pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: बुधिया द वंडर ब्वाय
बुधिया द वंडर ब्वाय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बुधिया द वंडर ब्वाय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 17 मई 2021

एक था बुधिया, द मैराथन रनर

अब वह मैराथन दौडना तो दूर, अपने साथियों के बराबर भी नहीं दौड पाता। उसने नेशनल लेवल तो क्या कोई राज्य स्तरीय अथवा जिला स्तरीय प्रतियोगिता भी नहीं जीती है। हालांकि दावे तो ओलम्पिक और मैराथन जीतने के हुआ करते थे ! बेवक्त, बेवजह का स्टारडम, ख्याति, परिवार की उसे दूसरों से अलग व विशेष बनाने की सनक, अति अपेक्षा और लालच के चलते, मैराथन दौडने वाला बुधिया, स्कूल स्तर की प्रतिस्पर्धाओं में भी सामान्य  बच्चों से पिछडता चला गया....................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग   

याद है आपको, वह पांच साल का बच्चा, बुधिया ! जिसने ओडिसा में 2006 के मई महीने की तपती दोपहरी में लगातार सात घंटे दो मिनट दौड़ कर पुरी से भुवनेश्वर तक की 65 किलोमीटर की दूरी को नाप कर दुनिया का सबसे कम उम्र का मैराथन धावक बनने का गौरव हासिल कर, सब को आश्चर्यचकित कर रख दिया था ! जिसका उत्साहवर्धन करने और मनोबल बनाए रखने के लिए रिजर्व पुलिस बल के दो सौ जवान भी उसके साथ दौड़े थे। जो रातों-रात हर अखबार और टेलीविजन चैनल की सुर्खियों में छा दुनिया भर में मशहूर हो गया था ! जबकि उस समय उसकी उम्र चार वर्ष से कुछ ही ज्यादा थी ! इस हैरतंगेज कारनामे के लिए उसका नाम ''लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्डस" में  भी शामिल किया गया था। बुधिया ने महज 5 साल की उम्र में 48 मैराथन पूरे कर लिए थे ! नन्हें बुधिया के चर्चा में आते ही विभिन्न संस्थाओं ने उसके लिए ढेरों कोष बनाने की घोषणाएं भी की थीं। उसके नाम के साथ Budhiya Born to Run ! Budhiya the Wonder Boy जैसे तरह-तरह के विशेषण जुड़ने लग गए थे ! पर फिर क्या हुआ ? कहां गुम हो गया, वह नन्हा मैराथन धावक ?

 


बुधिया सिंह ! एक अत्यन्त गरीब परिवार का बेटा ! गरीबी इतनी कि दूसरों के घर काम करती, उसकी माँ सुकांति सिंह ने अपने इस बच्चे को सिर्फ आठ सौ रूपए में एक परिवार को बेच दिया ! पर फिर भाग्य को कुछ तरस आया और एक दिन खेलते हुए इस बच्चे पर दौड़ाक और जुडो कोच बिरंची दास की नजर पड़ी ! उन्होंने प्रतिभा को भांप लिया और बुधिया को गोद ले अपने निरक्षण में दौड़ने का प्रसिक्षण देने लगे। पर भाग्य का फेर ! बुधिया का कुछ नाम होते ही उसकी माँ ने, जिसने चंद रुपयों के लिए उसे बेच डाला था, कोच बिरंची दास पर ना केवल गलत व अनर्गल आरोप लगाये बल्कि बुधिया को बंधक बनाने तक के मुकदमे भी दर्ज करा दिए ! इसी तनातनी के बीच बिरंची दास की रहस्यमय तरीके से हत्या कर दी गई ! इसके साथ ही बुधिया के दुर्दिन फिर शुरू हो गए !

कोच बिरंची दास के साथ बुधिया 



हालांकि उसकी प्रतिभा के चलते सरकार ने उसे भुवनेश्वर के SAI होस्टल मे रख, लंबी दूरी का धावक बनाने का प्रयास विधिवत रूप से शुरू किया भी था ! मगर इस सब से उचाट बुधिया हाॅस्टल से ही भाग निकला ! अपनी माँ की महत्वाकांक्षा और लालच के चलते एक विलक्षण प्रतिभा का वो हश्र हुआ, जो नही होना चाहिये था ! यह एक कटु सत्य है कि जो बच्चे अपने बचपन में ही अनायास मिली ख्याति, प्रसिद्धि और स्टारडम का स्वाद चख लेते हैं, आगे चल कर असफलता उनकी नियति बन जाती है ! हमारे आस-पास ऐसे लाखों उदाहरण मौजूद हैं ! इसमें उन मूर्ख अभिभावकों का भी बहुत बड़ा हाथ  होता है जो अपने अधूरे सपनों को अपने मासूम बच्चों की मार्फ़त पूरा करने की भूल किए जाते हैं ! जिंदगी की दौड़ में अपने बच्चे के पिछड़ जाने के बेफिजूल डर से वे अपने बच्चों से उनका बचपन, मासूमियत, भोलापन छीन बेवजह पैसा लुटा उसे सफल बनाने पर तुले रहते हैं ! वे भूल जाते हैं कि पौधा प्राकृतिक रूप से ही बड़ा हो पेड़ बनता है ! ज्यादा खाद-पानी उसे नष्ट भी कर सकते हैं ! पर नहीं ! सबके सब अपने बच्चों को बिना उनकी लियाकत या रुझान जाने, नायक, गायक, खिलाड़ी बनाने पर आमादा रहते हैं ! एक अँधी दौड चल रही है ! एक छलावा भ्रमित किए हुए है ! यही बुधिया के साथ हुआ !

बुधिया सिंह, अब 
आज वो वंडर ब्वाॅय बुधिया सिंह जवान हो चुका है। उस पर एक फिल्म भी बन चुकी है ! पर अब वह मैराथन दौडना तो दूर, अपने साथियों के बराबर भी नहीं दौड पाता। उसने नेशनल लेवल तो क्या, कोई राज्य स्तरीय अथवा जिला स्तरीय प्रतियोगिता भी नहीं जीती है । हालांकि दावे तो ओलम्पिक और मैराथन जीतने के हुआ करते थे ! जबकि उसे हर सहूलियत, विधिवत प्रशिक्षण और सरकारी मदद भी मिली पर फिर भी वह जीवन मे कुछ खास नही कर पाया ! बेवक्त, बेवजह का स्टारडम, ख्याति, परिवार की अति अपेक्षा, उसे दूसरों से अलग व विशेष बनाने की सनक और लालच के चलते, मैराथन दौडने वाला बुधिया, स्कूल स्तर की प्रतिस्पर्धाओं मे भी सामान्य बच्चो से पिछडता चला गया । उसका कैरियर बनने से पहले ही ढह कर रह गया !
यह एक बानगी, एक चेतावनी, एक नसीहत भी है उन अभिभावकों के लिए, जो अपने अधूरे सपनों, अपनी ख्वाहिशों को मूर्त रूप  देने के लिए, वक्त से पहले ही अपने बच्चों को क्षणिक प्रसिद्धि और बिना मतलब की ख्याति दिलाने हेतु अपने बच्चों के भविष्य को अँधकारमय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते ! ऐसे अभिभावकों से इतना ही कहा जा सकता है कि वे अपने बच्चों को नैसर्गिक तौर पर ही खेलने-कूदने-बढ़ने-फलने-फूलने दें ! उनसे उनका बचपन ना छीने ! उनके कोमल कंधों पर अपनी आकंक्षाओं को ना लादें ! वे जो चाहते हैं, करने दें ! आप सिर्फ उनका हौसला बढ़ाइए ! मीडिया पर छाए, बेवकूफ बनाते विज्ञापनों, तरह-तरह के उटपटांग सीरियलों के झांसे में ना आ कर, उन्हें प्राकृतिक तौर पर सीखने-समझने का मौका दीजिए ! 

विशिष्ट पोस्ट

सोनम चौबे ->छब्बे = दुबे

यह तथाकथित वैज्ञानिक जिसका अपने नाम का एक भी पेंटेंट नहीं है ! जिसने सरकार से सवा सौ एकड़ से ज्यादा जमीन हथिया रखी है ! जो पर्यावरण के नाम पर...