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सोमवार, 7 अप्रैल 2025

टेढ़ी उंगली और घी

यहां इस संयोग की भी प्रबल संभावना है कि इस बात की ईजाद करने वाले महानुभाव ठंडे प्रदेश में रहते होंगे, जहां घी सदा ठोस रूप में रहता होगा और उसे उंगली टेढ़ी कर ही बर्तन वगैरह से निकाल सकना संभव हो पाता होगा ! पर इसी के साथ यह सवाल भी तो उठता है कि यदि मौसम गर्म हो और उस कारण घी अपनी तरलावस्था में रहता हो, तब तो वह ना सीधी उंगली से निकलेगा ना हीं टेढ़ी से.........फिर ? 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

सीधी उंगली से घी नहीं  निकलता ! पता नहीं किसने इस सत्य की खोज की, क्योंकि उसके इस उपक्रम पर कई सवाल उठ खड़े होते हैं ! जैसे वह उंगली से ही घी क्यों निकालना चाहता था ? यदि वह घर में ऐसा कर रहा था तो उसने चम्मच या वैसे ही किसी उपकरण का उपयोग क्यों नहीं किया ? यदि बाहर कहीं उसे ऐसा करने की जरुरत पड़ ही गई तो क्या घी निकालने के पहले उसने हाथ वगैरह साफ किए थे या नहीं ? क्या उंगली के नाखून गंदगी-रहित थे ? ऐसा ना होने पर बाकी के घी के खराब होने का भी खतरा था ! प्रश्न यह भी उठता है कि वह उंगली से घी निकाल कर उसका क्या उपयोग करना चाहता था, क्योंकि जब उसके पास चम्मच ही नहीं था तो कटोरी वगैरह भी कहां होगी ! ऐसे में घी गिर कर बर्बाद भी हो सकता था ! 

 सिधाई का साथ नहीं 

यहां इस संयोग की भी प्रबल संभावना है कि इस बात की ईजाद करने वाले महानुभाव ठंडे प्रदेश में रहते होंगे, जहां घी सदा ठोस रूप में रहता होगा और उसे उंगली टेढ़ी कर ही बर्तन वगैरह से निकाल सकना संभव हो पाता होगा ! पर इसी के साथ यह सवाल भी तो उठता है कि यदि मौसम गर्म हो और उस कारण घी अपनी तरलावस्था में रहता हो, तब तो वह ना सीधी उंगली से निकलेगा ना हीं टेढ़ी से.........फिर ? 

टेढ़ा तो होना ही पड़ता है 

मेरे अपने व्यक्तिगत शोध तो यही बताते हैं कि शठे शाठ्यम समाचरेत ! अगला नहीं मान रहा, तो उसे ही कुछ ऐसा ''ताप'' दे दिया जाए कि त्राहिमाम-त्राहिमाम करते, पिघल कर खुद ही बाहर आ जाए ! अपनी उंगली टेढ़ी क्यों करनी ! यदि नहीं तो फिर उंगली से कहीं बेहतर है, चम्मच जैसा कोई उपकरण ! इससे घी-तेल सब कुछ आसानी, बेहतर और साफ-सुथरे तरीके से निकाला जा सकता है, बिना उन्हें अशुद्ध, दूषित या अन्य किसी आशंका के ! हालांकि टेढ़ा इसे भी करना पड़ता है ! यह तो नियति है !

वैसे इस घी वाली बात का अभिप्राय भले ही कुछ भी हो पर शाब्दिक अर्थ तो पूरी तरह भ्रामक है ! घी एक बहुत ही पवित्र और बहु-उपयोगी पदार्थ है, उसे पूजा-पाठ तथा अन्य धार्मिक कार्यों के अलावा कभी-कभी दवा के रूप में भी काम में लाया जाता है, ऐसी वस्तु को उंगली से निकालना उसे दुषित करना है, इस बात का उन महानुभाव को ध्यान रखना चाहिए था ! वैसे उनका तेल वगैरह के बारे में क्या विचार था, इसका पता नहीं चल पाया है ! यदि किसी मित्र, सखा, साथी को इस बारे में कुछ भी ज्ञात हो, तो साझा जरूर करें ! धन्यवाद !

@यह एक निर्मल हास्य है, अन्यथा ना लें  

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से                

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2022

मरतबान, बरनी या इमर्तवान

मर्तबान, मृद्भांडों के परिवार का सदस्य है। जिसका एक भाई-बंद भांड या कुल्हड़ कहलाता है ! भांड शब्द आजकल बहुत कम सुनाई पड़ता है ! जबकि गाँवों-कस्बों की भाषा अभी भी इसका चलन है। बंगाल जैसे प्रांत में अभी भी चाय वगैरह के कुल्हड़ों को भांड ही कहा जाता है ! चीनी मिटटी की बनी चाय की केतलियों की याद तो अभी भी बहुत से लोग भूले नहीं होंगे ! मिट्टी इत्यादि से बने ऐसे बर्तन पर्यावरण के साथ-साथ मानवोपयोगी भी होते हैं ! इनमें रखी वस्तुएं ना जल्दी खराब होती हैं नाहीं उनमें कोई रासायनिक परिवर्तन होता है ! इसके अलावा मिट्टी की एक अलग तासीर सी भी इनमें शामिल हो जाती है ..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

मरतबान, मर्तबान, बरनी या इमर्तवान ! अचार, घी, आदि रखने का चीनी मिट्टी या सादी मिट्टी आदि का चौड़े मुँह एवं हत्थे या बिना हत्थे का ढक्कनदार रोगन किया हुआ बर्तन ! किसी समय यह हर रसोई का एक अहम हिस्सा हुआ करता था ! बदलते फैशन और पश्चिम के अंधानुकरण से भले ही यह शहरी रसोइयों से दूर हो गया हो पर गांव-देहात या कस्बों में इसका प्रचलन बदस्तूर जारी रहा। होम्योपैथी, आयुर्वेद तथा यूनानी हकीमों के यहां आज भी भूरे और सफ़ेद रंग के मर्तबान या बरनियों को उपयोग में आता देखा जा सकता है। वैसे इस बहुपयोगी पात्र ने फिर वापसी की है और इस बार ज्यादा तड़क-भड़क, रंग-बिरंगे, चटकीले, आकर्षक और शिल्पयुक्त विभिन्न आकारों और आकृतियों में अवतरित हो, घरों की साज-सज्जा में चार चाँद लगा रहा है ! आजकल आधे फुट से लेकर चार-पाँच फुट तक के सजावट के काम आने वाले विभिन्न आकार के इन मर्तबानों का प्रयोग गुलदस्ते की तरह भी किया जा रहा है, जिनमें सजे फूलों से इनकी सुंदरता और भी बढ़ जाती है। 



मर्तबान नगर, भारत की पूर्वी सीमा से सटे हुए बर्मा राज्य के पेगू प्रदेश के इस शहर में बहुत पहले से चीनी मिट्टी के पात्र बनाए जाते रहे थे, जहां से इनका निर्यात होता था। इस नगर के नाम पर ही इन पात्रों को विदेश में 'मर्तबान' कहा जाने लगा । माले, चीन, तिब्बत, जापान, कोरिआ और ओमान जैसी जगहों में भी इनको बनाने का चलन रहा है। मध्य काल में भारत में ये उपलब्ध होने लग गए थे। विदेशी यात्री इब्नबतूता ने अपनी भारत यात्रा के विवरण में इनका वर्णन किया है। मर्तबान शब्द को यूँ तो अरबी मूल का माना जाता है और इसकी व्युत्पत्ति "मथाबान" से बताई जाती है !      


मर्तबानमृद्भांडों के परिवार का सदस्य है। जिसका एक भाई-बंद भांड या कुल्हड़ कहलाता है ! भांड शब्द आजकल बहुत कम सुनाई पड़ता है ! जबकि गाँवों-कस्बों की भाषा अभी भी इसका चलन है। बंगाल जैसे प्रांत में अभी भी चाय वगैरह के कुल्हड़ों को भांड ही कहा जाता है ! चीनी मिटटी की बनी चाय की केतलियों की याद तो अभी भी बहुत से लोग भूले नहीं होंगे ! मिट्टी इत्यादि से बने ऐसे बर्तन पर्यावरण के साथ-साथ मानवोपयोगी भी होते हैं ! इनमें रखी वस्तुएं ना जल्दी खराब होती हैं नाहीं उनमें कोई रासायनिक परिवर्तन होता है ! इसके अलावा मिट्टी की एक अलग तासीर सी भी इनमें शामिल हो जाती है ! वर्षों पहले जब आधुनिक मशीनें नहीं थीं तब से गृहणियां इन्हीं बर्तनों में अचार-मुरब्बा-घी वगैरह सुरक्षित रखती आ रही हैं।
                                


समय के साथ-साथ हमारे यहां अब इनका प्रयोग विदेश टोटके, फेंग्शुई जैसी विधाओं में भी होने लगा है ! उसके अनुसार पीले और लाल रंग के मर्तबान सबसे प्रभावशाली होते हैं और इनका सही उपयोग घर व कार्यालय में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने, आपसी संबंधों को मधुर बनाने तथा सुख-शान्ति के लिए प्रभावशाली साबित होता है। प्राचीन चीनी वास्तुकला में भी ये अत्यंत उपयोगी माने जाते रहे हैं। जरूरत है सिर्फ सही चयन और उनके उचित उपयोग की।

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