pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 18 जनवरी 2023

पासोवर, पीला ढक्कन, कुलेखारा, बाजार की तनिक प्रशंसा तो बनती है

सुबह आँख खोलने के बाद से रात सोने के वक्त तक बाजार, चिराग के जिन्न की तरह आपके दरवाजे पर हाथ बांधे आपके हुक्म के इंतजार में खड़ा रहता है ! कुछ भी, कहीं से भी ला कर आपको सौंपने के लिए ! उदाहरण के लिए, एक औषधीय पौधा होता है, "कुलेखारा", इसकी पत्तियों का रस होमोग्लोबिन बढ़ाने में बहुत सहायक होता है ! अधिकाँश लोगों को तो इसकी जानकारी तो क्या इसका नाम तक भी ज्ञात नहीं होगा ! यह सब जगह उपलब्ध भी नहीं है ! ऐसे ही कोका कोला के पीले ढक्कन के पेय को भी लिया जा सकता है ! पर बाजार का जिन्न इन सबको देश के किसी भी कोने तक पहुँचाने में सक्षम है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आज पल-पल बदलते फैशन, पसंद और जरुरत के जमाने मे भले ही बाजार की नीतियों, उसकी मंशा, उसकी व्यूह-रचना, उसके मायाजाल में सिर्फ उसकी खुदगर्जी और धन अर्जन की प्रमुखता हो, पर एक बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता कि अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए वह दिन-रात, 24x7, लगातार जी तोड़ मेहनत भी करता है ! उसकी नजर, अपने उपभोक्ताओं की हर जरुरत को, गुंजाईश चाहे कितनी भी छोटी से छोटी क्यों ना हो, भांपने और आंकने से नहीं चूकती ! इसके लिए उसकी ''मशीनरी'' बिना विराम के लगातार शोध करती रहती है ! अक्सर हमें लगता है कि हम बाजार के काले पहलू के षड्यंत्र में उलझते जा रहे हैं, पर उसका एक उजला पहलू भी है, भले ही उसका दायरा छोटा हो, पर अशक्त, उम्रदराज, घर से बाहर ना जा पाने को मजबूर, महिलाएं, काम में अत्यधिक व्यस्त लोगों के लिए वह किसी वरदान से कम भी नहीं है ! 


आज कोई भी चीज, यानी कोई भी चीज चाहिए हो तो वह एक कॉल पर घर बैठे उपलब्ध हो सकती है ! फिर वह चाहे खाना हो, दवा हो, रोजमर्रा की जरुरत की वस्तुएं हों, यात्रा का टिकट हो, होटल की बुकिंग हो, स्टेशन-एयरपोर्ट तक जाने के लिए वाहन हो, कपडे हों, जूते हों .... क्या-क्या गिनाया जाए, शायद ही कोई चीज ऐसी हो जो घर बैठे उपलब्ध न हो सकती हो ! उसके ऊपर पसंद ना आने पर वापसी की भी सुविधा ! सुबह आँख खोलने के बाद से रात सोने के वक्त तक बाजार, चिराग के जिन्न की तरह आपके दरवाजे पर हाथ बांधे आपके हुक्म के इंतजार में खड़ा रहता है ! कुछ भी, कहीं से भी ला कर आपको सौंपने के लिए ! उदाहरण स्वरुप, एक औषधीय पौधा होता है, "कुलेखारा", इसकी पत्तियों का रस होमोग्लोबिन बढ़ाने में बहुत सहायक होता है ! अधिकाँश लोगों को तो इसकी जानकारी तो क्या इसका नाम तक भी ज्ञात नहीं होगा ! यह सब जगह उपलब्ध भी नहीं है ! पर बाजार का जिन्न इसे भी देश के किसी भी कोने तक पहुँचाने में सक्षम है ! अजूबा ही तो है यह !

कुलेखारा की पत्तियां 


कुछ साल पहले तक हमारे कट्टर जैन भाइयों को यात्रा या पर्यटन के दौरान खाने-पीने के मामले में बहुत दिक्क्तों का सामना करना पड़ता था ! आज देश के किसी भी हिस्से में अच्छे होटल जैन फूड परोसने में सक्षम हैं ! तीज-त्योहारों के अनुरूप हर तरह की खाद्य सामग्री या जरुरत की वस्तुएं देश के हर कोने में उपलब्ध हैं ! बाजार तो जैसे संसार के हर इंसान की छोटी से छोटी जरुरत पूरी करने के लिए कमर कसे बैठा है ! इसका छोटा सा उदाहरण कोका कोला कंपनी है जो साल में एक बार, बसंत के महीने में अपनी परंपरागत बोतलों के साथ ही यहूदियों के धार्मिक त्यौहार (Passover) को ध्यान में रख एक पीले ढक्कन वाली बोतल भी बाजार में उतारती है। इस त्यौहार में यहूदी लोगों को गेहूं, जई, राई, जौ, मक्का, चावल, बीन्स इत्यादि का सेवन वर्जित होता है और चूंकि कोका कोला में मक्के के रस का प्रयोग किया जाता है इसलिए वे इसे पीने से बचते हैं। इस बात को भांप कर कोका कोला इन दिनों के लिए अपने मुख्य उत्पाद के साथ एक और पेय भी तैयार करता है जिसमें कॉर्न सिरप की जगह चीनी मिलाई जाती है, इसे Kosher Coke कहा जाता है और इसकी पहचान के लिए इसे पीले ढक्कन की बोतलों में भर कर रखा जाता है जिससे इसकी आसानी से पहचान हो सके ! यह बताता है कि बाजार की नजर कितनी पैनी है ! तो लब्बोलुआब यही रहा कि हर चीज के दो पहलू होते हैं ! बाजार से भी अच्छाई और बुराई दोनों जुडी हैं ! हंस तो हमें ही बनना होगा !       

गुरुवार, 5 जनवरी 2023

बाजार के चक्रव्यूह में अभिमन्यु बनता उपभोक्ता

एक ऐसे ही बाल बढ़ाऊ और केश निखारू उत्पाद ने प्याज को ही अपना ब्रांड एम्बेस्डर बना डाला है ! चतुराई इतनी कि अपनी साख जमाने के लिए उसने प्याज के दो रंग के बीजों लाल और काले से एक का शैंपू और दूसरे का तेल बना बाजार में धकेल दिया ! जितनी बारीकी से उसने केश विहीनों के मनोविज्ञान पर काम किया उतना शोध तो सिर्फ रॉकेट साइंस में ही होता होगा ! कीमत ज्यादा ना लगे इस आशंका में नीचे लिख दिया 1ml सिर्फ तीन रूपए का............!

#हिन्दी_ब्लागिंग

जबसे बाबा रामदेव ने बाजार के समर में आयुर्वेद का परचम थामा है, तबसे जाने-माने नामों यथा तुलसी, आंवला, हल्दी, अदरक के साथ-साथ अन्य नामालूम से साग-सब्जियों-लता-गुल्मों-पौधे-पत्तियों के दिन भी फिर गए हैं ! हर कॉस्मेटिक ब्रांड अपने उत्पाद में किसी भी वनस्पति का नाम थोप खुद को प्रकृति का सगा सिद्ध करने पर तुला हुआ है साथ ही लोगों के रुझान और मौके को ताड़ते और आयुर्वेद के नाम को भुनाते हुए अपने उत्पाद की कीमत तिगुनी-चौगुनी कर दी है ! एक ऐसे ही बाल बढ़ाऊ और केश निखारू उत्पाद ने प्याज को ही अपना ब्रांड एम्बेस्डर बना डाला है ! चतुराई इतनी कि अपनी साख जमाने के लिए उसने प्याज के दो रंग के बीजों लाल और काले से एक का शैंपू और दूसरे का तेल बना बाजार में धकेल दिया ! जितनी बारीकी से उसने केश विहीनों के मनोविज्ञान पर शोध किया उतना तो सिर्फ रॉकेट साइंस में ही होता होगा ! लोगों की इस धारणा को भुनाते हुए कि अच्छी और खास चीज मंहगी ही होती है, कंपनी ने अपने 200ml तेल की कीमत रख दी 600/- रूपए ! कीमत ज्यादा ना लगे इस आशंका में नीचे लिख दिया 1ml सिर्फ तीन रूपए का ! यही हथकंडा शैंपू के लिए भी अपनाया गया ! जिससे उपभोक्ता को लगे कि बस इतनी सी कीमत ! इंसान की कमजोरियों का फायदा उठा उसे अपने काबू की  ''जकड़'' में कैसे बनाए रखना है, यह इसका ताजा उदाहरण है !    

बहुत से लोगों को याद होगा एक जमाने में, सस्ती के समय कम कीमत में ढेर सा सामान आ जाता था, इसलिए चार सेर की धड़ी या पांच सेर की पनसेरी का चलन था ! समय गुजरा, मन-सेर-छटांक को किनारे कर किलोग्राम का चलन शुरू हो गया ! फिर मंहगाई बढ़ी तो इंसान के मनोविज्ञान को समझते हुए बाजार ने जिंसों की कीमत को कम दर्शाने के लिए एक किलो की पैकिंग 900 ग्राम और 500 ग्राम की जगह 400 ग्राम कर सामान बेचना शुरू कर दिया ! एक किलो की कीमत की जगह कब एक पाव या 250 ग्राम के रेट बता ग्राहक को भुलावे में रखा जाने लगा, पता ही नहीं चला ! किसी चीज की कीमत चुपचाप दुगनी कर, उसके साथ एक-दो चीजें मुफ्त देने या उस चीज की कीमत में 50-60 प्रतिशत की छूट दिखा, आम इंसान को गुमराह कर उसे लूटने की ऐसी प्रथा शुरू हो गई, जिसमें लुटने वाला भी ख़ुशी महसूस करने लगा ! इंसान के दिमाग को जितनी खूबी से बाजार ने समझा है उतना तो शायद ही कोई समझ पाया हो ! कब, कहां, कैसे इसे अपने हिसाब से चलाना-समझाना है, इसे क्या दिखा-बता कर अपना मतलब निकल सकता है, इसमें बाजार की ताकतों को महारत हासिल है और इसमें सहायक होती हैं नामी-गिरामी, सामाजिक हस्तियां जो अपनी शख्शियत का लाभ उठा, पैसे लेकर आम इंसान को सच-झूठ कुछ भी समझा कर कंपनियों को लाभ पहुंचाती रहती हैं, भले ही उनका ड्राइवर भी उस वस्तु का इस्तेमाल ना करता हो ! 

डॉक्टर आर्थो से अनुबंध ख़त्म हो गया लगता है 

बाजार की भूख ने तो सुरसा को भी मात दे दी ! इससे पार पाने के लिए तरह-तरह की तरकीबें बेचने वाले करोड़पति बन गए ! पहले एक तरह के शैंपू-तेल-परफ्यूम आते थे ! फिर पुरुषों-महिलाओं-बच्चों के लिए क्यों अलग-अलग होने चाहिए यह समझा कर उत्पाद बढ़ाए ! आज आप क्या खाएंगे, क्या पहनेंगे, किससे नहाएंगे, किससे सेहत बनाएंगें, सब बाजार ने अपने अधिकार में ले लिया है ! यह अलग बात है कि देश-विदेश में पदक जीतने वाले शायद ही हार्लिक्स-कॉम्पलान या बोर्नविटा जैसे उत्पादों से लाभान्वित हुए हों ! पर जो दिखता है वही बिकता है का सिद्धांत बदस्तूर जारी है ! यह भी सही है कि जब तक लोग भुलावे में आते रहेंगे तब तक गंजों को कंघी और पहाड़ों पर बर्फ बेची जाती रहेगी !     

रविवार, 1 जनवरी 2023

नीलकंठ धाम, पोयचा, गुजरात

यह विशाल मंदिर और इसका परिसर इतना सुंदर, मनमोहक और आकर्षक है कि इसकी भव्यता को शब्दों में व्यक्त करना बहुत ही कठिन है ! मंदिर का परिसर किसी महल जैसा लगता है। इसकी हर चीज, चाहे वह मूर्तियां हों, चाहे नक्काशी हो, चाहे सजावट हो, चाहे वास्तुशिल्प हो, के के आकर्षण में पर्यटक अचंभित सा अभिभूत हो बंध सा जाता है ! यहां से वापस जाने का मन ही नहीं करता...........!                                                

#हिन्दी_ब्लागिंग 

गुजरात,अपनी परंपरा, संस्कृति तथा धार्मिक स्थलों की वजह से देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है ! फिर चाहे वह द्वारका हो, बेट द्वारका हो, सोमनाथ व नागेश्वर ज्योतिर्लिंग हों, प्रभास क्षेत्र हो, अक्षरधाम हो या फिर सरदार सरोवर ! इंसान देखते-देखते थक जाए पर दिव्य, मनोरम, दर्शनीय स्थलों की गिनती पूरी न हो ! ऐसा ही एक अनुपम धार्मिक स्थल है, नीलकंठ धाम !  

विशाल परिसर 


यह आश्चर्यजनक स्थान राजपीपला नर्मदा जिले के नर्मदा नदी के तट पर पोइचा गाँव में स्थित है। जो अहमदाबाद से 170 किमी, वड़ोदरा से 60 किलोमीटर और सरदार सरोवर बाँध, केवड़िया से तक़रीबन 30 किमी की दूरी पर पोयचा नामक गांव में स्थापित है। यह स्वामीनारायण मंदिर लोगों की आस्था का एक बहुत बड़ा केंद्र है। नर्मदा नदी के तट के समीप,  2013 में 105 एकड़ में बने इस भव्य मंदिर का निर्माण स्वामी नारायण गुरुकुल राजकोट की तरफ से करवाया गया है। इसके मुख्यद्वार का अनूठापन, इसकी वास्तुकला, इसके उद्यान, इसकी मूर्तियों की सजीवता, शांत वातावरण, एक-एक पत्थर पर उकेरी गई इसकी कारीगरी पर्यटकों को बाँध कर रख लेती है ! यह अलौकिक स्थान श्रद्धालुओं के साथ-साथ पर्यटकों में भी अत्यंत लोकप्रिय है ! इसीलिए यहां आने वाले लोगों का तांता लगा रहता है। 

भव्य व आकर्षक प्रवेशद्वार 



यह विशाल मंदिर और इसका परिसर इतना सुंदर, मनमोहक और आकर्षक है कि उसकी भव्यता को शब्दों में व्यक्त करना बहुत ही कठिन है ! मंदिर का परिसर किसी महल जैसा लगता है। इसकी हर चीज, चाहे वह मूर्तियां हों, चाहे नक्काशी हो, चाहे सजावट हो, चाहे वास्तुशिल्प हो, के आकर्षण में पर्यटक अचंभित सा अभिभूत हो बंध सा जाता है ! यहां से वापस जाने का मन ही नहीं करता ! सबसे बड़ी बात यहां फोटो खींचने की कोई मनाही नहीं है, जिससे पर्यटक यहां की अद्भुत यादें अपने साथ घर भी ले जा सकता है। 





मंदिर परिसर के द्वार के समीप विशाल नटराज की मूर्ति स्थापित है, जिसकी भव्यता देखते ही बनती है। परिसर में मौजूद सरोवर मंदिर की सुंदरता में चार चांद लगाता है। सरोवर में भगवान गणेश, शिवलिंग और हनुमान जी की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। इसके अलावा मंदिर परिसर में प्रभु के चौबीस अवतारों के साथ-साथ स्वामी नारायण, शिवलिंग, गणेश जी, हनुमान जी, राधाकृष्ण देव इत्यादि के  32 और छोटे-बड़े मंदिर बने हुए हैं। रोज होने वाली रथ-यात्रा तथा रात का साउंड व लाइट शो अपना अतिरिक्त आकर्षण रखते हैं ! मंदिर में नीचे की ओर बहती नर्मदा नदी में डुबकी लगाने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ सुबह से ही इकट्ठा हो जाती है। अंधेरा होने पर मंदिर अलग-अलग तरह की लाइट्स से रोशनी में नहा जाता है। जो इस इमारत की खूबसूरती को और भी बढ़ा देती है। 

स्वामी नारायण जी का मंदिर 

सरोवर का निर्मल जल 

मूर्तियों की सजीवता 

स्वामी नारायण रथ 
इसके सहजानंद परिसर में, नीलकंठ हृदय कमल, भारतीय संस्कृति और हिंदू तीर्थयात्रा, विज्ञान नगर, मनोरंजन पार्क, नाव की सवारी, भुल भुलैया इत्यादि का आनंद लिया जा सकता है। इसके खुलने का समय सुबह 11:00 बजे से रात  8:00 बजे तक है। सहजानंद विश्वविद्यालय के 7 भाग हैं। इस सभी भागों में भारतीय संस्कृति और धार्मिक ब्योरों कोआकर्षक ढंग से पेश किया गया है। यदि कभी गुजरात घूमने का सुयोग बने तो कार्यक्रम में नीलकंठ धाम जरूर शामिल होना चाहिए।  

बुधवार, 28 दिसंबर 2022

अहमदाबाद ! गहराती रात, अनजान सहायक

साबरमती आश्रम में हमारे साथ मेहमानों की तरह व्यवहार किया गया ! उस कमरे को भी खोल कर दिखाया और बताया गया जहां बापू देश और विदेश के नेताओं से मिलते थे और मंत्रणा करते थे ! वहीं उनके द्वारा उपयोग में लाई गईं वस्तुएं और चरखा भी रखा हुआ था ! साबरमती आश्रम अपने आप में एक सुंदर और दर्शनीय स्थल तो है ही वहां के लोगों के व्यवहार ने उसे और ख़ास बना दिया हम सब के लिए...........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

अभी पिछले दिनों अपनी संस्था R&SCB के सौजन्य से गुजरात यात्रा का सुयोग मिला था। यात्रा के मुख्य पड़ावों और एक-एक दर्शनीय स्थल के बारे में तो विस्तार से लिखूंगा ही, पर यात्रा के दौरान एक रात जो एक सुखद, संवेदनशील, आपबीती घटी, उसका विवरण सबसे पहले साझा करना चाहता हूँ !

वर्षों से मन में जमी बैठी, गुजरात भ्रमण की ईप्सा, को अब जा कर दिसंबर 22 में पूरा होने का सुयोग मिल रहा था ! संस्था के अनुभवी अग्रजों द्वारा विस्तार से यात्रा के हर पहलू, उसकी रूप-रेखा, उसके हर कोण को चाक-चौबंद करने के बाद दिसंबर की 13 तारीख को रवानगी तय की गई ! रोमांच अपनी पराकाष्ठा पर था ! तभी जाने के चार-पांच दिन पहले, बदलते मौसम और विभिन्न कारणों से शरीर ने असहयोग कर दिया ! पर सारी तैयारियां हो चुकी थीं ! हवाई टिकट और नौ दिनों के अलग-अलग होटलों में व्यक्तिगत नामों से बुकिंग हो चुकी थी ! वैसे भी जाना तो था ही.....!

दवा वगैरह और आराम के जरिए हालत सामान्य होती सी लग तो रही थी पर भीतर ही भीतर कुछ खेल चल भी रहा था ! खैर चार-पांच दिन निकल गए ! द्वारका, सोमनाथ जैसे दिव्य स्थानों के ''ओरा'', उनकी सकारात्मक ऊर्जा, उनकी भव्यता ने शारीरिक कष्ट को कहीं पीछे छोड़ दिया था ! पर कुछ थका देने वाली यात्रा, गर्म मौसम तथा रोज-रोज के बदलते खान-पान ने असर दिखाना शुरू कर दिया था ! पांचवें दिन भाई सारस्वत जी की तबियत ने बिगड़ने के आसार दिखाए ! इसके बाद इन सब का असर मल्लिक जी की सेहत पर पड़ा और छठवें दिन मैं खुद सर दर्द-खांसी और गले की जकड़न के चपेट में आ गया ! कुछ और सदस्यों को भी गले की तकलीफ से दो-चार होना पड़ रहा था ! 

साबरमती रिवरफ्रंट 

सारे ब्योरे का विवरण इसलिए जरुरी था जिससे आगे होने वाले अनुभव और उसके पूरे असर की बानगी मिल सके ! अहमदाबाद की रात ! रात के भोजन के बाद सारस्वत जी, ठीक नहीं लगने के कारण होटल के रिसेप्शन पर अपनी जरुरत की दवाएं मंगवाने का कह, मुझे भी वैसा करने की सलाह दे, अपने कमरे में चले गए ! पहले तो मैंने भी वही रास्ता अपनाने की सोची पर फिर पता नहीं कैसे विचार बदल गया ! मेरे साथ विपिन जी थे मैंने उनसे पूछा कि क्या टहलते हुए दवा वगैरह ले आई जाए ! वे तुरंत तैयार हो गए ! होटल के स्टाफ के दिशा निर्देश के अनुसार करीब पौन किमी चलने के बावजूद किसी भी तरह की कोई दूकान नज़र नहीं आई ! हम लौटने का सोच ही रहे थे कि नीम अँधेरे में एक जगह दो-तीन लोग बैठे बातें करते दिखे ! कम रौशनी में उनके चेहरे भी साफ़ नजर नहीं आ रहे थे ! विपिन जी ने आगे बढ़ कर दवा की दूकान की जानकारी ली ! उन्होंने करीब और आधा किमी आगे दूकान होने की बात कही ! साथ में यह भी कहा कि आज रविवार है, हो सकता है कि दवा की दूकान बंद हो ! हम दोनों होटल से कुछ दूर तक आ गए थे ! रात गहरा रहे थी ! सड़कें भी जनशून्य थीं ! हमने वापस लौटना ही ठीक समझा ! यहीं घटनाक्रम में एक ट्विस्ट आया !

साबरमती आश्रम 

उन तीनों ने आपस में कुछ बात की और उनमें से एक युवक ने अपनी स्कूटी निकाली और कहा, जिन्हें दवा की जरुरत हो मेरे साथ चलें और दूसरे अंकल यहीं बैठ कर इंतजार करें ! विपिन जी वहाँ बैठ गए और वह युवक मुझे साथ ले दवा की खोज में निकल पड़ा ! उसने कहा कि रविवार को ज्यादातर दवाओं की दुकानें बंद रहती हैं, इसलिए हम किसी हॉस्पिटल की तरफ चलते हैं, जहां के मेडिकल स्टोर सदा खुले रहते हैं ! मैं क्या कहता ! खैर जब करीब दो-अढ़ाई किमी चल कर गंतव्य तक पहुंचे तो वहाँ की दूकान भी बंद मिली ! युवक बोला, अंकल नई जगह है, रात है, अनजान लोग हैं, पर घबड़ाइएगा नहीं ! आपको दवा जरूर दिलवाऊंगा ! मैंने कहा कि मैं घबड़ा नहीं रहा हूँ मुझे झिझक इस बात की हो रही है कि आपका टाइम खोटी हो रहा है ! उसकी कोई परवाह नहीं, उसने कहा ! खैर और चार-पांच मिनट के बाद एक दुकान दिखी, दवा ली गई ! वहीं उसने बताया कि जिस सज्जन ने उसे भेजा है उनके परदादा गांधी जी के साथ चरखे पर सूत काता करते थे और कल जब आप साबरमती आश्रम जाओगे तो वहां की गाइड लता जी को उनका नाम बताइएगा, तो जो कमरा सिर्फ वीआईपी के लिए खुलता है वह भी आप लोगों के लिए खोल दिया जाएगा ! लौटते समय युवक ने, जिसका नाम जिग्नेश था, मुझे  यह कह कर होटल उतारा कि आपको बेकार फिर पैदल चल कर आना पडेगा, आप यहां उतर जाइए मैं दूसरे अंकल को ले कर आता हूँ ! फिर वह विपिन जी को छोड़ कर गया ! हम पूरी तरह अभिभूत थे, कैसे उसका धन्यवाद करें समझ ही नहीं पा रहे थे ! 


गांधीजी का मंत्रणा कक्ष 

दवाई की दूकान आगे है, इतना कह कर वह अपना पल्लू झाड़ सकता था ! क्या था जो अनजाने लोगों के लिए कोई अपना समय दे रहा था ! क्या था जो बिना किसी अपेक्षा के कोई अनजान लोगों की जरुरत पूरी करने पर उतारू था ! क्या था जो कोई दूसरे की तकलीफ को अपनी समझ उसको दूर करने की सोच रहा था ! यही इंसानियत है ! यही मानवता है ! यही हमारी संस्कृति है ! यही हमारे संस्कार हैं ! यही वह सोच है कि सारी वसुंधरा ही हमारा परिवार है !

उन सज्जन के प्रभाव के कारण दूसरे दिन साबरमती आश्रम में हमारे साथ मेहमानों की तरह का व्यवहार किया गया ! उस कमरे को भी खोल कर दिखाया और बताया गया जहां बापू देश और विदेश के नेताओं से मिलते थे और मंत्रणा करते थे ! वहीं उनके द्वारा उपयोग में लाइ गईं वस्तुएं और चरखा भी रखा हुआ था ! साबरमती आश्रम अपने आप में एक सुंदर और दर्शनीय स्थल तो है ही वहां के लोगों के व्यवहार ने उसे और ख़ास बना दिया हम सब के लिए !

@आभार जिग्नेश जी ! आभार गुजरात !

मंगलवार, 29 नवंबर 2022

तराजू वाली प्रतिमा को खुद ही अपनी आँखों पर बंधी पट्टी उतार फेंकनी होगी

शिक्षा, चिकित्सा और न्याय ! आम-जन का विश्वास आक्रोश के मारे इन तीनों सर्वाधिक जनहित के क्षेत्रों से उठने लगा है ! लोग अब भगवान से उतना नहीं डरते जितना इन पेशों से जुड़े लोगों से खौफ खाते हैं ! खास कर कानून से जुड़े लोगों से ! कारण भी तो है ! यह जानते हुए भी कि न्याय में देर होने से उसकी अहमियत खत्म सी हो जाती है, इसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा अतिकाल होता है ! इसीलिए कभी-कभी आक्रोशित हो सर्वहारा आपे से बाहर हो कानून अपने हाथ में लेने की भयंकर भूल कर बैठता है ! जैसा कि कुछ लोगों ने जेल वैन पर हमला कर किया ! वह भूल जाता है कि समाज ऐसे नहीं चलता ! शुक्र है कि यह दौरा कुछ पल के लिए ही पड़ता है.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कुछ दिनों पहले संविधान दिवस पर अपने विचार व्यक्त करती हुई आदरणीय राष्ट्राध्यक्ष द्रौपदी मुर्मू जी आज की न्याय व्यवस्था पर कुछ खिन्न नजर आईं ! उन्होंने पुराने दिनों को याद करते हुए कहा कि उनके बचपन में उनके गांव के लोग गुरु, डॉक्टर और वकील को भगवान मानते थे ! क्योंकि गुरु ज्ञान देकर, डॉक्टर जीवन देकर और वकील न्याय दिला कर लोगों की रक्षा करते थे ! उन्होंने मर्यादा और मेजबान का ख्याल रखते हुए, आजकल की अवस्था पर चिंता व्यक्त की, खासकर जेलों की हालत पर ! महामहिम की बात बिलकुल ठीक थी।     

हालांकि अभी भी इन तीनों क्षेत्रों में अधिकांश लोग अपने काम में पूरी तरह ईमानदारी से समर्पित हैं ! पर जैसा कि होता है, हर क्षेत्र में पैसे के लिए कुछ भी करने वाले लोग होते ही हैं वैसे ही कुछ मुट्ठी भर लोगों की वजह से आम जन का विश्वास इन तीनों सर्वाधिक जनहित के क्षेत्रों से उठने लगा है ! अब वे भगवान से उतना नहीं डरते जितना इन पेशों से जुड़े लोगों से भय खाते हैं ! खास कर कानून से जुड़े लोगों से ! कारण भी तो है ! यह जानते हुए भी कि न्याय में देर होने से उसकी अहमियत खत्म सी हो जाती है, इसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा अतिकाल होता है ! इसी से गुनाह करने वाले भी कुछ हद तक बेखौफ हो अपने कुकर्मों को अंजाम देने में नहीं हिचकते ! उनको पता रहता है कि कोई ना कोई आएगा और उन्हें कानून की किसी ना किसी संकरी गली से साफ बचा ले जाएगा ! क्योंकि वहाँ के बारे में एक कहावत है कि "वहाँ यह देखा जाता है कि कौन बोल रहा है ना कि क्या बोला जा रहा है !" होता भी तो ऐसा ही आया है, जनता ने देखा भी है, दसियों ऐसे उदाहरण हैं जब भारी-भरकम लोग अपनी बात मनवा कर चल देते हैं ! अब तो तराजू वाली प्रतिमा को खुद ही अपनी आँखों पर बंधी पट्टी उतार फेंकनी होगी ! इधर आम-जन की यादाश्त मछली की तरह होती है वह बहुत जल्द पिछली बातों को भूल जाता है ! उसे चारे के रूप में नई चटपटी ख़बरें परोस भ्रमित कर दिया जाता है ! पर विगत में घटी किसी घटना की पुनरावृत्ति फिर सब कुछ ताजा कर उसके आक्रोश का वायस बन जाती है !

शायद यही कारण था कि वीभत्स हत्याकांड के आरोपी को ले जाती जेल वैन पर कुछ लोग हथियारों के साथ हमला कर देते हैं ! हो सकता है कि यह एक सस्ता प्रचार पाने और मीडिया में दिखने का प्रयास भर हो पर इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि लचर न्याय व्यवस्था से परेशान आम-जन की सहानुभूति इनके साथ हो जाए ! क्योंकि आज साधारण नागरिक को कुछ ऐसा एहसास हो गया है कि ऐसे दुष्कर्मियों के पीछे कोई ना कोई हाथ ही नहीं पूरा का पूरा रसूखदार शरीर होता है ! जिसको बिके हुए मिडिया का भी पूरा साथ मिलता है ! वह देखता है कि आए दिन अखबारों में कुछ ऐसी बातें छपवाई जाती हैं जिससे लोगों को भ्रमित कर अपराधी के प्रति सहानुभूति जगाई जा सके ! 

अभी वीभत्स हत्याकांड के आरोपी के बारे में भी ऐसा होना शुरू हो गया है ! उसके पछतावे के नाटक को हवा देने के लिए कभी खबर आती है कि वह मृतक का सर गोदी में ले घंटों बैठा रहता था या फिर रातों को रोता रहता था ! जबकि उन्हीं रातों में उसके अन्य लड़कियों से संबंध भी सामने आ चुके हैं ! इधर पुलिस को अलग समय लग रहा है, सबूत जुटाने में ! इसके अलावा उसे संकरी गलियों के उस्तादों की सहायता भी मिलनी शुरू हो चुकी है जो उसे कभी बीमार कभी मानसिक अस्वस्थ या कभी कोई और कारण बता दिन पर दिन निकलवाते जा रहे हैं ! उद्देश्य एक ही है, ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत कर मामले को हल्का बना, सजा में कटौती करवाना !

सवाल उठने भी लगे हैं कि यदि सारे सबूत मिल भी जाएंगे तो क्या आरोपी को फांसी होगी ? या फिर कोई कोर्ट और किसी कोर्ट के फैसले को पलटते हुए उसे दोष मुक्त कर देगा ? निर्भया काण्ड में ऐसा ही तो हुआ था ! तीनों आरोपी संदेह और अनियमितता का लाभ ले रिहा हो गए थे ! एक पति ने अपनी पत्नी की अरबों की संपत्ति हथियाने के लिए उसकी ह्त्या कर दी पर न्याय ने उसे फांसी नहीं आजीवन कारावास दिया, जब उसने सोलह हत्याओं के दोषियों को रिहाई मिलने की बात सुनी तो उसने भी अपनी रिहाई की अर्जी लगवा दी, जैसे न्याय न हो नौटंकी हो ! कई उदाहरण हैं ऐसे जब हाथी अपनी पूँछ सहित सूई के छेद से निकलवा दिया गया हो !    

नृशंस, संगीन, हैवानियत भरे आपराधिक कांडों पर हुए कुछ फैसलों से जब पुलिस तक हतोत्साहित हो जाती है तो आम नागरिक का क्या हाल होता होगा ? जब वह देखता है कि देश की संपत्ति हड़प जाने वाले, करोड़ों-अरबों का घोटाला करने वाले, नागरिकों को बेवकूफ बना अपना घर भरने वाले, गैर कानूनी हरकतें करने वाले, अपने लाभ के लिए हत्या तक कर देने वाले कभी पैरोल पर, कभी सबूत ना मिलने पर, कभी झूठी दलीलों के सहारे छाती तान बाहर घूमते हैं तो आक्रोश के मारे उसका हरेक व्यवस्था से विश्वास उठने लगता है ! वह आपे से बाहर हो कानून अपने हाथ में लेने की भयंकर भूल कर बैठता है ! जैसा कि कुछ लोगों ने जेल वैन पर हमला कर किया ! वह भूल जाता है कि समाज ऐसे नहीं चलता ! ऐसे तो अराजकता फैल जाएगी ! कुछ भी हो उसे व्यवस्था पर विश्वास तो रखना ही होगा उसे बनाए रखने का सबसे ज्यादा दायित्व भी तो उसी का है ! उधर उसी व्यवस्था के कर्णधारों को भी समय रहते हवा का रुख पहचान लेना चाहिए इसके पहले कि वह हवा तूफान का रूप ले ले ! क्योंकि हर चीज की एक हद तो होती ही है.............!

शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

हताश-निराश युवाओं को लिंकन की जीवनी जरूर पढनी चाहिए

आज के युवा जो किसी कारणवश अपने लक्ष्य से दूर रह हताश हो बैठ जाते हैं, ज़रा सी असफलता मिलते ही तनावग्रस्त हो अपनी जान तक देने पर उतारू हो जाते है, जो समझ नहीं पाते कि एक हार से जिंदगी ख़त्म नहीं हो जाती, उन्हें एक बार अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति की जीवनी जरूर पढनी चाहिए जो एक पूर्ण कर्मयोगी थे। पर क्या हर इंसान इतना मजबूत बन सकता है ? शायद हां ! इसी  "हां " को समझाने के लिए भगवान ने इस धरा पर गीता का संदेश दिया था  …… !

#हिन्दी_ब्लागिंग                       

अब्राहम लिंकन ने गीता तो शायद नहीं पढी होगी, पर उनका जीवन पूरी तरह एक कर्म-योगी का ही रहा। वर्षों-वर्ष असफलताओं के थपेड़े खाने के बावजूद वह इंसान अपने कर्म-पथ से नहीं हटा, इतनी हताशा, इतनी निराशा, इतनी असफलताऐं तो ऋषि-मुनियों का भी मनोबल तोड़ के रख दें ! पर धन्य था वह इंसान, जिसने दुनिया के सामने एक मिसाल कायम की ! अंत में तकदीर को ही झुकना पड़ा उसके सामने।

अब्राहम लगातार 28-30 सालों तक असफल होते रहे, जिस काम में हाथ ड़ाला वहीं असफलता हाथ आई। पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। लोगों के लिए मिसाल पेश की और असफलता को कभी भी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। लगे रहे अपने कर्म को पूरा करने में, जिसका फल भी मिला, दुनिया के सर्वोच्च पद के रूप में।

अब्राहम लिंकन का जन्म 12 फरवरी 1809 को इंग्लैण्ड से आकर केंटुकी के हार्डिन काउंटी में बसे एक अश्वेत गरीब परिवार में हुआ था। उन के पिता का नाम थॉमस लिंकन तथा माता का नाम नैंसी लिंकन था। उनके पिता ने कठिन मेहनत कर अपने परिवार को संभाला था ! 

अब्राहम लिंकन अमेरिका के सोलहवें राष्ट्रपति थे। इनका कार्यकाल 1861 से 1865 तक रहा। वे रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य थे ! वे प्रथम रिपब्लिकन थे जो अमेरिका के राष्ट्रपति बने। उन्होने अमेरिका को उसके सबसे बड़े संकट गृहयुद्ध से उबारा था ! अमेरिका में दास प्रथा के अंत का श्रेय  भी लिंकन को ही जाता है। पर उनको इस पद तक पहुंचने के पहले इतनी असफलताओं का सामना करना पड़ा कि हैरानी होती है कि कैसे उन्होंने तनाव तथा अवसाद को अपने पर हावी नहीं होने दिया होगा ! 

घर की आर्थिक स्थिति संभालने के लिए 20-22 साल की आयु में उन्होंने व्यापार करने की सोची, पर कुछ ही समय में घाटे के कारण सब कुछ बंद करना पड़ा। कुछ दिन इधर-उधर हाथ-पैर मारने के बाद फिर एक बार अपना कारोबार शुरु किया पर फिर असफलता हाथ आयी। 26 साल की उम्र में जिसे चाहते थे और विवाह करने जा रहे थे, उसी लड़की की मौत हो गयी। इससे उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया ! पर फिर उन्होंने अपने आप को संभाला और स्पीकर के पद के लिए चुनाव लड़ा पर वहां भी हार का सामना करना पड़ा ! 31 साल की उम्र में फिर चुनाव में हार ने पीछा नहीं छोड़ा ! 34 साल में कांग्रेस से चुनाव जीतने पर खुशी की एक झलक मिली पर वह भी अगले चुनाव में हार की गमी में बदल गयी ! पर 46 वर्षीय जीवट से भरे इस इंसान ने तो हार नहीं मानी पर हार भी कहां उनका पीछा छोड़ रही थी ! फिर सिनेट के चुनाव में पराजय ने अपनी माला उनके गले में डाल दी ! अगले साल उपराष्ट्रपति के चुनाव के लिए खड़े हुए पर हार का भूत पीछे लगा ही रहा ! अगले दो सालों में फिर सिनेट पद की जोर आजमाईश में सफलता दूर ही खड़ी मुस्कुराती रही ! 

पर कब तक भगवान परीक्षा लेता रहता, कब तक असफलता मुंह चिढाती रहती, कब तक जीत आंख-मिचौनी खेलती रहती ! दृढ प्रतिज्ञ लिंकन के भाग्य ने पलटा खाया और 51 वर्ष की उम्र में उन्हें राष्ट्रपति के पद के लिए चुन लिया गया। ऐसा नहीं था कि वह वहां चैन की सांस ले पाते हों वहां भी लोग उनकी बुराईयां करते रहते थे ! वहां भी उनकी आलोचना होती रहती थी ! पर लिंकन ने तनाव-मुक्त रहना सीख लिया था। उन्होंने कहा था कि कोई भी व्यक्ति इतना अच्छा नहीं होता कि वह राष्ट्रपति बने, परंतु किसी ना किसी को तो राष्ट्रपति बनना ही होता है। 

तो यह तो लिंकन थे जो इतनी असफलताओं का भार उठा सके ! पर क्या हर इंसान इतना मजबूत बन सकता है ? शायद हां ! इसी 'हां' को समझाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण जी ने इस धरा पर गीता का संदेश दिया था। क्योंकि वे जानते थे कि इस ''हां'' से आम-जन को परिचित करवाने के लिए, उसकी क्षमता को सामने लाने के लिए उसे मार्गदर्शन की जरूरत पड़ेगी।

मंगलवार, 15 नवंबर 2022

हाथ से खाना, बिना छुरी-कांटे के

भारत सरकार के औपचारीक भोजों में सभी को कटलरी का उपयोग करते हुए ही भोजन करने की इजाजत है ! यदि कोई हाथ से खाना चाहे तो इसकी अनुमति नहीं है ! हो सकता है कि विदेशी मेहमानों की उपस्थिति के कारण ऐसे नियम बने हों ! पर क्या इन्हें बदला नहीं जा सकता ! यूनानी या रोम वासी खाते समय कभी कटलरी का प्रयोग नहीं करते ! दुनिया के अनेक भागों में अतिथि को ऐसा भोजन परोसना, जो छुरी से काटना, फाड़ना या छेदना पड़े, असभ्यता माना जाता है....!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

जैसे-जैसे देश के लोगों में जागरूकता बढ़ रही है वैसे वैसे हमारी संस्कृति, परंपराओं, रीती-रिवाजों की अच्छाइयां सामने आने लगी हैं। देशी-विदेशी कुचक्रों के तहत हमारे संस्कारों को उपहास का पात्र बना, पीछे धकेलने की साजिशों से भी निजात पाई जा रही है। सनातन काल से चली आ रही हमारी दिनचर्या से जुडी आदतों, काम करने के तरीकों के वैज्ञानिक, पर्यावरण तथा सेहत के अनुकूल तथा हानिरहित होने के कारण अब तथाकथित विकसित देश भी उन्हें मानने और सम्मान देने लगे हैं। पर अपने ही घर में, अपने ही कुछ लोगों को अभी भी सद्बुद्धि की जरुरत है !

शरीर और जिंदगी के लिए सबसे जरुरी चीज है, भोजन ! एक ओर जहां पश्चिमी देशों में चम्मच-कांटे से खाने का चलन है तो हमारे यहां हाथों से खाना आम बात है। इस तरीके की काफी आलोचना होती रही है। अंग्रेजियत के खुमार से ग्रसित लोग इसे पिछड़ेपन की निशानी भी करार देते रहे हैं ! उनके अनुसार इससे संक्रमण का खतरा रहता है। लेकिन अब कई अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि हाथों से खाने पर भोजन का स्वाद बढ़ जाता है ! न्यूयॉर्क की स्टीवन्स यूनिवर्सिटी में लगभग 50 लोगों पर एक प्रयोग के दौरान सब को कुछ पनीर दिया गया, जिसे आधे प्रतिभागियों को हाथ से खाना था और आधे लोगों को चम्मच से ! निष्कर्ष यह निकल कर आया कि जिन लोगों ने हाथों से चीज़ खाई थी, वे उसे बेहद ज्यादा स्वादिष्ट बता रहे थे, जबकि बाकियों के लिए वह एकऔसत स्वाद था। 

भारत में हाथ से खाने का चलन तो है लेकिन अलग-अलग प्रदेशों में कुछ नियमों के तहत कई अलिखित सावधानियां भी बरती जाती हैं ! जिनमें भोजन के पहले जूते वगैरह उतार, हाथ-पैर धोना जरुरी होता है ! उत्तर भारत में खाते हुए अंगुलियों का ही इस्तेमाल किया जाता है, यहां पूरी हथेली से खाना अच्छा नहीं माना जाता ! पर वहीं दक्षिण में हथेली और अंगुलियों दोनों का ही उपयोग आम है ! इसके अलावा खाने के लिए दाहिने हाथ का ही ज्यादातर उपयोग किया जाता है ! ये चलन लगभग पूरे देश में है। पारंपरिक खाने के अलावा बहुत कम ही चीजें हैं, जिनके लिए चम्मच का उपयोग होता है, जैसे तरल पदार्थ, दही-खीर-हलुवा या आइसक्रीम वगैरह !

वैसे दक्षिण भारत में न केवल हाथ से खाने का चलन है, बल्कि यहां केले के पत्तों पर खाना खाया जाता है। आज भी वहां बहुत से घरों समेत रेस्त्रां में भी ये एक आम बात है। नई खोजों में यह बात सामने आई है कि केले के पत्तों में पॉलीफेनॉल्स नामक प्राकृतिक एंटी-ऑक्सिडेंट के साथ-साथ एंटी-बैक्टीरियल गुण भी पाए जाते हैं जिससे कई बीमारियों से बचाव हो जाता है। इसके अलावा सबसे बड़ा फायदा है ये है कि केले के पत्ते में भोजन करने से हमारे शरीर में कोई रासायनिक तत्व नहीं जाता है ! 

आयुर्वेद के अनुसार, हमारी पांच उंगलियां पांच तत्व हैं। अंगूठे को अग्नि, तर्जनी को वायु, मध्यम उंगली को आकाश, अनामिका यानी रिंग फिंगर को पृथ्वी और छोटी उंगली को जल का प्रतिनिधि कहा जाता है। जब व्यक्ति इन पांच उंगलियों की मदद से भोजन करता है, तो ये पांचों तत्व प्रेरित हो जाते हैंऔर उनकी ऊर्जा भोजन में प्रवेश कर हमारे शरीर में पहुंच जाती है ! हाथ से भोजन करने के दौरान जो एक मुद्रा बनती है, वह भोजन को शरीर केअनुकूल और पाचन में सहायक होती है। हमारे वेदों के अनुसार, हाथ से खाने का सीधा असर चक्रों पर पड़ता है और हाथ के इस्तेमाल से खून के प्रसार में भी इजाफा होता है ! हाथ से खाना खाने के समय हमारे हाथ "टेंपरेचर सेंसर" की तरह काम करते हैं। इसलिए हम बहुत ज्यादा गर्म या ठंडे खाने से होने वाले नुक्सान से भी बच जाते हैं ! 

ज्ञातव्य है कि भारत सरकार के औपचारीक भोजों में सभी को कटलरी का उपयोग करते हुए भोजन करने की इजाजत है ! यदि कोई हाथ से खाना चाहे तो इसकी अनुमति नहीं है ! हो सकता है कि विदेशी मेहमानों की उपस्थिति के कारण ऐसे नियम बने हों ! पर क्या इन्हें बदला नहीं जा सकता ! यूनानी या रोम वासी खाते समय कभी कटलरी का प्रयोग नहीं करते ! दुनिया के अनेक भागों में अतिथि को ऐसा भोजन परोसना, जो छुरी से काटना, फाड़ना या छेदना पड़े, असभ्यता माना जाता है ! 

सबसे मुख्य बात कि हमारा भारतीय भोजन ज्यादातर हाथ से खाने वाला ही होता है ! अब मक्के-बाजरे की रोटी या गेहूं के परांठे वगैरह छुरी कांटे से तो नहीं ही खाए जा सकते ! यहां तक कि आज का अत्यधिक लोकप्रिय खाद्य पिज्जा भी हाथ से ही बेहतर तरीके से खाया जा सकता है ! यदि आमिष भोजन की बात करें तो वह भी हाथ से खाने में ज्यादा सुरक्षित रहता है ! इसलिए हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि बिना किसी  दिखावे या पूर्वाग्रह के हम जहां तक हो सके हाथों से ही भोजन ग्रहण कर उसका पूरा फायदा और आनंद ले सकें।   

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