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शनिवार, 24 अक्टूबर 2020

एक गाँव, अफसरों वाला

यह तो सिर्फ एक गाँव की बात है ! पर कटु सत्य तो यह है कि हमारे देश के हर क्षेत्र में तरह-तरह के अनगिनत गौरव स्थल मौजूद हैं, जिन पर देशवासियों को नाज हो सकता है। पर उनमें से अधिकतर की जानकारी हमें नहीं है या देने की जरुरत ही नहीं समझी जाती ! शुरू से ही ऐसा रहा है ! लिखने-बताने वालों ने अपने पूर्वाग्रहों के चलते या फिर किसी दवाबवश, वही लिखा या बताया जितना उनसे कहा गया ! आज जब जागरूकता और सहूलियतें बढ़ी, तो ऐसी-ऐसी धरोहरें सामने आने लगीं कि हम किंकर्त्वयविमूढ़ रह गए...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आम धारणा है कि शहरों में पले युवा, सुविधासम्पन्न होने के कारण, गाँव-देहात के अपने समवयस्कों से ज्यादा होनहार, होशियारऔर समझदार होते हैं। हालांकि यह बात बहुतेरी बार झुठलाई जा चुकी है पर सोच का क्या किया जा सकता है ! हमारे संचार माध्यमों, मुद्रित, श्रव्य या दृश्य-श्रव्य कोई भी हो, उनको सनसनीखेज ख़बरों से ही फुरसत नहीं मिलती जो ऐसी गलत धारणाओं को झुठलाती सच्चाइयों को सारे देशवासियों के सामने लाएं  ! 

इसी सोच को दरकिनार करती हमारे देश में एक ऐसी जगह है जिसका सानी शायद ही कोई और स्थान हो ! एक ऐसा गाँव जिसके हर दूसरे घर का होनहार युवा आईएएस, आईपीएस या अन्य किसी उच्च सरकारी पद पर आसीन है। इस गाँव की हवा-पानी-माटी में ही ऐसी कोई बात है जिसने एक के बाद एक सैकड़ों युवाओं को देश के उच्च पदों तक पहुंचाया। तभी तो इस का नाम अफसरों वाला गाँव के रूप में ख्यात हो गया। 

इंटरमीडिएट कॉलेज, जिसका परीक्षा परिणाम हर वर्ष 90 प्रतिशत रहता है, से उत्तीर्ण अनगिनत प्रतिभावान छात्र आज पुलिस, प्रशासनिक तथा चिकित्सा क्षेत्र में कार्यरत हैं। कुछ दिनों पहले ही गाँव से एक साथ 11 लड़कों का चयन सब इंस्पेक्टर के पद पर हुआ था

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद डिवीज़न के प्रतापगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 24 किमी दूर दो नदियों, सई और लोनी, के बीच बसे इस गाँव का नाम बहुचरा है। दिखने में मोटे तौर पर यह भी प्रदेश के दूसरे गाँवों जैसा ही एक आम सा गाँव है, पर जो बात इसे दूसरों से अलग करती है वह है यहां की उपज ! यहां खेती तो नाम मात्र की होती है, पर होनहार बच्चों के लिए इस गाँव की जमीन खूब उपजाऊ है। 

यहां के लोग बताते हैं कि ''1919 में हमारे गाँव से 25 जवान ब्रिटिश सरकार की तरफ से प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेने गए थे। उनके लौटने पर जब सरकार की तरफ से उन्हें इनाम देने की बात आई तो उन्होंने इनाम के बदले गाँव में एक स्कूल खोलने की दरख्वास्त कर दी ! उनकी बात मान ली गई और इस तरह गाँव को एक स्कूल मिल गया। पर लोगों को पढ़ाई में ज्यादा रूचि नहीं थी ! लोग बच्चों को पढ़ने भेजने से कतराते थे। पर हमारे पूर्वजों को शिक्षा की महत्ता मालुम थी सो गाँव में ये नियम बनाया गया कि पांच साल का होते ही बच्चे को स्कूल में दाखिल करवाना पडेगा ! नहीं तो  भारी जुर्माना देना होगा ! उसी कारण आज यहां की साक्षारता दर, प्रदेश की 67.68% के मुकाबले तकरीबन 82% है। पर उसी जबरदस्ती के कारण विद्यालय का नाम जबरिया अनिवार्य प्राथमिक विद्यालय भी पड़ गया। 

जबरिया अनिवार्य प्राथमिक विद्यालय  
वर्ष 1969 से स्थापित महात्मा गांधी इंटरमीडिएट कॉलेज, जिसका परीक्षा परिणाम हर वर्ष 90 प्रतिशत रहता है, से उत्तीर्ण अनगिनत प्रतिभावान छात्र आज पुलिस, प्रशासनिक तथा चिकित्सा क्षेत्र में कार्यरत हैं।कुछ दिनों पहले ही गाँव से एक साथ 11 लड़कों का चयन सब इंस्पेक्टर के पद पर हुआ था। इसके पहले भी कई इंस्पेक्टर इस गाँव से चयनित हो चुके हैं तथा कई पुरुस्कारों से नवाजे जा चुके हैं।

यह तो सिर्फ एक गांव की बात है ! पर कटु सत्य तो यह है कि हमारे देश के हर क्षेत्र में तरह-तरह के अनगिनत गौरव स्थल मौजूद हैं, जिन पर देशवासियों को नाज हो सकता है। पर उनमें से अधिकतर की जानकारी हमें नहीं है या देने की जरुरत ही नहीं समझी जाती ! शुरू से ही ऐसा रहा है ! लिखने-बताने वालों ने अपने पूर्वाग्रहों चलते या फिर किसी दवाब वश वही लिखा या बताया जितना उनसे कहा गया ! आज जब जागरूकता और सहूलियतें बढ़ी तो ऐसी-ऐसी धरोहरें सामने आने लगीं कि हम खुद ही किंकर्त्वयविमूढ़ रह गए। 

शनिवार, 10 अक्टूबर 2020

''ट्राम रेस्त्रां'', कोलकाता का

इस परिवहन सेवा के साथ कोलकाता वासियों  का एक ऐसा अटूट भावनात्मक संबंध कायम हो गया, एक ऐसा रिश्ता बन गया कि इस पर लोग चढ़ें ना चढ़ें पर इसके बिना वे अपने शहर की कल्पना भी नहीं कर सकते ! इसीलिए उसे बचाने, उसे लोकप्रिय बनाने व दीर्घजीवी बनाने हेतु एक प्रयोग के तहत एक ट्राम को रंग-रोगन और चित्रकारी से सजा कर उसका एक नया  अवतार गढा गया ! ट्यूरिस्टों की जरूरतों को मद्दे नजर रख उसे पूरी तरह वातानुकूलित कर बायो टॉयलेट तथा म्यूजिक सिस्टम से युक्त कर उसे एक आधुनिक रेस्त्रां का रूप दे दिया गया................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

हमारा बंगाल ! पहले ऐसा कहा जाता था कि बंगाल जो आज सोचता है, वो पूरा भारत कल सोचता है ! वह राज्य जो देश में सर्वाधिक उपलब्धियों में पहला स्थान रखता है ! पहला महानगर, पहला अखबार, पहला विश्वविद्यालय, पहला नोबेल, पहला ऑस्कर, पहली मेट्रो, पहला प्लैनेटेरियम, पहला फ्लोटिंग मार्किट, पहली अंडरवाटर ट्रेन ! पहला ! पहला !! पहला !!! इसी गौरवमयी परंपरा में यहां के निवासियों ने एक और अनोखी पहल की है ! वह है कोलकाता का ''ट्राम रेस्त्रां'' !   


ट्राम ! अश्व चालित से विद्युत सरीसृप का रूप धर, अभी भी अस्तित्व में बने रहते हुए यह करीब डेढ़ सौ वर्षों से देश में घटित हुए विभिन्न घटनाक्रमों की चश्मदीद गवाह है ! इसीलिए 1902 में शुरू हुई इस परिवहन सेवा के साथ यहां के निवासियों का एक ऐसा अटूट भावनात्मक संबंध कायम हो गया, एक ऐसा रिश्ता बन गया कि इस पर लोग चढ़ें ना चढ़ें पर इसके बिना वे अपने शहर की कल्पना भी नहीं कर सकते ! भले ही इसे अपनी पटरियों पर धीमी गति और यातायात में बाधा आने के कारण बहुतेरी बार आलोचना का शिकार भी होना पड़ता रहा हो, पर स्थानीय निवासियों के प्रेम और उनकी  भावनाओं के कारण कलकत्ता में इसके वजूद को बरकरार रखा गया ! हालांकि इसके परिवहन पथ को बहुत सिमित कर दिया गया ! जहां साठ-सत्तर के दशक में ट्राम 52 रूटों पर चल करीब 70-75 की. मी. का दायरा पूरा करती थी वह अब पांच रूटों के 17-18 की मी के दायरे में सिमट कर रह गई है।  परंतु ''हेरिटेज'' में शामिल इस वाहन को बचाने, इसकी लोकप्रियता को बढ़ाने और कुछ कमाई का साधन जुटाने के लिए CTC (Calcutta Tramways Company) और इसके चाहने वालों ने एक प्रयोग के तहत, इसे चलित रेस्त्रां में बदलने की सोची ! 
 

इसी प्रयोग के तहत एक ट्राम को रंग-रोगन और चित्रकारी से सजा कर एक नया रूप दिया गया ! ट्यूरिस्टों की जरूरतों को मद्दे नजर रख उसे पूरी तरह वातानुकूलित कर बायो टॉयलेट तथा म्यूजिक सिस्टम से युक्त किया गया। इस पर करीब दस लाख रुपयों का खर्च आया।  खाद्य पदार्थों की आपूर्ति में कोई बाधा ना खड़ी हो, इसलिए खाद्य पदार्थ बनाने वाली कई ब्रांडेड कंपनियों को साथ लिया गया। CTC ने विक्टोरिया ग्रुप को इसका जिम्मा देते हुए उनसे दस साल का अनुबंध किया, जिसके तहत ग्रुप, CTC को हर महीने डेढ़ लाख से कुछ ज्यादा राशि का भुगतान करता है। इस ट्राम रेस्त्रां में एस्पलेनेड से खिदिरपुर जाने-आने की डेढ़ घंटे की यात्रा में 799/- और 999/- की दर पर निरामिष और आमिष दोनों तरह का भोजन उपलब्ध कराया जाता है। जिसमें कई तरह के भिन्न-भिन्न पेय, स्टार्टर, मुख्य भोजन और डेजर्ट वगैरह शामिल होते हैं।

ऐसी पहली सेवा 14 अक्टूबर 2018 में एस्प्लेनेड के ऐतिहासिक शहीद मीनार से खिदिरपुर तक के लिए शुरू की गई ! यही वह रूट है जिस पर 27 मार्च 1902 में पहली विद्युत चलित ट्राम चलाई गई थी। उसी मार्ग पर जहां पुराने महानगर का एकमात्र हरित स्थल ''मैदान'', जो वर्षों-वर्ष से यहां के वाशिंदों को प्राणवायु प्रदान करता आ रहा है, के बीचो-बीच चलती, अद्भुत इमारत विक्टोरिया मेमोरियल के दर्शन कराती, रेस कोर्स के बगल से गुजरती हुई अपने गंतव्य, खिदिरपुर की ओर बढ़ती इस नई, अनोखी सवारी को ''विक्टोरिया ऑन व्हील 18'' नाम दिया गया है। फिलहाल इसके चार ट्रिप निश्चित किए गए हैं, दो सुबह लंच के समय और दो शाम डिनर के वक्त ! इस चलित रेस्त्रां में 27 मेहमानों के स्वागत की व्यवस्था है। इसके लिए 24 घंटे पहले आरक्षण करवाना जरुरी है।यात्रा के दौरान इस पर कोई भी आधिकारिक यात्री कहीं से भी चढ़-उतर सकता है।

महलों के शहर कोलकाता को, विभिन्न खाद्यों के विविध स्वादों के रसास्वादन के साथ, धीरे-धीरे चलते हुए देखने, समझने, यादों  समेटने का, कुछ अलग सा, अवर्चनीय सुख तो यात्रा कर के ही प्राप्त किया जा सकता है। सो इस कोरोना संकट से उबर कर जब भी अगली बार कोलकाता जाना हो तो एक दिन के कुछ घंटे अपनी चहेती ट्राम के काया-कल्पित रूप को समर्पित जरूर हों।     

रविवार, 12 जुलाई 2020

स्टेशन; आधे पर भाई, आधे पर भाऊ

यह तो अच्छा है कि स्टेशनों का रख-रखाव भी रेलवे के ही जिम्मे है, नहीं तो पता नहीं आपसी लड़ाई में राजनीती ऐसी धरोहरों का क्या हाल कर के धर देती ! आधे में रौशनी होती, आधे में अंधकार ! आधा रंग-रोगन से चमकता, तो आधा बेरंगत फटे हाल ! आधे में साफ़-सफाई, तो आधा बदबूदार ! आधे के कर्मचारी उसके, आधे के इसके ! ना आपस में समन्वय, ना कोई भाईचारा ! इन सबके बीच मुसाफिर बेचारा रहता आफत का मारा ............!!

#हिन्दी_ब्लागिंग    
रेल सदा ही अबाल-वृद्ध में उत्सुकता, अचरज व लोकप्रियता का मुद्दा रही है। हमारी रेल व्यवस्था दुनिया के रेल तंत्र में चौथे स्थान पर है। साढ़े बारह हजार से भी ऊपर हमारी यात्री गाड़ियां रोज दो करोड से भी ज्यादा लोगों को अपने मुकाम पर पहुंचाने में लगी रहती हैं। इनको लाने ले जाने के पड़ाव के रूप में तकरीबन साढ़े आठ हजार के लगभग स्टेशन कार्यरत हैं। इनमें से कई अपनी अजीबोगरीब खासियतों के कारण मशहूरी पा चुके हैं। कोई अपनी ऊंचाई, कोई लम्बाई, कोई व्यस्तता, कोई अपने परिवेश, कोई अपने नाम को ही ले कर कौतुक का विषय बन चुका है। यदि ऐसे सारे अजूबों की बात की जाए तो अच्छा-खासा मोटा ग्रंथ बन जाएगा। इसलिए आज सिर्फ ऐसे दो रेलवे स्टेशनों की बात जो बात ही बात में दो राज्यों के बीच बंट कौतुक की बात बनने के बावजूद अवाम में गुमनाम सी बात बन कर रह गए हैं।


पहला है, नवापुर का स्टेशन !  पश्चिम रेलवे के सूरत-भुसावल मार्ग पर पड़ने वाला यह स्टेशन दो राज्यों में बंटा हुआ है ! इसका आधा हिस्सा महाराष्ट्र में और आधा गुजरात में पड़ता है। जब यह स्टेशन बनाया गया था तब महाराष्ट्र और गुजरात अलग-अलग प्रांत नहीं थे। तब इसे बाम्बे प्रेसीडेंसी में बनाया गया था। परन्तु जब 1961 में राज्यों का बंटवारा हो महाराष्ट्र और गुजरात अलग हुए तो नवापुर दोनों के हिस्से में आ गया। तब ज्यादा बखेड़ा न कर इसे यथावत रख दोनों राज्यों के बीच बांट दिया गया। स्टेशन की कुल लंबाई 800 मीटर है जिसके 300 मीटर का हिस्सा महाराष्ट्र में पड़ता है तथा 500 मीटर का हिस्सा गुजरात में ! यदि स्टेशन पर कोई रेलगाड़ी महाराष्ट्र से आ रही है तो उसका इंजन गुजरात में होता है और यदि गुजरात से ट्रेन आ रही है तो उसका इंजन महाराष्ट्र में होता है। इसके रेलवे पुलिस स्टेशन, जलपान गृह, टिकट घर, महाराष्ट्र राज्य के नंदूरबार जिले के नवापुर में आते हैं और स्टेशन मास्टर, वेटिंग रूम, पानी की टंकी और शौचालय गुजरात राज्य के तापी जिले के उच्छल में पड़ते हैं। इस स्टेशन पर आने वाली रेलगाड़ियों का एक हिस्सा महाराष्ट्र और दूसरा हिस्सा गुजरात में खड़ा होता है। दोनों राज्यों की सीमाओं को दिखाने के लिए इस स्टेशन के बीचो-बीच एक बेंच लगाई गई है, जिस पर बाकायदा पेंट कर दोनों राज्यों की सीमाओं के बारे में बताया गया है। इसमें एक तरफ गुजरात व दूसरी ओर महाराष्ट्र लिखा हुआ है। इसका उल्लेख एक बार रेल मंत्री भी कर चुके हैं। अलग-अलग भाषाओं के राज्य होने के कारण रेलों के आने-जाने की जानकारी भी चार भाषाओं हिंदी-अंग्रेजी-मराठी व गुजराती में दी जाती है ! एक और मजे की बात ! सुरा प्रेमी और गुटका-मसाला के चहेतों को यहां थोड़ा सजग रहने की भी जरुरत है ! ऐसी कोई भी लत लात खाने का कारण बन सकती है ! क्योंकि गुजरात में शराब बंदी है तो महाराष्ट्र में गुटका बैन है !
ऐसा ही एक दूसरा रेलवे स्टेशन है, भवानी मंडी ! जो भारतीय रेलवे के अनोखे स्टेशनों की फेहरिस्त में शामिल है ! रेलवे के वेस्ट सेन्ट्रल जोन के कोटा रेलवे डिवीजन के अंतर्गत आने तथा राजस्थान के झालावाड़ जिले में पड़ने वाले इस स्टेशन का उत्तरी हिस्सा मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में तथा दक्षिणी भाग राजस्थान के झालावाड़ में पड़ता है। इसलिए आधी गाडी एक राज्य में खड़ी होती है तो आधी दूसरे राज्य में ! चालक एक राज्य में होता है तो गार्ड दूसरे प्रांत में ! दो राज्यों की मिलकियत बना यह स्टेशन, दो राज्यों को रेलवे के जरिए एक भी करता है। इस स्टेशन पर भी दोनों राज्यों की सीमाओं को दिखाने के लिए बोर्ड लगाए गए हैं। नवापुर स्टेशन की तरह ही भवानी मंडी स्टेशन का टिकट बुकिंग काउंटर मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में पड़ता है तो स्टेशन में आने का रास्ता और इसका प्रतीक्षालय राजस्थान के झालावाड़ जिले के अंतर्गत आते हैं। इसीलिए वह मजेदार मंजर बनता है जहां टिकट मध्य प्रदेश से दिया जाता है और लिया राजस्थान में जाता है ! 

यह तो अच्छा है कि स्टेशनों का रख-रखाव भी रेलवे के ही जिम्मे है, नहीं तो पता नहीं आपसी लड़ाई में राजनीती ऐसी धरोहरों का क्या हाल कर के धर देती ! आधे में रौशनी होती, आधे में अंधकार ! आधा रंग-रोगन से चमकता, तो आधा बेरंगत फटे हाल ! आधे में साफ़-सफाई, तो आधा बदबूदार ! आधे के कर्मचारी उसके, आधे के इसके ! ना आपस में समन्वय, ना कोई भाईचारा ! इस सबके बीच रहता मुसाफिर आफत का मारा ! 

@चित्र अंतरजाल के सौजन्य से 

मंगलवार, 26 मई 2020

रामप्पा मंदिर, जो अपने शिल्पकार के नाम से जाना जाता है

प्राणप्रतिष्ठा के दिन महाराज गणपति देव ने जैसे ही मंदिर को देखा, वे अचंभित, ठगे से खड़े रह गए ! उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ऐसा भव्य, खूबसूरत, विशाल और अद्भुत निर्माण उन्हीं के राज्य में हुआ है ! उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली ! उन्होंने आगे बढ़ कर रामप्पा को गले से लगा लिया और कहा कि मैं धन्य हूँ, जो तुम जैसा कलाकार मेरे पास है। संसार की कोई भी निधि, कोई भी संपदा तुम्हारी इस कला का मोल नहीं चुका सकती ! तुमने मुझे और अपनी धरती को धन्य कर दिया। आज तक हर मंदिर उसमें स्थापित देव प्रतिमा के नाम से ही जाना जाता रहा है, पर मैं इस मंदिर का नाम तुम्हारे नाम पर रखता हूँ ! आज से यह मंदिर रामप्पा मंदिर के नाम से जाना जाएगा..................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
बात बहुत पुरानी है ! करीब 800 साल पहले की !  ईसवी सन 1213 की ! तब आंध्र राज्य पर काकतिया वंश के महाराज गणपति देव का शासन था। एक बार जब महाराज़ अपने सालाना राज्य-भ्रमण पर थे तो उसी दौरान अनेक पुराने मंदिरों को क्षतिग्रस्त व जर्जरावस्था में देख उनको यह विचार आया कि क्यों ना एक ऐसे मंदिर का निर्माण किया जाए जो हजारों वर्ष तक बिना किसी क्षति के बना रह सके ! ऐसा ख्याल आते ही वे वहीं से अपने महल लौट आए। महाराज गणपति शिव जी के अनन्य भक्त थे। महल वापस आते ही उन्होंने राज्य के प्रमुख शिल्पकार रामप्पा को बुलवा उसे अपनी मंशा जता एक ऐसा भव्य शिव मंदिर बनाने को कहा जो वर्षों तक बिना किसी नुक्सान के टिका रह सके। राजज्ञा ! बहस का तो सवाल ही नहीं ! शिल्पकार राजा की इच्छा को शिरोधार्य कर लौट आया।



रामप्पा एक बहुत ही कुशल, अनुभवी तथा अपने कार्य को पूरी तरह से जानने समझने वाला निष्णात व निपुण शिल्पकार था। उसकी बनाई हुई प्रतिमाएं अक्सर लोगों को सजीव होने का धोखा दे देतीं थीं। इसीलिए वह राजा का अत्यंत विश्वासपात्र व बहुत प्रिय दरबारी था। उसके लिए राजाज्ञा, देवाज्ञा के समान थी। महल से लौटते ही वह अपने काम में जुट गया। इस कार्य के लिए जैसी-जैसी जानकारी जहां-जहां से भी मिलने की संभावना थी उसने वे सारे ग्रंथ, लेख, पांडुलिपियां खंगाल डालीं। इसी प्रयास में यह तथ्य उसके सामने आया कि अब तक बनाए गए मंदिर या भवनों में बड़े-बड़े, विशाल पत्थरों व शिलाओं का प्रयोग होता रहा है, जिनके बेहद भारी होने की वजह से प्रकृति के कोप का सामना किया जा सके। परंतु उनका अपना यही भार कालांतर में उन्हीं पर भारी पड़ उनके जमींदोज होने का कारण बन जाता है। इस तथ्य का पता लगते ही रामप्पा एक ऐसे पदार्थ की ईजाद में लग गए जो कठोर, ठोस और मजबूत तो हो पर उसका भार बहुत कम हो। उन दिनों कम साधन होने के बावजूद उन्होंने रात-दिन एक कर दिए ! सेतुबंध तक अपनी खोज का दायरा बढ़ा दिया ! समय तो लगा परआखिर अपनी अथक मेहनत और लगन के बल पर उन्होंने एक ऐसे अपने मन मुताबिक़ ''पत्थर'' की खोज कर ही डाली। यह आज तक एक रहस्य ही है कि वह ''पत्थर'' उन्हें कहीं मिला था या उसको बनाया गया था ! अगर बनाया गया था तो 800-900 वर्ष पहले वह कौन सी तकनीक थी उनके पास, जो पत्थरों को इतना हल्का कर दे कि वो पानी में तैरने लगें ! क्योंकि सेतुबंध में प्रयोग किए गए पत्थरों के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसे पत्थर नहीं मिलते जो पानी पर तैर सकें ! तो क्या रामप्पा ने वह पौराणिक तकनीक खोज निकाली थी.....! 



जो भी हो उस पदार्थ के मिलते ही मंदिर का निर्माण शुरू हो गया। जिसे पूरा होने में 40 साल का वक्त लग गया था। छह फीट ऊंचे चबूतरे पर बनाए गए, भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर के मुख्य द्वार पर नौ फिट ऊँची शिव वाहन नंदी की भी मूर्ति स्थापित की गई ! दीवारों पर महाभारत और रामायण के दृश्य उकेरे गए ! शिल्पकारों ने अपनी कला की छाप भवन की छत, दीवारों, खंभों के साथ हर संभावित जगह पर छोड़ी थी। सुंदर, नक्काशीदार मूर्तियों की भव्यता को देख कोई भी बिना प्रभावित और मोहित हुए नहीं रह सकता था।


प्राणप्रतिष्ठा के दिन महाराज गणपति देव ने जैसे ही मंदिर को देखा, वे अचंभित, ठगे से खड़े रह गए ! उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ऐसा भव्य, खूबसूरत, विशाल और अद्भुत निर्माण उन्हीं के राज्य की धरती पर हुआ है ! भावातिरेक में उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली ! उन्होंने आगे बढ़ कर रामप्पा को गले से लगा लिया और कहा कि मैं धन्य हूँ, जो तुम जैसा कलाकार मेरे पास है। संसार की कोई भी निधि, कोई भी संपदा तुम्हारी इस कला का मोल नहीं चुका सकती ! तुमने मुझे और अपनी धरती को धन्य कर दिया। आज तक हर मंदिर उसमें स्थापित देव प्रतिमा के नाम से ही जाना जाता रहा है, पर मैं इस मंदिर का नाम तुम्हारे नाम पर रखता हूँ ! आज से यह मंदिर रामप्पा मंदिर के नाम से जाना जाएगा।


रामाप्पा या रामलिंगेश्वर मंदिर तेलंगाना में मुलुगू जिले के वेंकटापुर मंडल के सैकड़ों साल से आबाद पालमपेट गांव में स्थित है। तेलंगाना के वारंगल जिले से इसकी दूरी करीब 70 की. मी. है। शिवरात्रि के दौरान इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। कई प्राकृतिक आपदाएं झेलने के बाद भी इस प्रसिद्ध मंदिर को कभी भी कोई ज्यादा नुक्सान नहीं पहुंचा है। धीरे-धीरे इसकी ख्याति जब जन-जन से होते हुए सरकारी कानों तक पहुंची तब वैज्ञानिकों ने इसकी खोज-खबर ले, जांच-पड़ताल की और पाया कि अपनी उम्र के हिसाब से यह मंदिर आज भी बहुत मजबूत है। जब काफ़ी कोशिशों के बाद भी इसकी मज़बूती का रहस्य नहीं खुला तो मंदिर के एक पत्थर के एक टुकड़े को काट कर उसका परिक्षण किया गया ! परिणामस्वरूप पाया गया कि वह पदार्थ आश्चर्यजनक रूप से वजन में बहुत हल्का होने के बावजूद बहुत ही मजबूत है और इसके साथ-साथ पानी में भी नहीं डूबता है ! इस प्रकार मंदिर की मजबूती का तो पता चल गया पर पत्थर का रहस्य अब भी ज्यों का त्यों बना हुआ है ! 


तेहरवीं सदी में भारत आए मशहूर खोजकर्ता मार्को पोलो द्वारा "मंदिरों की आकाशगंगा में सबसे चमकीला तारा'' कहलवाने वाला यह मंदिर विश्व धरोहर की दौड़ में शामिल होने जा रहा है। साल 2018 में घोषित होने वाली विश्व धरोहरों की सूची में शामिल करने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस मंदिर का प्रस्ताव संस्कृति मंत्रालय को भेज दिया गया है। वहां से स्वीकृति मिलते ही वह प्रस्ताव यूनेस्को भेज दिया जाएगा। इसकी दिनों-दिन बढ़ती ख्याति के कारण यहां पर्यटकों की आवाजाही भी बहुत बढ़ गई है। इसीलिए उनकी सुख-सुविधा को ध्यान में रख पर्यटन विभाग भी जागरूक हो गया है उसी के तहत इसके पास की झील के किनारे कॉटेज व रेस्त्रां वगैरह की सुविधाएं उपलब्ध होने लग गई हैं। 

@सभी तस्वीरें अंतर्जाल से साभार 

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यूपी का रहस्यमयी मेंढक मंदिर

ओयल कस्बे में स्थित लगभग 200 साल पुराने नर्मदेश्वर महादेव मंदिर को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही यहां एक और आश्चर्यजनक बात...