pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: सिंघुबॉर्डर
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शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

दिल्ली का सिंघु बॉर्डर ! कौन था यह सिंघु

चर्मकार परिवार का वह युवक जन-जन का नायक बन गया ! क्या जाट, क्या राजपूत, क्या ब्राह्मण सभी उसके मुरीद हो गए ! उसने भी बिना भेद-भाव के समाज सेवा में खुद को समर्पित कर दिया ! उसी के सम्मान स्वरुप उस जगह का नाम, जहां सात दिनों तक लड़ाई चली थी, सिंघु बॉर्डर रख दिया गया। वर्षों बाद इस गुमनाम सी जगह और सिंघुराम को इस किसान आंदोलन के धरने ने पूरे देश में विख्यात कर दिया.................!! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

हरियाणा और उत्तरप्रदेश के मैदानी इलाकों से घिरी दिल्ली में प्रवेश के लिए दसियों मार्ग हैं जो अलग-अलग बॉर्डर के नाम से जाने जाते हैं। सुविधा के लिए तकरीबन सारे नाम सीमा पर स्थित जगहों, गावों या उपनगरों के नाम पर ही रखे जाते रहे हैं। जैसे बदरपुर, सिंघु, नोएडा, फरीदाबाद, गाजीपुर, टिकरी, गुरुग्राम, औचंदी, झड़ौदा, कुंडली बॉर्डर इत्यादि। मुख्य मार्ग पर पड़ने वाली सीमाओं के नामों से तो सभी परिचित होते ही हैं, पर महीनों से चलने वाले किसान आंदोलन ने कुछ अनजाने से नामों को भी प्रसिद्धि दिलवा दी। ऐसा ही एक नाम है सिंघु बॉर्डर ! जो करनाल बायपास की तरफ से हरियाणा-दिल्ली बॉर्डर का एक चेक पोस्ट है। शुरू में आम इंसान की तो छोड़ें अखबारों तक में इसे अज्ञानता के कारण सिंघु की जगह सिंधु बॉर्डर  कहा जाता रहा था। अभी भी अधिकांश लोगों को इस नाम के बारे में कोई खास जानकारी नहीं है ! कौन था सिंघु, जिसके नाम पर इस जगह का नामकरण कर दिया गया !  


बात करीब 70-72 साल पहले 1949 के आस-पास की है। कानून व्यवस्था अभी पूरी तरह व्यवस्थित नहीं हो पाई थी। राज्यों की सीमाओं पर चोरी-डकैती, लूट-पाट, राहजनी की वारदातें होती रहती थीं। अपराधियों के वारदात के बाद एक राज्य से दूसरे में चले जाने पर पुलिस के लिए मामला पेचीदा हो जाता था। लोग रोज-रोज की इन घटनाओं से बुरी तरह तंग आ चुके थे। ऐसे ही माहौल में जब एक ठग गिरोह ने हरियाणा में एक बड़ी वारदात को अंजाम देते हुए सैकड़ों मवेशियों, बैलगाड़ियों और रसद-पानी के साथ-साथ घरों के सामान को चुरा, दिल्ली की तरफ ले जाने की कोशिश की, तब कैथल जिले के कवारतन गांव के निवासी सिंघुराम, जिनका पूरा नाम सिंघुराम सिंहमार टोरी था, ने के गांवों के आदमियों और अपने साथियों को इकठ्ठा कर उन डकैतों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया। कहते हैं कि लगातार सात दिनों तक लाठी-बल्लम से लड़ी गई लड़ाई में सिंघुराम और उनके साथयों ने पचासों ठगों को मार गिराया और सारा सामान व पशु वगैरह जिन गरीबों के थे उन्हें वापस दिलवा दिए ! पर इस झगडे और शांति व्यवस्था को भंग करने के जुर्म में उन्हें जेल की सजा भी मिली।  

कहा जाता है कि जेल से आने के बाद यह चर्मकार परिवार का युवक जन-जन का नायक बन गया ! क्या जाट, क्या राजपूत, क्या ब्राह्मण सभी उसके मुरीद हो गए ! उसने भी बिना भेद-भाव के समाज सेवा में खुद को समर्पित कर दिया ! आज से करीब पांच साल पहले उनका निधन हो गया ! उन्हीं के सम्मान स्वरुप उस जगह का नाम, जहां सात दिनों तक लड़ाई चली थी, सिंघु बॉर्डर रख दिया गया। वर्षों बाद इस गुमनाम सी जगह और सिंघुराम को इस किसान आंदोलन के धरने ने पूरे देश में विख्यात कर दिया !  

साभार अंतर्जाल 

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