pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: राजस्थान
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मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

बदहाली से जूझता एक किला

परन्तु आज किले के प्रवेश द्वार से ही लगने लगता है कि इसका सिर्फ दोहन हो रहा है ! संरक्षित स्मारक होने के बावजूद किले के अंदर विशाल बुर्जों में दसियों होटल खुल गए हैं ! जगह-जगह दुकानें और पटरियों पर बिकता सामान, झरोखों पर टंगे कपड़े, जब-तब होती फिल्मों की शूटिंग, अंदर के रहवासियों की दौड़ती गाड़ियां, लोगों का हुजूम, बाजारवाद और आधुनिकता का दखल, जलवायु और मानवजनित क्षरण, कहीं-कहीं दरकती दीवारें कुछ अलग ही कथा बयान करती नजर आती हैं.........................😔   


#हिन्दी_ब्लॉगिंग 


किला जैसलमेर का ! सन 1156 में भाटी शासक रावल जैसल ने इस ऐतिहासिक किले की त्रिकूट पहाड़ी पर बहुत सोच-समझ कर और रणनीतिक दृष्टिकोण को सामने रखते हुए नींव रखी थी। उनके वंशजों ने यहाँ रहते हुए, भारत के गणतंत्र में परिवर्तन होने तक, बिना वंश क्रम को भंग किए हुए लगातार 770 वर्ष तक शासन किया, जो अपने आप में एक महत्वपूर्ण कीर्तिमान है ! भाटी वंश स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण के यादव वंश से जोड़ता है ! इस गौरवपूर्ण परंपरा का उल्लेख प्रचलित लोककथाओं में, शिलालेखों के साथ-साथ राजवंश के वृतांतों में भी स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है।  

रावल जैसल 

सोने का किला 

जैसलमेर का किला 
अनमोल विरासत 
रा जस्थान की राजधानी जयपुर से करीब 575 किलोमीटर की दूरी पर, 99 विशाल बुर्जों और 30 फुट ऊंची दीवार से घिरे, थार मरुस्थल के केंद्र में स्थित इस किले का निर्माण पीले बलुआ पत्थरों से किया गया है, जो सूर्य की रौशनी में चमक कर सोने का अहसास कराते हैं ! इसीलिए इसे सोने का किला भी कहा जाता है ! देश के सुविख्यात फिल्म निर्माता सत्यजीत रे ने इसको केंद्र में रख 1974 में सोनार केल्ला (सोने का किला) नामक एक बंगला फिल्म भी बनाई थी ! 
प्रवेश द्वार


हवा कक्ष 
यह किला भारत का एक प्रमुख पर्यटन स्थल तो है ही, साथ ही यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भी इसका नाम शामिल है। जैसलमेर का यह स्वर्ण किला दुनिया के उन गिने-चुने किलों में से एक है, जिसमें हजारों लोग रहते हैं यानी यह एक जीवंत किला है ! यह बहुद सुखद अनुभूति है कि इसके रहवासी आज भी अपने त्योहारों, परम्पराओं और लोकगीतों को भूले नहीं हैं ! अच्छी बात है ! पर परंपराओं के साथ-साथ  इस अनमोल धरोहर के संरक्षण, इसके रख-रखाव, इसकी सुरक्षा का भी ध्यान पूरी शिद्दत से रखा जाना चाहिए !

शयन कक्ष 

झरोखा 

पत्थर पर बेहतरीन नक्काशी 

पि छले दिनों अपनी संस्था के सौजन्य से जोधपुर-जैसलमेर यात्रा का अवसर मिला। जोधपुर जितना साफ-सुथरा और व्यवस्थित दिखा उतना जैसलमेर नजर नहीं आया ! खासकर दोनों के दुर्गों में जमीन-आसमान का फर्क दिखा ! जैसलमेर के किले के प्रवेश द्वार से ही एहसास होने लगता है कि इसका सिर्फ दोहन हो रहा है ! संरक्षित स्मारक होने के बावजूद किले के अंदर विशाल बुर्जों में दसियों होटल खुल गए हैं ! जगह-जगह दुकानें और पटरियों पर बिकता सामान, झरोखों पर टंगे कपड़े, जब-तब होती फिल्मों की शूटिंग, अंदर के रहवासियों की दौड़ती गाड़ियां, लोगों का हुजूम, कहीं-कहीं दरकती दीवारें कुछ अलग ही कथा बयान करती नजर आती हैं ! दुःख सा महसूस होता है हालत देख कर !

आवाजाही 

व्यवसाय 

दुकानदारी 

ढ़ती आमदनी के कारण स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और जीवन शैली पर बाजारवाद और आधुनिकता का दखल साफ तौर से दिखने लगा है ! जिसका असर मानवजनित क्षरण के रूप में किले पर भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पड़ने लगा है और यही बात चिंता का विषय भी है कि यदि तुरंत इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो कहीं इसका अस्तित्व ही खतरे में ना पड़ जाए ! 

गली-गली में दुकान 

यात्री वाहन 
पनी इस अनमोल विरासत को सहेजे रखना हम सबके लिए जितना महत्वपूर्ण है, इसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है ! आज इसकी पहचान, इसकी खासियत, इसकी विश्व-प्रसिद्ध लोकप्रियता ही इसके अस्तित्व के लिए खतरा बन गई है ! वाहनों द्वारा उत्पन्न प्रदूषण ! अनगिनत लोगों को सुविधा प्रदान करने का दवाब ! रख-रखाव की कमी ! बढ़ती दुकानदारी ! समय की मार, इन सबको झेलने में इसका दम फूलता नजर आता है ! 

निजी वाहन, बदहाल राहें 
एक बात का बेहद अचरज होता है कि जब इसे विश्व धरोहर घोषित कर दिया गया है तो इसके अंदर बुर्जों में होटल खोलने की इजाजत क्यों और कैसे दी गई ! होटल हैं तो पर्यटक भी आएंगे, भीड़ बढ़ेगी, जाहिर है दवाब बढ़ेगा तो मानवजनित क्षरण भी बढ़ेगा ! क्या इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया या आमदनी के सामने इसको इसकी हालत पर छोड़ दिया गया ? इसके पड़ोस में ही जोधपुर के मेहरानगढ़ की हालत बहुत ही अच्छी है। जैसलमेर को उसका अनुकरण करना चाहिए, जबकि यहां संसाधनों की किसी भी तरह की कोई कमी भी नहीं है !

@अंतिम तीन चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

सोमवार, 9 अगस्त 2021

गेपरनाथ, जहां शिव जी सपरिवार कुछ समय गुजारते हैं

ताल के हरे रंग के पारदर्शी पानी में कई लोग नहाने का आनंद ले अपनी थकावट दूर कर लेते हैं । जमीन का ढलाव यहां भी ख़त्म नहीं होता, बल्कि घाटी नीचे और नीचे होते हुए घने जंगल में विलीन होती चली जाती है। दर्रे की दूसरी दिवार पर भी कुछ कुटियानुमा कंदराएं नज़र आती हैं। जिनके बारे में बताया जाता है कि पहुंचे हुए साधू-संत वहां रह कर अपनी साधना पूरी किया करते थे............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

सावन का पावन महीना ! हर जगह हर-हर महादेव की गूँज ! सारा देश शिवमय ! शिव शंकर भोलेनाथ के देश भर में स्थित हजारों देवस्थानों में उत्सव का माहौल ! शिवालय छोटा हो या बड़ा, भगतों को कोई फर्क नहीं पड़ता ! उन्हें सिर्फ प्रभु का सानिध्य चाहिए होता है ! देव स्थान का मार्ग जितना दुर्गम होता है, लोगों के मन में उसकी प्रमाणिकता उतनी ही बढ़ जाती है। खासकर पहाड़ों के दुर्गम रास्तों के बाद अपने गंतव्य पर जा अपने इष्ट के दर्शन मिलने पर आस्था और विश्वास दोगुना हो जाता है। कष्ट सह कर पहुँचने पर जिस अलौकिक आनंद की अनुभूति मिलती है वह वर्णनातीत होती है। वैसे पहाड़ों के अलावा भी हमारे देश में कई ऐसे स्थान हैं, जहां पहुंचना कुछ कष्ट-साध्य ही माना जाएगा। 

प्रवेश द्वार 




ऐसा ही राजस्थान के कोटा शहर के पास, चम्बल की गहरी कंदराओं में प्रकृति की गोद में स्थित एक अनोखा, रहस्यमय, कुछ अनजाना सा शिवालय है, बाबा गेपरनाथ ! यहां का मार्ग दुर्गम तो नहीं है पर रोमांचक जरूर है ! कोटा बूंदी के रावतभाटा मार्ग पर रथ कांकरा के पास शहर से करीब 24-25 कि.मी. की दूरी पर एक सड़क दायीं ओर मुड़ती है, जो करीब दो कि.मी. के बाद चम्बल की घाटी और उस पर बने प्राकृतिक पहाड़ी, संकरे दर्रे पर जा कर ख़त्म होती है। ऊपर से घाटी की गहराई 800 से 1000 फिट तक की है। वहीं से पहाड़ी की एक दिवार से जुडी हुई सीढ़ियों की श्रृंखला नीचे तक चली गयी है। करीब चार सौ सीढ़ियां उतरने के बाद, भूतल से करीब 100 फिट पहले एक चबूतरे पर खोह नुमा जगह पर शिव जी का छोटा सा लिंग स्थापित है जिस पर पहाड़ी के अंदर से लगातार अटूट जलधारा आ कर उसका अभिषेक करती रहती है। मंदिर के अंदर जगह इतनी कम और संकरी है कि बमुश्किल दो लोग ही झुक कर बैठ सकते हैं। 






ऐसा माना जाता है कि पूर्व काल में यह क्षेत्र भील राजाओं के आधीन था, उन्हीं  भीलों के शैव मतावलंबी गुरु ने इस मंदिर की स्थापना करवाई थी। यहां के शिवलिंग की विशेषता है कि यह दोहरी योनि में स्थित है ! ऐसा उदाहरण बहुत कम देखने को मिलता है। स्थानीय लोग बाबा गेपरनाथ के रूप में यहां शिवजी को पूजते हैं। ऐसी मान्यता है कि शिवरात्रि के आस-पास शिव जी अपने पूरे परिवार के साथ कुछ समय यहां गुजारते हैं। इस जगह को करीब पांच सौ साल पुराना बतलाया जाता है। यह स्थान साधू-संतों की तपस्थली भी रहा है। 




मंदिर से कुछ नीचे, पहाड़ी से गिरी हुई छोटी-बड़ी शिलाओं से घिरा, एक ताल है, जिसमें पहाड़ों से आ-आ कर पानी एकत्र होता रहता है। हरे रंग के पारदर्शी पानी में कई लोग नहाने का आनंद ले अपनी थकावट दूर कर लेते हैं । जमीन का ढलाव यहां भी ख़त्म नहीं होता, बल्कि घाटी नीचे और नीचे होते हुए घने जंगल में विलीन होती चली जाती है। दर्रे की दूसरी दिवार पर भी कुछ कुटियानुमा कंदराएं नज़र आती हैं। जिनके बारे में बताया जाता है कि पहुंचे हुए साधू-संत वहां रह कर अपनी साधना पूरी किया करते थे।आज तो दस तरह की सहूलियतें उपलब्ध हैं। पर देख सुन कर आश्चर्य होता है कि जब इतने साधन नहीं थे, तब इतने दुर्गम, निर्जन, सुनसान, दुरूह इलाके की खोज कैसे हुई होगी। कैसे पहुंचा गया होगा यहां !



सुरम्य घाटी 
जो भी हो ! अद्भुत जगह है यह ! नीचे उतरने के पश्चात किसी दूसरे लोक में होने का अनुभव होने लगता है ! दिन की रौशनी में प्रकृति की अपूर्व छटा साल भर लोगों को लुभा कर प्रभू के दर्शन के अलावा युवाओं को पिकनिक के लिए भी आमंत्रित करती रहती है। इसीलिए दिन ब दिन लोगों की आवक बढती ही जा रही है ! 2008 में एक हादसे में सीढ़ियों के धंस जाने की वजह से पचासों लोग यहां फंस गए थे ! जिन्हें बड़ी मुश्किल और जद्दोजहद के बाद निकाला जा सका था ! उसके बाद ही पक्की-मजबूत सीढ़ियां बनाई गईं। पर अभी भी अभी बहुत सी मूलभूत सहूलियतों और सुरक्षात्मक उपायों की जरुरत है ! फिर भी यदि कभी मौका मिले तो ऐसी अद्भुत जगह के दर्शन करने का सुयोग छोड़ना नहीं चाहिए। 

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

कोटा में है, विभीषण का मंदिर

जैसे-जैसे इस जगह की ख्याति और जानकारी  बढ़ रही है वैसे - वैसे यहां लोगों के आने - जाने में भी बढ़ोत्तरी होने लगी  है। जिसका असर मंदिर की साज-सज्जा और रख - रखाव को देख साफ़ पता चलता है। पहले की अपेक्षा अब तो बहुत बदलाव हो गया है। पर अभी भी कोटा शहर में भी ऐसे लोग मिल जाएंगे जो इस मंदिर के बारे में अनजान हैं। जो भी हो मंदिर तो है ही और पूजा भी होती ही है........!
                
#हिन्दी_ब्लागिंग

वर्षों बाद फिर एक बार पहले राजस्थान के कोटा शहर जाने का मौका मिला तो कैथून जाने का लोभ संवरण नहीं कर सका । सच कहूँ तो  कोटा जाने का मुख्य उद्देश्य ही  यही था।  शहर से  बीस-पच्चीस  कि.मी.  दूर यह वही  जगह है, जहां विश्वप्रसिद्ध कोटा-डोरिया की साड़ियां बनायी जाती हैं ! यहीं पर है, रावण भ्राता, विभीषण का दुनिया का  इकलौता मंदिर !  यहां  देवता  के रूप में उसकी पूजा की जाती है। यह मंदिर चौथी शताब्दी  का बना  हुआ है।   यहां हर साल मार्च के महीने में  मेले का आयोजन किया जाता है। आश्चर्य की बात है कि इस जगह बारे में स्थानीय लोगों को  भी पूरी जानकारी  नहीं है ! पर धीरे-धीरे, जैसे-जैसे  इसकी ख्याति  और  जानकारी  बढ़  रही  है,  वैसे-वैसे  यहां लोगों  के आने-जाने  में  भी बढ़ोत्तरी होने लगी है !  जिसका असर मंदिर की साज-सज्जा और रख-रखाव को देख साफ़ पता चलता है। पहले की अपेक्षा अब तो बहुत बदलाव हो गया है।  

यह सही है कि राम-रावण समर में विभीषण ने राम का साथ दिया था वैसे भी वह धार्मिक प्रवृति का था। पर था तो राक्षस कुल का ही, ऊपर से  भाई के विरुद्ध जाने के कारण उसे कुलघाती माना जा कर दुनिया भर की बदनामी भी मिलती रही है । फिर भी उसके मंदिर का होना एक आश्चर्य का विषय है। यहां मंदिर बनने की कथा कुछ इस प्रकार है कि जब लंका-विजय के पश्चात श्री राम का राज्याभिषेक होने लगा तो सारे ब्रह्माण्ड से अतिथियों का आगमन हुआ था। कैलाश से शिव जी और लंका से विभीषण भी पधारे थे। समारोह के पश्चात शिव जी ने हनुमान जी से भारत भ्रमण की
मंदिर का पार्श्व भाग 
इच्छा जाहिर की तो विभीषण ने आग्रह किया कि शिव जी और हनुमान जी को कांवड़ में बैठा कर यात्रा करवाने की उनकी कामना को पूरा करने का सुयोग प्रदान किया जाए।भगवान शिव मान तो गए पर उन्होंने एक शर्त रख दी कि यदि यात्रा के दौरान कहीं कांवड़ भूमि से छू गयी तो वहीँ यात्रा का अंत कर दिया जाएगा।  विभीषण ने बात मान ली और एक ऐसी कावंड बनवाई जिसके दोनों छोरों में आठ कोस की दूरी थी। उसी में एक तरफ शिव जी तथा दूसरी तरफ हनुमान जी बैठ गए। पर प्रभुएच्छा से कुछ समय बाद जब ये लोग कैथून, तब की कनकपुरी, पहुंचे तो शिव जी वाला हिस्सा जमीन से छू गया और शर्तानुसार यात्रा वहीँ ख़त्म हो गयी। जिस जगह शिव जी उतरे वह जगह थी चौमा गांव वहीँ उनका मंदिर भी बना। उसी
अंदरुनी भाग 
तरह कोटा के रंगबाड़ी स्थान पर हनुमान जी स्थित हो गए, दोनों जगहों की प्रतिमाएं आज भी अपनी अपूर्व छटा के साथ विद्यमान हैं। इसी तरह इनके बीचोबीच कैथून में, जहां विभीषण जी ठहरे थे, वहाँ उनके मंदिर की स्थापना हो गयी। जहां उनके धड़ के ऊपरी भाग की पूजा की जाती है।

मंदिर के अंदर की छत 
अपने यहां बचपन से ही कथा-कहानियों के सुनने-सुनाने का दौर शुरू हो जाता है और घरवालों की आस्था तथा मान्यताओं के अनुरूप ही हम अपने मन में उन कथाओं के चरित्रों की छवि गढ़ लेते हैं,  जो ता-उम्र वैसी ही बनी रह कर आगे भी उसी रूप में स्थानांतरित होती चली जाती है। ये अलग बात है कि कोई चरित्र किसी के लिए नायक का होता है तो वही किसी और के लिए खलनायक का। इसका कारण स्थान, वहां के लोगों की आस्था, वर्षों से चली आ रही मान्यताएं कुछ भी हो सकता है। पर अभी भी कोटा शहर में भी ऐसे लोग मिल जाएंगे जो इस मंदिर के बारे में अनजान हैं।  जो भी हो मंदिर तो है ही और पूजा भी होती ही है। कभी कोटा जाएं तो इस जगह को जरूर ध्यान में रख घूम कर आएं।     

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