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सोमवार, 29 जून 2020

एक था धीरेंद्र ब्रह्मचारी

आज जब जीवन के नवरसों में आकंठ डूबे, पारांगत, निष्णात, मर्मज्ञ लोगों द्वारा कुछ आध्‍यात्मिक गुरुओं के दवा निर्माण या उनके कारोबार की आलोचना होते देखा-सुना है तो पूर्व नेताओं द्वारा पालित-पोषित ऐसे बाहुबली बाबाओं का इतिहास बरबस सामने आ खड़ा होता है, जिन्होंने अपने स्वार्थ और महत्वाकांक्षा के चलते देश की राजनीती की दिशा और दशा बदलने में कोई कसर छोड़ नहीं रखी थी। उन जैसे स्नातकों के सामने तो आज के बाबा पहली क्लास के शिशु नजर आते हैं...........................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हमारे नेता या राजनितिक पार्टियां चाहे कितना भी अपने को धर्मनिरपेक्ष कह लें या दिखाने की कोशिश करें पर सच्चाई यह है कि यह सब कहने को ही होता है। धर्म और धार्मिक बाबाओं का राजनेताओं से सदा ही चोली-दामन का साथ रहा है। हमारे यहां ऐसे बाबाओं की लम्बी फेहरिस्त रही है। ये लोग अपने अनुयायियों की विशाल संख्या और आम जनता पर अपने प्रभाव का उपयोग या दुरुपयोग सत्ता में बैठे लोगों के हितों के लिए कर बदले में जमीन, रसूख, अनुदान, विदेश में पैठ आदि अनेकानेक सहूलियतें हासिल करते रहे हैं ! एक तरह से ये एक दूसरे के पूरक कहे जा सकते हैं।इस भाईचारे की शुरुआत सही मायने में सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी के शासन काल में हुई। जब एक विवादित योग गुरु ने पूरे गांधी परिवार को अपने प्रभाव में ले भारतीय राजनीती तक को प्रभावित कर डाला था। 

दिल्ली की फ्रेंड्स कालोनी ! राजधानी के पॉश इलाकों में से एक ! उस समय जब ज्यादातर दिल्ली सायकिलों पर चलती थी तब भी इस कॉलोनी में एक से बढ़कर एक विदेशी लग्‍जरी कारें खड़ी नजर आती थीं। उसी कालोनी की ए-50 नंबर की कोठी में नेताओं, अभिनेताओं, उद्योगपतियों का दिनभर आना-जाना लगा रहता था। यह निवास था एक योग गुरु धीरेंद्र ब्रह्मचारी का ! उससे ज़रा सी भेंट ही लोगों को उपकृत व धन्य महसूस करवा देती थी। इस आदमी का सितारा बुलंदी पर था ! पूरी दिल्ली में उसके जलवे थे। कारण उसने अपनी तिकड़मों से नेहरू जी को प्रभावित कर इंदिरा का योग गुरु होने का सम्मान प्राप्त कर लिया था। पर धीरे-धीरे इंदिरा पर ऐसा प्रभाव डाल दिया कि कहते हैं इसके कारण बाप-बेटी में भी झड़प हो जाती थी। जब वे प्रधान मंत्री बनीं तब तो उसका तकरीबन रोज ही प्रधानमंत्री आवास, 1 सफदरजंग रोड, में आना-जाना होने ला गया था। 1975 के आपादकाल में इनके रिश्तो को लेकर कुछ अटकलों का बाज़ार भी गर्म हुआ था। इमरजेंसी के दिनों में इसकी ताकत इतनी बढ़ गई थी कि मंत्रियों को अपने पोजीशन को बचाने के लिए ब्रह्मचारी की जी हुजूरी करनी पड़ती थी। इसका जीता-जागता उदाहरण आई. के. गुजराल का था. जो इसकी ताकत का अंदाजा ना लगा पा कर अपनी कुर्सी गंवा बैठे थे। उन्हीं दिनों कुछ पत्रकारों ने बाबा को ‘भारतीय रास्पुतिन'' का नाम दे दिया था।
इस आदमी ने कभी अपने जन्म और जन्मस्थान का खुलासा नहीं किया। लोगों के लाख पूछने पर भी कभी अपने परिवार की बात नहीं की ! बस यही कहता रहा कि योगी की कोई उम्र नहीं होती, मैंने 13-14 साल की उम्र से ही योग अपना लिया है। पर अटकलें यही थीं कि बिहार के गांव चानपुरा के इस इंसान का असली नाम धीरचन्द्र चौधरी था जो समय के बलवान होते ही स्वामी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी बन गया और उसके शिष्यों में प्रधानमंत्री से लेकर छोटे बड़े बहुत से सामर्थ्यवान लोग और नेता शामिल होते चले गए ! उसका रहन-सहन उस दौर के बड़े-बड़े सेलिब्रिटीज से भी इक्कीस हुआ करता था ! उस समय जब देश के गिने-चुने लोग ही हवाई सफर कर पाते थे उस समय इसके पास अपना लग्जरी जेट विमान था। जो आज भी गुड़गांव के एक हैंगर में पड़ा जंग खा रहा है। 

यह ठीक है कि योग का प्रचार करने में उसकी अहम् भूमिका रही। दूरदर्शन पर योग की क्रियाएं दिखाने की शुरुआत भी उसी ने की थी, भले ही उसके शिष्यों के वस्त्रों या कैमरे के कोणों से वे आलोचित भी रहीं। इसके साथ ही यह योग गुरु रहस्यमय ढंग से विवादित और चर्चित भी रहा। धीरे-धीरे वह इंदिरा गांधी का सलाहकार और राजदार भी बन गया। आपातकाल में तो उसके जलवे देखने लायक थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इंदिरा गांधी के लगभग सभी बड़े फैसलों में उसकी अहम् भूमिका रहती थी ! कहा तो यहां तक जाने लगा था कि इंदिरा गांधी संजय गांधी के बाद सबसे ज्यादा भरोसा इसी पर किया करती थीं। यह विश्वास इतना बढ़ गया था कि कैबिनेट के फैसलों में भी इस ब्रह्मचारी की भूमिका रहने लगी थी ! मंत्रियों का बनना, हटना भी इसके इशारे पर होने लगा था। संजय की मृत्योपरांत तो इंदिरा जी की निर्भरता उस पर और भी बढ़ गई थी। 
रास्पुतिन
अब सत्ता के पावर के साथ जो ''गुण'' आते है, वे आए और धीरे-धीरे इस स्वामी की असलियत लोगों के सामने आने लगी। उस पर जमीन हड़पने से लेकर अवैध हथियार रखने जैसे कई आपराधिक आरोप लगने लगे ! इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब ''इंडिया ऑफ्टर नेहरू'' में उसे बड़ा बिजनेसमैन निरूपित किया है। जिसके अनुसार जम्‍मू के गांधी नगर इंडस्ट्रियल एस्‍टेट में शिव गन नाम से इसकी फैक्‍ट्री हुआ करती थी। जिसका टर्नओवर उस समय लाखों में था ! यह योग गुरु उस दौर का सबसे बड़ा आर्म डीलर माना जाने लगा था। गुहा के मुताबिक, उस दौर के लगभग सभी बड़े रक्षा सौदों में उसकी भूमिका अहम होती थी. उस दौर में स्वीडन की कई कंपनियों से उसके संबंध भी थे। 1990 के दौर में धीरेंद्र ब्रह्मचारी के ऊपर अपनी गन फैक्ट्री में अवैध विदेशी हथियार रखने के आरोप लगे। पुलिस ने ब्रह्मचारी समेत उनके कई करीबियों पर मुकदमा दर्ज किया पर रसूख के कारण उसे अदालत से जमानत पर रिहाई मिल गई। हालांकि जैसा चलन है ब्रह्मचारी इसे खुद को बदनाम करने की साजिश करार देता रहा। यही नहीं गैर कानूनी कार्यों के चलते उसके जम्मू स्थित अपर्णा आश्रम के साथ-साथ और अनेकों सम्पत्तियों को भी सन 2000 में हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीज कर दिया गया था। उससे जुड़े कुछ राज अभी भी राज ही बने हुए हैं। 

इंदिरा गांधी की ह्त्या, दैवयोग से जिसका कारण भी एक विवादास्पद बाबा ही था, के बाद धीरेन्द्र ब्रह्मचारी के सितारे भी गर्दिश में आ गए ! कानून का शिकंजा भी कसता जा रहा था ! धीरे-धीरे सब कुछ मिटने लगा। और फिर 9 जून 1994 कोअपने कस्बे मानतलाई को सिंगापुर बनाने का अधूरा सपना लिए इस बाहुबली, विवादास्पद बाबा की मृत्यु भी संजय गांधी की दुर्घटना की तरह ही हो गई, जब उसका प्राइवेट प्लेन उसके मानतलाई आश्रम की हवाई पट्टी पर उतरने के दौरान पेड़ों से टकरा गया ! इस दुर्घटना में उसके साथ उसका पायलेट भी मारा गया था ! विडंबना रही कि अपने और संजय के दोनों विमानों को इसी के द्वारा ऐशो-आराम के लिए बाहर से आयात किया गया था।  

आज जब जीवन के नवरसों में आकंठ डूबे पारांगत, निष्णात, मर्मज्ञ लोगों द्वारा कुछ आध्‍यात्मिक गुरुओं के दवा निर्माण या उनके कारोबार की आलोचना होते देखा-सुना जाता है तो पूर्व नेताओं द्वारा पालित-पोषित ऐसे बाहुबली बाबाओं का इतिहास बरबस सामने आ खड़ा होता है, जिन्होंने अपने स्वार्थ और महत्वाकांक्षा के चलते देश की राजनीती की दिशा और दशा बदलने में कोई कसर छोड़ नहीं रखी थी। उन जैसे स्नातकों के सामने तो ये लोग पहली क्लास के शिशुओं की तरह हैं। आजके बाबाओं का व्यापार विदेशी कंपनियों को खुली चुन्नौती दे रहा है, जो उनके दलालों के गले की हड्डी बन गई है। शायद इसीलिए बिना जांचे-परखे सिर्फ विरोध के लिए विरोध किया जा रहा है।  
@संदर्भ अंतरजाल   

मंगलवार, 5 मई 2020

शैवतीर्थ उनाकोटी, जहां बिखरी पड़ी हैं असंख्य मूर्तियां और प्रतिमाएं

तेज प्रवाह वाली नदियों, उबड़ खाबड़ पहाड़ियों, दूर तक फैले घने जंगलों, दलदली इलाकों के बीहड़ के बीच  अज्ञात सा, अद्भुत रहस्यमय स्थान, उनाकोटी ! जहां जंगल की क्षीणकाय, नामालूम सी पगडंडियों पर चल कर ही पहुंचा जा सकता है। अभी भी इसके और इसके जंगलों के बीच अफरात में फैले शैलचित्रों और मूर्तियों के भंडार और उनकी खासियत के बारे में बहुतेरे देशवासियों को कोई खबर नहीं है  

#हिन्दी_ब्लागिंग  
उनाकोटि हमारे देश के त्रिपुरा राज्य का एक विचित्र, अनोखा, रोमांचक, रहस्यमय, अज्ञात सा एक ऐसा अद्भुत स्थान, जिसकी आज भी अधिकांश देशवासियों को कोई खबर नहीं है ! छविमुड़ा गांव के आगे घोर जंगलों के बीचोबीच, मानव बस्तियों से दूर बीहड़ में मौजूद असंख्य हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं। ऐसा अनोखा, भव्य और असीमित मूर्ति भंडार देश के किसी भी और हिस्से में उपलब्ध नहीं है ! जिन्हें पहाड़ी को काट कर या उन्हीं पर उकेर कर बनाया गया है। उन्हें देख यह किसी इंसानी हाथ का काम नहीं लगता।  






तेज प्रवाह वाली नदियों, उबड़-खाबड़ पहाड़ियों, दूर-दूर तक फैले घने जंगलों, दलदली इलाकों के बीहड़ के बीच स्थित है यह अज्ञात सा,अद्भुत रहस्यमय स्थान उनाकोटी। जहां जंगल की क्षीणकाय, नामालूम सी पंगडंडियों पर चल कर ही पहुंचा जा सकता है। अभी भी इसके और इसके जंगलों के बीच अफरात में फैले शैलचित्रों और मूर्तियों के भंडार और उनकी खासियत के बारे में बहुतेरे देशवासियों को कोई खबर नहीं है। जनशून्य जगह में, बीहड़ के बीचोबीच, किसी साधन की उपलब्धता के आसार के बिना, इतनी मात्रा में भव्य मूर्तियों का निर्मित होना लंबे समय से खोज व शोध का विषय बना हुआ है ! स्थानीय लोगों के अनुसार यह सब कुछ दैवीय कृपा से ही संभव हो पाया है !








यहां की मुख्य मूर्ति शिव जी की उनाकोटेश्वर कालभैरव नामक करीब 30-35 फुट की विशाल प्रतिमा है, जिस पर उकेरा गया मुकुट ही दस फुट का है ! इनके दोनों ओर दो स्त्री विग्रह हैं जिनमें एक सिंहारूढ दुर्गा जी की मूर्ति है। यहीं विष्णु जी की वृहदाकार मूर्ति के साथ ही गणेश जी की चार भुजाओं व तीन दांतों तथा आठ भुजाओं और चार दाँतों वाली कहीं और ना पायी जाने वाली दुर्लभ मूर्तियों के अलावा माँ दुर्गा, माँ काली की हैरान कर देने वाली प्रतिमाओं के साथ-साथ नंदी और अन्य देवताओं की भी ढेर सारी अनगिनत मूर्तियां बनी हुई हैं। मान्यता के अनुसार गिनती में ये एक कम, एक करोड़ हैं।  





स्थानीय लोगों के अनुसार, जो यहां आ कर इन प्रतिमाओं की पूजा भी करते हैं, इन सभी कलाकृतियों का संबंध पौराणिक कथाओं से है। उनके अनुसार हजारों साल पहले कालू नामक एक महान शिव भक्त मूर्तिकार हुआ करता था। वह अपने आप को शिव-गौरी का पुत्र मान उनके पास कैलाश जाना चाहता था। उसकी जिद को देख देवताओं ने एक शर्त रखी कि यदि वह एक रात में एक करोड़ मूर्तियों का निर्माण कर देगा तो उसे कैलाश भेज दिया जाएगा। कालू प्रस्ताव मान काम में जुट गया ! उसने रात भर मेहनत कर काम पूरा कर दिया, पर उससे गिनती में जरा सी भूल हो गयी ! प्रस्तावित संख्या से एक मूर्ति कम बनी थी ! यानी एक करोड़ में एक मूर्ति कम रह गयी और इस कारण शिल्पकार कालू धरती पर ही रह गया। स्थानीय भाषा में एक करोड़ में एक कम संख्या को उनाकोटि कहते हैं। इसलिए इस जगह का नाम उनाकोटि पड़ गया। 







त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से यह लगभग 125 किमी की दूरी पर स्थित है। यहां सड़क मार्ग द्वारा आराम से पहुंचा जा सकता है। यहां का नजदीकी हवाई अड्डा अगरतला एयरपोर्ट है। रेल मार्ग से जाने पर कुमारघाट या धर्मनगर रेलवे स्टेशन पर उतरना ठीक रहता है। 

@सभी चित्र अंतरजाल के सौजन्य से 

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