गुरुवार, 30 अक्तूबर 2008

न्याय, परम पिता का

परम पिता की नज़रों में तो सब बराबर हैं ! ना ऊँच-नीच, ना धर्म-अधर्म, ना जात-पात ! ना रंग-भेद ! फिर हमने क्यों कहीं दीवारें खड़ी कर दीं ! कहीं खाइयां खोद दीं ! कहाँ से ले आए हम इतना भेद-भाव, अहम्, द्वेष 

#हिन्दी_ब्लागिंग 
सावन-भादों की एक शाम। आकाश में घने बादल गहराते हुए रौशनी को विदा करने पर आमदा थे। दामिनी एक सिरे से दूसरे सिरे तक लपलपाती हुई माहौल को और भी डरावना बना रही थी। जैसे कभी भी कहीं भी गिर कर तहस-नहस मचा देगी। हवा तूफान का रूप ले चुकी थी।

ऐसे में उस सुनसान इलाके में, एक जर्जर अवस्था में पहुंच चुके खंडहर में, एक आदमी ने दौड़ते हुए आकर शरण ली। तभी दो सहमे हुए मुसाफिरों ने भी बचते बचाते वहां आ कर जरा चैन की सांस भरी। फिर एक व्यापारी अपने सामान को संभालता हुआ आ पहुंचा। धीरे-धीरे वहां सात-आठ लोग अपनी जान बचाने की खातिर इकट्ठा हो गये। बरसात शुरु हो गयी थी। लग रहा था जैसे प्रलय आ गयी हो। इतने में एक फटे हाल बच्चा अपने सूकर के साथ अंदर आ गया। उसके आते ही मौसम ने प्रचंड रूप धारण कर लिया। बादलों की कान फोड़ने वाली आवाज के साथ-साथ ऐसा लगने लगा जैसे बिजली जमीन को छू-छू कर जा रही हो। सबको लगने लगा कि अपने पालतू समेत उस बच्चे के आने से ही प्रकृति का कहर बढ़ा है। यदि यह इस जगह रहेगा तो ऊपर वाले के कोप से बिजली जरूर यहीं गिरेगी। इस पर सबने एक जुट हो, उस डरे, सहमे बच्चे को जबर्दस्ती धक्के दे कर बाहर निकाल दिया। डरते-रोते हुए बच्चे ने कुछ दूर एक घने पेड़ के नीचे शरण ली।

उसके वहां पहुंचते ही जैसे आसमान फट पड़ा हो, बादलों की गड़गड़ाहट से कान बहरे हो गये। बिजली इतनी जोर से कौंधी कि नजर आना बंद हो गया। एक पल बाद जब कुछ दिखाई पड़ने लगा, तब तक उस खंडहर का नामोनिशान मिट चुका था। प्रकृति भी धीरे-धीरे शांत होने लगी थी। बच्चा अपने पालतू के साथ अपने घर की ओर दौड़ा चला जा रहा था !

4 टिप्‍पणियां:

seema gupta ने कहा…

बिजली इतनी जोर से कौंधी कि नजर आना बंद हो गया। एक पल बाद जब कुछ दिखाई पड़ने लगा, तब तक उस खंडहर का नामोनिशान मिट चुका था। प्रकृति भी धीरे-धीरे शांत होने लगी थी।

" sach kha hai jako rakhe sayeyan maar ske na koee"

Regards

Unknown ने कहा…

mere new blog pe aapka sawagat hai......
http://numerologer.blogspot.com/

Udan Tashtari ने कहा…

बताईये, शायद उसी बच्चे की किस्मत से सब बच गये होते..मगर, सोच नहीं जाती!!!

राज भाटिय़ा ने कहा…

जिसे अछुत कह कर भगाया उसी के कारण तो बचे थे, बहुत ही सुन्दर शिक्षा दी आप ने , काश हम इस बातो से कुछ ग्रहण करे.
धन्यवाद

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