pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 17 अप्रैल 2025

क्षणिक बैराग्य

हमारे पहले भी वक्त यूँ ही चला करता था, हमारे बाद भी ऐसे ही चलता रहेगा, क्योंकि समय के पास तो अपने लिए भी समय नहीं होता ! हर सौ साल में मनुष्यों की पूरी दुनिया बदल जाने के बावजूद कायनात यूँ ही कायम रहती आई है ! वर्षों के बाद हमारी आगामी पीढ़ी हमारी ही फोटो देख पूछेगी, यह लोग कौन थे ? तब उन्हें हमारे संबंध में बतलाया जाएगा और ऊपर बैठे हम अपने आंसू छिपाए यह सोचेंगे, क्या इन्हीं के लिए हमने अपनी जिंदगी खपाई थी जो हमें पहचानते ही नहीं ! यह भी एक तरह का बैराग्य ही है, जो परिस्थियोंवश कुछ समय के लिए दिलो-दिमाग पर छा जाता है................! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

बै राग्य यानी राग रहित ! वह स्थिति जब किसी विषय-वस्तु से लगाव खत्म हो जाए ! इसके कई प्रकार बताए गए हैं ! जैसे कारण बैराग्य, विवेक बैराग्य, श्मशान बैराग्य, मर्कट बैराग्य इत्यादि ! अधिकतर लोग मर्कट बैराग्य के वशीभूत होते रहते हैं ! जो कुछ समय के लिए ही प्रभावी रहता है ! जैसे ही स्थिति, परिस्थिति, माहौल बदलता है, इसका असर खत्म हो जाता है !  


कुछ दिनों पहले एक समागम में सम्मलित होने का मौका मिला था। उत्तराखंड से कुछ प्रबुद्ध लोगों का आगमन हुआ था, सभी पढ़े-लिखे ज्ञानी जन थे। प्रवचन चल रहे थे ! बीच में नेताओं की, उनके कुकर्मों की बातें आ गईं ! फिर वही सब दोहराया जाने लगा कि सभी यह जानते हैं कि एक दिन सब को जाना ही है और वह भी खाली हाथ, फिर भी संचय की लालसा नहीं मिटा पाता कोई भी ! पाप करने से खुद को रोक नहीं पाता, यही दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य है !

प्र वचन जारी था, "सोचने की बात है कि दिन-रात मेहनत कर हम अपना कमाया हुआ धन शादी-ब्याहों में पानी की तरह बहाते हैं, पर किस को याद रहता है कि पिछली दो शादियों में जिनमें शिरकत की थी, उनमें कितना धन खर्च हुआ था या वहां क्या खाया था ? सब भूल चूका होता है ! अपनी जरुरत से कहीं ज्यादा जमीं-जायदाद खरीद कर हम किसे प्रभावित करना चाहते हैं ? कौन सा सकून पाना चाहते हैं ? जानवरों की तरह मेहनत-मश्शकत कर हम अपनी आने वाली कितनी पीढ़ियों को आर्थिक रूप से सुरक्षित करना चाहते हैं ? क्या हमें अपनी नस्लों की लियाकत के ऊपर भरोसा नहीं है कि वे भी अपने काम में सक्षम होंगे ?'' 
बैरागी 
वा र्तालाप चल रहा था, ''आजकल ज्यादातर घरों में दो या तीन बच्चे होते हैं, किसी-किसी के तो एक ही संतान होती है फिर भी लोग लगे रहते हैं अपनी सेहत को दांव पर लगा कमाने में ! कितना चाहिए एक इंसान को जीवन-यापन करने के लिए ? जिनके लिए हम कमाते हैं वह उनके काम आएगा कि नहीं यह भी पता नहीं ! फिर विडंबना देखिए कि जिनके भविष्य के लिए दिन-रात एक किए हुए होते हैं, वर्तमान में उन्हीं से दो बातें करने के लिए, उनके साथ कुछ समय गुजारने का हमारे पास वक्त नहीं होता ! सारा जीवन यूँ ही और-और सिर्फ और इकट्ठा करने में गुजर जाता है ! 

समागम 
व्या ख्यान में सीख ने स्थान ले लिया, ''धनी होना कोई बुरी बात नहीं है पर धन को अपने ऊपर हावी होने देना ठीक नहीं होता। समय चक्र कभी रुकता नहीं है। जो आज है, वह कल नहीं रहता, जो कल होगा वह भी आगे नहीं रहेगा। एक न एक दिन हम सबको जाना है, एक दूसरे से बिछुड़ना है। हमारे पहले भी वक्त यूँ ही चला करता था, हमारे बाद भी ऐसे ही चलता रहेगा, क्योंकि समय के पास तो अपने लिए भी समय नहीं होता ! हर सौ साल में मनुष्यों की पूरी दुनिया बदल जाने के बावजूद कायनात यूँ ही कायम रहेगी।

वर्षों के बाद हमारी आगामी पीढ़ी हमारी ही फोटो देख पूछेगी, यह लोग कौन थे ? तब उन्हें हमारे संबंध में बतलाया जाएगा और ऊपर बैठे हम अपने आंसू छिपाए यह सोचेंगे, क्या इन्हीं के लिए हमने अपनी जिंदगी खपाई जो हमें पहचानते ही नहीं ! पर हमें यह ख्याल शायद ही आए कि हम अपने पूर्वजों को और उनकी पहचान को कितना याद रख पाए थे !

प्र वचन चल रहा था, लोग दत्तचित्त हो सुन रहे थे। सभी सहमत थे उपरोक्त बातों से ! सभी पर जैसे विरक्ति हावी होती जा रही थी ! यह मर्कट बैराग्य था ! पर इसकी मौजूदगी तभी तक रहनी थी जब तक श्रवण क्रिया चल रही थी ! जैसे कोई सम्मोहन से चुटकी बजते ही होश में आ जाता है वैसे ही इस माहौल से बाहर आते ही सभी ने फिर दो और दो को पांच करने के चक्कर में फंस जाना था ! 

यही तो माया है ! प्रभू की लीला है ! यदि इंसान भूलता नहीं, हर बात को दिल से लगाए रखता या बात-बात पर विरक्त हो जाता, तब तो यह संसार कभी का खत्म हो गया होता ! फिर भी ऐसे समागम हमें कभी-कभी आईना तो दिखा ही जाते हैं। कभी-ना कभी कुछ गंभीरता से सोचने को मजबूर तो कर ही देते हैं !   

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से   

सोमवार, 7 अप्रैल 2025

टेढ़ी उंगली और घी

यहां इस संयोग की भी प्रबल संभावना है कि इस बात की ईजाद करने वाले महानुभाव ठंडे प्रदेश में रहते होंगे, जहां घी सदा ठोस रूप में रहता होगा और उसे उंगली टेढ़ी कर ही बर्तन वगैरह से निकाल सकना संभव हो पाता होगा ! पर इसी के साथ यह सवाल भी तो उठता है कि यदि मौसम गर्म हो और उस कारण घी अपनी तरलावस्था में रहता हो, तब तो वह ना सीधी उंगली से निकलेगा ना हीं टेढ़ी से.........फिर ? 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

सीधी उंगली से घी नहीं  निकलता ! पता नहीं किसने इस सत्य की खोज की, क्योंकि उसके इस उपक्रम पर कई सवाल उठ खड़े होते हैं ! जैसे वह उंगली से ही घी क्यों निकालना चाहता था ? यदि वह घर में ऐसा कर रहा था तो उसने चम्मच या वैसे ही किसी उपकरण का उपयोग क्यों नहीं किया ? यदि बाहर कहीं उसे ऐसा करने की जरुरत पड़ ही गई तो क्या घी निकालने के पहले उसने हाथ वगैरह साफ किए थे या नहीं ? क्या उंगली के नाखून गंदगी-रहित थे ? ऐसा ना होने पर बाकी के घी के खराब होने का भी खतरा था ! प्रश्न यह भी उठता है कि वह उंगली से घी निकाल कर उसका क्या उपयोग करना चाहता था, क्योंकि जब उसके पास चम्मच ही नहीं था तो कटोरी वगैरह भी कहां होगी ! ऐसे में घी गिर कर बर्बाद भी हो सकता था ! 

 सिधाई का साथ नहीं 

यहां इस संयोग की भी प्रबल संभावना है कि इस बात की ईजाद करने वाले महानुभाव ठंडे प्रदेश में रहते होंगे, जहां घी सदा ठोस रूप में रहता होगा और उसे उंगली टेढ़ी कर ही बर्तन वगैरह से निकाल सकना संभव हो पाता होगा ! पर इसी के साथ यह सवाल भी तो उठता है कि यदि मौसम गर्म हो और उस कारण घी अपनी तरलावस्था में रहता हो, तब तो वह ना सीधी उंगली से निकलेगा ना हीं टेढ़ी से.........फिर ? 

टेढ़ा तो होना ही पड़ता है 

मेरे अपने व्यक्तिगत शोध तो यही बताते हैं कि शठे शाठ्यम समाचरेत ! अगला नहीं मान रहा, तो उसे ही कुछ ऐसा ''ताप'' दे दिया जाए कि त्राहिमाम-त्राहिमाम करते, पिघल कर खुद ही बाहर आ जाए ! अपनी उंगली टेढ़ी क्यों करनी ! यदि नहीं तो फिर उंगली से कहीं बेहतर है, चम्मच जैसा कोई उपकरण ! इससे घी-तेल सब कुछ आसानी, बेहतर और साफ-सुथरे तरीके से निकाला जा सकता है, बिना उन्हें अशुद्ध, दूषित या अन्य किसी आशंका के ! हालांकि टेढ़ा इसे भी करना पड़ता है ! यह तो नियति है !

वैसे इस घी वाली बात का अभिप्राय भले ही कुछ भी हो पर शाब्दिक अर्थ तो पूरी तरह भ्रामक है ! घी एक बहुत ही पवित्र और बहु-उपयोगी पदार्थ है, उसे पूजा-पाठ तथा अन्य धार्मिक कार्यों के अलावा कभी-कभी दवा के रूप में भी काम में लाया जाता है, ऐसी वस्तु को उंगली से निकालना उसे दुषित करना है, इस बात का उन महानुभाव को ध्यान रखना चाहिए था ! वैसे उनका तेल वगैरह के बारे में क्या विचार था, इसका पता नहीं चल पाया है ! यदि किसी मित्र, सखा, साथी को इस बारे में कुछ भी ज्ञात हो, तो साझा जरूर करें ! धन्यवाद !

@यह एक निर्मल हास्य है, अन्यथा ना लें  

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से                

गुरुवार, 3 अप्रैल 2025

मच्छरदानी, इंसान की एक छुद्र कीट से मात खाने की निशानी

एक तरफ दुनिया भर में जंगली, खतरनाक, दुर्लभ, मासूम, हर तरह के जानवरों को पिंजरों में बंद कर विश्व के सबसे खतरनाक जानवर इंसान के दीदार के लिए रखा जाता है ! दूसरी तरफ वही इंसान एक अदने से कीड़े से बचने के लिए खुद को मसहरी नुमा पिंजरे में बंद कर अपनी जान की हिफाजत करने पर मजबूर हो जाता है ! वह भले ही ग्रहों के पार जाने की जुगत भिड़ा चुका हो, पर मच्छर भाऊ ने उसके ग्रहों की दशा अभी भी दिशाहीन ही कर के रखी हुई है.................!  

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कुछ सालों पहले तक बंगाल के भद्र-लोक के व्यक्तित्व का, रहन-सहन का जिक्र होते ही धोती-कुर्ता, छाता, सिगरेट, चाय, घर का अपना पोखर जैसी चीजों का उल्लेख भी प्रमुख रूप से हो ही जाता था ! परंतु ऐसी चर्चा करने वाले पता नहीं क्यों उस एक चीज को भुला देते थे जो वहां के तकरीबन हर घर में पाई जाती थी, जिसका नाम है मसहरी ! हो सकता है कि एक छुद्र कोटि के निम्न कीट से अपनी हार की निशानी को ज्यादा मशहूरी दे कर हम अपनी बची-खुची नाक की और बेइज्जती नहीं होने देना चाहते हों ! इसलिए उसका जिक्र ना करते हों !

मसहरी 

म सहरी, मच्छरदानी, मशारी, मॉस्किटो नेट ! एक अति छुद्र-कीट, मच्छर से बचने का एकमात्र फुलप्रूफ साधन ! मच्छर, विश्व भर में तकरीबन हर साल करीब 20-25 करोड़ लोगों को अपने खूनी पंजे में फंसा, उनमें से अधिकतर को जहन्नुम रसीद कर देता है ! और अब तो यह बात जग-जाहिर सी हो चुकी है कि इंसान माने या ना माने उससे एक तरह से हार स्वीकार कर चुका है ! इंसानी ईजाद की कोई भी चीज धुंआ, स्प्रे, केमिकल कुछ भी उस अस्थि विहीन, तकरीबन भार हीन कीट से पार नहीं पा सकी है ! उलटे यह अभी भी जमीनी आत्माओं का मिलन परमात्मा से बेहिचक करवाए जा रहा है ! इसने इतने लोगों को ऊपर पहुंचा दिया है, जितने मनुष्य के आपसी युद्ध भी नहीं कर पाए हैं ! इस खतरनाक बला के खौफ का आलम तो यह है कि इससे मुक्ति की परिकल्पना को साकार करने के लिए हमें वैश्विक स्तर पर हर साल 25 अप्रैल को विश्व मलेरिया दिवस मनाना पड़ता है !

 खतरनाक कीट 
ऐसे में यह मसहरी ही है जो हमें इस दुर्दांत शत्रु से किसी हद तक बचाती आ रही है ! मनुष्य जाति को तो इसके आविष्कारक के नाम कोई नोबल पुरुस्कार जैसा कुछ घोषित कर देना चाहिए ! वैसे इसका इतिहास सैकड़ों साल पुराना है ! कहते हैं कि क्लियोपेट्रा के शयन कक्ष में भी इसका उपयोग होता था ! भारत तथा ग्रीस के पुराने दस्तावेजों में भी इसका उल्लेख मिलता है ! समय के साथ-साथ इसके रूप-रंग-आकार-प्रकार में भी तरह-तरह के बदलाव आए हैं ! फैशन के अनुसार इसने भी अपने को ढाल लिया है !

डिजायनर 
एक तरफ दुनिया भर में जंगली, खतरनाक, दुर्लभ, मासूम, हर तरह के जानवरों को पिंजरों में बंद कर विश्व के सबसे खतरनाक जानवर इंसान के दीदार के लिए रखा जाता है ! दूसरी तरफ वही इंसान एक अदने से कीड़े से बचने के लिए खुद को मसहरी नुमा पिंजरे में बंद कर अपनी जान की हिफाजत करने पर मजबूर हो जाता है ! कहते हैं ना कि भगवान सभी को ठिकाने से लगाए रखता है !

बिना भेदभाव सुरक्षा 
जो भी हो मसहरी का तो हमें सदा अहसानमंद रहना होगा ! जो बिना भेदभाव अमीर-गरीब, आबालवृद्ध, स्त्री-पुरुष सभी को बीमार पड़ने से बचाती है ! एक बार घर आ जाए तो वर्षों साथ निभाती है। सोने के पहले इसको लगाने की जरा सी जहमत जरूर होती है पर उसके बाद इसके अंदर परिवार ऐसे निश्चिंत हो सोता है, जैसे किसी किले में सुरक्षा प्राप्त हो

बेफिक्री की नींद 
सो चता हूँ, इंसान को मसहरी में सुरक्षित सोता देख मच्छर क्या सोचता होगा ? जाल की दीवारों पर सर पटक-पटक कर भिनभिनाता होगा, अरे मेरे पेट पर लात मार चैन से सो रहा है ! अच्छा बेटा अभी तो सो ले ! सुबह तो बाहर आएगा ! बहुत शौक है ना शाम को टहल कर सेहत बनाने का, तब देखूंगा तुझे ! देखता हूँ उस बराबर की जंग में कौन जीतता है !

कुछ भी हो इंसान भले ही ग्रहों के पार जाने की जुगत भिड़ा चुका हो, पर मच्छर भाऊ ने उसके ग्रहों की दशा अभी भी दिशाहीन ही कर के रखी हुई है !  

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से  

@मशक में कौन सा खतरनाक होता है, सभी जानते हैं 😀 

रविवार, 30 मार्च 2025

शिव, मेरा मैन फ्राइडे

बालकगणों के लिए मील के फैक्ट्री एरिया के अलावा हर जगह, हर क्षेत्र, निर्बाध था ! उसी के चलते एक घर में काम करते शिव को देखना हुआ। सांवले रंग का, गोल-मटोल, भोला-भाला, नाटा सा बालक ! कोई ऐब नहीं, कोई लत नहीं। उससे कभी बातचीत नहीं होती थी, पर जब भी मुझे दिखता, उसके चेहरे पर एक बाल सुलभ मुस्कान खिंच जाती ! अच्छा लगता था वह मुझे.................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

मैं छोटा था और वह मुझसे भी छोटा था ! पता नहीं कहां से आया था, कौन लाया था ! यादाश्त में उसका घरों में काम करते सहायक का रूप ही दर्ज है। शिव उसका नाम  था, ना आगे कुछ ना ही पीछे ! कभी पूछा भी नहीं ! भले ही नाम के आगे-पीछे कुछ न हो पर मेरे साथ शायद उसके किसी पिछले जन्म का कोई संबंध जरूर था !

शिव, पचास साल पहले 

बात साठ के उत्तरार्द्ध की है। बंगाल के नार्थ परगना जिले के भाटपारा इलाके में स्थित रिलायंस जूट मील में  बचपन का वह बेफिक्र, सुखद, अवर्चनीय समय था ! स्कूल से कॉलेज और फिर कार्यक्षेत्र तक का सफर वहीं रहते पूरा हुआ ! उस जगह से मेरे परिवार का पच्चीस साल से भी ज्यादा का नाता रहा !

लॉन 

मील के स्टाफ परिसर में देश के तकरीबन हर प्रांत के लोगों के होने के बावजूद वहां एक परिवार का माहौल था ! तीज-त्यौहार, सुख-दुःख सबके साझा होते थे ! बच्चों को खेल-कूद या किसी भी घर में आने-जाने की पूरी छूट तो थी पर लाड-प्यार-डांट-डपट का हक भी सभी बड़ों को था ! उन दिनों वहां के सर्वेसर्वा डागा जी थे ! जो सिर्फ मील के ही नहीं, उसके स्टाफ के परिवारों के भी संरक्षक थे ! हर कोई उन्हें परिवार के मुखिया के रूप में आदर सहित देखता था ! 

परिसर 

बात हो रही थी शिव की ! जैसा कि मैंने बताया बालकगणों के लिए वहां की हर जगह, हर क्षेत्र, निर्बाध था ! उसी के चलते एक घर में काम करते शिव को देखना हुआ। सांवले रंग का, गोल-मटोल, भोला-भाला, नाटा सा बालक ! कोई ऐब नहीं, कोई लत नहीं। उससे कभी बातचीत नहीं होती थी पर जब भी मुझे दिखता उसके चेहरे पर एक बाल सुलभ मुस्कान खिंच जाती ! अच्छा लगता था वह मुझे। 

कैसे भुलाएं इस जगह को 

स मय ने अपनी यात्रा के दौरान मुझे रिलायंस से करीब बीस किमी दूर सोदपुर में स्थित कमरहट्टी जूट मील पहुंचा दिया ! काम मैं वहां जरूर करता था, पर सप्ताहंत या मौका मिलते या बना कर ''घर'' पहुँच जाया करता था। ऐसे ही साल भर बीत गया ! एक दिन रिलायंस आया हुआ था कि अचानक शिव मेरे पास आया और मेरे साथ चलने की इच्छा जाहिर की ! उन दिनों मेरे खाने-पीने का इंतजाम मील के मेस में ही था ! उसके रहने-खाने के इंतजाम के बारे में सोच-विचार कर, कुछ समय पश्चात मेस में उसे सहायक के रूप में रखवा उसके रहने खाने का प्रबंध करवा कर मैंने उसकी इच्छा पूरी कर दी।    

वृक्षों के पीछे हुगली यानी गंगा नदी 

यहां से शुरू होती है शिव के मेरे मैन फ्राइडे बनने की यात्रा ! पता नहीं उस किशोर को मेरे से क्या लगाव था, काम तो उसको रिलांयस में भी मिल सकता था ! खैर ! यहां वह मेरी छोटी से छोटी जरुरत का ध्यान और ख्याल रखने लगा ! कभी-कभी मेरे साथ रिलायंस भी चला जाता था। हालांकि मेस का खाना साफ-सुथरे परिवेश में सफाई पसंद महाराज द्वारा बहुत अच्छी क्वालिटी का बना होता था, पर माँ को उस बारे में सदा चिंता लगी रहती थी ! ऐसे ही एक दिन इस समस्या के निदान हेतु शिव ने माँ को कह दिया आप दोपहर का खाना तैयार रखा करें,  मैं भैया के लिए ले जाया करूँगा !

मुझे इस सांठ-गाँठ के बारे में कुछ पता नहीं था। एक दिन ग्यारह बजे काम से लौटने पर देखता हूँ कि मेरे कमरे में टेबल पर एक टिफिन रखा हुआ है ! पूछताछ पर शिव ने बताया मैं घर से लाया हूँ ! घर से.......! मैं भौचक्क ! यहां यह बताना जरुरी है कि सिमित समय में दोनों जगहों पर आना-जाना आसान नहीं था ! सीधा सड़क मार्ग नहीं था, बस बदलनी पड़ती थी ! वैसे भी सड़क मार्ग से बहुत समय लगता था ! इसलिए यात्रा कई चरणों में पूरी करनी पड़ती थी ! पहले आधा की.मी. तय कर मेन रोड़ पर आना पड़ता था, वहां से बस ले कर सोदपुर स्टेशन, फिर वहां से लोकल ट्रेन से सातंवा स्टेशन कांकिनाड़ा ! उसके बाद फिर वहां से तकरीबन पौन की.मी. पर स्थित मील के अंदर घरों तक ! फिर वैसी ही वापसी ! पागलपन जैसा काम था !

मुझे याद है, उस दिन वैसा करने पर मैं शिव पर बहुत झल्लाया था, गुस्सा हुआ था ! पर वह सर झुकाए सब सुनता रहा..........फिर माँ की ममता सब पर भारी रही ! समय अपनी गति से चलता रहा ! पांच साल निकल गए ! इसी बीच प्रभु ने भी मुझे गृहस्त बनाने की योजना बना डाली ! दिल्ली से संबंध जुड़ा ! यहां भी शिव साये की तरह मेरे साथ रहा ! एक राज की बात बताऊँ, शिव के दिल्ली प्रवास ने वधु-पक्ष पर काफी रुआब डाला था 😀  

हा लांकि शिव ने मुझसे कभी कुछ नहीं मांगा, पर उसके भविष्य को और आने वाली जिम्मेदारियों को ध्यान में रख मैंने उसे मील में स्थाई काम पर रखवा दिया ! मेहनती तो बहुत था, वहां भी कभी किसी को शिकायत का मौका नहीं दिया। 

मय का फेर ! बिमारी और स्वास्थय के चलते मुझे काम छोड़ना पड़ा ! इसी चक्कर में दिल्ली प्रवास और व्यस्तता के चलते सब पीछे छूट गया ! शिव की खोज-खबर लेने की कोशिशें नाकाम रहीं ! पर मुझे विश्वास है कि अपनी मेहनत के बूते वह जहां भी होगा खुश होगा ! प्रभु उसे स्वस्थ-प्रसन्न रखें ! 

शुक्रवार, 21 मार्च 2025

रॉबिन्सन क्रूसो का मैन फ्राइडे, क्या से क्या हो गया

अपने सृजन के समय जो चरित्र एक भरोसेमंद, भलामानस व मददगार के रूप में गढ़ा गया था ! वह आज तक आते-आते पूर्णतया रीढ़-विहीन, मतलब-परस्त, कुटिल, धूर्त और सिर्फ अपने भले की सोच रखने वाला हो गया है ! वैसे तो ये समाज के हर तबके में उपलब्ध है, पर इनकी हाई-ब्रीड राजनितिक नर्सरियों में बड़ी कुशलता और देख-रेख के बीच पनपती है ! जिन्हें बड़ी आसानी से देखा, पहचाना तो जा सकता है पर वह आम इंसान की जिंदगी के लिए खरपतवार ही सिद्ध होती है.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग

 भी-कभी साहित्य का कोई शब्द, वाक्य, मुहावरा या चरित्र वर्षों बाद पुस्तक के पन्नों से निकल साक्षात देह धारण कर लेता है ! ऐसे कई उदाहरणों में से एक है, वर्षों पहले लिखे गए एक उपन्यास 'रॉबिन्सन क्रूसो' का एक काल्पनिक पात्र ''मैन फ्राइडे'' ! हम में से अधिकांश ने वह रोचक उपन्यास जरूर पढ़ा होगा। 

अपने मैनफ्राइडे के साथ क्रूसो  
ज से तकरीबन आठ सौ साल पहले एक अंग्रेज लेखक डैनियल डेफो या डैनियल फ़ो​ ने एक उपन्यास की रचना की थी, जिसका नाम था रॉबिन्सन क्रूसो। यह इतना लोकप्रिय हुआ कि 1719 में ही इसके चार संस्करणों ने छप कर इतिहास रच दिया। केवल पुस्तक रूप में ही नहीं बल्कि फिल्म, टेलीविजन और रेडियो तक में भी इसका रूपांतरण हुआ ! आज भी उसकी कहानी उतनी ही लोकप्रिय है। 

सका नायक क्रूसो अपने माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध इंग्लैंड से समुद्री यात्राओं पर निकल पड़ता है। अपनी कई रोमांचक, खतरनाक समुद्री यात्राओं में से एक कठिन उथल-पुथल भरी यात्रा में उसका जहाज तूफान में नष्ट हो जाता है और वह एक टापू में शरण लेता है ! वही उसकी भेंट एक स्थानीय व्यक्ति से होती है, पर दोनों एक दूसरे की भाषा नहीं समझते ! पर इसके बावजूद वह स्थानीय जंगली व्यक्ति क्रूसो का वफादार सेवक व सखा बन उसकी हर संभव मदद करता है, उसे हर खतरे से यहां तक कि खुद को जोखिम में डाल नरभक्षियों से भी बचाता है ! चूंकि जिस दिन इनकी भेंट होती है वह दिन शुक्रवार का था, इसलिए क्रूसो ने संवाद हीनता की वजह से उसे, मेरा आदमी शुक्रवार यानी मैन फ्राइडे का नाम दे दिया !

आज का शुक्रु 
पने सृजन के समय जो चरित्र एक भरोसेमंद, भलामानस व मददगार के रूप में गढ़ा गया था ! परंतु समय के साथ अब वह एक अपमान सूचक शब्द सा बन गया है ! तक आते-आते उसका अर्थ  पूर्णतया रीढ़-विहीन,  मतलब-परस्त, कुटिल, धूर्त और सिर्फ अपने भले की सोच रखने वाला हो गया है ! वैसे तो ये समाज के हर तबके में  उपलब्ध है, पर इनकी हाई-ब्रीड, राजनितिक नर्सरियों में बड़ी कुशलता और देख-रेख के बीच पनपती है ! जिन्हें बड़ी आसानी से देखा, पहचाना तो जा सकता है पर वह आम इंसान की जिंदगी के लिए खरपतवार ही सिद्ध होती है.......! 

@आभार अंतर्जाल 

मंगलवार, 18 मार्च 2025

लड्डू गोपाल जी के संरक्षण में चल रही एक मिठाई की दुकान

दुकान में ग्राहक आते हैं, अपनी पसंद की मिठाई लेते हैं, डिब्बे पर लिखी सारी जानकारी पढ़ते हैं और पास पड़े डिब्बे में उसकी कीमत डाल देते हैं। ग्राहकों की सहूलियत के लिए पास ही अलग-अलग मूल्यवर्ग के नोट भी रखे रहते हैं जिससे मिठाई की उचित कीमत अदा की जा सके। क्यू आर कोड से भी भुगतान की सुविधा है ! इसके अलावा जिनके पास पैसे नहीं हैं, वे भी मिठाई ले जा सकते हैं, इस विश्वास के साथ कि जब भी संभव होगा, वे उधार चुकता कर देंगे...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

के दौर में, जहां भाई-भाई का विश्वास नहीं करता ! धन-दौलत के लालच पिता-पुत्र में ठन जाती हो ! छोटी-छोटी बातों पर संदेह किया जाता हो ! आस्था-विश्वास-भाईचारा-इंसानियत किसी बीते युग की बातें लगती हों ! वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनकी ईश्वर पर अटूट आस्था है। जिनका विश्वास है कि भले ही दिखते ना हों पर भगवान सदा हमारे साथ रहते हैं !  
 
लड्डू गोपाल जी 
बलपुर के नेपियर टाउन में रहने वाले ऐसे ही एक प्रभु भक्त हैं, विजय पांडे जी। उनका मिठाई का कारोबार है। उनकी बचपन से ही श्री कृष्ण जी के बालरूप लड्डू गोपाल में गहरी आस्था व श्रद्धा है। चौबीस घंटे खुली रहने वाली उनकी दुकान 2014 से मंदिरों और पूजास्थलों के साथ-साथ श्रद्धालुओं की मांग पूरी करती आ रही है। पर उस दूकान में ना हीं कोई मालिक है, ना हीं कोई विक्रेता है, ना हीं कोई कैशियर है, ना हीं कोई सुरक्षा कर्मी ! यह दुकान पूरी तरह से विश्वास और ईमानदारी पर टिकी हुई है और पूरी तरह से भगवान के भरोसे चल रही है। यहां आने वाला हर ग्राहक अपनी जरूरत के अनुसार मिठाई उठाता है और पूरी ईमानदारी से पैसे रखकर चला जाता है। 

विजय पांडे जी 
ऐसा ख्याल कैसे आया, इस बारे में विजय जी बताते हैं कि एक दिन उनकी दुकान पर एक व्यक्ति आया, जो अपनी बेटी के जन्म-दिन पर मिठाई लेना चाहता था पर उसके पास पैसे नहीं थे, पर संकोचवश वह बोल नहीं पा रहा था ! विजय जी ने उसकी मजबूरी समझी और बिना झिझक उसे मिठाई दे दी और कहा कि जब संभव हो, वह पैसे दे जाए ! इसी घटना के बाद उन्होंने सोचा कि मजबूरी के संकोच के कारण कोई भी इंसान से कुछ माँगने पर झिझकेगा परंतु ईश्वर से नहीं ! आज यदि यहां मेरी जगह दुकान पर खुद लड्डू गोपाल बैठे होते, तो यह आदमी इतना संकोच नहीं करता ! बस, उसी समय से उन्होंने पूरी दुकान प्रभु को सौंप दी, उन्हें ही मालिक बना दिया ! इसीलिए इस दुकान में प्रवेश करते ही सर्वप्रथम लड्डू गोपाल जी के दर्शन होते हैं। 
लड्डू गोपाल जी का कैश काउंटर 
ने पियर टाउन के शास्त्री ब्रिज के पास स्थित इस दुकान में ग्राहक आते हैं, अपनी पसंद की मिठाई लेते हैं, डिब्बे पर लिखी सारी जानकारी पढ़ते हैं और पास पड़े डिब्बे में उसकी कीमत डाल देते हैं। ग्राहकों की सहूलियत के लिए पास ही अलग-अलग मूल्यवर्ग के नोट भी रखे रहते हैं जिससे मिठाई की उचित कीमत अदा की जा सके। क्यू आर कोड से भी भुगतान की सुविधा है ! इसके अलावा जिनके पास पैसे नहीं हैं, वे भी मिठाई ले जा सकते हैं, इस विश्वास के साथ कि जब भी संभव होगा, वे उधार चुकता कर देंगे ! देश में अपनी तरह का शायद यह पहला प्रयोग है !
प्रवेश द्वार 
विजय जी का कहना है, यहां जो भी ग्राहक आता है, तो उसे पता होता है कि वह किसी इंसान से नहीं, बल्कि भगवान से लेन-देन कर रहा है, ऐसे में बेईमानी की गुंजाइश ही नहीं बचती ! यह पूछने पर कि भविष्य कैसा होगा, उन्होंने कहा मुझे पूरा भरोसा है कि लोग लड्डू गोपाल से धोखा नहीं करेंगे, सब कुछ ठीक चलेगा ! इसका प्रमाण है वह वजन की मशीन जिसे ग्राहकों की वजन को लेकर किसी शंका के समाधान के लिए रखा गया है पर आज तक किसी ने भी उसका उपयोग नहीं किया है !
इस प्रयोग की सफलता के बाद आम लोगों के मन में यह सवाल भी उठता है कि क्या इसी तरह की ईमानदारी आधारित दुकानों की संख्या बढ़ सकती है ? क्या दूसरे व्यवसाय भी इस मॉडल को अपनाएंगे ? फिलहाल, विजय पांडे जी ने समाज को एक नई सोच और दिशा दी है, जहां मुनाफे से ज्यादा आस्था, विश्वास, सौहार्द का वातावरण दिखाई देता है ! प्रभु उनके भरोसे को डगमगाने ना दें ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2025

महाकुंभ की सफलता का श्रेय इन्हें भी जाता है

 इस महाकुंभ की अपार सफलता के पीछे उन विपक्षी नेताओं का भी बहुत बड़ा सहयोग है, जिन्होंने अपने राजनीतिक करियर को दांव पर लगा, अपने भविष्य को अंधकार में धकेल, लोगों की भावनाओं, उनकी आस्थाओं को दरकिनार कर लगातार विष-वमन करते हुए इस आयोजन की बुराई की ! किसी भी तरह इस आयोजन को रोकने-बदनाम करने के लगातार षड्यंत्र रचे ! वे खुद बर्बाद होने, उपेक्षित होने, बदनाम होने के बावजूद अपने मिशन पर लगे रहे ! उनके इसी उद्यम के कारण पूरा सरकारी तंत्र सदा सचेत, मुस्तैद तथा सतर्क रहा ! जनता को ऐसे लोगों की कद्र करते हुए, उन्हें सदा-सदा के लिए विपक्ष में बैठाए रखना चाहिए जिससे वे भविष्य में भी ऐसे ही सरकार की सतर्कता बनाए रख सकें..................!  
#हिन्दी_ब्लागिंग 
पैंतालीस दिन यानी डेढ़ महीने तक चले महाकुंभ का, हिमालय जैसा अभूतपूर्व कीर्तिमान बना कर, समापन हो गया ! पर जाते-जाते उसने दुनिया को सनातन की विशालता, उसकी गहराई, उसकी आस्था, उसकी व्यापकता का ऐसा परिचय करवा दिया, जिसको सारा विश्व वर्षों-वर्ष याद रखेगा ! इतने बड़े आयोजन का सफलता पूर्वक निर्वहण ही अपने-आप में ही एक कीर्तिमान है ! एक मील का पत्थर है ! एक ऐसा उच्चमान जिसे सालों-साल याद रखा जाएगा ! भविष्य में कहीं भी होने वाले हर बड़े समागम का ऐसा प्रतिस्पर्धी, जिसके प्रत्यक्ष उपस्थित ना होते हुए भी उसकी तुलना उस समय के आयोजन की सफलता से की जाएगी ! एक ऐसी उपलब्धि जिसका उल्लेख आज संसार के हर देश में हो रहा है ! दुनिया अचंभित है ! विकसित देश अपने लोगों को भेज रहे हैं, ऐसे भीड़ प्रबंधन (Crowd Management) को समझने, उसकी कार्यशैली, उसकी विधि को जानने के लिए ! 
सफलता के सिपहसालार 
कोई भी विशाल-विराट अभियान तभी सफल होता है जब उससे जुड़े सभी लोग अपनी पूरी क्षमता से, पूरी तन्मयता से, पूरे समर्पण से अपने आप को उसमें झोंक दें ! योगी जी के नेतृत्व में यहां यही हुआ ! इसमें कोई शक नहीं कि यदि योगी जी ने इस असंभव से काम को ना संभाला होता तो इसकी सफलता अनिश्चित ही थी ! इसके लिए उनकी प्रशंसा करना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा ही होगा ! वे ही इस अकल्पनीय, अद्भुत, अभूतपूर्व, अद्वितीय सफलता के कारक रहे ! उनको तथा उन के लिए पूरे सरकारी तंत्र को अनेकानेक साधुवाद। वहां कार्यरत एक-एक कर्मी का, चाहे वह सफाई से जुड़ा हो, चाहे सुरक्षा से, चाहे व्यवस्था से, पूरा देश दिल से आभारी है और रहेगा ! 
सफल आयोजन के हकदार 
भार तो प्रयागराज के प्रत्येक निवासी का भी है, जिन्होंने अपनी चिंता ना कर, अपनी असुविधाओं को दरकिनार कर, अपनी परेशानियों की शिकायत ना कर करोड़ों-करोड़ लोगों का अपने परिवार सदृश समझ उनका स्वागत किया ! यदि इस पूरे आयोजन के दौरान वहां के हर मेहमान को खाना-पानी-चाय-नाश्ते-यातायात या अन्य किसी मूलभूत सुविधा की कमी महसूस नहीं हुई तो इसका श्रेय वहां के स्थानीय लोगों को जाता है ! इस भागीरथ प्रयास की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है। इससे जुड़े सभी व्यक्ति सम्मान पाने के हकदार हैं !
 गंगा पूजन 
परंतु इसके अलावा वहां जाने वाले पैंसठ करोड़ से भी ज्यादा श्रद्धालुओं को भी कोटि-कोटि धन्यवाद, क्योंकि उनके गिलहरी सहयोग के बिना कुंभ की सफलता शायद संदिग्ध हो जाती ! वैयक्तिक व्यवहार, नैतिकता या सामान्य शिष्टाचार को लेकर हमारे बारे में कोई अच्छी राय नहीं है ! हम अपनी हितानुसार नियम-कानून का पालन करते आए हैं ! अपनी सुविधा को उन पर तरजीह देते हैं ! पर महाकुंभ में भाग लेने वाले श्रद्धालुजन मर्यादित रहे, सयंमित रहे, धैर्यवान रहे, जागरूक रहे ! कभी भी उच्छृंखलता नहीं दर्शाई ! यदि ऐसा ना होता तो 15-20 हजार सफाई कर्मियों के लिए हर समय सफाई बनाए रखना लगभग असंभव था ! यदि यह जन-सैलाब जरा सा भी अमर्यादित हो जाता तो बीसियों हजार सुरक्षा कर्मियों की हालत सागर में तिनके के मानिंद हो जाती ! इसलिए महाकुंभ के सुखद समापन का श्रेय तीर्थ यात्रियों को भी जाता है। 
 
जन सैलाब 
यदि देखा जाए तो इस महाकुंभ की अपार सफलता के पीछे उन विपक्षी नेताओं का भी बहुत बड़ा सहयोग है, जिन्होंने अपने राजनीतिक करियर को दांव पर लगा, बिना अपने भविष्य को ध्यान में रखे, लोगों की भावनाओं, उनकी आस्थाओं को दरकिनार कर लगातार विष-वमन करते हुए इस आयोजन की बुराई की ! किसी भी तरह इस आयोजन को रोकने-बदनाम करने के लगातार षड्यंत्र रचे ! खुद और अपने लगे-बंधों से लोगों को डराने-धमकाने की चेष्टा की ! इस महा पर्व को बदनाम करने के लिए धर्म, संस्कृति, परंपरा, समाज सभी के विरोधी बन गए ! वे खुद बर्बाद होने, उपेक्षित होने, बदनाम होने, जनता द्वारा नकार दिए जाने के बावजूद अपने मिशन पर लगे रहे ! यही कारण था कि पूरा सरकारी तंत्र सदा सचेत रहा ! किसी भी अनहोनी, आपदा, विपदा या षड्यंत्र का सामना करने के लिए मुस्तैद रहा ! सरकार को उनका आभार मानना चाहिए तथा जनता को ऐसे लोगों की कद्र करते हुए उन्हें सदा-सदा के लिए विपक्ष में बैठाए रखना चाहिए, जिससे वे भविष्य में भी ऐसे ही सरकार की सतर्कता बनाए रख सकें !  

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

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