परन्तु आज किले के प्रवेश द्वार से ही लगने लगता है कि इसका सिर्फ दोहन हो रहा है ! संरक्षित स्मारक होने के बावजूद किले के अंदर विशाल बुर्जों में दसियों होटल खुल गए हैं ! जगह-जगह दुकानें और पटरियों पर बिकता सामान, झरोखों पर टंगे कपड़े, जब-तब होती फिल्मों की शूटिंग, अंदर के रहवासियों की दौड़ती गाड़ियां, लोगों का हुजूम, बाजारवाद और आधुनिकता का दखल, जलवायु और मानवजनित क्षरण, कहीं-कहीं दरकती दीवारें कुछ अलग ही कथा बयान करती नजर आती हैं.........................😔
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किला जैसलमेर का ! सन 1156 में भाटी शासक रावल जैसल ने इस ऐतिहासिक किले की त्रिकूट पहाड़ी पर बहुत सोच-समझ कर और रणनीतिक दृष्टिकोण को सामने रखते हुए नींव रखी थी। उनके वंशजों ने यहाँ रहते हुए, भारत के गणतंत्र में परिवर्तन होने तक, बिना वंश क्रम को भंग किए हुए लगातार 770 वर्ष तक शासन किया, जो अपने आप में एक महत्वपूर्ण कीर्तिमान है ! भाटी वंश स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण के यादव वंश से जोड़ता है ! इस गौरवपूर्ण परंपरा का उल्लेख प्रचलित लोककथाओं में, शिलालेखों के साथ-साथ राजवंश के वृतांतों में भी स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है।
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| रावल जैसल |
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| सोने का किला |
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| जैसलमेर का किला |
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| अनमोल विरासत |
रा जस्थान की राजधानी जयपुर से करीब 575 किलोमीटर की दूरी पर, 99 विशाल बुर्जों और 30 फुट ऊंची दीवार से घिरे, थार मरुस्थल के केंद्र में स्थित इस किले का निर्माण पीले बलुआ पत्थरों से किया गया है, जो सूर्य की रौशनी में चमक कर सोने का अहसास कराते हैं ! इसीलिए इसे सोने का किला भी कहा जाता है ! देश के सुविख्यात फिल्म निर्माता सत्यजीत रे ने इसको केंद्र में रख 1974 में सोनार केल्ला (सोने का किला) नामक एक बंगला फिल्म भी बनाई थी !  |
प्रवेश द्वार
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| हवा कक्ष |
यह किला भारत का एक प्रमुख पर्यटन स्थल तो है ही, साथ ही यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भी इसका नाम शामिल है। जैसलमेर का यह स्वर्ण किला दुनिया के उन गिने-चुने किलों में से एक है, जिसमें हजारों लोग रहते हैं यानी यह एक जीवंत किला है ! यह बहुद सुखद अनुभूति है कि इसके रहवासी आज भी अपने त्योहारों, परम्पराओं और लोकगीतों को भूले नहीं हैं ! अच्छी बात है ! पर परंपराओं के साथ-साथ इस अनमोल धरोहर के संरक्षण, इसके रख-रखाव, इसकी सुरक्षा का भी ध्यान पूरी शिद्दत से रखा जाना चाहिए !
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| शयन कक्ष |
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| झरोखा |
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पत्थर पर बेहतरीन नक्काशी
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पि छले दिनों अपनी संस्था के सौजन्य से जोधपुर-जैसलमेर यात्रा का अवसर मिला। जोधपुर जितना साफ-सुथरा और व्यवस्थित दिखा उतना जैसलमेर नजर नहीं आया ! खासकर दोनों के दुर्गों में जमीन-आसमान का फर्क दिखा ! जैसलमेर के किले के प्रवेश द्वार से ही एहसास होने लगता है कि इसका सिर्फ दोहन हो रहा है ! संरक्षित स्मारक होने के बावजूद किले के अंदर विशाल बुर्जों में दसियों होटल खुल गए हैं ! जगह-जगह दुकानें और पटरियों पर बिकता सामान, झरोखों पर टंगे कपड़े, जब-तब होती फिल्मों की शूटिंग, अंदर के रहवासियों की दौड़ती गाड़ियां, लोगों का हुजूम, कहीं-कहीं दरकती दीवारें कुछ अलग ही कथा बयान करती नजर आती हैं ! दुःख सा महसूस होता है हालत देख कर !
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| आवाजाही |
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| व्यवसाय |
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| दुकानदारी |
ब ढ़ती आमदनी के कारण स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और जीवन शैली पर बाजारवाद और आधुनिकता का दखल साफ तौर से दिखने लगा है ! जिसका असर मानवजनित क्षरण के रूप में किले पर भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पड़ने लगा है और यही बात चिंता का विषय भी है कि यदि तुरंत इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो कहीं इसका अस्तित्व ही खतरे में ना पड़ जाए !
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| गली-गली में दुकान |
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| यात्री वाहन |
अ पनी इस अनमोल विरासत को सहेजे रखना हम सबके लिए जितना महत्वपूर्ण है, इसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है ! आज इसकी पहचान, इसकी खासियत, इसकी विश्व-प्रसिद्ध लोकप्रियता ही इसके अस्तित्व के लिए खतरा बन गई है ! वाहनों द्वारा उत्पन्न प्रदूषण ! अनगिनत लोगों को सुविधा प्रदान करने का दवाब ! रख-रखाव की कमी ! बढ़ती दुकानदारी ! समय की मार, इन सबको झेलने में इसका दम फूलता नजर आता है !
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| निजी वाहन, बदहाल राहें |
एक बात का बेहद अचरज होता है कि जब इसे विश्व धरोहर घोषित कर दिया गया है तो इसके अंदर बुर्जों में होटल खोलने की इजाजत क्यों और कैसे दी गई ! होटल हैं तो पर्यटक भी आएंगे, भीड़ बढ़ेगी, जाहिर है दवाब बढ़ेगा तो मानवजनित क्षरण भी बढ़ेगा ! क्या इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया या आमदनी के सामने इसको इसकी हालत पर छोड़ दिया गया ? इसके पड़ोस में ही जोधपुर के मेहरानगढ़ की हालत बहुत ही अच्छी है। जैसलमेर को उसका अनुकरण करना चाहिए, जबकि किसी भी तरह की कोई कमी भी नहीं है !@अंतिम तीन चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से
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