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मंगलवार, 11 मई 2021

कण्वाश्रम, बाल भरत की क्रीड़ास्थली

चारों ओर सघन, सुनसान पर सुरम्य अरण्य से घिरे इस स्थल का मुख्य आकर्षण, सुन्दर चित्रों से सुसज्जित चार दीवारी से घिरा भरत स्मारक है जिसका निर्माण 1956 में हुआ बतलाते हैं। इस गोल इमारत के निचले हिस्से में भरत से संबंधित चित्रावली है ! ऊपर पहले खंड में देवताओं के वैद्य धन्वन्तरि जी की बहुत सुंदर प्रतिमा स्थापित है ! मूर्ति का चेहरा और आँखें इतनी सजीव हैं कि लगता है अभी सचल हो उठेंगी। उस के ऊपर कण्व ऋषि की प्रतिमा है पर वहां जाने का रास्ता नहीं है...............!

#हिन्दी-ब्लागिंग 

ऋषि विश्वामित्र और अप्सरा मेनका की पुत्री शकुंतला की कथा का वर्णन महाभारत में भी आता है ! पर इसको अमर किया महाकवि कालिदास के संस्कृत नाटक अभिज्ञान शाकुंतलम ने ! इसकी कथा तो तक़रीबन सभी को ज्ञात ही है कि कैसे दुष्यंत-शकुंतला का गंधर्व विवाह हुआ, और कैसे शकुंतला को दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण कण्वाश्रम में ही रहना पड़ा था ! जहां उनके पुत्र भरत का जन्म हुआ ! भरत के बल के बारे में ऐसा माना जाता है कि वह बाल्यकाल में वन में सिंह जैसे हिंस्र जानवरों के बीच निर्भय-निडर हो उनके साथ खेला करते थे ! खेल ही खेल में अनेक जंगली जानवरों को पकड़कर उन्हें पेड़ों से बांध देते थे या फिर उनकी सवारी करने लगते थे। इसी कारण ऋषि कण्व के आश्रम के निवासियों ने उनका नाम सर्वदमन रख दिया था। जो आगे चल कर एक महान प्रतापी सम्राट बने ! उन्हीं के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा।


कण्व वैदिक काल के महान ऋषि थे। माना जाता है कि उनका आश्रम आज के उत्तराखंड के गढ़वाल जिले के कोटद्वार भाबर क्षेत्र में एक पहाड़ी की तराई में मालिनी नदी के किनारे स्थित था। जहां सामान्य शिक्षा में उत्तीर्ण उन छात्रों को, अलग-अलग निकायों में विभिन्न तरह की, उच्च शिक्षा उपलब्ध कराई जाती थी, जो अपने क्षेत्र में पारंगत होना चाहते थे। कण्वाश्रम में चारों वेदों, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष, आयुर्वेद, शिक्षा तथा कर्मकाण्ड इन छ: वेदांगों के अध्ययन-अध्यापन का प्रबन्ध था। यहां ऋषि कण्व के साथ ही ऋषि कश्यप भी विद्या दान किया करते थे।  




यज्ञ स्थान 
आज यह कोई धार्मिक स्थल या दैवी स्थान भले ही न हो ! पर आज भी यह हमारे समृद्ध इतिहास, हमारे राष्ट्र की आत्मा को जरूर संभाले-समेटे पड़ा है। कण्वाश्रम उत्तराखंड के कोटद्वार शहर से 14 कि.मी. की दूरी पर हेमकूट और मणिकूट पर्वतों की गोद में स्थित है। ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण पर कुछ-कुछ उपेक्षित इस पर्यटन स्थल पर काफी ध्यान देने की जरुरत है !





विचार-विमर्श 
हजारों वर्ष पहले घटनाक्रम का आज कोई ठोस प्रमाण तो है नहीं ! जनश्रुति और ग्रंथों के विवरण के अनुसार ही इस जगह को कण्वाश्रम माना जाता है। पर यह अति मतवपूर्ण, विशाल भू-भाग भी अब वर्चस्व के लिए आपसी खींच-तान, ढुल-मुल राजनितिक रवैये और अवाम की उदासीनता के कारण दो हिस्सों में बंट कर रह गया है ! कोटद्वार से आते वक्त मालिनी नदी के पुल को पार करते ही सामने ऊपर करीब तीस फुट की ऊंचाई पर स्थित समतल भूभाग को लेकर एक पक्ष का दावा है कि यहीं दुष्यंत-शकुंतला विवाह संपन्न हुआ था। वहां एक छोटा सा पिंजरेनुमा मंदिर बना हुआ है, जिसमें दुष्यंत-शकुंतला हार पहने खड़े हैं। दो ऋषियों कण्व व कश्यप की प्रतिमाओं के साथ बाल भरत की मूर्ति भी है जो शेर के दांत गिनते दिखाए गए हैं ! चारों ओर बियाबान और सुनसान परिसर में उसी के कुछ ऊपर इस जगह के केयर टेकर महंत जी का निवास स्थान है। जिनका इस जगह को लेकर अपना दावा है ! 


धन्वन्तरी जी की सजीव सी प्रतिमा 

ऊपर चढ़ने का घुमावदार पथ 

मालिनी नदी के पुल को पार कर दाहिनी ओर करीब पौन किमी दूर, बेतरतीब सड़क द्वारा एक विशाल और कुछ-कुछ व्यवस्थित क्षेत्र, जहां बहुत कुछ निर्माणाधीन है तक पहुंचा जाता है ! इसी स्थल को वास्तविक कण्वाश्रम बताया जाता है ! मान्यता के अनुसार यहीं भरत का लालन-पालन हुआ और उनका बचपन बीता ! यहां के महंत, जो गुरूजी कहलाते हैं, उनके अनुसार कभी-कभी, कुछ-कुछ सरकारी सहायता मिल तो जाती है पर वह ऊँट के मुंह में जीरा ही साबित हो पाती है ! दैनिक खर्चे ही पूरे नहीं हो पाते ! इसलिए उन्होंने हर आने वाले पर्यटक से दस रूपए की राशि लेनी शुरू कर दी है ! वैसे यहां आने वालों के लिए मुफ्त में भोजन की भी व्यवस्था है। वर्तमान में गढ़वाल मंडल विकास निगम, कण्वाश्रम विकास समिति तथा शासकीय प्रयासों से इस स्थल की देख-रेख होती है।

कार पार्किंग से भरत स्मारक जाने का मार्ग 
                                
 रॉकेट के बेस जैसा विचित्र पेड़ का तना 

चारों ओर सघन, सुनसान पर सुरम्य अरण्य से घिरे इस स्थल का मुख्य आकर्षण, सुन्दर चित्रों से सुसज्जित चार दीवारी से घिरा भरत स्मारक है ! जिसका निर्माण 1956 में हुआ बतलाते हैं। इस गोल इमारत के निचले हिस्से में भरत से संबंधित चित्रावली है ! ऊपर पहले खंड में देवताओं के वैद्य धन्वन्तरि जी की बहुत सुंदर प्रतिमा स्थापित है ! मूर्ति का चेहरा और आँखें इतनी सजीव हैं कि लगता है अभी सचल हो उठेंगी। उस के ऊपर कण्व ऋषि की प्रतिमा है, पर वहां जाने का रास्ता नहीं है। 

ध्यान कक्ष 
                                    

भ्रमण पर आईं स्कूली बालिकाऐं 
इसके अलावा कण्व ऋषि, भरत की मूर्तियों के साथ-साथ पुरातात्विक महत्त्व की अनेक मूर्तियाँ संरक्षित हैं। इसके साथ ही एक ध्यान केंद्र जिसे जबरदस्ती एक तंग सुरंग से गुजरने के बाद बनाया गया है ! वहीँ भोजन कक्ष, दवाखाना, ध्यान कक्ष, यज्ञ स्थान, पर्यटकों के रात्रि निवास के लिए अलग-अलग शुल्क धारी कुछ कमरे भी उपलब्ध हैं। पर लोगों की आवाजाही बहुत कम है और इस जगह को लोकप्रिय बनाने की अति जरुरत है जिसके लिए धन और जन दोनों की बहुत आवश्यकता है। वैसे हमारे रहते ही वहां किसी स्थानीय स्कूल की अनेक बालिकाएं अपनी शिक्षिकाओं के साथ पहुंची ! उनका उत्साह और जोश देखते ही बनता था ! जरुरत है ऐसी जगहों और उनसे जुडी कथाओं को जन-जन तक पहुंचाने की ! उनके प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करवाने की ताकि हमारे गौरवशाली इतिहास की पूरी और सच्ची जानकारी आज की पीढ़ी तक भी पहुँच सके।

शनिवार, 20 मार्च 2021

कोटद्वार के सिद्धबली हनुमान

हनुमान जी यहां आने वाले आने वाले अपने सारे भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इसीलिए यहां हर धर्म के लोग अपनी इच्छापूर्ति के लिए दूर-दूर से आते रहते हैं। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु मंदिर परिसर में भंडारा आयोजित कर प्रभु को अपना आभार व्यक्त करते हैं। लोगों की श्रद्धा का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां  होने वाले विशेष भंडारों की बुकिंग फिलहाल 2025 तक के लिए बुक हो चुकी है..........!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

सिद्धबली हनुमान जी का मंदिर, उत्तराखंड के कोटद्वार नगर के दर्शनीय स्थलों में  एक प्रमुख देव स्थान है। जो मुख्य नगर से करीब तीन किमी की दूरी पर खोह नदी के किनारे,नजीबाबाद-बुआखाल राष्ट्रीय राजमार्ग पर  लगभग 135 फुट की ऊंचाई पर एक पहाड़ी टीले पर स्थित है। इस ऊंचाई से चारों ओर का नैसर्गिक दृश्य निहारना अपने आप में एक अलौकिक अनुभव प्रदान करता है। ऐसी दृढ मान्यता है कि हनुमान जी यहां आने वाले आने वाले अपने सारे भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इसीलिए यहां हर धर्म के लोग अपनी इच्छापूर्ति के लिए दूर-दूर से आते रहते हैं। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु मंदिर परिसर में भंडारा आयोजित कर प्रभु को अपना आभार व्यक्त करते हैं। लोगों की श्रद्धा का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां  होने वाले विशेष भंडारों की बुकिंग फिलहाल 2025 तक के लिए बुक हो चुकी है। 





सड़क से लगे प्रवेश द्वार से 158 सीढ़ियां चढ़ कर मुख्य मंदिर तक पहुंचा जाता हैं। वहां  सफ़ेद संगमरमर की बेहद आकर्षक प्रतिमा स्थापित है। पूरा परिसर बेहद साफ़-सुथरा और मनभावन है।  मंदिर  से कुछ ही नीचे शिव जी और शनिदेव विराजमान हैं। मंदिर से  तक़रीबन आधी दूर पहले भक्तों द्वारा भंडारा करने की सुन्दर व्यवस्था है। ऊपर प्रकृति के साए में मंदिर का वातावरण इतना मनोहर-शांत व मनमोहक है कि वहां से वापस लौटने की इच्छा ही नहीं होती। बहुत कम जगहों पर ऐसा अहसास होता है। 




नाथ परंपरा की धारणाओं के अनुसार गुरु गोरखनाथ एवं उनके शिष्यों ने यहां लम्बे समय तक तपस्या की, जो की बाद में ‘सिद्ध’ नाम से प्रसिद्द हुए। जानकारों के अनुसार 14वीं शताब्दी में प्रख्यात संत सिधवा ने भी इसी जगह आ कर साधना की थी, जिन्हें सिद्ध के रूप  में पूजा जाता है। मंदिर की  स्थापना के बारे  में यह बताया जाता है कि इस स्थान पर तप साधना करने के बाद सिद्ध बाबा को हनुमान जी की  सिद्धि प्राप्त हुई थी।  उसके  उपरांत सिद्ध बाबा ने  यहां बजरंगबली की एक  विशाल मूर्ति का   निर्माण करवाया था, तबसे इस जगह का नाम सिद्धबली पड़ गया। 

 

सिद्ध बाबा की समाधी और शिव मंदिर  


इस बारे में एक और भी कहानी प्रचलित है, जिसके अनुसार अंग्रेजों के समय एक मुस्लिम अधिकारी अपने घोड़े पर सवार जब यहां पहुंचे तो भावशून्य हो गए ! उसी अवस्था में उन्हें भान हुआ कि सिद्ध बाबा की समाधि पर हनुमान जी के मंदिर की स्थापना की जाए ! सजग होने पर उन्होंने स्थानीय लोगों से इस बात की चर्चा की और फिर इस मंदिर का निर्माण हुआ। जिसे धीरे-धीरे भक्तों और श्रद्धालुओं की आस्था ने यह भव्य स्वरुप प्रदान करवाया। 



हनुमानजी हमारे सर्वप्रिय पांच देवताओं में से एक हैं। तत्काल प्रसन्न होने और अभय प्रदायी होने के कारण ये अबालवृद्ध सभी में अत्यंत लोकप्रिय हैं। संसार भर में इनके भक्त इनका स्मरण कर सुख-शांति पाते हैं।इनके मंदिर विश्व भर में स्थापित हैं, जहां एक से बढ़ कर एक प्रतिमाएं स्थापित हैं। पर कुछ कम जाना जाने वाले इस सिद्धबली की मूर्ति भी अद्भुत है। मौका मिले तो दर्शन करने जरूर आना चाहिए।   

मंगलवार, 16 मार्च 2021

एक दर्शनीय स्थल, कोटद्वार

दर्शनीय स्थानों में सबसे महत्वपूर्ण कण्व ऋषि का आश्रम है जो पहाड़ की तलहटी में, शहर से करीब 35 किमी की दूरी पर स्थित है। यही वह जगह है जहां शकुंतला-दुष्यंत के यशस्वी पुत्र भरत का जन्म और शैशव काल बीता था। जिनके नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा। सुनसान-बियाबान में यह शांत जगह सकून प्रदायी तो है पर भीतर ही भीतर कुछ विवाद समेटे, बहुत ही ज्यादा देखरेख की मांग भी करती है.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

जीवन में कभी-कभी कुछ ऐसा घट जाता है, जिसकी पहले दूर-दूर तक संभावना होती नहीं लगती। शायद इस लिए भी इसे अनिश्चित कहा गया है। कुछ ऐसा ही हुआ जब विभिन्न परिस्थितियों के चलते उत्तराखंड के एक शांत से शहर कोटद्वार जाने का मौका हासिल हो गया। यह उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे गढ़वाल मंडल के पौड़ी जिले का खोह नदी के तट पर बसा, प्रमुख नगर है। इतिहास में इसका उल्लेख 'खोहद्वार' के रूप में उपलब्ध है। इसे गढ़वाल का प्रवेशद्वार भी कहा जाता है। यहां करीब 150000 लोगों की बसाहट है। 



झंडा चौक, कोटद्वार 

देश भर से रेल द्वारा जुड़े, कोटद्वार की भौगोलिक स्थिति कुछ ऐसी है कि यहां से कुछ धार्मिक व पर्यटन के विश्वप्रसिद्ध स्थल बहुत नजदीक पड़ते हैं। जैसे हरिद्वार और ऋषिकेश यहां से लगभग 70 से 90 किमी की दूरी पर पश्चिम की ओर, कॉर्बेट नेशनल पार्क करीब 150 किमी दूर पूर्व की ओर, तक़रीबन 40 किमी उत्तर-पूर्व में लैंसडाउन, जहां प्राकृतिक गोद में गढ़वाल राइफल्स का रेजिमेंटल सेंटर है तथा करीब 85 किमी पूर्व में रामगंगा नदी पर बना दर्शनीय कालागढ़ बाँध स्थित है। वहीं बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम के लिये भी सीधी बस और टैक्सी सेवा उपलब्ध है। उतनी ही आसानी से पौड़ी, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग भी जाया जा सकता है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून यहां से करीब सवा सौ किमी है। जबकि देश की राजधानी दिल्ली की दूरी तकरीबन सवा दो सौ किमी  पड़ती है।  

दुष्यंत-शकुंतला विवाह स्थली 


दर्शनीय स्थानों में सबसे महत्वपूर्ण कण्व ऋषि का आश्रम है जो पहाड़ की तलहटी में, शहर से करीब 13-14 किमी की दूरी पर स्थित है। यही वह जगह है जहां शकुंतला-दुष्यंत के यशस्वी पुत्र भरत का जन्म और शैशव काल बीता था। जिनके नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा। सुनसान-बियाबान में यह शांत जगह सकून प्रदायी तो है पर भीतर ही भीतर कुछ विवाद समेटे, बहुत ही ज्यादा देखरेख की मांग भी करती है। 

                                

सिद्धबली हनुमान जी 
नगर के पास ही स्थित हनुमान जी का सिद्धबली मंदिर भी एक प्रख्यात आस्था स्थली है। जहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है।


अन्य प्रमुख दर्शनीय स्थलों में दुर्गा देवी मंदिर जो कोटद्वार से लगभग 9 किलोमीटर दूर खोह नदी के तट पर तथा शक्ति पीठ, सुखरी देवी मंदिर दर्शनीय स्थान हैं।

उधर पहाड़ की एक चोटी चर्कान्य शिखर के रूप में जानी जाती है इसी स्थान पर महर्षि चरक ने निघुंट नामक ग्रन्थ की रचना की थी। जिसमें हिमालय की गोद में छुपी दैवीय, अनमोल औषधीय जड़ी-बूटी तथा पौधों के बारे में बहुमूल्य जानकारियां संग्रहित की गई थीं। अब जहां अंग्रेज रहे हों और वहां  चर्च ना हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता; उसी प्रथा के अनुसार यहां भी एक सुंदर दर्शनीय सेंत जोसेफ चर्च बना हुआ है। जो शिल्प कला का बेहतरीन नमूना है। 

हमारा देश ऐसी असंख्य जगहों से भरा पड़ा है जो अपने आप  में हर दृष्टि से समृद्ध, मनोभावन, ऐतिहासिक और धार्मिक जानकारियों का खजाना समेटे हैं ! जरुरत है तो सिर्फ अन्वेषण की !!

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