pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: सूर्य
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सोमवार, 6 अप्रैल 2026

अभिमान, स्वाभिमान

इतना सुनना था कि चुहिया मुंह बिचका कर वहां से सीधे पहाड़ के पास चली आई और उनसे अपने विवाह की इच्छा जाहिर की। अब आज के युग मे छोटी-छोटी बातें तेज-तेज चैनलों से पल भर में दुनिया मे फैल जाती हैं तो पर्वतराज को चुहिया की इस दौड़-धूप की खबर का तो पता लगना ही था ! वह भी तब जब उनके शिखर पर एक दूर-संचार का टावर भी लगा हुआ था। चुहिया को गिरता-पड़ता वहां तक पहुंचने की खबर मिलते ही पर्वतराज मायूस सा दिखते हुए चेहरे पर दर्द भरे भाव ले आए और इंतजार करने लगे नायिका के सामने आने का................... 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

एक सुबह एक तपस्वी ऋषि नदी मे स्नान करने के पश्चात सूर्यदेव को अर्ध्य दे रहे थे, तभी आकाशगामी एक चील के चंगुल से छूट कर एक छोटी सी चुहिया उनकी अंजली मे आ गिरी। वह बुरी तरह घायल थी। वे उसे संभाल कर अपने आश्रम ले आए ! उसका इलाज तथा मरहम-पट्टी कर किसी अनजान खतरे को भांपते हुए अपने पास ही रख लिया। समय बीतता गया और उनकी तीमारदारी, पुत्रीवत स्नेह में बदल गई ! इसी मोहवश अपने तपोबल से उन्होंने उसे मानव रूप दे सर्वगुण सम्पन्न कर दिया। 

परामर्श 
कन्या
जब बड़ी हुई तो उसके विवाह के लिए उन्होंने एक योग्य मूषक के बारे में उसकी राय जाननी चाही तो चुहिया ने कहा, मैं इस चूहे जैसे निम्न कोटि के जीव से नहीं, दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति से विवाह करना चाहती हूँ ! ऋषि के बहुत समझाने पर भी जब वह ना मानी तो उन्होंने उसे सबक सिखाने हेतु सबसे तेजस्वी देवता सूर्यदेव के पास भेज दिया। चुहिया ने सूर्यदेव के पास जा कर अपनी इच्छा बताई। सूर्यदेव सारी बात जानते ही थे, उन्होंने उससे कहा कि देवी, मुझसे ताकतवर तो मेघ है, जो जब चाहे मुझे ढ़क लेता है तुम उनके पास जाओ। वे ही तुम्हारी इच्छापूर्ती कर सकते हैं ! 

सूर्यदेव से याचना 
यह सुन मुषिका मेघराज के पास पहुंच गई और अपनी कामना उन्हें बताई। मेघराज ने मुस्कुरा कर कहा बालिके, तुमने गलत सुना है। अरे ! मुझसे तो कहीं शक्तिशाली पवन है जो अपनी मर्जी से मुझे इधर-उधर डोलवाता रहता है। मैं उसके सामने कहीं नहीं टिकता ! इतना सुनना था कि चुहिया ने पवनदेव को जा पकड़ा। पवनदेव ने उसकी सारी बात सुनी और फिर उदास हो बोले कि मैं जरूर तुम जैसी सुंदरी से विवाह कर लेता ! पर मैं तुम्हारे परिक्षण में उत्तीर्ण नहीं हो पा रहा हूँ, क्योंकि सदियों से मैं विशाल पर्वत से पार नहीं पा सका हूँ ! उनके आगे मेरा कोई बस नहीं चलता ! 
मेघदेव से विनय 
इ तना सुनना था कि चुहिया मुंह बिचका कर वहां से सीधे पहाड़ के पास चली आई और उनसे अपने विवाह की इच्छा जाहिर की। अब आज के युग मे छोटी-छोटी बातें तेज-तेज चैनलों से पल भर में दुनिया मे फैल जाती हैं तो पर्वतराज को चुहिया की दौड़-धूप की खबर तो पता लगनी ही थी ! वह भी तब जब उनके शिखर पर एक दूर-संचार का टावर लगा हुअ था। वे तो इंतजार कर ही रहे थे नायिका के आने का ! 
पवनदेव से विनती 
चु हिया को गिरता-पड़ता वहां तक आता देखते ही पर्वतराज मायूस सा दिखते हुए चेहरे पर दर्द भरे भाव ले आए और जब चुहिया ने अपने आने का कारण बताया तो उन्होंने उसे वही बता अपना पीछा छुड़वाया, जो सैकड़ों साल पहले भी एक बार बता चुके थे कि एक जीव मेरे से भी ताकतवर है, जो अपने मजबूत पंजों से मुझमें भी छिद्र कर खोखला बना देता है। देख ही रही हो मुझे अभी भी लगातार वेदना हो रही है ! 
पर्वतराज की शरण में 
इ तना सुन चुहिया ने वापस अपने पितृतुल्य ऋषि के पास जा चूहे से अपने विवाह की स्विकृति दे दी। ऋषि ने उसी समय मूषकराज को खबर भेजी ! वे वहां आए और सारी बातें सुन कर कुछ देर के लिए मौन साध लिया, फिर बोले देवी क्षमा करें। हमारा कभी भी मतैक्य नहीं हो सकता ! इसलिए मैं आपसे विवाह नहीं कर सकता ! सच कटू होता है ! आपकी अस्थिर बुद्धी तथा चंचल मन, इतने महान और सुयोग्य पात्रों की काबलियत और गुण ना पहचान सके ! मैं तो एक अदना सा चूहा हूं ! मेरे साथ आपका निर्वाह कभी भी ना हो सकेगा ! मुझे क्षमा करें ! इतना कह उन्होंने विदा ली ! अपने को सर्वोत्कृष्ट समझने वाली चुहिया को ऐसे परिणाम की आशा नहीं थी ! वह सन्न हो खड़ी रह गई !   

सबक 
सुना है, आजकल मुषिका रानी लेखिका हो गई है और पानी पी-पी कर पुरुष वर्ग के विरुद्ध आग उगलती रचनाएं लिखते हुए महिला संघर्ष समिति की अग्रणी नेता बनी हुई है.......!

@सभी चित्र अंतर्जाल और AI के सौजन्य से 🙏

शुक्रवार, 10 जनवरी 2025

कड़कड़ाती ठंड में नहाना, किसी पराक्रम से कम नहीं

नहाना.....! उसका तो सोच कर ही नानी-परनानी-लकड़नानी और ना जाने कौन-कौन याद आने लगती है ! उजले तन को क्या साफ़ करना; मन की मैल धोनी जरुरी होती है, जैसे विचार आ-आकर आदमी को दार्शनिक बनाने से नहीं चूकते ! ना नहाने के सौ बहाने गढ़ लिए जाते हैं ! पर कभी-कभी किसी पवित्र पर्व या दिन पर ना नहाने के अनिष्ट के डर से यह क्रिया सम्पन्न करने का अति कठिन संकल्प लेना ही पड़ता है......!

#हिन्दी_ब्लागिंग       

इस बार धरती के कुछ स्थानों पर शीत ने प्रचंड प्रकोप दिखा अपना राज्य स्थापित कर लिया ! प्रकृति के सारे रंग बेरंग हो गए, घर-द्वार, महल-झोंपड़ी, जल-थल, जंगल-पहाड़ सब पर सफेदी का आलम छा गया ! चहुं ओर कुहासे की सफेद चादर बिछ गई ! पारा किसी रीढ़विहीन नेता की तरह भूलुंठित होता चला गया ! उधर सूर्यदेव तो पहले ही दक्षिणायन हो निस्तेज से हुए पड़े थे, उस पर यह कहर ! उन्होंने भी अपना यात्रा पथ छोटा कर लिया और अपने रथ को चारों ओर से कोहरे के मोटे लिहाफ से ढक, कंपकपाते हुए मजबूरी में किसी तरह एक चक्कर लगा जल्द अस्ताचल में जा छिपने लगे !  

कोहरा ही कोहरा 
जब देवों का यह हाल था, तो धरा के निर्बल आम इंसानों पर क्या बीत रही होगी ! पर दिनचर्या किसी तरह चलानी-निभानी पड़ती ही है ! भले ही घरों, दफ्तरों, बसों, कारों, ट्रेनों में ऊष्मा-यंत्र लगे हुए हों, पर बाहर तो निकलना पड़ता ही है, पेट जो जुड़ा हुआ है साथ में ! ऐसे में तापमान में बड़े बदलाव के कारण, गर्म-सर्द हो, तबियत बिगड़ने की आशंका भी बनी रहती है ! खासकर बड़ी उम्र के लोगों में ! 
बहुते ठंडी है भई  
हमारे ग्रंथों में स्वस्थ बने रहने के लिए कहा गया है कि सौ काम छोड़ कर भोजन और हजार काम छोड़ कर स्नान करना जरुरी है ! अब इस भीषण ठंड में खाना तो बिना काम छोड़े भी इंसान कर लेता है, वह भी तरह-तरह की ग़िज़ाओं वाला, पर नहाना.....उसका तो सोच कर ही नानी-परनानी-लकड़नानी और ना जाने कौन-कौन याद आने लगती है ! उजले तन को क्या साफ़ करना, मन की मैल धोनी जरुरी होती है, जैसे विचार आ-आकर आदमी को दार्शनिक बनाने से नहीं चूकते ! ना नहाने के सौ बहाने गढ़ लिए जाते हैं ! पर फिर किसी पवित्र पर्व या दिन पर, ना नहाने के अनिष्ट के डर से यह क्रिया सम्पन्न करने का अति कठिन संकल्प लेना ही पड़ता है !
शुभ्र हिम चहुँ ओर 
ऐसी ही एक घड़ी में और बुजुर्गों की लानत-मलानत के बाद अपुन को भी इस शुद्धिकरण की क्रिया के लिए संकल्पित होना पड़ा ! भाग्य प्रबल था, शायद इसीलिए उस दिन सुबह-सबेरे से ही धूप खिली हुई थी ! शुक्र मनाया और सबसे पहले पानी गर्म किया ! फिर जिनके नाम याद थे उन सारे देवी-देवताओं-उपदेवताओं को स्मरण कर, शरीर को ना छोड़ने वाले प्रेममय लिहाफ को ''उसकी इच्छा'' के विरुद्ध, अकड़े हुए शरीर से अलग किया ! फिर ऊनी टोपी उतारी ! कुछ नहीं होगा जैसी सांत्वना देते हुए सर को सहलाया ! गुलबंद खोला ! शॉल हटाया ! सिहरते हुए स्वेटर उतारा ! दस्ताने खोले ! कमीज को किनारे किया ! फिर धीरे से ऊपर का इनर हटा गंजी तो उतारनी ही थी, उतारी ! पायजामे को मुक्ति दी ! फिर उसके बाद इनर का नंबर आया ! अंत में जब मौजा उतरा तब कहीं जा कर बारह बजे दोपहर को कई दिनों से बिन नहाया शरीर धुल पाया ! कांपते-कंपकपाते फिर अपने उन सारे हितैषियों के समकक्षों को धारण कर, इस भीषण परिक्षण से सही-सलामत उत्तीर्ण करने के लिए प्रभु को धन्यवाद दे, धूप में जा बैठा ! 
प्राण दाता भुवन-भास्कर 
एक होता है पराक्रम ! जो कई तरह का होता है जैसे शौर्य, शक्ति, बल, सामर्थ्य इत्यादि ! विकट या विपरीत परिस्थितियों में ही इसका परिक्षण होता है। इसमें उत्तीर्ण हो जाने वाले को पराक्रमी कहा जाता है ! सोच रहा था खुद को, खुद से ही अलंकृत कर लूँ इस उपाधि से ! आप क्या कहते हैं, इसका इन्तजार रहेगा !

हर-हर गंगे !       

@गलत फैमिली में ना जाएं, इक्का-दुक्का दिन छोड़, रोज नहाता हूँ भाई------खुद के हित में जारी। 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

बुधवार, 20 दिसंबर 2023

वास्तु और तकनीकी की अद्भुत मिसाल, सोमेश्वर छाया मंदिर

यहां की विशेषता यह है कि दिन भर इस मंदिर के शिवलिंग पर एक स्तंभ की छाया पड़ती रहती है, जबकि गर्भगृह में स्थित शिवलिंग और आकाश में विचरते सूर्य के बीच आने वाला कोई स्तंभ यहां है ही नहीं ! वैसे भी यदि कोई स्तंभ हो भी तो सूर्य के विचरण के कारण किसी भी छाया का दिन भर एक ही जगह बने रहना असंभव होता है ! यहां वह छाया कैसे, क्यूँ, किस तरह बनती है, इसकी पेचीदगी को ले कर वातुशास्त्री, वैज्ञानिक व इंजिनियर सभी आज तक अचंभित हैं ...........!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

प्रकृति ने जिस खुले दिल से हमारे देश पर अपना प्यार-स्नेह लुटाया है उसी जज्बे, जोश और हौसले से इसके रहवासियों ने तरह-तरह के उपकर्मों से इसे सजाया-संवारा है ! वह भी तब, जब आज की तरह के आधुनिक यंत्र और सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं ! फिर भी प्राचीन भारतीय वास्तुकला इतनी उन्नत थी कि उसकी कोई मिसाल ही नहीं मिलती ! चाहे तकनिकी पेचीदगी हो, चाहे बारीक से बारीक कलाकारी हो, चाहे दांतों तले उंगली दबवा लेने वाली वास्तु कला हो, एक से बढ़ कर एक विस्मयकारी, अद्भुत रचनाएं देख दर्शक किंकर्तव्यविमूढ़, भौंचक्का सा खड़े का खड़ा रह जाता है ! ऐसा ही एक स्थान है, तेलंगाना राज्य के नलगोंडा जिले के पनागल या पनागल्लु कस्बे में स्थित एक तीर्थ, सोमेश्वर छाया मंदिर। 


गर्भगृह में स्थित शिवलिंग 
हैदराबाद शहर से तकरीबन 100 किमी तथा तेलंगाना के नलगोंडा नगर से करीब चार किमी दूर एक जगह है, पनागल। यहीं स्थित है 12वीं सदी की शुरुआत में चोल राजवंश के द्वारा बनवाया गया शिव जी का एक मंदिर, जो सोमेश्वर छाया मंदिर के नाम से विख्यात है ! यहां की विशेषता यह है कि दिन भर इस मंदिर के शिवलिंग पर एक स्तंभ की छाया पड़ती रहती है, जबकि गर्भगृह में स्थित शिवलिंग और आकाश में विचरते सूर्य के बीच आने वाला कोई स्तंभ यहां है ही नहीं ! वैसे भी यदि कोई स्तंभ हो भी तो सूर्य के विचरण के कारण किसी भी छाया का दिन भर एक ही जगह बने रहना असंभव होता है ! यहां वह छाया कैसे, क्यूँ, किस तरह बनती है, इसकी पेचीदगी को ले कर वातुशास्त्री, वैज्ञानिक व इंजिनियर सभी आज तक अचंभित हैं !


अलंकृत स्तंभ 
यह निर्माण हमारे प्राचीन कलाविदों के वास्तुशास्त्र के ज्ञान की पराकाष्ठा का एक उदाहरण है। प्रकृति का नियम है, छाया है तो उसका कारण भी होगा और वह है मंदिर के बाहर बने प्रस्तर स्तंभ, जिन पर रामायण, महाभारत तथा पुराणों के प्रसंगों को बहुत खूबसूरती से उकेरा गया है। उन स्तंभों का निर्माण इस तरह और ऐसी जगहों पर, इस तरह और इस खूबी के साथ किया गया है कि सूर्य के दिन भर के बदलते कोणों के बावजूद, किसी ना किसी स्तंभ की छाया बिना किसी विघ्न के शिवलिंग पर पड़ती रहती है ! 

इस मंदिर में शिव जी के साथ ब्रह्मा, विष्णु जी की भी पूजा होती है। इन तीनों के मंदिर एक ही प्रांगण में होने के बावजूद उनके प्रवेश द्वार अलग-अलग दिशाओं में हैं ! जो भी हो पर यह मंदिर हमारी बेहतरीन मूर्तिकला और वास्तुकला की विरासत को आज भी संभाले हुए है। इस क्षेत्र में इस ऐतिहासिक मंदिर की बहुत मान्यता है इसीलिए श्रद्धालु दर्शनार्थी यहां भारी संख्या में अपनी मन्नतों को पूरा करने हेतु आते रहते हैं। 

आपकी आँखें हमारे लिए अनमोल हैं 
प्रकृति के नियमानुसार बीतते समय का असर इस प्राचीन मंदिर पर भी पड़ा है ! इसके कुछ हिस्सों की सुरक्षा के लिए कदम उठाए भी गए हैं ! पर यह हमारी और हमारी सरकारों की जिम्मेदारी है कि हम अपनी ऐसी विलक्षण धरोहरों को सहेज कर रखें, जिससे हमारी आने वाली पीढ़ियां भी ऐसे अनोखे और दुर्लभ निर्माणों को देख गौरवान्वित हो सकें। जीवन की आपाधापी तो कभी खत्म नहीं होती फिर भी कुछ समय निकाल ऐसी जगहों पर जरूर जाना चाहिए ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

विशिष्ट पोस्ट

सोनम चौबे ->छब्बे = दुबे

यह तथाकथित वैज्ञानिक जिसका अपने नाम का एक भी पेंटेंट नहीं है ! जिसने सरकार से सवा सौ एकड़ से ज्यादा जमीन हथिया रखी है ! जो पर्यावरण के नाम पर...