लब्बोलुआब यह है कि किसी ने चाहे कैसे भी, यदि कुछ दिया, तो मुसीबत में किसी जरूरतमंद की सहायता तो हुई ही ! फिर देने वाले की मंशा चाहे कुछ भी हो
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
गुरुवार, 8 जुलाई 2021
सोनू सूद, कुछ कही कुछ अनकही
शुक्रवार, 2 जुलाई 2021
दिल्ली का सिंघु बॉर्डर ! कौन था यह सिंघु
चर्मकार परिवार का वह युवक जन-जन का नायक बन गया ! क्या जाट, क्या राजपूत, क्या ब्राह्मण सभी उसके मुरीद हो गए ! उसने भी बिना भेद-भाव के समाज सेवा में खुद को समर्पित कर दिया ! उसी के सम्मान स्वरुप उस जगह का नाम, जहां सात दिनों तक लड़ाई चली थी, सिंघु बॉर्डर रख दिया गया। वर्षों बाद इस गुमनाम सी जगह और सिंघुराम को इस किसान आंदोलन के धरने ने पूरे देश में विख्यात कर दिया.................!!
#हिन्दी_ब्लागिंग
हरियाणा और उत्तरप्रदेश के मैदानी इलाकों से घिरी दिल्ली में प्रवेश के लिए दसियों मार्ग हैं जो अलग-अलग बॉर्डर के नाम से जाने जाते हैं। सुविधा के लिए तकरीबन सारे नाम सीमा पर स्थित जगहों, गावों या उपनगरों के नाम पर ही रखे जाते रहे हैं। जैसे बदरपुर, सिंघु, नोएडा, फरीदाबाद, गाजीपुर, टिकरी, गुरुग्राम, औचंदी, झड़ौदा, कुंडली बॉर्डर इत्यादि। मुख्य मार्ग पर पड़ने वाली सीमाओं के नामों से तो सभी परिचित होते ही हैं, पर महीनों से चलने वाले किसान आंदोलन ने कुछ अनजाने से नामों को भी प्रसिद्धि दिलवा दी। ऐसा ही एक नाम है सिंघु बॉर्डर ! जो करनाल बायपास की तरफ से हरियाणा-दिल्ली बॉर्डर का एक चेक पोस्ट है। शुरू में आम इंसान की तो छोड़ें अखबारों तक में इसे अज्ञानता के कारण सिंघु की जगह सिंधु बॉर्डर कहा जाता रहा था। अभी भी अधिकांश लोगों को इस नाम के बारे में कोई खास जानकारी नहीं है ! कौन था सिंघु, जिसके नाम पर इस जगह का नामकरण कर दिया गया !
कहा जाता है कि जेल से आने के बाद यह चर्मकार परिवार का युवक जन-जन का नायक बन गया ! क्या जाट, क्या राजपूत, क्या ब्राह्मण सभी उसके मुरीद हो गए ! उसने भी बिना भेद-भाव के समाज सेवा में खुद को समर्पित कर दिया ! आज से करीब पांच साल पहले उनका निधन हो गया ! उन्हीं के सम्मान स्वरुप उस जगह का नाम, जहां सात दिनों तक लड़ाई चली थी, सिंघु बॉर्डर रख दिया गया। वर्षों बाद इस गुमनाम सी जगह और सिंघुराम को इस किसान आंदोलन के धरने ने पूरे देश में विख्यात कर दिया !
साभार अंतर्जाल
गुरुवार, 24 जून 2021
बूँदों की सरगम और मानसून के साज पर राग पावस
नन्ही - नन्हीं बूँदों के अलौकिक संगीत के बीच सतरंगी पुष्पों से श्रृंगार किए, धानी चुनरी ओढ़े, दूब के मखमली गलीचे पर जब प्रकृति, इंद्रधनुषी किरणों के साथ हौले से पग धरती है तो नभ के अमृत - रस से सराबोर हुए पृथ्वी के कण - कण का मन - मयूर नाचने - गाने को बाध्य सा हो जाता है। बसंत यदि ऋतु-राज है तो वर्षा ऋतु-साम्राज्ञी है ! उसी महारानी का अद्भुत श्रृंगार 'मानसून' कहलाता है ! इसके क्रियान्वयन के लिए उन ख़ास हवाओं जरुरत पड़ती है, जो हिंद व अरब महासागर से उठ, हमारे देश को दक्षिण-पश्चिम दिशा से घेर, जमीन की तरफ पानी लेकर आती हैं ! उन्हीं हवाओं को "मानसून" के नाम से जाना जाता है। ऐसा न हो कि प्रकृति का यह अनुपम, अनमोल तोहफा, राग पावस और बूँदों की सरगम की मधुर ध्वनि किसी कंप्यूटर की डिस्क में ही सिमट कर रह जाए...............!!
#हिन्दी_ब्लागिंग
इस बार देश में भले ही पिछले सालों जैसी झुलसा देने वाली उतनी लंबी गर्मी न पडी हो, देश के अधिकांश भागों में मानसून ने भी कुछ पहले ही दस्तक दे दी थी। पर दिल्ली समेत कुछ इलाकों में गर्मी ने विदा होने के पहले जून के अंतिम सप्ताह में अपना असली रूप कुछ न कुछ दिखाया जरूर है। हालांकि उसका रौद्र रूप अपने चरम पर नहीं रहा, नाही उतनी पानी की किल्लत हुई पर एक बार तो उसने अपनी उपस्थिति जाहिर कर ही दी। समयानुसार प्रकृति ने फिर करवट बदली है ! कुछ देर से ही सही सकून देने वाली पावस ऋतु के कदमों में बंधी पायल की सुमधुर रिम-झिम ध्वनि सुनाई पड़ने लगी है। धीरे-धीरे सारा देश इस मधुर ध्वनि के आगोश में खो जाने वाला है। इस बार कुछ देर से ही सही पर आकाश से बरसने वाली इस अमृत रूपी बरसात से जल्द ही सिर्फ हमारा देश ही नहीं, पाकिस्तान और बांग्ला देश भी तृप्त और खुशहाल होने वाले हैं। जून से सितंबर तक होने वाली इस बरसात को जो हवाएं, हिंद और अरब महासागर से उठ, अपने देश को दक्षिण-पश्चिम दिशा से घेर, जमीन की तरफ पानी लेकर आती हैं उन्हीं हवाओं को "मानसून" के नाम से जाना जाता है। मानसून नाम अरबी भाषा के ''मावसिम'' शब्द से आया है।
इन दिनों की राह तो जैसे सारी कायनात देख रही होती है ! मौसम का यह खुशनुमा बदलाव समस्त चराचर को अभिभूत कर रख देता है। आकाश में जहां सिर्फ आग उगलते सूर्य का राज होता था वहीं अब जल से भरे कारे-कजरारे मेघों का आधिपत्य हो जाता है। उनसे झरती नन्ही-नन्हीं बूँदों के अलौकिक संगीत के बीच जब सतरंगी पुष्पों से श्रृंगार किए, धानी चुनरी ओढ़े, दूब के मखमली गलीचे पर जब प्रकृति, इंद्रधनुषी किरणों के साथ हौले से पग धरती है तो नभ के अमृत-रस से सराबोर हुए पृथ्वी के कण-कण का मन-मयूर नाचने-गाने को बाध्य सा हो जाता है। बसंत यदि ऋतु-राज है तो वर्षा ऋतु-साम्राज्ञी है। प्राचीन काल के ऋषि-मुनियों से लेकर आज तक शायद ही कोई कवि या रचनाकार हुआ होगा जो इसके प्रेम-पाश से बच सका हो।
गुरुवार, 17 जून 2021
क्या आप भी बिस्कुट को चाय में डुबो कर खाते हैं
कोई चाहे कुछ भी कहे ! पर बिस्कुट को चाय में भिगो कर खाने का मजा कुछ और ही है ! पर इस काम में "टाइमिंग" बहुत मायने रखती है, जो बिस्कुट के आकार-प्रकार, चाय (दूध या कॉफी) की गर्माहट, कप की मुंह से दूरी आदि से तालमेल बिठा कर तय होती है। जहां ग्लूकोज़ बिस्कुट, केक-रस्क या बेकरी के उत्पादों के भिगोने का समय अलग होता है, वहीं "मैरी, थिन-अरारोट या क्रीमक्रैकर'' जैसे बिस्कुटों का कुछ अलग। यह पूरा मामला स्वाद का है ! यदि बिस्कुट पूरा ना भीगे तो उसमें वह लज्जत नहीं आ पाती जिसका रसास्वादन करने को जीभ लालायित रहती है और कहीं ज्यादा भीग जाए तो फिर वह प्याले में डुबकी लगाने से बाज नहीं आता.........!!
हमारी कई ऐसी नैसर्गिक खूबियां हैं, जो बेहतरीन कला होने के बावजूद किसी इनीज-मिनीज-गिनीज रेकॉर्ड में दर्ज नहीं हो पाई हैं। ऐसा नहीं होने का कारण यह भी है कि इस ओर हमने कभी कोई कोशिश या दावा ही नहीं किया है ! ऐसी ही एक नायाब कला है, बिस्कुट को चाय में डुबो, बिना गिराए मुंह तक ले आ कर खाने की ! सुनने-दिखने में बेहद मामूली सा यह काम उतना आसान नहीं है, जितना लगता है। इस सारी प्रक्रिया में बेहद तन्मयता, एकाग्रता, विशेषज्ञता और कारीगरी की जरुरत होती है। यह अपने आप में एक विज्ञान है ! इसके पीछे पूरा एक गणित काम करता है ! हम ऐवंई नहीं गणित में जगतगुरु बन गए थे ! पर चूँकि हमारे यहां और हमारे लिए यह एक आम बात है तथा हम इसे बिना किसी विशेष प्रयास के सरलता से अंजाम दे देते हैं, इसलिए इसे बच्चों का खेल समझ इसकी पेचीदगी की ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता। पर अपने-आप को मॉडर्न समझने वाले या नीम-विदेशी इसे चाहे कितनी भी हिकारत की नज़र से देखें, उससे इस विज्ञान की अहमियत कम नहीं हो जाती।
वैसे इस काम में "टाइमिंग" बहुत मायने रखती है ! जो बिस्कुट के आकार-प्रकार, चाय (दूध या कॉफी) की गर्माहट, कप की मुंह से दूरी आदि से तालमेल बिठा कर तय होती है। जहां ग्लूकोज़ बिस्कुट, केक-रस्क या ''बेकरी'' के उत्पादों को भिगोने का समय अलग होता है, वहीं "मैरी, थिन-अरारोट या क्रीम-क्रैकर जैसे बिस्कुटों का कुछ अलग। यह नैसर्गिक कला हमें विरासत में मिलती चली आई है। पहले बिस्कुटों की इतनी विभिन्न श्रेणियाँ नही होती थीं । परन्तु तरह-तरह के बिस्कुट, केक, रस्क या टोस्ट के बाजार में आ जाने के बावजूद हमें कोई दिक्कत पेश नहीं आई है। हमारी प्राकृतिक सूझ-बूझ ने सब के साथ अपनी "टाइमिंग" सेट कर ली है।
मंगलवार, 15 जून 2021
मेरी शेव को तो आपकी भाभी तक नोटिस नहीं करतीं
हमें लगता है कि मुझे देख लोग क्या कहेंगे ! अरे कौन से लोग ? दुनिया में कौन है जो पूरी तरह से देवता का रूप ले कर पैदा हुआ है ? हरेक इंसान में कोई ना कोई कमी होती है ! यह जो निर्माता से पैसा लेकर, मीडिया पर अवतरित हो, हमें उल्टी-सीधी चीजें बेचने की कोशिश करते हैं, वे खुद तरह-तरह की पच्चीसों बिमारियों-व्याधियों से घिरे हुए हैं। दुनिया में गोरों की संख्या से कहीं ज्यादा काले, पीले, गेहुएं रंग वालों की आबादी है। एक अच्छी खासी तादाद नाटे लोगों की है। करोंड़ों लोगों का वजन जिंदगी भर पचास का आंकड़ा नहीं छू पाता ! लाखों लोग मोटापे की वजह से ढंग से हिल-ड़ुल नहीं पाते ! गंजेपन से तंग-हार कर उसे फैशन ही बना दिया गया है ........................!!
#हिन्दी_ब्लागिंग
मेरे मित्र त्यागराजनजी बहुत सीधे, दुनियादारी से परे एक सरल ह्रदय और खुशदिल इंसान हैं। किसी पर भी शक, शुबहा, अविश्वास करना तो उन्होंने जैसे सीखा ही नहीं है। अक्सर अपने-अपने काम से लौटने के बाद हम संध्या समय चाय-बिस्कुट के साथ अपने सुख-दुख बांटते हुए दुनिया जहान को समेटते रहते हैं। पर कल जब वह आए तो कुछ अनमने से लग रहे थे ! जैसे कुछ बोलना चाहते हों पर झिझक रहे हों ! मैंने पूछा कि क्या बात है ? कुछ परेशान से लग रहे हैं ! वे बोले, नहीं ऐसी कोई बात नहीं है ! मैंने कहा, कुछ तो है, जो आप मूड़ में नहीं हैं। वे धीरे से मुस्कुराए और बोले, कोई गंभीर बात नहीं है, बस ऐसे ही कुछ उल्टे-सीधे, बेतुके से विचार बेवजह भरमाए हुए हैं। सुनोगे तो आप बोलोगे कि पता नहीं आज कैसी बच्चों जैसी बातें कर रहा हूं ! मैंने कहा, अरे, त्यागराजन जी हमारे बीच ऐसी औपचारिकता कहां से आ गई ! जो भी है खुल कर कहिए ! क्या बात है।
थोड़ा सा प्रकृतिस्ठ हो वे बोले, टी.वी. में दिन भर इतने सारे विज्ञापन आते रहते हैं, तरह-तरह के दावों के साथ ! जिनमें से अधिकतर गले से नहीं उतरते ! जबकि उनमें से अधिकांश को कोई सेलेब्रिटी या समाज के शिखर पर बैठी बड़ी-बड़ी हस्तियां पेश करती हैं। अपने दावों का सच तो प्रस्तुत करने वाले भी जानते ही होंगे ! फिर उनकी क्या मजबूरी है जो आम आदमी को गलत संदेश दे उसे भ्रमित करते रहते हैं ! ना उन्हें पैसे की कमी है, ना हीं शोहरत की ! फिर क्यूं वे ऐसा करते हैं ? अब जैसे मैं एक क्रीम शाहरूख के समझाने से वर्षों से लगा रहा हूँ ! पर मेरा रंग वैसे का वैसा ही सांवला है। मुझे लगा कि इतना बड़ा हीरो है, झूठ थोड़े ही बोलेगा मेरी स्किन में ही कोई गड़बड़ी होगी !
क्या कभी आपने परफ्यूम लगाए किसी ऐंड़-बैंड़ छोकरे के पीछे बदहवास सी कन्याओं को दौड़ते देखा है ? अरे, महिलाएं बेवकूफ नहीं होतीं, उनमें पुरुषों से ज्यादा शऊर, सलीका व मर्यादा होती है ! अच्छे-बुरे की पहचान युवकों से ज्यादा होती है
मैं अपनी हंसी दबा कर बोला, क्या महाराज, आप भी किसकी बातों में आ गए ! अरे, वहां सब पैसों का खेल है ! उनकी कीमत चुकाओ और कुछ भी करवा या बुलवा लो ! उसकी बातों में सच्चाई होती तो उस क्रीम के निर्माता अपनी फैक्टरी अफ्रीका में लगाए बैठे होते, जहां चौबिसों घंटे बारहों महीने लगातार उत्पादन कर भी वे वहां की जरूरत पूरी नहीं कर पाते, पर करोंड़ों कमा रहे होते।
त्यागराजन जी कुछ उत्साहित हो बोले, वही तो ! मैं समझ तो रहा था, पर ड़ाउट क्लियर करना चाहता था। जैसे मैं एक बहु-विज्ञापित ब्लेड़ से दाढी बनाते आ रहा हूं ! शेव करने के बाद बाहर किसी कन्या की तो बात ही छोड़िए, आपकी भाभी तक ने भी कभी नोटिस नहीं किया कि मैंने शेव बनाई भी है कि नहीं ! पर उधर इस ब्लेड के विज्ञापन में शेव बनने की देर है, कन्या हाजिर। वैसे आप तो मुझे जानते ही हैं कि यदि ऐसा कोई हादसा मेरे शेव करने पर होता तो मैं तो शेव बनाना ही बंद कर देता।
मैं बोला, यह सब बाजार की तिकड़में हैं ! जिनमें रत्ती भर भी सच्चाई नहीं होने पर भी लोग बेवकूफ बनते रहते हैं। इनका निशाना खासकर युवा वर्ग होता है। आप ही एक बात बताईए, आप अपने काम के सिलसिले में इतना घूमते हैं ! हर छोटे-बड़े शहर में आपका आना-जाना होता है, पर क्या कभी आपने परफ्यूम लगाए किसी ऐंड़-बैंड़ छोकरे के पीछे बदहवास सी कन्याओं को दौड़ते देखा है ? अरे, महिलाएं बेवकूफ नहीं होतीं, उनमें पुरुषों से ज्यादा शऊर, सलीका व मर्यादा होती है ! अच्छे-बुरे की पहचान भी युवकों से कहीं ज्यादा होती है ! मुझे तो आश्चर्य है कि महिलाओं की प्रगति की बात करने वाले किसी भी संगठन ने ऐसे घटिया विज्ञापनों और उनके बनाने वालों पर तुरंत कार्यवाही क्यों नहीं की !
अच्छा एक बात बताईए ! आप भाभीजी के साथ साड़ी वगैरह तो लेने गये होंगे ? कभी किसी भी दुकान में विक्रेता को इन विज्ञापनों की तरह लटके-झटकों के साथ साड़ी बेचते देखा है ? कभी किसी बीमा एंजेंट को बस या ट्रेन में बीमा पालिसी बेचते देखा है ? किसी भी पैथी की दवा खा कर कोई शतायू हो सका है ? किसी पेय को पी कर किसी बच्चे को ताड़ सा लंबा, बलवान या कुशाग्र बनते देखा है ? किसी भी डिटर्जेंट से नए कपडे जैसी सफाई हो पाती है ? सारे कीट नाशक, साबुन, हैण्ड वाश अपने 99.9 वाले दावे से कानून से क्यूँ और कैसे बचे रह जाते हैं ? यह सब सिर्फ बाजार के इंसान के दिलो-दिमाग में घर किए बैठे किसी अनहोनी के डर का फायदा उठा अपने अस्तित्व को बचाए रखने की तिकड़में भर हैं !
हमें सदा अपनी कमजोरियां दिखती हैं ! इसीलिए हम अपनी खूबियों को नजरंदाज करते रहते हैं। हमें लगता है कि मैं ऐसा हूं तो लोग क्या कहेंगे ! अरे कौन से लोग ? किसे फुरसत है किसी को देखने, आंकने की ! वैसे भी दुनिया में कौन ऐसा है जो पूरी तरह से देवता का रूप ले कर पैदा हुआ हो बिना किसी खामी के ? हरेक इंसान में कोई ना कोई कमी होती ही है ! यह जो निर्माता से पैसा लेकर, मीडिया पर अवतरित हो, उल्टी-सीधी चीजें हमें बेचने की कोशिश करते हैं, वे खुद तरह-तरह की पच्चीसों बिमारियों-व्याधियों से घिरे हुए हैं ! दुनिया में गोरों की संख्या से कहीं ज्यादा काले, पीले, गेहुएं रंग वालों की तादाद है। एक अच्छी खासी तादाद नाटे लोगों की है। करोंड़ों लोगों का वजन जिंदगी भर पचास का आंकड़ा नहीं छू पाता। लाखों लोग मोटापे की वजह से ढंग से हिल-ड़ुल नहीं पाते ! गंजेपन से तंग-हार कर उसे फैशन ही बना दिया गया है........!
अब आप जरा अपनी ओर देखिए ! इस उम्र में आज भी आप पांच-सात कि.मी. चलने के बावजूद थकान महसूस नहीं करते ! किसी शारीरिक व्याधि से कोसों दूर हैं। छूट-पुट समस्या को छोड़ दें तो दवा-दारु और उसके खर्चों से बचे हुए हैं ! अपने सारे काम बिना सहायक के पूरे करने में सक्षम हैं ! यह भी तो भगवान की अनमोल देन है आपको ! आप जो हैं खुद में एक मिसाल हैं, अपने लिए ! इन टंटों में ना पड़ मस्त रहिए ! खुश और बिंदास होकर प्रभू द्वारा दी गई जिंदगी का आनंद लीजिए।
मेरे इतने लंबे भाषण से त्यागराजनजी को कुछ-कुछ रिलैक्स होता देख मैंने अंदर की ओर आवाज लगाई कि क्या हुआ भाई, आज चाय अभी तक नहीं आई ? तभी श्रीमतीजी चाय की ट्रे लिए नमूदार हो गयीं। चाय का पहला घूंट लेते ही त्यागराजनजी बोल पड़े, भाभीजी यह टीवी पर दिखने वाली वही ताजगी वाली चाय है ना, जिसमें पांच-पांच जड़ी-बूटियां पड़ी होती हैं ?
बहुत रोकते, रोकते भी मेरा ठहाका निकल ही गया !
@करीब ग्यारह साल पुरानी रचना, आज भी सामयिक
शनिवार, 12 जून 2021
कुछ समस्याओं का हल, सिर्फ नजरंदाजगी
इनको ख़त्म करने का सरल सा उपाय है, इनकी उपेक्षा ! जैसे सर्दी जुकाम का कोई इलाज नहीं है, पर उस पर ध्यान ना दे, सिर्फ शरीर को आराम देने से उसके कीटाणु नष्ट हो जाते हैं ठीक उसी तरह इनके क्रिया-कलापों-बतौलेबाजी को अनदेखा-अनसुना कर इनसे छुटकारा पाया जा सकता है
शुक्रवार, 11 जून 2021
दिल को देखो, चेहरा ना देखो
तक़रीबन सभी प्रमुख दलों के सर्वोच्च पदों पर कुछ लुभावने, आकर्षक व सुंदर मुखड़ों का वर्चस्व रहता है ! कुछ सुप्रीमो, प्रभु प्रदत्त अपनी इस नेमत को मानव कौशल की छेनी-हथोड़ी से सुधरवाने की कोशिश करते हैं। पर यदि उनका खुद का सांचा और समय का गणित उसमें बाधा खड़ी करता है तो वे अपने धन-बल व साख से खुद के चहुंओर आकर्षक व सुंदर चेहरों की बाड़ लगा लेते हैं। ऐसों का अपने प्रवचनों के दौरान जब कभी मुंह खुलता है, तो सहसा उन पुरानी हवेलियों और महलों की छतों इत्यादि में पानी की निकासी के लिए बनी, भव्य और नक्काशीदार नालियों की याद आ जाती है जो खुद तो बनावट में सुंदर व आकर्षक होती हैं, पर उनमें से निकलने वाला पानी गंदगी और दुर्गन्धयुक्त होता है.............!!
#हिन्दी_ब्लागिंग
चेहरे के बारे में किशोर कुमार कहते-कहते चले गए कि इस लुटेरे से बच कर रहो, दिल की बात सुनो ! उनके पहले और बाद में भी बहुत से लोगों ने चेहरों से सावधान रहने को बहुत कुछ कहा है ! पर हम सदा चेहरे की लुनाई, उसकी सुंदरता, उसकी मनमोहकता पर रीझ उस पर फ़िदा होते रहे हैं। समाज के हर क्षेत्र में लियाकत के साथ-साथ सुंदर व आकर्षक चेहरा सफलता के मापदंडों में प्रमुख भूमिका निभाता रहा है !राजनीती को ही देख लें ! तक़रीबन सभी प्रमुख दलों के सर्वोच्च पदों पर लुभावने, आकर्षक व सुंदर मुखड़ों का वर्चस्व रहता है ! यदि कुछ सुप्रीमो खुद इस कसौटी पर कहीं नहीं ठहरते तो वे प्रभु प्रदत्त अपनी इस नेमत को मानव कौशल की छेनी-हथोड़ी से सुधरवाने की कोशिश करते हैं। पर यदि उनका खुद का सांचा और समय का गणित उसमें बाधा खड़ी करता है तो वे अपने धन-बल व साख से खुद के चहुंओर आकर्षक व सुंदर चेहरों की बाड़ लगा लेते हैं। भले ही मुंह खोलते ही उनकी औकात सामने आ जाती हो ! पर उनके ग्लैमर से चूंधियाई हुई आम जनता की तालियों की आवाज, परिणाम आने तक ही सही, पार्टी में जान सी फूँक देती है !
इनके दल या उसके प्रमुख पर इनके क्रिया-कलापों की वजह से भले ही देश-विदेश में लानत-मलानत हो रही हो ! पर ये बिना किसी हिचक या शर्म के दूसरे की राई बराबर चूक को पहाड़ सा दर्शाते, सिद्ध करते मीडिया पर आ बतौलेबाजी करने लगते हैं
हमारा देश त्योहारों का देश है और हम, उत्सव प्रियः मानवा:। धीरे-धीरे हमारे चुनाव भी एक तरह के उत्सव में बदल गए हैं। अब उत्सव है तो मौज-मस्ती-हंसी-ठिठोली "इज ए मस्ट" ! सो इस त्यौहार के आते ही लुभावने-सलोने चेहरों की मांग बढ़ जाती है। जो ज्यादातर "शो या लोकप्रिय बिजनेस" से ताल्लुक रखते हैं। इनमें इक्के -दुक्के को छोड़ अधिकतर ऐसे होते हैं जिन्हें देश-समाज-गरीब-गुरबों की कोई चिंता नहीं होती ! उन्हें तो उनकी खुदगर्जी और राजनितिक दल की मज़बूरी इस स्टेज पर ले आती है ! वे तो अपने अस्ताचलगामी समय को भांप कर, लोगों में अपनी पहचान और अपने अतीत की यादों को बचाए रखने के लिए, जिस किसी भी पार्टी की तरफ से ज्यादा लुभावना प्रस्ताव मिलता है, उसी के हिमायती बन उसकी खिदमत और तीमारदारी में जुट उसके कहेनुसार "डॉयलाग डिलीवरी" कर अवाम और समाज को बरगलाने में लग जाते हैं !
ऐसे बहुत से मतलबपरस्त हैं, जो कभी इधर कभी उधर मंडराते हुए, अपने हितों को साधते रहते हैं ! कुछ ऐसे भी होते हैं जो अचानक मिल गई सत्ता, ताकत, लोकप्रियता को संभाल नहीं पाते ! फिर उनको किसी का लिहाज नहीं रहता। ना उम्र का ! ना पद का ! नाहीं देश की गरिमा या मान-सम्मान का ! ऐसों का प्रवचनों के दौरान जब कभी मुंह खुलता है, तो सहसा उन पुरानी हवेलियों और महलों की छतों इत्यादि में पानी की निकासी के लिए बनी, भव्य और नक्काशीदार नालियों की याद आ जाती है जो खुद तो बनावट में सुंदर व आकर्षक होती हैं, पर उनमें से निकलने वाला पानी गंदगी और दुर्गन्धयुक्त होता है ! ऐसे मतलबपरस्त लोग अपने आकाओं की नाकामयाबियों पर पर्दा डालने, उनको छिपाने के लिए दूसरों पर अनवरत विष-वमन करते रहते हैं। जो इनका एकमात्र और एक सूत्रीय कार्यक्रम रहता है ! जिसके लिए इनकी औकात से ज्यादा भुगतान इन्हें किया जाता है। इनके दल या उसके प्रमुख पर इनके क्रिया-कलापों की वजह से भले ही देश-विदेश में लानत-मलानत हो रही हो ! पर ये बिना किसी हिचक या शर्म के दूसरे की राई बराबर चूक को पहाड़ सा दर्शाते, सिद्ध करते मीडिया पर आ बतौलेबाजी करने लगते हैं।
आजकल हर चीज पराकाष्ठा को प्राप्त हो चुकी है। नफ़रत, द्वेष, ईर्ष्या की कोई हद नहीं रही है। आज जो ज्यादा अंतहीन बकवास कर सकता हो, स्तरहीन भाषा का इस्तेमाल कर सकता हो, निम्न कोटि के शब्दों का प्रयोग कर सकता हो, वही ज्यादातर पार्टीयों के प्रमुख प्रवक्ता का पद हासिल कर पाता है ! बशर्ते चेहरा लुभावना हो ! विपक्ष में ऐसे लोगों की भरमार है ! उनमें से कुछ पूर्वाग्रही और कुंठित लोगों को सिर्फ बाल की खाल निकालने, बात का बतंगड़ बनाने, सच पर झूठ का मुलम्मा चढ़ाने और दूसरे को किसी भी तरह दोषी ठहराने का काम सौंपा गया है ! इनको अपने इतिहास, अपने आकाओं की गलतियों और अपनी पार्टी की गलत नीतियों से कोई मतलब नहीं होता ! ये सिर्फ इन्तजार करते हैं कि सामने वाला कभी भी, कहीं भी कुछ भी बोले और ये अपनी सर्पजिह्वा से वैमनस्य फैलाना शुरू करें ! सोशल मीडिया पर तो छुद्र कोटि के ऐसे निम्न सोच वाले लोग बैठे हैं जो हर बात को ''शिट और पी'' (इन्हीं शब्दों का उपयोग कर) के समकक्ष बनाने में कोई गुरेज नहीं करते ! पता नहीं कैसी मानसिकता और सोच है ! ये इंसान हैं या कौवे, जिसका ध्यान सिर्फ गंदगी पर रहता है !
यह जरुरी नहीं कि हर किसी की विचारधारा एक हो ! इतना बड़ा देश है ! अथाह आबादी है ! सबकी अपनी-अपनी निष्ठा है ! अपनी-अपनी सोच है ! किसी की पसंद-नापसंद उसका अपना व्यक्तिगत मामला है। अच्छी बात है, विविधता होनी भी चाहिए। पर जब देश की बात हो, देश के प्रधान की बात हो, तब वह इंसान या व्यक्तिगत बात नहीं रह जाती। वह देश के मान-सम्मान, विदेशों में उसकी साख की बात बन जाती है। कोई व्यक्ति विशेष का विरोध करे, बात समझ में आती है। पर अपने स्वार्थ, अपने हित, अपनी महत्वकांक्षा की पूर्ती के लिए देश के गरिमामय पद की बदनामी की जाए, उस पर लांछन लगाए जाऐं, उसकी हर बात को गलत सिद्ध किया जाए, यह तो किसी भी तरह बर्दास्त करने की बात नहीं है ! कहा भी गया है की भय के बिना प्रीत नहीं होती ! तो आज उसी भय की सख्त जरुरत है ! यह भी सही है कि हमारे देश की रीती रही है कि यदि किसी के गलत काम का सौ लोग विरोध करते हैं तो दस उसके पक्ष में भी आ खड़े होते हैं ! उन्हीं दस की शह पर वह और कुकर्म करता जाता है ! तो आज उस कुकर्म करने वाले के साथ ही उन दस लोगों को भी सबक सिखाने की सख्त जरुरत है ! इसके लिए चाहे कुछ भी करना पड़े ! वृक्ष को स्वस्थ रख पर्यावरण बचाना है तो पहले दीमकों और कीड़ों का नाश तो करना ही पडेगा !
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