हमारे वे महानायक कितने महान योद्धा रहे होंगे, जिनका वर्णन ना चाहते हुए भी, उन पोषित कारकूनों को, जो आगे चल कर इतिहासकार कहलाए, मजबूरन करना पड़ा ! उन्हीं कुंठित लोगों ने, उन हजारों हजार वीरों, जिनके रहते आक्रांताओं की इधर आँख उठा कर देखने की मजाल नहीं रही या जिन्होंने भारत को विश्व में शिरोमणि बनाए रखा, उन साम्राज्यों और उनके महानायकों का जिक्र अपने पर्चों में कभी और कहीं भी नहीं किया ..............!
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कभी-कभी विचार आता है कि जो भी हमें पढ़ाया गया, उस इतिहास में उँगलियों पर गिने जा सकने वाले हमारे वे महानायक कितने महान योद्धा रहे होंगे, जिनका वर्णन ना चाहते हुए भी, उन पोषित कारकूनों को, जो आगे चल कर इतिहासकार कहलाए, मजबूरन करना पड़ा ! उन्हीं कुंठित लोगों ने, उन हजारों हजार वीरों, जिनके रहते आक्रांताओं की इधर आँख उठा कर देखने की मजाल नहीं रही या जिन्होंने भारत को विश्व में शिरोमणि बनाए रखा, उन साम्राज्यों, उनके महानायकों और वीरांगनाओं का जिक्र अपने पर्चों में कभी और कहीं भी नहीं किया !
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| अहोम राज |
भारत के ऐसे ही अनजाने उन महान अनेकानेक साम्राज्यों में से एक था अहोम साम्राज्य ! जो आज के असम की पूर्वी ब्रह्मपुत्र घाटी में स्थित था। यह पूर्वोत्तर भारत में एक दुर्जेय शक्ति थी ! इसने 1228 ईस्वी से शुरू होकर लगभग 600 वर्षों तक अपनी संप्रभुता लगातार बनाए रखी थी ! 13वीं शताब्दी के आरंभ में भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में दो महान साम्राज्य हुआ करते थे। एक अहोम तथा दूसरा कामरूप, जिसकी राजधानी प्राग्यज्योतिषपुर थी, जो आजकी गुवाहाटी है। अहोम लोग अब आसाम के अन्य निवासियों में घुल मिल गये हैं और उनकी संख्या बहुत कम रह गई है।
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| अहोम साम्राज्य |
राजा चाओलुंग सुकफा ने 13वीं शताब्दी में बर्मा के कुछ हिस्सों, ऊपरी असम तथा उसके निकटवर्ती क्षेत्रों और वहां की जनजातियों को अपने अधीन कर, पुरानी व्यवस्था को समाप्त करते हुए अहोम राजवंश की स्थापना की थी ! हालांकि अहोम साम्राज्य के लोग अपने आदिवासी देवताओं की पूजा-उपासना करते थे पर उन्होंने हिंदू धर्म को भी अपनाए रखा ! अहोम राजाओं की सफलता का राज यह था कि राजा ही सर्वोच्च सेनापति भी होता था, जो सदा सेना का आगे बढ़ कर नेतृत्व किया करता था ! अपनी दूरदर्शिता के चलते उन्होंने नागरिकों, सैनिकों तथा धनाढ्य श्रेष्ठि वर्ग के बीच आपसी समझ और एकता को सदा बनाए रखा ! जिससे कभी आपसी वैमनस्य नहीं उभरा !
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| वीर सेनानी |
अपनी बहादुरी के लिये विख्यात अहोम, शक्तिशाली मुगल साम्राज्य के आगे भी कभी नहीं झुके। उल्टे इन्होंने मुगलों को सत्रह बार बुरी तरह परास्त किया था ! मुगलों का यह हश्र देख किसी अन्य आक्रांता की हिम्मत नहीं हुई, इन पर आक्रमण करने की ! इसीलिए यह साम्राज्य 600 वर्षों तक लगातार वजूद में रहा !इस अवधि में 39 अहोम राजा गद्दी पर बैठे। यहाँ के राजाओं की उपाधि 'स्वर्ग देव' थी। अहोम राजाओं ने आसाम में बहुत अच्छा शासन प्रबंध किया। हालांकि उस सामन्तवादी प्रबंधन में अच्छाइयाँ और बुराइयाँ शामिल थीं ! शासन अपना पूरा लेखा-जोखा रखता था, जिसे बुरंजी कहा जाता था। यह राज्य यंदाबू की संधि पर वर्ष 1826 में ब्रिटिश भारत में शामिल कर लिया गया !
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| लाचित बोड़फुकन |
अपने इतने अहम और महत्वपूर्ण साम्राज्य के बारे में अपने ही देश के लोगों की जानकारी नगण्य सी है ! उसी को प्रकाश में लाने का उपक्रम मार्च, 2021 में किया गया, जब अहोम साम्राज्य के सेनापति लाचित बोड़फुकन को, जिनका जन्म 24 नवंबर, 1622 को हुआ था और जिन्होंने 1671 में हुए सराईघाट के युद्ध में अपनी सेना का प्रभावी नेतृत्व करते हुए मुगल सेना का असम पर कब्जा करने का प्रयास विफल कर दिया था, भारत की "आत्मनिर्भर सेना का प्रतीक'’ की उपाधी प्रदान की गई ! इसके अलावा उनके नाम का एक स्वर्ण पदक भी जारी किया गया जो राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के सर्वश्रेष्ठ कैडेट को प्रदान किया जाता है !
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| वीरांगना मुला गभारू |
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| स्मारक |
यह तो सिर्फ एक बानगी है ! ऐसी सैंकड़ों कथाएं-गाथाएं हैं, जिनको सामने लाने की आवश्यकता है ! अब समय है नई पीढ़ी को अपने गौरवमय इतिहास उसके उन नायकों, महानायकों, योद्धाओं के व्यक्तित्व की सच्चाई बताने का, जिन्होंने देश के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया था ! पर षड्यंत्रवश उनके कर्मों, उनके प्रयासों, उनके त्याग को कभी उजागर नहीं किया गया ! उन्हें सदा गुमनामी के अंधकार में छुपाए रखा गया !
@चित्र और संदर्भ अंतर्जाल के सौजन्य से
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