मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

बदहाली से जूझता एक किला

परन्तु आज किले के प्रवेश द्वार से ही लगने लगता है कि इसका सिर्फ दोहन हो रहा है ! संरक्षित स्मारक होने के बावजूद किले के अंदर विशाल बुर्जों में दसियों होटल खुल गए हैं ! जगह-जगह दुकानें और पटरियों पर बिकता सामान, झरोखों पर टंगे कपड़े, जब-तब होती फिल्मों की शूटिंग, अंदर के रहवासियों की दौड़ती गाड़ियां, लोगों का हुजूम, बाजारवाद और आधुनिकता का दखल, जलवायु और मानवजनित क्षरण, कहीं-कहीं दरकती दीवारें कुछ अलग ही कथा बयान करती नजर आती हैं.........................😔   


#हिन्दी_ब्लॉगिंग 


किला जैसलमेर का ! सन 1156 में भाटी शासक रावल जैसल ने इस ऐतिहासिक किले की त्रिकूट पहाड़ी पर बहुत सोच-समझ कर और रणनीतिक दृष्टिकोण को सामने रखते हुए नींव रखी थी। उनके वंशजों ने यहाँ रहते हुए, भारत के गणतंत्र में परिवर्तन होने तक, बिना वंश क्रम को भंग किए हुए लगातार 770 वर्ष तक शासन किया, जो अपने आप में एक महत्वपूर्ण कीर्तिमान है ! भाटी वंश स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण के यादव वंश से जोड़ता है ! इस गौरवपूर्ण परंपरा का उल्लेख प्रचलित लोककथाओं में, शिलालेखों के साथ-साथ राजवंश के वृतांतों में भी स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है।  

रावल जैसल 

सोने का किला 

जैसलमेर का किला 
अनमोल विरासत 
रा जस्थान की राजधानी जयपुर से करीब 575 किलोमीटर की दूरी पर, 99 विशाल बुर्जों और 30 फुट ऊंची दीवार से घिरे, थार मरुस्थल के केंद्र में स्थित इस किले का निर्माण पीले बलुआ पत्थरों से किया गया है, जो सूर्य की रौशनी में चमक कर सोने का अहसास कराते हैं ! इसीलिए इसे सोने का किला भी कहा जाता है ! देश के सुविख्यात फिल्म निर्माता सत्यजीत रे ने इसको केंद्र में रख 1974 में सोनार केल्ला (सोने का किला) नामक एक बंगला फिल्म भी बनाई थी ! 
प्रवेश द्वार


हवा कक्ष 
यह किला भारत का एक प्रमुख पर्यटन स्थल तो है ही, साथ ही यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भी इसका नाम शामिल है। जैसलमेर का यह स्वर्ण किला दुनिया के उन गिने-चुने किलों में से एक है, जिसमें हजारों लोग रहते हैं यानी यह एक जीवंत किला है ! यह बहुद सुखद अनुभूति है कि इसके रहवासी आज भी अपने त्योहारों, परम्पराओं और लोकगीतों को भूले नहीं हैं ! अच्छी बात है ! पर परंपराओं के साथ-साथ  इस अनमोल धरोहर के संरक्षण, इसके रख-रखाव, इसकी सुरक्षा का भी ध्यान पूरी शिद्दत से रखा जाना चाहिए !

शयन कक्ष 

झरोखा 

पत्थर पर बेहतरीन नक्काशी 

पि छले दिनों अपनी संस्था के सौजन्य से जोधपुर-जैसलमेर यात्रा का अवसर मिला। जोधपुर जितना साफ-सुथरा और व्यवस्थित दिखा उतना जैसलमेर नजर नहीं आया ! खासकर दोनों के दुर्गों में जमीन-आसमान का फर्क दिखा ! जैसलमेर के किले के प्रवेश द्वार से ही एहसास होने लगता है कि इसका सिर्फ दोहन हो रहा है ! संरक्षित स्मारक होने के बावजूद किले के अंदर विशाल बुर्जों में दसियों होटल खुल गए हैं ! जगह-जगह दुकानें और पटरियों पर बिकता सामान, झरोखों पर टंगे कपड़े, जब-तब होती फिल्मों की शूटिंग, अंदर के रहवासियों की दौड़ती गाड़ियां, लोगों का हुजूम, कहीं-कहीं दरकती दीवारें कुछ अलग ही कथा बयान करती नजर आती हैं ! दुःख सा महसूस होता है हालत देख कर !

आवाजाही 

व्यवसाय 

दुकानदारी 

ढ़ती आमदनी के कारण स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और जीवन शैली पर बाजारवाद और आधुनिकता का दखल साफ तौर से दिखने लगा है ! जिसका असर मानवजनित क्षरण के रूप में किले पर भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पड़ने लगा है और यही बात चिंता का विषय भी है कि यदि तुरंत इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो कहीं इसका अस्तित्व ही खतरे में ना पड़ जाए ! 

गली-गली में दुकान 

यात्री वाहन 
पनी इस अनमोल विरासत को सहेजे रखना हम सबके लिए जितना महत्वपूर्ण है, इसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है ! आज इसकी पहचान, इसकी खासियत, इसकी विश्व-प्रसिद्ध लोकप्रियता ही इसके अस्तित्व के लिए खतरा बन गई है ! वाहनों द्वारा उत्पन्न प्रदूषण ! अनगिनत लोगों को सुविधा प्रदान करने का दवाब ! रख-रखाव की कमी ! बढ़ती दुकानदारी ! समय की मार, इन सबको झेलने में इसका दम फूलता नजर आता है ! 

निजी वाहन, बदहाल राहें 
एक बात का बेहद अचरज होता है कि जब इसे विश्व धरोहर घोषित कर दिया गया है तो इसके अंदर बुर्जों में होटल खोलने की इजाजत क्यों और कैसे दी गई ! होटल हैं तो पर्यटक भी आएंगे, भीड़ बढ़ेगी, जाहिर है दवाब बढ़ेगा तो मानवजनित क्षरण भी बढ़ेगा ! क्या इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया या आमदनी के सामने इसको इसकी हालत पर छोड़ दिया गया ? इसके पड़ोस में ही जोधपुर के मेहरानगढ़ की हालत बहुत ही अच्छी है। जैसलमेर को उसका अनुकरण करना चाहिए, जबकि यहां संसाधनों की किसी भी तरह की कोई कमी भी नहीं है !

@अंतिम तीन चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

अनोखी समाधि, एक महावृक्ष की

पुरोला देवता रेंज के चीड़ के पेड़ों में एक ऐसा वृक्ष भी था, जिसकी बढ़त आम पेड़ों से अलग थी। समय के साथ 2.70 मीटर की मोटाई वाले तने के इस पेड़ की ऊंचाई 60.65 मीटर तक पहुँच गई थी ! इस खूबी के कारण वह एशिया महाद्वीप का सबसे लंबा चीड़ का पेड़ बन गया था ! जब यह खबर पर्यावरण मंत्रालय तक पहुंची तो 1997 में पर्यावरण मंत्रालय ने एशिया के इस सबसे बड़े और ऊँचे चीड़ के पेड़ को सम्मानित करते हुए इसे ''महावृक्ष'' की उपाधि से नवाज, सम्मानित किया................!
#हिन्दी_ब्लॉगिंग 
माधि ! वैसे तो यह योग की अंतिम अवस्था है, जब साधक ध्येय वस्तु के ध्यान मे पूरी तरह से डूब जाता है और उसे अपने अस्तित्व का भी ज्ञान नहीं रहता ! योग और समाधि एक दूसरे के पूरक शब्द हैं ! परंतु साधारण बोलचाल में इसे चलायमान प्राणियों के लिए भी प्रयुक्त किया जाता है ! जब किसी मृत व्यक्ति या प्राणी का जिस जगह अंतिम संस्कार होता है और उस जगह पर उसकी स्मृति में कोई स्मारक बना दिया जाता है तो उस जगह को उस व्यक्ति या प्राणी की समाधि कहते हैं। पर क्या किसी पेड़ की भी समाधी हो सकती है ?
समाधि स्थल 
जी हाँ ! उत्तराखंड के उत्तरकाशी से 160 किमी की दूरी पर टौंस वन प्रभाग, पुरोला देवता रेंज के अंतर्गत मोरी-त्यूणी सड़क मार्ग पर टौंस नदी के किनारे स्थित है एक अनोखी समाधि ! जिसका एशिया के सबसे बड़े चीड़ के वृक्ष, जिसे पर्यावरण मंत्रालय ने ''महावृक्ष'' की उपाधि प्रदान की थी, की याद को बनाए रखने के लिए वन विभाग द्वारा निर्माण किया गया है ! इसके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है ! पर जिन्हें इस अनोखी और सुरम्य जगह का पता है, वह यहां मौका मिलते ही जरूर आते हैं !

अनोखी जगह 
त्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के पुरोला देवता रेंज में चीड़ के पेड़ों का एक जंगल है जिसका रखरखाव पर्यावरण मंत्रालय के वन-विभाग द्वारा किया जाता है। वहीं 220 साल की आयु का एक ऐसा वृक्ष भी था, जिसकी बढ़त आम पेड़ों से अलग थी। समय के साथ 2.70 मीटर की मोटाई वाले तने के इस पेड़ की ऊंचाई 60.65 मीटर तक पहुँच गई थी ! इस खूबी के कारण वह एशिया महाद्वीप का सबसे लंबा चीड़ का पेड़ बन गया था ! जब यह खबर पर्यावरण मंत्रालय तक पहुंची तो 1997 में पर्यावरण मंत्रालय ने एशिया के इस सबसे बड़े और ऊँचे चीड़ के पेड़ को सम्मानित करते हुए इसे ''महावृक्ष'' की उपाधि से नवाज, सम्मानित किया ! 

पर्यटकों का आकर्षण 
पर इस धरा पर जो भी आया है उसे जाना ही पड़ता है ! हर एक का समय निश्चित है ! यह महावृक्ष भी कवक रोग से ग्रसित हो गया ! कोई उपचार काम नहीं आया ! धीरे-धीरे यह अंदर से खोखला हो कमजोर होता चला गया और 2007 में आए एक भीषण तूफान का सामना ना कर सकने के फलस्वरूप धराशाई हो गया ! वन विभाग ने इसके मान और गौरव का ध्यान रखते हुए इस पेड़ के तनों के साथ ही इस पेड़ के अलग-अलग हिस्सों को संरक्षित कर नदी किनारे एक संग्रहालय बना, उसके आस-पास इको पार्क का निर्माण करवा, उसे चीड़ के पेड़ की समाधि-स्थल का नाम दे दिया ! 
चीड़ वन 
दे वभूमि उत्तराखंड अपने प्राकृतिक सौंदर्य, ग्लेशियरों, नदियों, झीलों, तालों, बुग्यालों के लिए तो प्रसिद्ध है ही, इस चीड़ के पेड़ की समाधि को देखने के लिए भी बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं और उसके आसपास बने इको पार्क में भी समय व्यतीत करते हैं। महावृक्ष समाधि स्थल पर्यटकों के लिए हमेशा से ही आकर्षण का केंद्र बना रहा है, कभी समय और अवसर मिले तो जरूर जाइएगा !

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

रविवार, 1 फ़रवरी 2026

व्यस्त रहें, मस्त रहें

अब यह तो पता नहीं कि खाली दिमाग ना मिलने पर शैतान कहां रहता होगा; पर यह जरूर लगता है कि दिमाग में घर बना कर वह इंसान का भला ही करता है, उसे कुछ ना कुछ करने के लिए उकसा कर ! जिससे शरीर चलायमान रहता है। अपनी तरफ से तो वह पूरी कोशिश करता है कि जिस शरीर के दिमाग  को उसने घर बनाया है वह स्वस्थ रहे ! बेशक उसकी नीयत ठीक होती है। पर नाम तो उसका बदनाम है, तो वह जो भी करवाता है, वह शैतानियत ही लगती है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

वैसे तो मनुष्य की आदत है अपने भूतकाल को गौरवान्वित करने की ! पर जब कर्मविहीन इंसान, खासकर सेवानिवृत्त, वेल्ला होता है तो ऐसे में वह बैठे-बैठे अपने अतीत को खंगालने लगता है ! उस समय उसे बीते समय की खुशनुमा बातें तो कम याद आती हैं, उल्टे बुरी यादें, नाकामियां, आधे-अधूरे प्रसंग, कष्ट, अभाव व तकलीफ में गुजरे लम्हों की जैसे फिल्मी रील सी चलने लगती है। ऐसा ना हो तो फिर अनिश्चित भविष्य के खतरे, निर्मूल आशकाएं या अनहोनी घटनाओं का डर उसे घेर लेता है। इस नकारात्मक सोच का दिलो-दिमाग पर गहरा असर पड़ता है। जिससे वह अपने को बीमार सा महसूस करने लगता है। 
बेल्लापन 
सीलिए हर व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने-आप को सदा व्यस्त तथा किसी भी काम में उलझाए रखे। व्यस्तता ही सखा, साथी, सहारा बन जाना चाहिए। इससे नकारात्मक विचारों को दिमाग में घुसने का मार्ग नहीं मिल पाता, ऊल-जलूल बातों पर ध्यान नहीं जाता और सबसे बड़ी बात, शारीरिक और मानसिक रूप से थकने के बाद रात को नींद ना आने की बिमारी से भी मुक्ति मिल जाती है। दिमाग दुरुस्त रहता है और शरीर स्वस्थ। इसलिए हरेक को कुछ भी, कैसा भी, कोई ना कोई शौक, रूचि, ''हॉबी'' जरूर पाल कर रखनी चाहिए। 
कब्जा 
एक कहावत भी है, खाली दिमाग शैतान का घर ! अब यह तो पता नहीं कि खाली दिमाग ना मिलने पर शैतान कहां रहता होगा पर यह जरूर लगता है कि दिमाग में घर बना कर वह इंसान का भला ही करता है, उसे सही-गलत, कुछ ना कुछ करने के लिए उकसा कर ! जिससे उसका आवास चलायमान रहे। अब अपनी तरफ से तो वह पूरी कोशिश करता है कि जिस शरीर के दिमाग को उसने घर बनाया है, वह स्वस्थ रहे, पर नाम ऐसा बदनाम है कि उसका किया-धरा सब कुछ लोगों को शैतानियत ही लगता है ! 
खुशहाली 
एक सच्चाई यह भी है कि इंसान के व्यस्त व स्वस्थ रहने का सकारात्मक असर उसके परिवार की शांति और सकून पर भी पड़ता है। क्योंकि घर के अन्य लोग, उसकी बेवजह दखलंदाजी, फिजूल के हस्तक्षेप, बिन मांगी सलाहें, बेकार की टोका-टाकी, बार-बार की चाय-पानी की पानी की फरमाइश से बचे रहते हैं, जिसके फलस्वरूप परिवार के सदस्य व आत्मीय-जन सुकून महसूस करते हैं, नतीजतन घर में शांति बनी रहती है। 

विभिन्न रुचियां 
तो लब्बो-लुआब यह है कि यदि हम अपने-आप को व्यस्त रखने का कोई जरिया ढूंढ लेते हैं, जिसमें व्यस्त रहते हुए खुशी और संतुष्टि भी मिले। आनंद महसूस हो। कुछ ज्ञान बढे। सृजनता का आभास हो। समय की बर्बादी न लगे और ना हीं मजबूरी ! ऐसा हो तो यह तय है कि दिमाग दुरुस्त व शरीर चुस्त तो रहेगा ही, साथ-साथ बोनस में घरेलू सुख-शांति-सुकून तो हईए है ! 
  
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

गुरुवार, 29 जनवरी 2026

पिगी बैंक में सूअर ही क्यों 🤔

ये चाहे मिट्टी से बनें हों, प्लास्टिक से या किसी भी दूसरी धातु से, बच्चों में अत्यंत प्रिय, इनका नाम पिगी बैंक ही होता है ! समय के साथ अब इनकी बनावट भी बदली है और यह विभिन्न आकारों-प्रकारों में मिलने लगा है ! पर भले ही इसका आकार-प्रकार और इसको बनाने में प्रयुक्त पदार्थ बदल गए हों, पर जो चीज नहीं बदली, वह है इसका बचपन से सीख देता आ रहा संदेश कि बचत  करना अच्छी बात है........!

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चपन से ही देखते आने के बावजूद हम में से कभी किसी ने सोचा कि बच्चों की छोटी-छोटी बचत के लिए जो गुल्लक होती है, ज्यादातर उसका रूप पिग यानी सूअर का ही क्यों होता है ? दुनिया में हाथी, शेर, बाज, मोर जैसे और भी बहुतेरे जानवर और परिंदे हैं उनका आकार क्यों नहीं अपनाया गया ? सबसे पहले इन गुल्लकों को ऐसा रूप कहां मिला इस पर भी मतभेद है ! भले ही यह सब तय करना कुछ मुश्किल हो, पर कुछ तथ्य तो उपलब्ध हैं ही !

आओ बचत करें 
मध्य युग में धातुएं के अत्यधिक मंहगा होने के कारण  यूरोप में पाइग (pygg) नाम की एक खास मिट्टी से प्लेटें इत्यादि बर्तन बनाए जाते थे। उसी समय कुम्हारों ने अपने छोटे सिक्कों को सुरक्षित रखने के लिए गुल्लक बनाई और उसे पिगी बैंक कहा जाने लगा। समय के साथ धीरे-धीरे, सहूलियत या भूलवश पाइग पिग होता चला गया और Pygg शब्द को Pig समझ लिया गया। इसीलिए आगे चल कर कुम्हार लोग पिग को ध्यान में रख सूअर रूपी गुल्लकें बनाने लग गए। लोगों, खासकर बच्चों को यह बदलाव बहुत पसंद आया और इसी लोकप्रियता के कारण यह शब्द ''पिगी बैंक'' भी प्रचलित हो गया। कुछ लोग इसका संबंध चीन, जर्मनी और इंडोनेशिया से भी जोड़ते हैं क्योंकि वहां भी प्राचीन काल के ऐसे बर्तन मिले हैं ! कुछ लोग मिटटी के नाम पर भी संदेह करते हैं, इसीलिए इसके उद्भव के बारे में निश्चित तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता !  

पिग 
भले ही इतिहास, जिज्ञासाएं, कथाएं, कुछ भी हों, आज पिगी बैंक का मतलब या पर्याय सिक्के जमा करने के लिए बने किसी भी आकार और रूप के उपकरण से हो गया है ! ये चाहे मिट्टी से बनें हों, प्लास्टिक से या किसी भी दूसरी धातु से, बच्चों में अत्यंत प्रिय, इनका नाम पिगी बैंक ही होता है ! समय के साथ अब इनकी बनावट भी बदली है और यह विभिन्न आकारों-प्रकारों में मिलने लगा है ! पर भले ही इसका आकार-प्रकार और इसको बनाने में प्रयुक्त पदार्थ बदल गए हों, पर जो चीज नहीं बदली, वह है इसका बचपन से सीख देता आ रहा यह संदेश कि बचत  करना अच्छी बात है और यह नियम लोगों के बड़े होने पर आदत में तब्दील होता चला जाता है !  

आधुनिक पिग्गी 
एक नजर उस पिग मिटटी से मिलते-जुलते नाम वाले पिग जैसे दिखने और अपने यहां पाए जाने वाले जीव पर भी ! भारत में पाए जाने वाले इस पिग को पिग्मी हॉग के नाम से जाना जाता है, जो असल में जंगली सूअरों की एक लुप्तप्राय प्रजाति है। अपने असम के राष्ट्रिय उद्यानों में इसे सुरक्षित रखा गया है ! घास के मैदानों में रहने वाला यह जीव अपनी थूथन से मिटटी खोद कर कंद, जंगली फल, केंचुए, दीमक जैसे कीटों को अपना आहार बनाता है और उसके इन्हीं उपक्रमों से मिटटी उपजाऊ होती चली जाती है ! 
पिग्मी हॉग 
अब यह तो प्रभु की माया और इच्छा है कि कौन-कब-कहां ख्याति प्राप्त करता है ! कैसे जंगल-जंगल घूमने वाला घर-घर में पैठ बना लेता है ! चलते-चलते एक मनोरंजक जानकारी, कोलकाता के सबसे प्रतिष्ठित इलाके, धर्मतल्ला यानी चौरंगी की लिंडसे स्ट्रीट पर 1874 में बना शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, न्यू मार्किट स्थित है ! इसका एक नाम हॉग मार्केट भी है ! बंगला भाषा में इसे हॉग साहेबेर बाजार भी कहा जाता है 😅

@संदर्भ और चित्रों के लिए अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏  

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

दुर्योधन की वह एक चूक

श्री कृष्ण बोले, तुम्हारे पास एक ऐसा योद्धा था, जिसे काल भी परास्त नहीं कर सकता था ! जो तुम्हारे सारे सेनापतियों से ज्यादा सक्षम था ! जो इस युद्ध को सिर्फ एक पहर में ही तुम्हारे पक्ष में समाप्त करवा सकता था ! पर तुम्हारा कभी उसकी ओर ध्यान ही नहीं गया ! तुम अपनी भावनाओं, मित्रता, भावुकता में अपने सेनापति चुनते रहे ! दुर्योधन अवाक हो श्री कृष्ण जी का मुंह ताकता रह गया, फिर संभल कर पूछा, गोविंद ऐसा कौन सा वीर था जिसे मैं जान ही नहीं पाया ?

#हिन्दी_ब्लागिंग 

किसी संगठन, संस्थान  या प्रतिष्ठान के  साधन या उपादान चाहे  कितने भी सक्षम हों, यदि उनका दूरदर्शी नेतृत्वकर्ता, निस्वार्थ भाव से, उसको  संभालने के लिए  सही व्यक्ति  का चयन और नियुक्ति, सही  समय पर करता है, तभी  इसे असली नेतृत्व  कहा जा सकता है ! पर अक्सर  देखा गया है कि नेतृत्वकर्ता  या संचालक अपने  मोह, पूर्वाग्रहों, भावनाओं, द्वेष  या अहम के वशीभूत हो कर अपने सबसे काबिल सहायक, कार्यकर्त्ता को  नजर-अंदाज  कर संगठन के हित पर, अपनी  पसंद  को वरीयता दे देता है और  जब तक  इस चूक की कीमत समझ आती है, तब तक तो बहुत देर हो चुकी होती है ! सदियों से ऐसा होता चला आ रहा है !

रणक्षेत्र 

18 दिनों के भीषण रक्तपात के बाद कुरुक्षेत्र का मैदान अब युद्धभूमि नहीं, श्मशान बन चुका था ! जहां कल तक सैनिकों की हुंकार, शंखनाद और तलवारों की खनखनाहट थी, आज वहां मृत्यु अपने भयावह सन्नाटे के साथ मौजूद थी ! दिव्यास्त्रों की आग और ताप से कोसों दूर तक के लता-पादप-वृक्ष भस्म हो चुके थे। उनसे उठे धुएं ने आकाश को कालिमा से ढक चारों ओर अंधकार कायम कर दिया था ! मांसभक्षी जानवरों ने क्षत-विक्षत लाशों को लोथड़ों में तब्दील कर दिया था ! टूटे हुए रथ, घोड़े-हाथियों के शव दूर-दूर तक बिखरे पड़े थे ! सड़ती लाशों और रक्त से सनी मिट्टी के साथ मिल कर हवा ने पूरे वातावरण को विषाक्त और दुर्गंधमय बना दिया था ! ऐसे में अपने पतियों, पुत्रों, भाइयों के शवों को ढूंढने रणभूमि में पहुंचीं महिलाओं के मर्मभेदी विलाप से रह-रह कर आकाश कांप उठता था ! 

विभीषिका 
इन्हीं के बीच घायलावस्था में अपनी टूटी हुई जंघाओं के साथ, तन और मन  की मर्मांतक पीड़ा सहता, कुरु वंश का  अभिमानी युवराज दुर्योधन अकेला  पड़ा हुआ था ! उसकी  सांसें तो उखड़ रही थीं, लेकिन ह्रदय में पराजय  की आग और अपने साथ  हुए छल  का आक्रोश उसे मरने नहीं दे रहा था !  तभी वहां  श्री कृष्ण का आगमन हुआ। दुर्योधन ने कृष्ण को देखते ही उन पर आरोप जड़ दिए कि सिर्फ तुम्हारे छल ने मुझे हराया है ! यदि धर्म युद्ध होता, तो पांडव कभी नहीं जीतते ! श्री कृष्ण के चेहरे पर दया और करुणा व्याप्त थी ! 

प्रभु 

उन्होंने दुर्योधन के पास आ कर उसके सर पर हाथ फेरा और कहा, तुम अभी भी सिर्फ पांडवों के छल को देख रहे हो, लेकिन अपनी ओर से हुए कपट और अन्याय की तरफ तुम्हारा ध्यान नहीं जा रहा ! जैसा तुमने किया उसी का फल तुम्हें मिला ! पर बात इतनी सी नहीं है ! युद्ध की शुरुआत से ही तुम गलतियां करते आ रहे हो ! तुम हारे अपनी गलत नीतियों से, अपने गलत चयनों से, अपने गलत निर्णयों की वजह से ! तुमने यदि युद्ध की शुरुआत में सोच-विचार कर निष्पक्ष भाव से निर्णय लिया होता तो यह युद्ध एक दिन में ही खत्म हो इतिहास बदल सकता था ! 

करुणा 
प्रभु के स्पर्श से पीड़ामुक्त हुए दुर्योधन ने चकित हो पूछा, गोविन्द मैंने ऐसी कौन सी चूक की ?  

श्री कृष्ण बोले, तुम्हारे पास एक ऐसा योद्धा था, जिसे काल भी परास्त नहीं कर सकता था ! जो तुम्हारे सारे सेनापतियों से ज्यादा सक्षम था ! जो इस युद्ध को सिर्फ एक पहर में ही तुम्हारे पक्ष में समाप्त करवा सकता था ! पर तुम्हारा कभी उसकी ओर ध्यान ही नहीं गया ! तुम अपनी भावनाओं, मित्रता, भावुकता में अपने सेनापति चुनते रहे ! दुर्योधन अवाक हो श्री कृष्ण जी का मुंह ताकता रह गया, फिर संभल कर पूछा, गोविंद ऐसा कौन सा वीर था जिसे मैं जान ही नहीं पाया ?

अश्वथामा 
गुरु द्रोण के पुत्र, शिव अंशावतार अश्वत्थामा ! जिसको तुम्हारी भावनाओं और मित्रता के मोह ने अनदेखा कर दिया था ! श्री कृष्ण ने उसकी रणनीतिक भूलों को याद दिलाते हुए कहा, सबसे पहले तुमने भीष्म पितामह को बनाया, जो अजेय थे पर पांडवों से स्नेह रखते थे ! वे उन्हें मारना ही नहीं चाहते थे। उनके बाद तुमने गुरु द्रोण को बागडोर सौंप दी, जिनका मोह अर्जुन के साथ था ! उनके जाने के पश्चात तुमने मित्र मोह में कर्ण का चुनाव किया, जबकि तब तुम्हें अश्वत्थामा को चुनना चाहिए था, जिसका क्रोध अपने पिता की मृत्यु के कारण चरम पर था वह साक्षात काल बन चुका था ! उसके बाद भी तुमने उसे अनदेखा कर शल्य को कमान सौंप दी ! तुम यह भी नहीं सोच पाए कि जिन लोगों को तुम नेतृत्व सौंप रहे हो, वे सब नश्वर थे जबकि अश्वस्थामा को अमरता का वरदान प्राप्त था !

युद्ध 

दुर्योधन निश्चल हो पड़ा था, पर उसके ज्ञान चक्षु खुल चुके थे ! काम-क्रोध-द्वेष-मोह-लिप्सा सब तिरोहित हो चुके थे ! एक-एक कर उसे अपनी गलतियां साफ दिखाई पड़ने लगी थीं ! भाइयों से द्वेष ना कर उनका का हिस्सा उन्हें दे देता तो लाखों-करोड़ों लोगों की जान बच जाती ! प्रकृति का विनाश ना होता ! द्रोपदी का सम्मान करने की बजाय उसका अपमान किया ! जब प्रभु खुद उसके पास आए थे तो उसने उनकी शरण की बजाए उनकी सेना मांग ली थी ! जरासंध, जयद्रथ जैसों का विनाश भी सही-गलत की पहचान नहीं करवा पाया ! 

दुर्योधन की आँखें जैसे अतीत में झांक रहीं थीं ! अब उसे याद आ रही थी अश्वस्थामा की शक्ति जो हजारों योद्धाओं से एक साथ लड़ सकता था ! जिसे अपने पिता के अलावा परशुराम, व्यास और दुर्वासा जैसे ऋषियों से भी युद्ध कौशल का ज्ञान प्राप्त था ! उसके पास अर्जुन से भी घातक दिव्यास्त्र थे ! फिर उसे याद आई वह काली रात, जब उसने अंत समय में अश्वस्थामा को सेना नायक बनाया था और उसने कुछ ही समय में पांडवों के सेनापति धृष्टद्युम्न, शिखंडी, पाण्डवपुत्रों के साथ-साथ उनकी बची हुई समस्त सेना का भी नाश कर दिया था !  

पर अब क्या हो सकता था, सिवा पछताने के और उसके लिए भी समय कहां था ! पर उसके साथ ही यह भी ध्रुव सत्य है कि होता वही है जो प्रभु चाहते हैं ! इसलिए जो होना है वह तो हो कर ही रहेगा और वह जो करेगा अच्छा ही करेगा, यह विश्वास बना रहना चाहिए ! दुर्योधन तो चला गया ! कहते हैं कि दुनिया में ऐसा कुछ भी घटित नहीं होता, जो महाभारत ग्रंथ में उल्लेखित ना हो ! पर फिर भी यदि हम उससे कोई सबक नहीं सीखते, तो फिर दुर्योधन की तरह पछताने के सिवा कोई चारा भी नहीं बचता ! 

@चित्र व संदर्भ हेतु अंतर्जाल का हार्दिक आभार 🙏 

शनिवार, 17 जनवरी 2026

व्यक्तिगत कुंठा जब दंभ का चोला पहन, शब्दों का रूप अख्तियार करती है, तो अनर्थ ही होता है

कोई अपने अहंकार में यदि अपनी भूल को भूल ही नहीं मानता और ऐसे में जब उसकी कुंठा व सोच, दंभ का चोला पहन, शब्दों का रूप अख्तियार कर अवाम के सामने आती है, तब-तब जनता उसे सबक सिखाती है ! इसका कोई भी अपवाद नहीं है ! देश प्रेमी जनता कभी भी दुर्वचनों, दुर्भावनाओं या गलतबयानियों को प्रशय नहीं देती ! सामने वाले का मफलर, गमछा, टोपी, शॉल किस  रंग का है, इससे पब्लिक को कोई मतलब नहीं होता, उसके लिए सामने वाले के मनोभाव, उद्गार तथा देश के प्रति निष्ठा मायने रखती है.......................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

अभी बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए जब किसी ने अपने सबसे बड़े सहयोगी की जरुरत को ही नकार दिया था ! तब जनता ने उन्हें ही कुछ हद तक नकारा बना दिया था ! एक था, जिसने जन्मों-जन्मों तक की भविष्यवाणी कर दी थी, जनता ने उसी के सिम्बल से उसे बुहार कर किनारे कर दिया ! एक के लगातार विष-वमन से तंग आ लोगों ने उसका दायरा ही तंग कर डाला ! एक ने जातियों का व्यूह रचा, अवाम ने उसे पांति के ही लायक ना छोड़ा ! एक ने डर, हिंसा, खौफ का माहौल बना खुद को अजेय करना चाहा, उसे आज दर-दर भटकने को मजबूर होना पड़ रहा है ! देश प्रेमी जनता कभी भी दुर्वचनों, दुर्भावनाओं या गलतबयानियों को प्रशय नहीं देती ! सामने वाले का मफलर, गमछा, टोपी, शॉल किस  रंग का है, इससे पब्लिक को कोई मतलब नहीं होता, उसके लिए सामने वाले के मनोभाव, उद्गार तथा देश के प्रति निष्ठा मायने रखती है ! 

जनता जनार्दन 
फिर भी है कि लोग समझते ही नहीं, ताजा उदाहरण है, एक भाई साहब, जिनका नाम भी देश के अधिकांश लोगों ने नहीं सुना होगा, अचानक अपने सहयोगी दल को एक मजबूरी बता मिडिया की सुर्खियां बन गए ! अब वह लाख सफाई देते रहें, अपने कहे का अर्थ बदलते रहें, नुक्सान तो हो गया ! लातूर जिले में ऐसी ही बयानबाजी के चलते मिले विपरीत परिणामों से भी उन्होंने कुछ नहीं सीखा !  बोलना है कुछ भी भक्क से उगल दिया ! ऐसी ही हरकत सामने से भी कुछ दिनों पहले हुई थी, जिसने दोस्त, मित्र, साथी, अनुयायी सभी को सकते में ला दिया था !

याद आता है जब 1977 में इंदिरा जी चुनाव हारी थीं, तब जीतने के बाद जनता दल, देश और देशवासियों के हित में कुछ करने के बजाय सिर्फ इस बात पर जुट गया कि इस महिला को जेल भिजवाना है ! पब्लिक को यह सब रास नहीं आया और जनता दल को ही दलदल बना डाला ! 

खुद के गुमान में डूबे ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि जब आपका व्यवहार, बर्ताव, कथनी करनी का फर्क, ढोंग या उदण्डता लोगों को बार-बार दिखाई देती है, तो वे आपको नकार देते हैं ! आपका समाज को खंडित, विखंडित करने या देश को तनावग्रस्त या कमजोर करने का प्रयास जनता कतई बर्दास्त नहीं करती ! झूठे किस्से, कहानियों, आरोपों को वह समझने-पहचानने लगी है ! समय बदल रहा है, जितनी जल्दी हो समझ व संभल जाएं नहीं तो अप्रासंगिक होते देर नहीं लगेगी ! हाल ही के बहुतेरे उदाहरण सामने हैं ! बड़े-बड़े तीसमारखाँ निपटा दिए जनता ने ! क्योंकि अब देश के अवाम को राष्ट्रबोध, स्वयंबोध, शत्रुबोध, इतिहासबोध अच्छी तरह होने लगा है ! अब वह बहकावे में नहीं आती !

निष्कर्ष यही है कि कोई अपने अहंकार में यदि अपनी भूल को भूल ही नहीं मानता और ऐसे में जब उसकी कुंठा व सोच, दंभ का चोला पहन, शब्दों का रूप अख्तियार कर अवाम के सामने आई है, तब-तब जनता ने उसे सबक सिखाया है, इसका कोई भी अपवाद नहीं है ! पब्लिक सब बूझती है ! किसी नायक, नेता की नीयत और फितरत उससे छिपी नहीं रहती ! देर-सबेर वह सबक जरूर सिखाती है ! उसके लिए परिवार, जाति, भाषा, धर्म मायने जरूर रखते हैं, पर देश की सुरक्षा, देश की भलाई या देश की उन्नति की कीमत पर नहीं !    

जय हिंद 🙏

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

है अपनी ये तो रीत नहीं, है अपना ये व्यवहार नहीं

अभी-अभी पश्चिमी कैलेंडर ने नए साल का ऐलान किया और हम सब जुट गए उसके स्वागत समारोह में, कोई बुराई नहीं ! पर एक बार अपने नव वर्ष के समय और इस नए साल के समय का तुलनात्मक विश्लेषण कर लें तो साफ फर्क नजर आ आएगा कि नई परिस्थिति का उल्लास क्या होता है ! जब प्रकृति, कायनात, निसर्ग खुद अंगड़ाई ले आलस्य त्यागती है तो ऐसे प्रफुल्लित वातावरण में धरा का जर्रा-जर्रा उल्लसित नजर आने लगता है ! जड़ में भी जान आ जाती है ! एक बार पूर्वाग्रह त्याग, तुलना कर देखें तो सही.........🙏

#हिन्दी_ब्लागिंग 

मारा देश एक उत्सव-धर्मी देश है ! हमारी आत्मा बसती है, इन उत्सवों में ! इतने विविध त्यौहार दुनिया के शायद ही किसी और देश में मनाए जाते हों ! रंग-बिरंगे, उल्लासमय, खुशियां बिखेरते, प्रकृति, परंपराओं से, गाथाओं से जुड़े हुए, एक से एक बढ़ कर महोत्सव ! होना तो यह चाहिए था कि दुनिया हमारे समारोहों को मनाए, पर हुआ इसके ठीक विपरीत, हम जुट गए पाश्चात्य जश्नों को अपनाने में ! यही नहीं हम तो एक कदम और आगे बढ़ अपने मासूम से पर्वों को पश्चिमी रंगों से रंगने की धृष्टता करने से  भी बाज नहीं आए !

पावन, पवित्र 
ऐसा नहीं है कि किसी और के त्यौहार को मनाना गलत है ! त्यौहार तो खुशी का प्रतीक हैं ! खुशियां अपनानी ही चाहिए ! पर हमारे हमारे पर्व गौण क्यों होते चले गए ? ऐसा क्योंकर हुआ ? तो इसका एक कारण यह भी समझ में आता है कि सैकड़ों वर्षों की पराधीनता ने अधिकांश देशवासियों में जो एक हीन भावना का संचार कर दिया था, उसी से हम आक्रांताओं को अपने से बेहतर मानने लग गए, जिसका परिणाम यह रहा कि हमें अपने ऊपर ही विश्वास नहीं रह गया ! हमारी समृद्ध परिपाटी, परंपरा, इतिहास, सभी हाशिए पर सिमटते चले गए !   

जैसे अभी-अभी पश्चिमी कैलेण्डर ने नए साल का ऐलान किया और हम सब जुट गए उसके स्वागत समारोह में, कोई बुराई नहीं ! पर एक बार अपने नव वर्ष के समय और इस नए साल के समय का तुलनात्मक विश्लेषण कर लें तो साफ फर्क नजर आ आएगा कि नई परिस्थिति का उल्लास क्या होता है ! जब प्रकृति, कायनात, निसर्ग खुद अंगड़ाई ले आलस्य त्यागती है तो ऐसे प्रफुल्लित वातावरण में धरा का जर्रा-जर्रा उल्लसित नजर आने लगता है ! जड़ में भी जान आ जाती है ! एक बार पूर्वाग्रह त्याग, तुलना कर देखें तो सही ! 

इसी बात का उल्लेख वर्षों पहले अपनी कविता  ''यह नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं'' में हमारे राष्ट्र कवि श्री रामधारी दिनकर जी ने पूरे विस्तार के साथ किया था ! हम सभी को उसे पढ़ना चाहिए, वे कहते हैं कि -


ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं                                
है अपना ये त्यौहार नहीं                                                          


है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं

धरा ठिठुरती है सर्दी से,
आकाश में कोहरा गहरा है                                               
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर                                                                  
सर्द हवा का पहरा है                                                                             

सूना है प्रकृति का आँगन
कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं
हर कोई है घर में दुबका हुआ
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं

चंद मास अभी इंतज़ार करो
निज मन में तनिक विचार करो
नये साल नया कुछ हो तो सही
क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही                                                                                                  

उल्लास मंद है जन-मन का
आयी है अभी बहार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं

ये धुंध कुहासा छंटने दो
रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने दो
फागुन का रंग बिखरने दो

प्रकृति दुल्हन का रूप धार
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी
शस्य श्यामला धरती माता
घर-घर खुशहाली लायेगी

तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर
जय गान सुनाया जायेगा

युक्ति प्रमाण से स्वयंसिद्ध
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध                                                                                    
आर्यों की कीर्ति सदा -सदा
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा


अनमोल विरासत के धनिकों को
चाहिये कोई उधार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं                                                                                    

है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं                                                                                                                                           

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏🙏

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