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सोमवार, 20 जुलाई 2026

रीयल आइस मैन ऑफ इंडिया

भीड़ में जिस शख्स का कद सबसे बड़ा था, पता चला वह शख्स किसी और के कांधे पर खड़ा था 😡

लद्दाख ! जहां लोगों की मुख्य आजीविका खेती है, वहां पानी की अनुपलब्धि सबसे बड़ी और विकट समस्या रही है ! अप्रैल और मई के महीनों में जब खेतों में बुआई का समय होता है, तब एक-एक बूंद पानी के लिए किसानों को तरसना पड़ता रहा है ! क्योंकि हिमनद पहाड़ के ऊपर, लगभग 18,000 फुट की ऊंचाई पर रहते हैं और जाड़े का मौसम खत्म होने पर जून में जा कर उनका पिघलना आरंभ होता है, तब तक खेती का सही समय निकल जाता था ! फलस्वरूप अधिकांश भूमि बंजर होती जा रही थी !

बंजरता 

बर्फ का रेगिस्तान 
एक इंसान बचपन से ही यह विषमता देखता चला आ रहा था ! वह अपने लोगों, अपने परिवार, अपने समाज की इस अभिशप्तता को दूर करने के लिए बेचैन था ! वह बड़ा हुआ, इजीनियर बना ! तभी 1987 की सर्दियों आईं ! एक दिन वह नदी किनारे अपने घर के बाहर खड़ा था, उसने देखा कि नल से पानी की बूंद टपक कर जमीन पर गिरी और बर्फ बन गई ! उधर नदी का पानी बेकार बह कर बर्बाद हुआ जा रहा था ! उसके दिमाग में एक विचार आया कि यदि इस पानी को किसी तरह जमा दिया जाए तो लद्दाख में पानी की किल्लत दूर हो सकती है ! 

चेवांग नॉरफेल 
व्याकुलता 
निर्माण 
उसने अपनी योजना का खाका तैयार किया और गांव वालों को साथ ले, उसे मूर्त रूप देने में जुट गया ! सबने मिल कर वहीं के मिटटी-पत्थरों का उपयोग कर, छोटी-छोटी नहरें बना, नदी के पानी का रास्ता बदल उसे पास की छायादार घाटी में बांध बना संग्रहित कर दिया ! कड़ाके की सर्दी में वह पानी जम कर, बर्फ के विशाल ढेर में बदल वहां स्थित हो गया ! इस तरह इंसान ने प्रकृति से होड़ ले, पहाड़ की छोटी से काफी नीचे अपना एक कृत्रिमिक ग्लेशियर बनाने में सफलता पा ली ! तापमान में फर्क होने की वजह से इस हिमनद का पिघलना मार्च-अप्रैल में ही शुरू हो जाने लगा और यह वही समय होता था जब यहां के किसानों और निवासियों को पानी की सबसे ज्यादा जरुरत होती थी ! 

निरर्थकता 
उपक्रम 
संग्रह 
एक इंसान के बुद्धि-कौशल, लगन और जिद ने लद्दाख के एक हिस्से की सूखी, बंजर जमीन को हरा-भरा कर शस्य=श्यामला बना दिया ! कभी पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसने वाले किसानों, रहवासियों के लिए वह इंसान भगवान स्वरूप हो गया ! लोग उन्हें "आइस मैन ऑफ इंडिया" कहने लगे ! उन्होंने करीब 15 छोटे-बड़े हिमनद बनाए, जिनमें सबसे बड़ा हिमनद लगभग 2 कीमी का था ! लद्दाख की भूमि की रंगत बदलने और समाज के उत्थान के लिए किए गए उनके इस अनूठे प्रयास का संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार ने भी 2015 में उन्हें पद्म-पुरस्कार से नवाज कर सम्मानित किया ! 

पद्म सम्मान 

मानव निर्मित ग्लेशियर 
स्वप्न साकार 
पर सुदूर बसे लद्दाख में हुए ऐसे क्रांतिकारी आविष्कार, जिसने लाखों लोगों की जिंदगियों को प्रभावित किया, समाज की दशा बदल दी, समृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया, वह प्रयास, उन्नत संचार व्यवस्था और आज जैसा सोशल मीडिया ना होने के कारण बहुत ज्यादा प्रचारित नहीं हो पाया ! फिर समय बदला, हर हाथ में फोन आ गया ! खबरें विद्युत गति से चलने लगीं ! दुनिया सिकुड़ गई ! लद्दाख भी अब वैसा अनजान नहीं रहा और इसी बात का फायदा, एक चालाक, धूर्त, कुटिल व्यक्ति ने उठाया और उन हिमनदों को अपनी उपलब्धि बता, संसार में अपने को वैज्ञानिक सिद्ध कर दिया ! लोग उसके दीवाने हो गए ! देश-विदेश में उसकी उपलब्धियों की बातें होने लगीं, बुलावा व सम्मान मिलने लगा ! धन का नियमित प्रवाह भी शुरू हो गया और वह एक जानी-मानी हस्ती बन जगह-जगह अपनी टांग अड़ाने की कोशिश करने लगा ! देश विरोधी गतिविधियों की वजह से उसे सजा भी मिली ! पर...................!

समर्पण 

मक्कारी 
अब उन दोनों व्यक्तियों की पहचान ! पहला वह जिसे आज भी  लद्दाखवासी कृतज्ञता से याद करते हैं ! जो लद्दाख और लद्दाखवासियों का गर्व है ! उसका नाम है ''चेवांग नॉरफेल'' ! और दूसरा है, अपने ही देशवासी की उपलब्धि को चुरा कर छद्म लोकप्रियता हासिल करने वाला, एक नौटंकीबाज, कुटिल, मौकापरस्त सोनम वांगचुक ! जो आज विदेशी ताकतों का मोहरा बन, देश के देशद्रोही, सनातन विरोधी, मक्कार, धूर्त नेताओं का हमजोली बना हुआ है ! गूगल से प्रमाणित होने के बाद ही किसी बात को मानने वाले, वहां जा कर इस बात की सच्चाई जान सकते हैं !

@चित्रों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार !

@''शख्स किसी और के कांधे.....'' वाली पंक्ति प्रख्यात शायर श्री मदन लाल सेठी ऊर्फ मायकश अम्बालवी जी की है। 

शुक्रवार, 10 जनवरी 2025

कड़कड़ाती ठंड में नहाना, किसी पराक्रम से कम नहीं

नहाना.....! उसका तो सोच कर ही नानी-परनानी-लकड़नानी और ना जाने कौन-कौन याद आने लगती है ! उजले तन को क्या साफ़ करना; मन की मैल धोनी जरुरी होती है, जैसे विचार आ-आकर आदमी को दार्शनिक बनाने से नहीं चूकते ! ना नहाने के सौ बहाने गढ़ लिए जाते हैं ! पर कभी-कभी किसी पवित्र पर्व या दिन पर ना नहाने के अनिष्ट के डर से यह क्रिया सम्पन्न करने का अति कठिन संकल्प लेना ही पड़ता है......!

#हिन्दी_ब्लागिंग       

इस बार धरती के कुछ स्थानों पर शीत ने प्रचंड प्रकोप दिखा अपना राज्य स्थापित कर लिया ! प्रकृति के सारे रंग बेरंग हो गए, घर-द्वार, महल-झोंपड़ी, जल-थल, जंगल-पहाड़ सब पर सफेदी का आलम छा गया ! चहुं ओर कुहासे की सफेद चादर बिछ गई ! पारा किसी रीढ़विहीन नेता की तरह भूलुंठित होता चला गया ! उधर सूर्यदेव तो पहले ही दक्षिणायन हो निस्तेज से हुए पड़े थे, उस पर यह कहर ! उन्होंने भी अपना यात्रा पथ छोटा कर लिया और अपने रथ को चारों ओर से कोहरे के मोटे लिहाफ से ढक, कंपकपाते हुए मजबूरी में किसी तरह एक चक्कर लगा जल्द अस्ताचल में जा छिपने लगे !  

कोहरा ही कोहरा 
जब देवों का यह हाल था, तो धरा के निर्बल आम इंसानों पर क्या बीत रही होगी ! पर दिनचर्या किसी तरह चलानी-निभानी पड़ती ही है ! भले ही घरों, दफ्तरों, बसों, कारों, ट्रेनों में ऊष्मा-यंत्र लगे हुए हों, पर बाहर तो निकलना पड़ता ही है, पेट जो जुड़ा हुआ है साथ में ! ऐसे में तापमान में बड़े बदलाव के कारण, गर्म-सर्द हो, तबियत बिगड़ने की आशंका भी बनी रहती है ! खासकर बड़ी उम्र के लोगों में ! 
बहुते ठंडी है भई  
हमारे ग्रंथों में स्वस्थ बने रहने के लिए कहा गया है कि सौ काम छोड़ कर भोजन और हजार काम छोड़ कर स्नान करना जरुरी है ! अब इस भीषण ठंड में खाना तो बिना काम छोड़े भी इंसान कर लेता है, वह भी तरह-तरह की ग़िज़ाओं वाला, पर नहाना.....उसका तो सोच कर ही नानी-परनानी-लकड़नानी और ना जाने कौन-कौन याद आने लगती है ! उजले तन को क्या साफ़ करना, मन की मैल धोनी जरुरी होती है, जैसे विचार आ-आकर आदमी को दार्शनिक बनाने से नहीं चूकते ! ना नहाने के सौ बहाने गढ़ लिए जाते हैं ! पर फिर किसी पवित्र पर्व या दिन पर, ना नहाने के अनिष्ट के डर से यह क्रिया सम्पन्न करने का अति कठिन संकल्प लेना ही पड़ता है !
शुभ्र हिम चहुँ ओर 
ऐसी ही एक घड़ी में और बुजुर्गों की लानत-मलानत के बाद अपुन को भी इस शुद्धिकरण की क्रिया के लिए संकल्पित होना पड़ा ! भाग्य प्रबल था, शायद इसीलिए उस दिन सुबह-सबेरे से ही धूप खिली हुई थी ! शुक्र मनाया और सबसे पहले पानी गर्म किया ! फिर जिनके नाम याद थे उन सारे देवी-देवताओं-उपदेवताओं को स्मरण कर, शरीर को ना छोड़ने वाले प्रेममय लिहाफ को ''उसकी इच्छा'' के विरुद्ध, अकड़े हुए शरीर से अलग किया ! फिर ऊनी टोपी उतारी ! कुछ नहीं होगा जैसी सांत्वना देते हुए सर को सहलाया ! गुलबंद खोला ! शॉल हटाया ! सिहरते हुए स्वेटर उतारा ! दस्ताने खोले ! कमीज को किनारे किया ! फिर धीरे से ऊपर का इनर हटा गंजी तो उतारनी ही थी, उतारी ! पायजामे को मुक्ति दी ! फिर उसके बाद इनर का नंबर आया ! अंत में जब मौजा उतरा तब कहीं जा कर बारह बजे दोपहर को कई दिनों से बिन नहाया शरीर धुल पाया ! कांपते-कंपकपाते फिर अपने उन सारे हितैषियों के समकक्षों को धारण कर, इस भीषण परिक्षण से सही-सलामत उत्तीर्ण करने के लिए प्रभु को धन्यवाद दे, धूप में जा बैठा ! 
प्राण दाता भुवन-भास्कर 
एक होता है पराक्रम ! जो कई तरह का होता है जैसे शौर्य, शक्ति, बल, सामर्थ्य इत्यादि ! विकट या विपरीत परिस्थितियों में ही इसका परिक्षण होता है। इसमें उत्तीर्ण हो जाने वाले को पराक्रमी कहा जाता है ! सोच रहा था खुद को, खुद से ही अलंकृत कर लूँ इस उपाधि से ! आप क्या कहते हैं, इसका इन्तजार रहेगा !

हर-हर गंगे !       

@गलत फैमिली में ना जाएं, इक्का-दुक्का दिन छोड़, रोज नहाता हूँ भाई------खुद के हित में जारी। 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...