pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: शिवलिंग
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रविवार, 22 मार्च 2026

जनश्रुति के कोहरे में घिरा, माडूं का नीलकंठ मंदिर (वीडियो सहित)

माडूं के मंदिर का यह शिवलिंग चबूतरे पर ना हो कर करीब छह फुट की गहराई में स्थित है। यदि मंदिर ही बनाना होता तो ऊपर ही शिवलिंग स्थापित किया जा सकता था, चट्टानी पत्थरों वाले फर्श को इतना गहरा खोदने की क्या आवश्यकता थी ! दूसरी बात, शिवलिंग के गर्भगृह की गहराई और आंगन से चबूतरे की ऊंचाई लगभग बराबर है ! यानी वहां पहले से शिवलिंग था और उसके चारों ओर ऊँचा चबूतरा बना दीवारें खड़ी की गईं, जिससे शिवलिंग ढक जाए और नजर ना आए ! ऐसा इसलिए भी लगता है क्योंकि गर्भगृह तक नीचे जाने के लिए बनी सीढ़ीयां स्टील की हैं और हाल के वर्षों में ही लगी प्रतीत होती हैं...........!!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

मांडू या मांडवगढ़ अपनी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध, एक प्राचीन नगर है। यह मध्य प्रदेश के मालवा और निमाड़ क्षेत्र में, धार शहर से 35 किमी और इंदौर से लगभग 100 किमी की दूरी पर एक चट्टानी इलाके में बसा हुआ है। इसकी ज्यादातर ख्याति बाज बहादुर और रानी रूपमती के प्रेम प्रसंगों और उससे जुड़े प्राचीन भवनों के कारण जानी जाती है ! इसी मांडू नगरी की सुंदर वादियों में, मांडू बस अड्डे से करीब पांच किमी और मांडू रोड से तीन किमी की दूरी पर भगवान शिव का एक प्राचीन नीलकंठ महादेव मंदिर स्थित है ! सड़क से कुछ ही दूर, पत्थरों से निर्मित करीब सत्तर सीढ़ियां उतरने के बाद गहरी खाई के साथ एक आंगन के चबूतरे पर मुगल शैली की इमारत में यह मंदिर बना हुआ है ! 

नीलकंठेश्वर 


इस मंदिर के गर्भ-गृह में स्थित शिवलिंग का एक प्राकृतिक झरने से सतत जलाभिषेक होता रहता है, जो मंदिर को खास बनाता है। अब हिंदुओं का कोई खास धर्म स्थान हो और विधर्मियों की कुदृष्टि उस पर ना पड़े, यह तो हो ही नहीं सकता, सो यहां भी वही सब दोहराया गया जो पहले से होता आया है ! साथ ही हमारे तथाकथित इतिहासकारों ने अपने कुठिंत विचारों से इसके बारे में भी सदा की तरह एक मनघड़ंत कहानी गढ़ी और फैला रखी है ! उसीको यहां के स्थानीय निवासी और गाइड वगैरह आने वाले पर्यटकों-श्रद्धालुओं को सुनाते-बताते रहते हैं !

चबूतरे पर निर्माण 
सीढ़ियां 
श्रमसाध्य 

मुद्र-मंथन के बाद शिवजी ने हलाहल को अपने गले में धारण किया और वे नीलकंठ कहलाए ! भोलेनाथ ने हलाहल विष की ज्वाला को शांत करने के लिए जिस-जिस जगह पर धूनी रमाई, वही जगह नीलकंठेश्वर के नाम से विख्यात हो गई ! उस कथा से मांडू की पावन जगह का नाम जुड़ा है, तो जाहिर है कि वर्तमान शिवलिंग की स्थापना बहुत पहले हो चुकी होगी ! कुछ लोगों का मानना भी है और वे दबे स्वर में बताते भी हैं कि वर्तमान निर्माण भगवान शिव के पुराने मंदिर पर ही बना है ! जिम्मेदार लोगों, पुरातत्ववेताओं और संस्थाओं की जिम्मेदारी बनती है कि यहां के इतिहास को खंगाल कर यहां की सच्चाई सामने लाई जाए ! 

दुर्गमता 

दीवाल पर खुदी आयतें 

दरवाजे के ऊपर लिखा संदेश 

नश्रुति कहती है कि नीलकंठ महल को मांडू के मुगल गवर्नर शाह बदगाह ने 1574 AD में अकबर की प्रिय मुगल महारानी मरियम-उज-ज़मानी के लिए बनवाया था, जिसे आम बोलचाल में जोधाबाई के नाम से जाना जाता है। शाही मुगल कागजों में इस महल का नाम इमारत-ए-दिलखुशा लिखा मिलता है। पर यह स्थान आज भी सुनसान और कुछ-कुछ निर्जन ही है। उस समय तो और भी दुर्गम रहा होगा ! उस पर यहां की उबड़-खाबड़ पत्थर की सीढ़ियों से उतर कर पहुंचना भी आसान नहीं है, खासकर महिलाओं के लिए, भले ही वह पालकी में आएं ! इसलिए यह जगह महल कम शिकारगाह ज्यादा लगती है !

नमस्कार 

यहां आ कर ऐसा अनुमान और आभास होता है कि पहले यह महल भगवान शिव के पुराने मंदिर के पास बनाया गया होगा, जिसके खंडहर अभी भी मौजूद हैं, फिर किसी सूबेदार ने आदतानुसार अपने आका को खुश करने के लिए शिवलिंग को घेर कर उस पर भी इमारत खड़ी कर दी होगी ! ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि शिवलिंग चबूतरे पर ना हो कर करीब छह फुट की गहराई में स्थित है। यदि मंदिर ही बनाना होता तो ऊपर ही शिवलिंग स्थापित किया जा सकता था, चट्टानी पत्थरों वाले फर्श को इतना गहरा खोदने की क्या आवश्यकता थी ! दूसरी बात, शिवलिंग के गर्भगृह की गहराई और आंगन से चबूतरे की ऊंचाई लगभग बराबर है ! यानी वहां पहले से शिवलिंग था और उसके चारों ओर ऊँचा चबूतरा बना दीवारें खड़ी की गईं, जिससे शिवलिंग ढक जाए और नजर ना आए ! ऐसा इसलिए भी लगता है क्योंकि गर्भगृह तक नीचे जाने के लिए बनी सीढ़ीयां स्टील की हैं और हाल के वर्षों में ही लगी प्रतीत होती हैं ! 

गर्भगृह 
                                       

जैसा कि भ्रम फैलाया गया है कि यह मंदिर किसी मुगल रानी के लिए बनवाया गया है। तो यदि श्रद्धा से मंदिर बनवाया जाएगा तो उस पर कलश की स्थापना होनी चाहिए, जो यहां नहीं है ! सोचने की बात है यदि कोई मंदिर, चर्च या मस्जिद बनवाएगा तो उसी के वास्तुनुसार निर्माण होगा ! चर्च और मस्जिद पर कलश नहीं बनवा दिया जाएगा ना हीं घंटे-घड़ियाल लटका दिए जाएंगे ! तो यदि मंदिर बनवाना था तो इस मंदिर का दरवाजा मस्जिदनुमा क्यों है ? दरवाजे के ऊपर के हिस्से में और बगल की दीवारों पर आयतें क्यों कुरेदी गई हैं ? पुरातत्व विभाग ने भी एक आधा-अधूरा सा शिलालेख लगा अपने कर्तव्य की खानापूर्ति कर दी है, कौन झंझट मोल ले ! 

पुरातत्व विभाग का शिलालेख 
मंदिर के गर्भगृह में शिव लिंग के पीछे से कुदरती झरने का पानी बहता रहता है और मंदिर के सामने एक टैंक में इकट्ठा होता है। पास के एक कमरे में भी शिव परिवार स्थापित है ! आंगन के बीच में एक कुंड है, जिसका पानी उसके किनारे बनी एक पानी की भूलभुलैया से गुजरता है ! मान्यता है कि कोई यदि उसमें एक पत्ता रख दे और वह पत्ता भूलभुलैया से बाहर निकल जाए,  तो उस व्यक्ति की इच्छा पूर्ण हो जाती है ! 

भूलभुलैया सी संरचना 
श्रद्धा-भक्ति-आस्था से ओतप्रोत जब कोई श्रद्धालु, अपने मन में एक शिव मंदिर की तस्वीर की कल्पना लिए यहां पहुंचता है तो अपनी सोच के ठीक विपरीत यहां मुगलिया निर्माण के अंदर स्थित शिवलिंग को देखता है तो स्तब्ध, परेशान और हैरान हो कर रह जाता है और बहुत कुछ सोचने पर भी विवश हो जाता है !

बुधवार, 20 दिसंबर 2023

वास्तु और तकनीकी की अद्भुत मिसाल, सोमेश्वर छाया मंदिर

यहां की विशेषता यह है कि दिन भर इस मंदिर के शिवलिंग पर एक स्तंभ की छाया पड़ती रहती है, जबकि गर्भगृह में स्थित शिवलिंग और आकाश में विचरते सूर्य के बीच आने वाला कोई स्तंभ यहां है ही नहीं ! वैसे भी यदि कोई स्तंभ हो भी तो सूर्य के विचरण के कारण किसी भी छाया का दिन भर एक ही जगह बने रहना असंभव होता है ! यहां वह छाया कैसे, क्यूँ, किस तरह बनती है, इसकी पेचीदगी को ले कर वातुशास्त्री, वैज्ञानिक व इंजिनियर सभी आज तक अचंभित हैं ...........!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

प्रकृति ने जिस खुले दिल से हमारे देश पर अपना प्यार-स्नेह लुटाया है उसी जज्बे, जोश और हौसले से इसके रहवासियों ने तरह-तरह के उपकर्मों से इसे सजाया-संवारा है ! वह भी तब, जब आज की तरह के आधुनिक यंत्र और सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं ! फिर भी प्राचीन भारतीय वास्तुकला इतनी उन्नत थी कि उसकी कोई मिसाल ही नहीं मिलती ! चाहे तकनिकी पेचीदगी हो, चाहे बारीक से बारीक कलाकारी हो, चाहे दांतों तले उंगली दबवा लेने वाली वास्तु कला हो, एक से बढ़ कर एक विस्मयकारी, अद्भुत रचनाएं देख दर्शक किंकर्तव्यविमूढ़, भौंचक्का सा खड़े का खड़ा रह जाता है ! ऐसा ही एक स्थान है, तेलंगाना राज्य के नलगोंडा जिले के पनागल या पनागल्लु कस्बे में स्थित एक तीर्थ, सोमेश्वर छाया मंदिर। 


गर्भगृह में स्थित शिवलिंग 
हैदराबाद शहर से तकरीबन 100 किमी तथा तेलंगाना के नलगोंडा नगर से करीब चार किमी दूर एक जगह है, पनागल। यहीं स्थित है 12वीं सदी की शुरुआत में चोल राजवंश के द्वारा बनवाया गया शिव जी का एक मंदिर, जो सोमेश्वर छाया मंदिर के नाम से विख्यात है ! यहां की विशेषता यह है कि दिन भर इस मंदिर के शिवलिंग पर एक स्तंभ की छाया पड़ती रहती है, जबकि गर्भगृह में स्थित शिवलिंग और आकाश में विचरते सूर्य के बीच आने वाला कोई स्तंभ यहां है ही नहीं ! वैसे भी यदि कोई स्तंभ हो भी तो सूर्य के विचरण के कारण किसी भी छाया का दिन भर एक ही जगह बने रहना असंभव होता है ! यहां वह छाया कैसे, क्यूँ, किस तरह बनती है, इसकी पेचीदगी को ले कर वातुशास्त्री, वैज्ञानिक व इंजिनियर सभी आज तक अचंभित हैं !


अलंकृत स्तंभ 
यह निर्माण हमारे प्राचीन कलाविदों के वास्तुशास्त्र के ज्ञान की पराकाष्ठा का एक उदाहरण है। प्रकृति का नियम है, छाया है तो उसका कारण भी होगा और वह है मंदिर के बाहर बने प्रस्तर स्तंभ, जिन पर रामायण, महाभारत तथा पुराणों के प्रसंगों को बहुत खूबसूरती से उकेरा गया है। उन स्तंभों का निर्माण इस तरह और ऐसी जगहों पर, इस तरह और इस खूबी के साथ किया गया है कि सूर्य के दिन भर के बदलते कोणों के बावजूद, किसी ना किसी स्तंभ की छाया बिना किसी विघ्न के शिवलिंग पर पड़ती रहती है ! 

इस मंदिर में शिव जी के साथ ब्रह्मा, विष्णु जी की भी पूजा होती है। इन तीनों के मंदिर एक ही प्रांगण में होने के बावजूद उनके प्रवेश द्वार अलग-अलग दिशाओं में हैं ! जो भी हो पर यह मंदिर हमारी बेहतरीन मूर्तिकला और वास्तुकला की विरासत को आज भी संभाले हुए है। इस क्षेत्र में इस ऐतिहासिक मंदिर की बहुत मान्यता है इसीलिए श्रद्धालु दर्शनार्थी यहां भारी संख्या में अपनी मन्नतों को पूरा करने हेतु आते रहते हैं। 

आपकी आँखें हमारे लिए अनमोल हैं 
प्रकृति के नियमानुसार बीतते समय का असर इस प्राचीन मंदिर पर भी पड़ा है ! इसके कुछ हिस्सों की सुरक्षा के लिए कदम उठाए भी गए हैं ! पर यह हमारी और हमारी सरकारों की जिम्मेदारी है कि हम अपनी ऐसी विलक्षण धरोहरों को सहेज कर रखें, जिससे हमारी आने वाली पीढ़ियां भी ऐसे अनोखे और दुर्लभ निर्माणों को देख गौरवान्वित हो सकें। जीवन की आपाधापी तो कभी खत्म नहीं होती फिर भी कुछ समय निकाल ऐसी जगहों पर जरूर जाना चाहिए ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

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