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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

यूट्यूब पर चाय पीता, एक लड़का

यूट्यूब पर अक्सर किसी मीम या फनी शॉर्ट्स के अंत में चाय का कप पकड़े, एक लड़का खुल कर स्वाभाविक हंसी हँसते हुए दिख जाता है ! कौन है ये ? ये वो है, जो बताता है कि यदि नीयत साफ हो और साथ देने वाला, मित्र नेक और सच्चा हो, तो मंजिल मिल ही जाती है। गरीबी के कारण इसके जिन हाथों ने कलम छोड़ सफाई का कपड़ा थामा था, आज उन्हीं हाथों में कामयाबी की चाबी है। आज वो लाखों दिलों पर राज कर रहा है ! यह उपलब्धि अरुण जैसे हजारों बालक-बालिकाओं के लिए प्रेरणा बन सकती है................!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

कदीर कब किस पर मेहरबान हो जाए, कब रूठ जाए, शायद देवता भी नहीं जानते ! घर से अपने विशाल व्यवसाय को संभालने निकला करोड़पति शाम को कंगाल हो लौट सकता है ! वहीं एक अनजान, गुमनाम व्यक्ति रातों-रात दुनिया में मशहूर हो सकता है ! ऐसे अनगिनत उदाहरण अक्सर सामने आते रहते हैं ! ऐसा ही उस लड़के के साथ हुआ जो दो जून की रोटी के जुगाड़ के लिए ट्रक के सहायक के रूप में काम किया करता था !   

संक्रामक हंसी 
ते लंगाना के एक छोटे से गांव में रहने वाला एक लड़का राजा यानी अरुण कुमार ! परिवार की माली हालत ठीक ना होने के कारण मात्र चौथी कक्षा के बाद उसे पढ़ाई छोड़नी पड़ी। काम की तलाश में उसकी भेंट होती है नेहरू नाम के एक ट्रक ड्राइवर से ! नेहरू ने अरुण को ट्रक पर क्लीनर की नौकरी दी। दोनों साथ मिलकर देश के विभिन्न हिस्सों में ट्रक से सामान लाते-ले जाते रहे ! समय बीतता गया ! 

अरुण कुमार 
चानक एक दिन भाग्य की देवी की नजर इन पर भी पड़ी ! नेहरू को यात्रा के दौरान मोबाइल पर छोटी-छोटी रीलें बनाकर सोशल मीडिया पर डालने का शौक था ! एक दिन हाईवे के किनारे चाय पीते हुए अरुण किसी बात पर बड़ी जोर से हंस पड़ा, संयोगवश वह हँसी नेहरू के कैमरे में कैद हो गई ! जब नेहरू ने अपना वीडियो यूट्यूब पर डाला तब तो उतनी प्रतिक्रिया नहीं मिली। परंतु फिर किसी ने चाय के कप के साथ अरुण की हंसी की छोटी सी क्लिप को अपने फनी वीडियो के अंत में लगा दिया ! फिर वही हुआ जो आज सबके सामने है ! वह स्वाभाविक, दिल खोलकर हंसने वाला पल देखते-देखते वायरल हो गया ! लोग इस हंसी को बार-बार देखने और अपने वीडियो में जोड़ने लगे। धीरे-धीरे यह क्लिप तकरीबन हर मीम और रील का हिस्सा बन गई। आज यह हंसी इंटरनेट पर खुशी और फन का सबसे बड़ा सिंबल मानी जा रही है।

नेक इंसान, नेहरू 
तना ही नहीं नेहरू ने अरुण की आर्थिक सहायता की और उसे फिर से पढ़ने के लिए भी प्रेरित किया ! काम के बोझ के बावजूद अरुण ने मेहनत की और 10वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा सफलतापूर्वक पास की ! आज वह कंटेंट क्रिएटर बन चुका है। उसकी एक पहचान बन चुकी है ! 

मेहनत के साथ भाग्य भी जरुरी है 
गर नीयत साफ हो और साथ देने वाला, सच्चा मित्र हो, तो मंजिल मिल ही जाती है। गरीबी के कारण जिन हाथों ने कलम छोड़ सफाई का कपड़ा थामा था, आज उन्हीं हाथों में कामयाबी की चाबी है। आज वो लाखों दिलों पर राज कर रहा है ! यह उपलब्धि अरुण जैसे हजारों बालक-बालिकाओं के लिए प्रेरणा बन सकती है !  

@अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏

रविवार, 22 दिसंबर 2024

ठेका, चाय की दुकान का

यह शै ऐसी है कि इसकी दुकान का नाम दूसरी आम दुकानों की तरह तो रखा नहीं जा सकता, इसलिए बड़े-बड़े अक्षरों में ठेका देसी या अंग्रेजी शराब लिख उसके साथ वैधता तथा लाइसेंस नंबर इत्यादि लिख दिए गए ! इसीलिए इस ठेके के ठिकाने इतने मशहूर हो गए कि इन्होंने ने बाकी ठेकों को किनारे कर अपने इस रूप को अप्रतिम ख्याति दिलवा दी ! यही कारण था कि हमारे ग्रुप के ''वैष्णव सदस्य'' चाय की दूकान का नाम ठेके के रूप में  देख ठठिया से गए थे........................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

पिछले दिनों ग्रुप के साथ उदयपुर यात्रा के दौरान घूमते-घूमते संध्या समय च्यास की तलब लगने पर एक चाय की दूकान पर काफिला रुका ! उसके बोर्ड पर ''ठेका चाय का'' लिखा देख सबको कुछ बात करने का एक मुद्दा मिल गया। क्योंकि ठेका शब्द सुनते-देखते ही किसी के भी दिमाग में शराब की दुकान की ही तस्वीर आती है ! चाय के साथ उसका मेल नहीं बैठ पाने के कारण कई मित्र असमंजस में पड़ गए थे । 


लो, आप भी देख लो 

वैसे इस शब्द ठेका के कई अर्थ होते हैं, पर मुख्यता इसको सहारे या समर्थन के पर्याय के रूप में जाना जाता है ! किसी के ठहरने के अस्थाई स्थान को भी ठेका या फिर ठिकाना कहा जाता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में तबला वादन में या फिर कव्वाली में सहारा देने वाली ''ताल'' को भी ठेका कहा जाता है ! किसी कार्य को करवाने केलिए दिए जाने वाले कांट्रैक्ट या संविदा को भी ठेका ही कहा जाता है। 


अब रही शराब की दुकानों को ठेका कहे जाने की आम बात ! जिनको सिर्फ सरकार द्वारा ही मान्यता दी जाती है, इसलिए सरकारी नियमों के अनुसार शराब की हर दूकान के बोर्ड पर उसकी वैधता की पूरी जानकारी लिखी होती है। अब यह शै ऐसी है कि इसकी दुकान का नाम दूसरी आम दुकानों की तरह तो रखा नहीं जा सकता, इसलिए बड़े-बड़े अक्षरों में ठेका देसी या अंग्रेजी शराब लिख उसके साथ वैधता तथा लाइसेंस नंबर इत्यादि लिख दिए जाते हैं ! इसीलिए इस ठेके के ठिकाने इतने मशहूर हो गए कि इन्होंने बाकी ठेकों को किनारे कर अपने इस रूप को अप्रतिम ख्याति दिलवा दी ! यही कारण था कि हमारे ग्रुप के ''वैष्णव सदस्य'' चाय की दूकान के नाम को ठेके के रूप में देख ठठिया से गए थे  😅

गुरुवार, 17 जून 2021

क्या आप भी बिस्कुट को चाय में डुबो कर खाते हैं

कोई चाहे कुछ भी कहे ! पर बिस्कुट को चाय में भिगो कर खाने का मजा कुछ और ही है ! पर  इस काम में "टाइमिंग" बहुत मायने रखती है, जो बिस्कुट के आकार-प्रकार, चाय (दूध या कॉफी) की गर्माहट, कप की मुंह से दूरी आदि से तालमेल बिठा कर तय होती है। जहां ग्लूकोज़ बिस्कुट, केक-रस्क या बेकरी के उत्पादों के भिगोने का समय अलग होता है, वहीं "मैरी, थिन-अरारोट या क्रीमक्रैकर'' जैसे बिस्कुटों का कुछ अलग। यह पूरा मामला स्वाद का है ! यदि बिस्कुट पूरा ना भीगे तो उसमें वह लज्जत नहीं आ पाती जिसका रसास्वादन करने को जीभ लालायित रहती है और कहीं ज्यादा भीग जाए तो फिर वह प्याले में डुबकी लगाने से बाज नहीं आता.........!!

हमारी कई ऐसी नैसर्गिक खूबियां हैं, जो बेहतरीन कला होने के बावजूद किसी इनीज-मिनीज-गिनीज रेकॉर्ड में दर्ज नहीं हो पाई हैं। ऐसा नहीं होने का कारण यह भी है कि इस ओर हमने कभी कोई कोशिश या दावा ही नहीं किया है ! ऐसी ही एक नायाब कला है, बिस्कुट को चाय में डुबो, बिना गिराए मुंह तक ले आ कर खाने की ! सुनने-दिखने में बेहद मामूली सा यह काम उतना आसान नहीं है, जितना लगता है। इस सारी प्रक्रिया में बेहद तन्मयता, एकाग्रता, विशेषज्ञता और कारीगरी की जरुरत होती है। यह अपने आप में एक विज्ञान है ! इसके पीछे पूरा एक गणित काम करता है ! हम ऐवंई नहीं गणित में जगतगुरु बन गए थे ! पर चूँकि हमारे यहां और हमारे लिए यह एक आम बात है तथा हम इसे बिना किसी विशेष प्रयास के सरलता से अंजाम दे देते हैं, इसलिए इसे बच्चों का खेल समझ इसकी पेचीदगी की ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता। पर अपने-आप को मॉडर्न समझने वाले या नीम-विदेशी इसे चाहे कितनी भी हिकारत की नज़र से देखें, उससे इस विज्ञान की अहमियत कम नहीं हो जाती।


तक़रीबन हर नई तकनीक, विधा, खोज, शहरों से गांवों की तरफ जाती है। पर मुझे लगता है, चाय-बिस्कुट की यह कला गांवों से शहर की ओर आई होगी। अंग्रेजों ने 1826 में हमसे चाय का इंट्रो करवाया ! उसके करीब 66 वर्षों बाद 1892 में हमने बिस्कुट का स्वाद चखा। पर इन ''नेमतों'' को गांव-देहात पहुँचने में काफी वक्त लग गया ! यह और बात है कि चाय पहले पहुँच लोगों के ऐसे मुंह लगी कि सर पर चढ़ कर बैठ गई। अब गांव में काम पर जाने के पहले रोटी चाय के साथ खाई जाने लगी ! हो सकता है रोटी को चाय में डुबो कर खाने में उसका स्वाद और नरमाई ज्यादा स्वादिष्ट लगने के कारण अत्यधिक लोकप्रिय हो गई हो और सालों बाद जब गांव और शहर के फासले मिटने लगे, दूरियां कम हो गईं तब यह कला रोटी से बिस्कुट तक आ शहरों तक आ गई !


वैसे इस काम में "टाइमिंग" बहुत मायने रखती है ! जो बिस्कुट के आकार-प्रकार, चाय (दूध या कॉफी) की गर्माहट, कप की मुंह से दूरी आदि से तालमेल बिठा कर तय होती है। जहां ग्लूकोज़ बिस्कुट, केक-रस्क या ''बेकरी'' के उत्पादों को भिगोने का समय अलग होता है, वहीं "मैरी, थिन-अरारोट या क्रीम-क्रैकर जैसे बिस्कुटों का कुछ अलग। यह नैसर्गिक कला हमें विरासत में मिलती चली आई है। पहले बिस्कुटों की इतनी विभिन्न श्रेणियाँ नही होती थीं । परन्तु तरह-तरह के बिस्कुट, केक, रस्क या टोस्ट के बाजार में आ जाने के बावजूद हमें कोई दिक्कत पेश नहीं आई है। हमारी प्राकृतिक सूझ-बूझ ने सब के साथ अपनी "टाइमिंग" सेट कर ली है। 

यह पूरा मामला स्वाद का है ! यदि बिस्कुट पूरा ना भीगे तो उसमें वह लज्जत नहीं आ पाती जिसका रसास्वादन करने को जीभ लालायित रहती है और कहीं ज्यादा भीग जाए तो फिर वह प्याले में डुबकी लगाने से बाज नहीं आता। यह सारा काम सेकेण्ड के छोटे से हिस्से में पूरा करना होता है। यदि बिस्कुट चाय के प्याले में गिर गया तो समझिए कि आपकी चाय की ऐसी की तैसी हो गयी। उसका पूरा स्वाद बदल जाता है। और बिस्कुट की तो बात ही छोड़ें, वह तो प्याले में गोता लगा, किसी और ही गति को प्यारा हो चुका होता है। पर हमारे यहां ऐसे हादसे नहीं के बराबर ही होते हैं। इक्का-दुक्का होता भी है तो, ट्रेनिंग के दौरान बच्चों से या चाय पीते वक्त ध्यान कहीं और होने से हो जाता है ! अब चूंकि विदेशी हमारी इस विधा को समझ नहीं पाए और उनकी नक़ल में उनके पिच्छलग्गु हमारे तथाकथित विकसित देशवासी, इस कला को अपना नहीं पाए, इसीलिए उन सबने इस उच्च कोटि की विधा को फूहड व कमतर आंकने या अंकवाने का दुष्प्रचार चला रखा है। पर कुछ भी हो, कोई कुछ भी कहे ! कितना भी भरमाए ! हमें अपनी यह विरासत जिंदा रखनी है ! इस कला को पोषित करते रहना है ! इसे कला जगत में इसका अपेक्षित सम्मान दिलवाना है, बिस्कुट को भिगो कर ही खाना है ! 

@ जरुरी सलाह - यदि कभी गलती से बिस्कुट कप में गिर जाए तो उसे कभी भी बचाने या निकालने की कोशिश ना करें ! आज तक इसमें कभी सफलता नहीं मिल पाई है।
@ सभी चित्र अंतर्जाल से  

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