और अपनी पसंद का उसका दूसरा भाई ले आया !
शा यद यह बात पहले वाले को पसंद नहीं आई, हो सकता है कि इससे उसकी भावनाओं और सम्मान को ठेस पहुंची हो ! फिर क्या था उसकी आत्मा ने अपना रंग दिखाया, एक-दो दिन बाद ऑफिस में जो रिफ्रेशमेंट का सामान आया, उसमें वही बिस्कुट भाई साहब मुझे मुंह चिढ़ाते हुए शामिल थे ! मुझे लगा ऐसा संयोगवश हुआ होगा ! पर बंदे को क्या पता था कि यह सब सुपर-नैचुरल पॉवर का खेल है ! और फिर मेरे सिवाय वहां सभी को वे पसंद भी थे ! अपने वश का तो इतना ही था कि उसका सेवन ही ना किया जाए ! ऐसा ही करता भी रहा, या ज्यादा से ज्यादा किसी के अनुरोध पर एक-आध कुतर लिया !
इसी बीच अपने छोटे भ्राता निहार के यहां नागपुर जाने का मौका मिला ! अब विडंबना देखिए, झटका यहां जैसे मेरा इंतजार ही कर रहा था ! अगले दिन सुबह की चाय के साथ बिस्कुटों के डिब्बे का जैसे ही मैंने ढक्कन खोला तो देखा उसी ब्रांड के वही महाशय मुझे देख, आँख मारते हुए वहां भी विराजमान थे ! जैसे कह रहे हों बेटा, कहां-कहां भागोगे, जहां भी जाओगे मुझे ही पाओगे ! एक अदना सा बिस्कुट इंसान को कितना निरीह बना देता है !
सच मानिए उस बिस्कुट का खौफ सा छा गया था मेरे दिल-ओ-दिमाग पर ! हफ्ते भर बाद लौटना हुआ तो यह भी संतोष था कि चलो उस रसहीन से पिंड तो छूटा ! पर ''तेरे मन कुछ और है कर्ता के कछु और'' नियति पर भी शायद उसी बिस्कुट की आत्मा का प्रभाव हावी था, जो मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी !
वा पसी मद्रास-निजामुद्दीन राजधानी एक्सप्रेस से थी ! सुबह जब वेंडर चाय लाया तो उसके साथ भी वही दो डाइजेस्टिव बिस्कुट फिर किसी साये की तरह मेरे सामने उपस्थित थे ! लगने लगा था कि एक तरह से मिडास हो गया हूँ, जिस बिस्कुट को छूता हूँ वही ''वह'' बन जाता है ! समझ नहीं आ रहा था कि रोऊं या उस बिस्कुटिया आत्मा से माफी मांगू ............!
अब आप बताएं, आपको क्या लगता है ! क्या यह सब संयोग था, या फिर......................😨






