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गुरुवार, 3 सितंबर 2020

राम मंदिर और सोमपुरा परिवार

अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण से जुडा सोमपुरा परिवार एक ऐसा अनोखा परिवार है, जो पिछली सोलह पीढ़ियों से मंदिर निर्माण कार्य में जुटा हुआ है। नागर शैली में मंदिरों की रचना में  इस परिवार को महारथ  हासिल है। इसी शैली में अयोध्या में राममंदिर का निर्माण भी होना है। सोमपुरा परिवार का मानना है कि उनके पुरखों ने मंदिरों की रचना और उनकी बनावट की कला दैव्य वास्तुकार विश्वकर्मा से सीखी थी । उनके दादा प्रभाशंकर जी ने जगत-प्रसिद्ध गुजरात के सोमनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था.......................!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

राम मंदिर ! सदियों से करोड़ों-करोड़ लोगों की आँखों में पलता एक सपना ! जिसे पूरा होता देखने की चाह में अनगिनत पीढ़ियां दिवंगत हो गईं। जिसको साकार करने की चाह में हजारों लोगों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए ! जिसकी राह में अपनों ने ही रोड़े अटकाए ! तुच्छ राजनीती के तहत श्री राम के अस्तित्व पर ही सवाल उठाए गए ! बेबुनियाद तर्कों का माया जाल रचा गया ! कुछ अवसरवादियों ने अपने मतलब के लिए इसे राजनीतिक, सामाजिक व धार्मिक विवाद बना दिया ! अमन-शान्ति के नाम पर रुकावटें खड़ी की गईं ! पर आखिरकार अनगिनत पीढ़ियों का संघर्ष, प्रभु के भक्तों का बलिदान और करोड़ों लोगों की आस्था रंग लाई और सारी बाधाओं को पार कर अब वह सपना साकार होने की ओर अग्रसर हो गया है। 

अब ऐसे महान, चिरप्रतीक्षित, देश की बहुसंख्यक आबादी के साथ-साथ देश-विदेश के करोड़ों लोगों की आस्था के प्रतीक को साकार करने हेतु कुछ ऐसा रूप देना, जो संसार में अप्रतिम, अनूठा, नायाब और अपने आप में मिसाल हो, कोई आसान काम नहीं था ! वह भी तब, जबकि सारे संसार की नजर इस घटनाक्रम पर टिकी हुई थीं ! कमोबेस सभी देशों को इस फैसले का उत्सुकतापूर्वक इन्तजार था ! इसकी भव्यता, विशालता और सुंदरता के लिए कौतूहल था ! सभी बड़ी आतुरता के साथ इसका निर्माण होते देखना चाहते थे ! इसे सभी की अपेक्षाओं पर खरा उतरना था। एक उदाहरण स्थापित करना था ! एक ऐसा निर्माण जिसे देश की पहचान बनना था ! बहुत कठिन परीक्षा की घडी थी। ऐसे में खोज जा कर ख़त्म हुई, महान शिल्पकार चंद्रकांत सोमपुरा के पास !                         
चंद्रकांत सोमपुरा
                        
गुजरात राज्य के भावनगर जिले के पालिताणा नगर में रहने वाला सोमपुरा परिवार एक ऐसा अनोखा परिवार है, जो पिछली सोलह पीढ़ियों से मंदिर निर्माण कार्य में जुटा हुआ है। नागर शैली में मंदिरों की रचना में  इस परिवार को महारथ हासिल है। इसी शैली में अयोध्या में राममंदिर का निर्माण भी होना है। सोमपुरा परिवार का मानना है कि उनके पुरखों ने मंदिरों की रचना और उनकी बनावट की कला दैव्य वास्तुकार विश्वकर्मा से सीखी है। गुजरात के इस परिवार के द्वारा अब तक 200 से भी ज्यादा मंदिरों के डिजाइन तैयार किए जा चुके हैं। उनके दादा प्रभाशंकर जी ने जगत-प्रसिद्ध गुजरात के सोमनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था। देश-विदेश में बिरला परिवार के लिए कई मंदिर इस परिवार ने बनवाए हैं। अक्षरधाम और अंबाजी जैसे कई आस्था स्थल सोमपुरा परिवार के डिजाइन पर ही बने हैं। मथुरा के मंदिर के निर्माण में भी इनका योगदान रहा है। 

बड़ी अनोखी बात है कि भव्य राम मंदिर का मॉडल तैयार करने वाले श्री चंद्रकांत सोमपुरा के पास वास्तुकला की कोई औपचारिक डिग्री नहीं है ! इन्होंने जो भी सीखा, अपने पिता से ही सीखा है। इसके बावजूद इनके हुनर के बल पर इन्हें देश-दुनिया से बड़े-बड़े मंदिरों का मॉडल बनाने के लिए बुलाया जाता रहा है।  खुद सोमपुरा अपने-आप को मंदिर का वास्तुविद कहलाना पसंद करते हैं। इन्होने ना सिर्फ अपने देश बल्कि दुनिया में भी नागर शैली के मंदिरों का नक्शा तैयार किया है। लंदन के सुप्रसिद्ध अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण मंदिर, जो अपने स्थापत्व और भव्यता के लिए दुनिया में सर्वोपरि माना जाता है, उसका नक्शा भी इन्होंने ही बनाया था।  

अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण मंदिर, लंदन 
अपने परिवार के मुखिया श्री चंद्रकांत सोमपुरा बताते हैं कि घनश्यामदास बिरला जी ने उन्हें विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष अशोक सिंघल जी से मिलवाया था। जिनके आग्रह पर 1987 में उन्होंने राम मंदिर की रूप-रेखा तैयार की थी और उनके साथ मिल कर मंदिर पर काम शुरू किया था। इसमें लगने वाले पत्थरों के लिए बंसी पहाड़पुर के बलुआ-पत्थरों का चुनाव किया गया था, जिनकी उम्र 1500 साल मानी जाती है। बंसी पहाड़पुर, राजस्थान के भरतपुर जिले की एक तहसील रूपबास के रुदावल क्षेत्र का छोटा सा गांव है। जो अपने गुलाबी पत्थरों के लिए विश्वप्रसिद्ध है। इस पत्थर की उम्र हजारों साल की मानी जाती है। इसके अलावा इसकी खासियत है कि ना तो यह चटकता है, नाहीं इसमें सीलन आती है और तो और जैसे-जैसे इस पर पानी पड़ता है, वैसे-वैसे इसकी चमक और भी बढती जाती है। इसीलिए इसका चुनाव इस ऐतिहासिक मंदिर के निर्माण हेतु किया गया। हालांकि मंदिर के मुख्य द्वार पर जगत्प्रसिद्ध मकराना का सफ़ेद संगमरमर लगाया जाएगा।  


अब 77 साल के हो चुके चंद्रकांत सोमपुरा ने अपनी उम्र और कोरोना संकट के चलते अपने बेटे आशीष को यह भार सौंपा है। जो अनुबंध प्राप्त कंपनी लार्सन एंड टर्बो के साथ मिलकर अयोध्या में राम मंदिर पर काम कर रहे हैं। इस महान और ऐतिहासिक कार्य में उनके छोटे भाई निखिल उनके सहायक हैं। आशीष को यह कला अपने पिता और दादा से मिली है। पूरा परिवार ही बहुत रोमांचित और उत्साहित है। उनका मानना है कि आदिकाल से ही उनके परिवार पर सदा ईश-कृपा बनी रही है। यह प्रभु का आशीर्वाद ही है कि श्री राम मंदिर के साथ ही उनका नाम भी जुड़ गया है। अब राम मंदिर के निर्माण के साथ ही उनके जीवन में एक और नए अध्याय की शुरुआत होगी।

@अंतर्जाल का आभार 

मंगलवार, 26 मई 2020

रामप्पा मंदिर, जो अपने शिल्पकार के नाम से जाना जाता है

प्राणप्रतिष्ठा के दिन महाराज गणपति देव ने जैसे ही मंदिर को देखा, वे अचंभित, ठगे से खड़े रह गए ! उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ऐसा भव्य, खूबसूरत, विशाल और अद्भुत निर्माण उन्हीं के राज्य में हुआ है ! उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली ! उन्होंने आगे बढ़ कर रामप्पा को गले से लगा लिया और कहा कि मैं धन्य हूँ, जो तुम जैसा कलाकार मेरे पास है। संसार की कोई भी निधि, कोई भी संपदा तुम्हारी इस कला का मोल नहीं चुका सकती ! तुमने मुझे और अपनी धरती को धन्य कर दिया। आज तक हर मंदिर उसमें स्थापित देव प्रतिमा के नाम से ही जाना जाता रहा है, पर मैं इस मंदिर का नाम तुम्हारे नाम पर रखता हूँ ! आज से यह मंदिर रामप्पा मंदिर के नाम से जाना जाएगा..................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
बात बहुत पुरानी है ! करीब 800 साल पहले की !  ईसवी सन 1213 की ! तब आंध्र राज्य पर काकतिया वंश के महाराज गणपति देव का शासन था। एक बार जब महाराज़ अपने सालाना राज्य-भ्रमण पर थे तो उसी दौरान अनेक पुराने मंदिरों को क्षतिग्रस्त व जर्जरावस्था में देख उनको यह विचार आया कि क्यों ना एक ऐसे मंदिर का निर्माण किया जाए जो हजारों वर्ष तक बिना किसी क्षति के बना रह सके ! ऐसा ख्याल आते ही वे वहीं से अपने महल लौट आए। महाराज गणपति शिव जी के अनन्य भक्त थे। महल वापस आते ही उन्होंने राज्य के प्रमुख शिल्पकार रामप्पा को बुलवा उसे अपनी मंशा जता एक ऐसा भव्य शिव मंदिर बनाने को कहा जो वर्षों तक बिना किसी नुक्सान के टिका रह सके। राजज्ञा ! बहस का तो सवाल ही नहीं ! शिल्पकार राजा की इच्छा को शिरोधार्य कर लौट आया।



रामप्पा एक बहुत ही कुशल, अनुभवी तथा अपने कार्य को पूरी तरह से जानने समझने वाला निष्णात व निपुण शिल्पकार था। उसकी बनाई हुई प्रतिमाएं अक्सर लोगों को सजीव होने का धोखा दे देतीं थीं। इसीलिए वह राजा का अत्यंत विश्वासपात्र व बहुत प्रिय दरबारी था। उसके लिए राजाज्ञा, देवाज्ञा के समान थी। महल से लौटते ही वह अपने काम में जुट गया। इस कार्य के लिए जैसी-जैसी जानकारी जहां-जहां से भी मिलने की संभावना थी उसने वे सारे ग्रंथ, लेख, पांडुलिपियां खंगाल डालीं। इसी प्रयास में यह तथ्य उसके सामने आया कि अब तक बनाए गए मंदिर या भवनों में बड़े-बड़े, विशाल पत्थरों व शिलाओं का प्रयोग होता रहा है, जिनके बेहद भारी होने की वजह से प्रकृति के कोप का सामना किया जा सके। परंतु उनका अपना यही भार कालांतर में उन्हीं पर भारी पड़ उनके जमींदोज होने का कारण बन जाता है। इस तथ्य का पता लगते ही रामप्पा एक ऐसे पदार्थ की ईजाद में लग गए जो कठोर, ठोस और मजबूत तो हो पर उसका भार बहुत कम हो। उन दिनों कम साधन होने के बावजूद उन्होंने रात-दिन एक कर दिए ! सेतुबंध तक अपनी खोज का दायरा बढ़ा दिया ! समय तो लगा परआखिर अपनी अथक मेहनत और लगन के बल पर उन्होंने एक ऐसे अपने मन मुताबिक़ ''पत्थर'' की खोज कर ही डाली। यह आज तक एक रहस्य ही है कि वह ''पत्थर'' उन्हें कहीं मिला था या उसको बनाया गया था ! अगर बनाया गया था तो 800-900 वर्ष पहले वह कौन सी तकनीक थी उनके पास, जो पत्थरों को इतना हल्का कर दे कि वो पानी में तैरने लगें ! क्योंकि सेतुबंध में प्रयोग किए गए पत्थरों के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसे पत्थर नहीं मिलते जो पानी पर तैर सकें ! तो क्या रामप्पा ने वह पौराणिक तकनीक खोज निकाली थी.....! 



जो भी हो उस पदार्थ के मिलते ही मंदिर का निर्माण शुरू हो गया। जिसे पूरा होने में 40 साल का वक्त लग गया था। छह फीट ऊंचे चबूतरे पर बनाए गए, भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर के मुख्य द्वार पर नौ फिट ऊँची शिव वाहन नंदी की भी मूर्ति स्थापित की गई ! दीवारों पर महाभारत और रामायण के दृश्य उकेरे गए ! शिल्पकारों ने अपनी कला की छाप भवन की छत, दीवारों, खंभों के साथ हर संभावित जगह पर छोड़ी थी। सुंदर, नक्काशीदार मूर्तियों की भव्यता को देख कोई भी बिना प्रभावित और मोहित हुए नहीं रह सकता था।


प्राणप्रतिष्ठा के दिन महाराज गणपति देव ने जैसे ही मंदिर को देखा, वे अचंभित, ठगे से खड़े रह गए ! उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ऐसा भव्य, खूबसूरत, विशाल और अद्भुत निर्माण उन्हीं के राज्य की धरती पर हुआ है ! भावातिरेक में उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली ! उन्होंने आगे बढ़ कर रामप्पा को गले से लगा लिया और कहा कि मैं धन्य हूँ, जो तुम जैसा कलाकार मेरे पास है। संसार की कोई भी निधि, कोई भी संपदा तुम्हारी इस कला का मोल नहीं चुका सकती ! तुमने मुझे और अपनी धरती को धन्य कर दिया। आज तक हर मंदिर उसमें स्थापित देव प्रतिमा के नाम से ही जाना जाता रहा है, पर मैं इस मंदिर का नाम तुम्हारे नाम पर रखता हूँ ! आज से यह मंदिर रामप्पा मंदिर के नाम से जाना जाएगा।


रामाप्पा या रामलिंगेश्वर मंदिर तेलंगाना में मुलुगू जिले के वेंकटापुर मंडल के सैकड़ों साल से आबाद पालमपेट गांव में स्थित है। तेलंगाना के वारंगल जिले से इसकी दूरी करीब 70 की. मी. है। शिवरात्रि के दौरान इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। कई प्राकृतिक आपदाएं झेलने के बाद भी इस प्रसिद्ध मंदिर को कभी भी कोई ज्यादा नुक्सान नहीं पहुंचा है। धीरे-धीरे इसकी ख्याति जब जन-जन से होते हुए सरकारी कानों तक पहुंची तब वैज्ञानिकों ने इसकी खोज-खबर ले, जांच-पड़ताल की और पाया कि अपनी उम्र के हिसाब से यह मंदिर आज भी बहुत मजबूत है। जब काफ़ी कोशिशों के बाद भी इसकी मज़बूती का रहस्य नहीं खुला तो मंदिर के एक पत्थर के एक टुकड़े को काट कर उसका परिक्षण किया गया ! परिणामस्वरूप पाया गया कि वह पदार्थ आश्चर्यजनक रूप से वजन में बहुत हल्का होने के बावजूद बहुत ही मजबूत है और इसके साथ-साथ पानी में भी नहीं डूबता है ! इस प्रकार मंदिर की मजबूती का तो पता चल गया पर पत्थर का रहस्य अब भी ज्यों का त्यों बना हुआ है ! 


तेहरवीं सदी में भारत आए मशहूर खोजकर्ता मार्को पोलो द्वारा "मंदिरों की आकाशगंगा में सबसे चमकीला तारा'' कहलवाने वाला यह मंदिर विश्व धरोहर की दौड़ में शामिल होने जा रहा है। साल 2018 में घोषित होने वाली विश्व धरोहरों की सूची में शामिल करने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस मंदिर का प्रस्ताव संस्कृति मंत्रालय को भेज दिया गया है। वहां से स्वीकृति मिलते ही वह प्रस्ताव यूनेस्को भेज दिया जाएगा। इसकी दिनों-दिन बढ़ती ख्याति के कारण यहां पर्यटकों की आवाजाही भी बहुत बढ़ गई है। इसीलिए उनकी सुख-सुविधा को ध्यान में रख पर्यटन विभाग भी जागरूक हो गया है उसी के तहत इसके पास की झील के किनारे कॉटेज व रेस्त्रां वगैरह की सुविधाएं उपलब्ध होने लग गई हैं। 

@सभी तस्वीरें अंतर्जाल से साभार 

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