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| कुछ ही समय पहले इनकी ऐसी धमा-चौकड़ी होती थी, अब खोजे नहीं मिलतीं |
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| सलीका |
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| आज नो झगड़ा |
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| मस्तमौला |
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| अपनी बारी का इन्तजार |
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इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
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| कुछ ही समय पहले इनकी ऐसी धमा-चौकड़ी होती थी, अब खोजे नहीं मिलतीं |
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| सलीका |
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| आज नो झगड़ा |
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| मस्तमौला |
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| अपनी बारी का इन्तजार |
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| जनरल सैम मानेक शॉ |
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| मान पत्र |
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| प्रशस्ति पत्र |
2021 में भारत-पाकिस्तान युद्ध पर बनी एक फिल्म, भुज, The Pride of India, आई थी, जिसमें अजय देवगन, सोनाक्षी सिन्हा, संजय दत्त और नोरा फतेही की मुख्य भूमिकाएं थीं। इसमें अजय देवगन ने इस युद्ध के नायक रहे भारतीय वायु सेना के स्क्वाड्रन लीडर विजय कार्णिक के किरदार को निभाया था। उसी के साथ संजय दत्त ने भी इस फिल्म में भारतीय सेना के स्काउट रणछोड़दास पागी के असल किरदार को साकार किया था ! यह भी उन्हें एक तरह की श्रद्धांजलि ही थी !
सैम मानेक शॉ अपने अंतिम दिनों में भी अपने इस ''पागी'' को भूल नहीं पाए थे। 2008 में जब सैम मानेकशॉ तमिलनाडु के वेलिंगटन अस्पताल में भर्ती थे तो अक्सर डाक्टरों के साथ उनके किस्से साझा किया करते थे ! समझा जा सकता है कि जब मानेक शॉ जैसी हस्ती बार-बार किसी को याद करती हो तो उस इंसान में कितनी खूबियां होंगी ! आज ये दोनों विभूतियां हमारे साथ नहीं हैं ! 27 जून 2008 में सैम मानेक शॉ का निधन हो गया ! जुलाई 2009 में रणछोड़ जी ने भी स्वैच्छिक सेवानिवृति ले ली। जनवरी 2013 में 112 वर्ष की उम्र में वे भी इस दुनिया को छोड़ गए।
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से
अच्छाई की बुराई पर जीत की जद्दोजहद, अंधेरे और उजाले के सदियों से चले आ रहे महा-समर, निराशा को दूर कर आशा की लौ जलाए रखने की पुरजोर कोशिश ! चिरकाल से चले आ रहे इस संग्राम में उसी आशा की लौ के स्थापन के लिए अपनी छोटी सी जिंदगी को दांव पर लगा, अपने महाबली शत्रु तमस से जूझती हैं, चिरागों के रूप में, सूर्यदेव की अनुपस्थिति में उनका प्रतिनिधित्व करने वाली रश्मियाँ ! दीपोत्सव के केंद्र में दीपक ही तो होता है.......................!
#हिन्दी_ब्लागिंग
दीपोत्सव फिर आने का वादा कर समय-चक्र पर सवार हो विदा ले गया ! साल की सबसे घनघोर काली रात के भय से उबारने वाला यह त्यौहार सदा याद दिलाता रहता है, अच्छाई की बुराई पर जीत की जद्दोजहद, अंधेरे और उजाले के सदियों से चले आ रहे महा-समर, निराशा को दूर कर आशा की लौ जलाए रखने की पुरजोर कोशिश की ! चिरकाल से चले आ रहे इस संग्राम में उसी आशा की लौ के स्थापन के लिए अपनी छोटी सी जिंदगी को दांव पर लगा, अपने महाबली शत्रु तमस से जूझती हैं, चिरागों के रूप में, सूर्यदेव की अनुपस्थिति में उनका प्रतिनिधित्व करने वाली रश्मियाँ ! दीपोत्सव के केंद्र में दीपक ही तो होता है !
दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पावन पर्व है। हम भारतवासियों का दृढ विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है, झूठ का नाश होता है ! दीपावली भी यही चरितार्थ करती है, असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय ! अंधकार कितना भी गहरा क्यों ना हो, ये छोटे-छोटे दीपक रौशनी के सिपाही बन, अपनी सीमित शक्तियों के बावजूद, एक मायाजाल रच, विभिन्न रूप धर, अंधकार को मात देने के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगा देते हैं। ताकि समस्त जगत को खुशी और आनंद मिल सके।
अपनी छोटी सी पर सार्थक जिंदगी के पश्चात दीपक बुझ तो जरूर जाता है पर उसका बलिदान व्यर्थ नहीं जाता ! इसकी परख निश्छल मन वाले बच्चों के चेहरे पर फैली मुस्कान और खुशी को देख कर अपने-आप हो जाती है। एक बार अपने तनाव, अपनी चिंताओं, अपनी व्यवस्तताओं को दर-किनार कर यदि कोई अपने बचपन को याद कर, उसमें खो कर देखे तो उसे भी इस दैवीय एहसास का अनुभव जरूर होगा। यही है इस पर्व की विशेषता, इसके आतिशी मायाजाल का करिश्मा, जो सबको अपनी गिरफ्त में ले कर उन्हें चिंतामुक्त कर देने की, चाहे कुछ देर के लिए ही सही, क्षमता रखता है। बाहरी संसार को रौशन करने के उसके इस प्रयास के साथ ही कितना अच्छा हो यदि हमारी यह कोशिश रहे कि जगत में उजास बनाए रखने के साथ ही हम अपने अंतस में छिपे राग-द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध, वैमनस्य जैसे तमस को भी दूर कर दें ! जिससे मानव मात्र के भले के साथ ही देश-समाज-जगत में भी सुख-शांति-चैन का माहौल स्थापित हो सके !
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मैं क्या सोच रहा था कि अपुन भी तो वर्षों-वर्ष इस दिखावे की अंधी दौड़ में शामिल रहे ! हर साल इस मौके पर नए-नए कपड़े ला-लाकर आलमारी को भरते गए ! बाटा कंपनी के स्लोगन ''पूजोय चाई नोतून जूतो'' से प्रभावित हो पता नहीं कितने जूते, चप्पल, सैंडिल खरीद मारे ! सफाई, रौशनी, दीया-बाती-लड़ी-पटाखे, मिठाइयां सब कुछ तो हुआ, माँ का ध्यान पाने के लिए ! पर वे मेहरबान होती रहीं, फिलिप्स, बाटा, रेमंड, ड्यूलक्स, हल्दीराम पर, जिन्होंने हमारा ही धन समेट मारा.......!
#हिन्दी_ब्लागिंग
दीपावली की धूम-धाम ! हजारों-लाखों दीए, मोमबत्तियां, रंग-बिरंगे बल्बों की लड़ियां ! अमीर-गरीब सबके घर, अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार रौशनी में नहाए हुए ! साल की इस सबसे घनेरी रात में भी दिन के उजाले का भ्रम ! नए, रंग-बिरंगे वस्त्रों में सजे नागरिक ! गहने-आभूषणों की दुकानों में ना समा सकने वाली भीड़ ! पकवानों की महक ! शोर-शराबा ! हँसते-गाते, तोहफे बांटते लोग ! क्या इनको देख अपने सालाना भ्रमण पर निकली माँ लक्ष्मी भ्रमित नहीं हो जाती होंगी ! जब वे यहां के रौनक-मेले, पानी से बहते धन और माया की बदौलत उत्पन्न स्वर्गिक छटा देखती होंगी तो यह सोच कि यहां तो मेरे सभी भक्त आनंद के सागर में आकंठ डूबे हैं, सुखी हैं ! उलटे पांव लौट ना जाती होंगी..........!
वैसे तो माँ अन्तर्यामी हैं ! कौन कैसा है, सब पता है उनको ! पर कुछ अहं ब्रह्मास्मि का अहम् पाले लोगों के आख्यानों से वे गफलत में भी पड़ जाती होंगी कि कहीं सचमुच कोई भूखा तो नहीं रह रहा ! कोई ऐसा तो नहीं जो हाड़-तोड़ मेहनत करने पर भी दो जून की रोटी का जुगाड़ ना कर पा रहा हो ! कोई कल की चिंता में आज बिसूरता बैठा हो ! कोई जीवन-यापन नहीं, कठिनाई से जीवन काट रहा हो ! किसी के अथक कर्म करने के बावजूद भाग्य साथ ना दे रहा हो ! इसी आशंकाओं के कारण वे चली आती हैं, हर बार ! माँ जो ठहरीं !
बचपन में एक कहानी पढ़ी थी, जिसका सार था कि दिवाली की रात घूमते हुए माँ लक्ष्मी को एक गरीब ब्राह्मण की कुटिया दिखाई पड़ी, जिसमें एक छोटा सा दीपक जल रहा था और ब्राह्मण दंपत्ति अधपेट खा कर भी प्रभु का आभार मान रहे थे ! उनको देख माँ का हृदय पसीज गया और उन्होंने उनके शेष जीवन को सुखमय बना दिया !
इधर मैं क्या सोच रहा था कि अपुन भी वर्षों-वर्ष इस दिखावे की अंधी दौड़ में शामिल रहे ! हर साल इस मौके पर नए-नए कपड़े ला-लाकर आलमारी को भरते गए ! बाटा कंपनी के स्लोगन ''पूजोय चाई नोतून जूतो'' से प्रभावित हो पता नहीं कितने जूते, चप्पल, सैंडिल खरीद मारे ! सफाई, रोशनी, दिया-बाती-लड़ी-पटाखे, मिठाइयां सब कुछ तो हुआ माँ का ध्यान पाने के लिए पर वे मेहरबान होती रहीं, फिलिप्स, बाटा, रेमंड, ड्यूलक्स, हल्दीराम पर, जिन्होंने हमारा ही धन समेट मारा !
वैसे उस कहानी के ब्राह्मण जितनी मुश्किलात अपनी हरगिज नहीं हैं ! सदन-वाहन-वसन सब कर्मों के अनुसार सुलभ हैं ! अब किसी तरह की चाहत भी नहीं है ! गुजारा हो रहा है ! पर बाटा-रेमंड जैसी सहूलियतें भी तो नहीं हैं ! एक ''वो'' वाली फिलिंग भी नहीं आ पा रही ! तो इस बार कुछ अलग करने की धुन में ऊपर-नीचे-दाएं-बाएं रोशनियों के समुद्र में अपना लैगून, सिर्फ रोजमर्रा की लाइट के साथ रहा ! नो धूम-धड़ाका, नो हल्ला-गुल्ला ! सिर्फ घर के देवस्थान पर दीप दान !
अब देखना यह है कि आज रात ऊपर से अवतरित होते हुए, इस चकाचौंधी रौशनी, धूम-धड़ाके, शोर-शराबे के बीच मैं और मुझ ब्राह्मण का, कुछ अलग सा, आवास-निवास उन्हें नजर आ पाते भी हैं कि नहीं.........!
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से
अल्लादीन के जिन्न को भले ही वापस बोतल में भेजना बहुत दुष्कर हो, पर बिखरे हुए घरेलू सामान को समेटना उससे भी विकट समस्या होती है ! ऊपर से सामान की मालकिन को अपनी हर चीज बेहद जरूरी लगती है, भले ही वर्षों से उसका उपयोग न हुआ हो ! पर उनके अनुसार क्या पता कब किस चीज की जरूरत पड़ जाए ! फिर बाजार दौड़ो ! इसके साथ ही पंजाबी का वह मुहावरा सुनाने से भी नहीं चूकतीं कि "कक्ख दी बी लोड़ पै जांदी ऐ ", अब उनके इस "कक्ख" के चक्कर में मैं तो चकरघिन्नी बन कर रह जाता हूँ...........!
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| चर्चिल |
| सकारात्मक मुद्रा |
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| नकारात्मक मुद्रा |
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| विद्योत्तमा तथा कालिदास का शास्त्रार्थ |
दुनिया भर में हर जगह पानी अपनी फितरत के अनुसार ऊपर से नीचे की ओर गिरता या बहता है। पर अपने देश के छत्तीसगढ़ राज्य के एक मुख्यालय अंबिकापुर के एक जिले सरगुजा के एक कस्बे मैनपाट के पास जंगलों में स्थित एक छोटे से गांव बिसरपानी के नजदीक बहने वाली एक छोटी सी जलधारा में बहता हुआ पानी, सारी कायनात और विज्ञान के सभी नियम-कानून-जानकारियों को धत्ता बता, गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के विपरीत, नीचे से ऊपर की ओर चलता है यानी ढलान से ऊंचाई की ओर बहता है...........!
#हिन्दी_ब्लागिंग
प्रकृति सदा अपने बंधे-बंधाए नियमों के अनुसार ही चलती है। उसके सिद्धांतों में कभी फेर-बदल नहीं होता। इसी लिए लाखों-करोड़ों साल से यह विश्व टिका हुआ है। पर कभी-कभी इसी धरा पर कुछ ऐसे अजूबों से भी हमारा सामना हो जाता है, जिन्हें देख अपने अज्ञानवश हमें लगता है कि वे ना कायनात से मेल खाते हैं ना हीं विज्ञान सम्मत हैं ! ऐसा ही एक अजूबा है, छत्तीसगढ़ के मैनपाट इलाके में स्थित एक जलधारा, जिसका पानी प्रकृति और विज्ञान की मान्यताओं और अपने स्वभाव के विपरीत नीचे से ऊपर की ओर बहता है यानी ढलान से ऊंचाई की तरफ चलता है ! इसी अनोखे और अचंभित कर देने वाले चमत्कार के कारण उस जगह का नाम उल्टा पानी पड़ गया है !
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| उल्टा पानी, जलधारा |
दुनिया भर में हर जगह पानी अपनी फितरत के अनुसार ऊपर से नीचे की ओर गिरता या बहता है। पर अपने देश के छत्तीसगढ़ राज्य के एक मुख्यालय अंबिकापुर के एक जिले सरगुजा के एक कस्बे मैनपाट के पास जंगलों में स्थित एक छोटे से गांव बिसरपानी के नजदीक बहने वाली एक छोटी सी जलधारा में बहता हुआ पानी सारी कायनात और विज्ञान के सभी नियम-कानून-जानकारियों को धत्ता बता, गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के विपरीत, नीचे से ऊपर की ओर चलता है यानी ढलान से ऊंचाई की ओर बहता है और इसका कारण अभी तक वैज्ञानिक भी समझ नहीं पाए हैं !
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| नीचे से ऊपर बहता पानी |
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से तकरीबन पौने चार सौ कि.मी और मुख्यालय अंबिकापुर से लगभग 55 कि.मी. की दूरी पर विंध्य पर्वतश्रेणी में समुद्र तट से 3781' की ऊंचाई पर स्थित है मैनपाट नाम का कस्बा। जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता तथा मौसम की वजह से छत्तीसगढ़ का शिमला कहलाता है। इसी से करीब 8-9 कि.मी. की दूरी पर बसे हुए एक छोटे से गांव बिसरपानी के पास ही है वह जलधारा, जो उल्टा पानी के नाम से प्रसिद्ध है।
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| सरकारी प्रमाण |
वैज्ञानिक इसे कुछ और ना मान आँखों का धोखा (Eye Illusion) निरूपित करते हैं। उनके अनुसार सिर्फ ऐसा महसूस होता है कि पानी नीचे से ऊपर जा रहा है, जबकि ऐसा है नहीं ! पर वे यह नहीं बता पाते कि जब उसी पानी में कागज की नाव छोड़ी जाती है तो वह नीचे आने की बजाय ऊपर की ओर क्यों जाने लगती है ! वैसे भी यहां पानी में हाथ डालने पर उसके बहाव की दिशा का अंदाज भी लग जाता है !
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| टाइगर जलप्रपात |
उल्टा पानी की तरह ही यहां एक और अजूबा भी है, जहां न्यूट्रल गियर में डली गाड़ियां धीरे-धीरे ऊपर खिसकने लगती हैं ! जो यहां किसी चुंबकीय क्षेत्र के होने का आभास भी देती हैं ! इसी कारण ऐसी संभावना भी बनती है कि हो सकता है कि इस क्षेत्र का चुंबकीय आकर्षण इतना ज्यादा हो जो इस जगह के गुरुत्वाकर्षण पर भी बहुत भारी पड़ता हो और उसी की वजह से पानी जैसा तरल भी ऊंचाई की ओर बढ़ने लग जाता हो ! जो भी हो इन बातों का जवाब ढूंढना वैज्ञानिकों के लिए एक चुन्नौती तो है ही।
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| तिब्बती पैगोडा |
रिहन्द और मांड नदियों का यह उद्गम स्थल कभी अपने अजूबों के कारण भूतिया कहलाता था। पर पर्यटन विभाग के अथक और अनवरत प्रयासों के फलस्वरूप अब मैनपाट में साल भर पर्यटकों का तांता लगा रहता है, जबकि अभी भी यह पूरी तरह पर्यटन की दृष्टि से विकसित नहीं हुआ है ! एक समय 1962 में चीन से आए तिब्बती शरणार्थियों को भी यहीं बसाया गया था। आज उल्टा पानी के अलावा टाइगर प्वाइंट, मेहता प्वाइंट, दलदली, फिश प्वाइंट जैसी जगहों के साथ-साथ यहां के तिब्बती मंदिर, तिब्बती बाजार और तिब्बती खानपान भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं। हो सके तो ऐसी जगहों पर भी जरूर जाना चाहिए।
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से
पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...