मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

बॉक्सिंग डे यानी डिब्बा दिवस

अब वहां विदेशों में छुट्टी कभी भी हो पर अपने देश के क्रिकेट प्रेमी तो इस बार यही दुआ कर रहे हैं कि इस बार बॉक्सिंग दिवस पर खेले जाने वाले मैच में भारतीय टीम का डिब्बा गोल ना हो। वर्षों से हमारी टीम के साथ जुड़ा हुआ ''जिंक्स'' भी जाने वाले साल के साथ ही विदा हो। आमीन ! 

 भारत ने अब तक 14 बॉक्सिंग डे टेस्ट मैच खेले हैं और इनमें से दस में उसे हार का सामना करना पड़ा. उसने केवल एक मैच जीता है जबकि तीन अन्य ड्रॉ रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया में वह सात बॉक्सिंग डे टेस्ट का हिस्सा रहा और इनमें से पांच मैचों में उसे हार झेलनी पड़ी. जबकि दो मैच का कोई रिजल्‍ट नहीं निकला.
#हिन्दी_ब्लागिंग   
भारत ऑस्ट्रेलिआ के बीच तीसरा क्रिकेट टेस्ट मैच कल, यानी 26 दिसंबर 2018 को खेला जाना है। क्रिसमस के बाद का दूसरा दिन योरोप में "बॉक्सिंग दिवस'' के रूप में जाना जाता है। इसलिए इस दिन खेले गए मैच को बॉक्सिंग डे मैच कहते हैं। भारत ने अपने विदेशी दौरों पर 14 बॉक्सिंग डे मैच खेले हैं। जिनमें दस में हार मिली है, तीन ड्रॉ रहे हैं तथा सिर्फ एक मैच ही जीत पाया है वह भी साऊथ अफ्रीका से !  ऑस्ट्रेलिआ में बॉक्सिंग डे के मैच मेलबोर्न क्रिकेट ग्राउंड पर ही खेले जाते हैं। अब तक हम ने इस दिन वहां सात टेस्ट खेले हैं, जिनमें पांच में हार का सामना करना पड़ा है और बाकी दो ड्रॉ रहे हैं। इस तरह देखें तो तस्वीर निराशाजनक ही रही है। 
 मेलबोर्न क्रिकेट ग्राउंड 
अब रही इस दिन के नाम की बात ! बॉक्सिंग दिवस एक धर्मनिरपेक्ष उत्सव दिवस है। जो 26 दिसम्बर को मनाया जाता है, अर्थात बड़े दिन के अगले दिन, जो कि सेंट स्टीफेन दिवस भी है इसलिए यह एक धार्मिक अवकाश भी है। पर इसी दिन कई देशों में तरह-तरह के खरलों की शुरुआत होने के कारण ऐसा लगता है कि इस दिन का संबंध शायद बॉक्सिंग के खेल से हो, जबकी ऐसा नहीं है। हालांकि इस के बारे में कुछ ज्यादा स्पष्ट नहीं है। पर हर जगह ग़रीबों, जरूरतमंदों को धन या अन्य दान दे कर उनकी सहायता करने का चलन रहा है तो ऐसा मन जाता है कि तक़रीबन रोमन काल से यह परिपाटी चली आ रही है जब जरुरत का सामान और खाद्यपदार्थ डिब्बों में बंद कर उन्हें जरुरत मंद-बेसहारा लोगों के लिए चर्चों के बाहर रख दिए जाता था। वहीं कुछ खाली बॉक्स भी सेंट स्टीफेन की दावत के नाम पर कुछ रकम इकट्ठी करने के लिए रख दिए जाते थे। इन्हीं डिब्बों या बाक्सों के लेन-देन के कारण इस दिन का नाम बॉक्सिंग डे पड़ गया। 
इसको मनाने का कोई बहुत ही कठोर नियम नहीं है। कभी-कभी जब 26 दिसम्बर को रविवार पड़ जाता है तो बॉक्सिंग दिवस अगले दिन अर्थात 27 दिसम्बर को और यदि बॉक्सिंग दिवस शनिवार को पड़ जाये तो उसके बदले में आने वाले सोमवार को अवकाश दिया जाता है। परन्तु यदि क्रिसमस शनिवार को हो तो क्रिसमस की सुनिश्चित छुट्टी सोमवार 27 दिसम्बर को होती है और बॉक्सिंग दिवस का सुनिश्चित अवकाश मंगलवार 28 दिसम्बर को होता है।
अब वहां विदेशों में छुट्टी कभी भी हो पर अपने देश के क्रिकेट प्रेमी तो इस बार यही दुआ कर रहे हैं कि इस बार बॉक्सिंग दिवस पर खेले जाने वाले मैच में भारतीय टीम का डिब्बा गोल ना हो। वर्षों से हमारी टीम के साथ जुड़ा हुआ ''जिंक्स'' भी जाने वाले साल के साथ ही विदा हो। आमीन ! 

शनिवार, 22 दिसंबर 2018

सूजी आटे-मैदे की मंझली बहन है

यह मैदा और सूजी किस चीज से बनते हैं भई SS ? नई पीढ़ी को तो शायद ही पता होना था, बीच वाली भी सोच में पड़ी दिखी ! कुछ देर के बाद जवाब आया ! मैदा तोआटे से बनता है: सूजी का...पता नहीं ! घूम-फिर कर करीब एक दर्जन निगाहें मेरी तरफ ! आप ही बताओ ! सवाल ने ''बूमरैंग'' हो मेरे को ही आ घेरा था ! सच्चाई यह थी कि मैदे का प्रोसेस तो कुछ-कुछ मुझे मालुम था, पर सूजी के बारे में यहां भी  निल बटे सन्नाटा ही था........ ! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 
कल रात मजे-मजे में एक ऐसी बात हो गयी: जो अजीब तो थी पर गरीब बिल्कुल नहीं थी ! क्योंकि उससे यह बात निकल कर सामने आई कि  ऐसी बहुत सी चीजें है, खासकर खाद्य-पदार्थ जिन्हें हम वर्षों, पीढी दर पीढ़ी उपयोग में  तो लाते रहते हैं पर उनके बारे में पूरी जानकारी नहीं होती हमें ! अब जैसे मैदे और सूजी को ही लें ! शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहां इनका प्रयोग ना होता हो ! पर यह बनते कैसे हैं, बहुतों को नहीं पता ! 

तो हुआ कुछ यूँ कि कई दिनों की मसरूफियत के बाद कल रात मेरे कानूनी भाई के यहां इकट्ठा होने का मौका निकाला गया। जाहिर है भोजन का बंदोबस्त भी वहीं होना था, तो उदर-पूर्ति के लिए जो बनाया गया, वह था छोले-भटूरे और सूजी का हलवा। हल्का-फुल्का माहौल, ठंड का मौसम, स्वादिष्ट व्यंजन, दूसरे दिन अवकाश ! सब जने निश्चिंतता से संगत का लुत्फ़ उठा ही रहे थे कि अचानक मेरे जेहन में एक प्रश्न ने सर उठाया कि पूछूं तो सही कि यह मैदा और सूजी किस चीज से बनते हैं ? नई पीढ़ी को तो खैर क्या ही पता होना था: बीच वाली भी इसे ले, सोच में पड़ी दिखी ! कुछ देर के बाद जवाब आया, मैदा तो आटे से बनता है: सूजी का...पता नहीं ! घूम-फिर कर करीब एक दर्जन निगाहें मेरी तरफ ! आप ही बताओ ! सवाल ने ''बूमरैंग'' की तरह मेरे को ही आ घेरा था ! सच्चाई यह थी कि मैदे का प्रोसेस तो मुझे मालुम था, पर सूजी के बारे में यहां भी निल बटे सन्नाटा ही था। सब को यह बात बताई और कहा कल ब्लॉग में खुलासा करूंगा ! फिर वही हुआ जो ऐसे में होता है..''गूगलम शरणम गच्छामी''.. तो पेश है दूसरे दिन का लब्बो लुआब !

यह तो जग जाहिर है कि सेहत और पौष्टिकता के लिए आटा सर्वोपरि है। पर मैदा भले ही सेहत के लिए कुछ नुकसानदायक हो, इसके द्वारा बने अनगिनत व्यंजन होते तो सुस्वादु ही हैं। इसी कारण इसका प्रचलन कभी ख़त्म नहीं होता। इसको बनाने वाली मशीनें गेहूँ का आटा बनाने वाली चक्कियों से अलग होती हैं। जहां पहले गेहूँ को अच्छी तरह धो-सूखा कर उनकी सहायता से उसकी ऊपरी परत को निकाल देते हैं। फिर बचे हुए सफ़ेद भाग को बहुत ही महीन पीसा जाता है जिसके फलस्वरूप जो चिकना-हल्का पाउडर जैसा पदार्थ मिलता है वही मैदा कहलाता है। अब सवाल यह उठता है कि जब मैदा भी गेहूँ से ही बनता है तो फिर उससे परहेज करने को क्यों कहा जाता है ! इसका कारण है, इसके बनाने की विधि, जिसके दौरान ज्यादातर पौष्टिक पदार्थ जैसे मिनरल, विटामिन, प्रोटीन और फाइबर नष्ट हो जाते हैं पर कैलोरी बढ़ जाती है। फाइबर के ना होने से मैदा ठीक से पच नहीं पाता: वहीं अपनी चिकनाई की वजह से यह आँतों में चिपक भी जाता है, जिससे कब्ज इत्यादि की शिकायत बढ़ जाती है। इसके अलावा इसमें तेल इत्यादि को सोखने की नहुत क्षमता होती है जो खाद्य-पदार्थों को भारी बना देती है जिससे पेट से संबंधित अनेक परेशानियां होने लगती हैं। इसीलिए इसका कम से कम उपयोग करने की सलाह दी जाती है। 

अब रही सूजी की बात ! तो यह जान कर बड़ा आश्चर्य होगा कि सूजी, आटे-मैदे की मंझली बहन है ! वो ऐसे कि गेहूँ को मैदा बनाने के पहले चरण के दौरान उसकी ऊपरी परत हटाई जाती है तो इस प्रक्रिया में वह मोटे टुकड़ों में टूट जाता है। इन टुकड़ों में से भूसी को निकाल कर अलग करने के बाद जो बारीक बचे हुए कण प्राप्त होते हैं, उन्हीं को सूजी के नाम से जाना जाता है। जिनको फिर महीन पीस कर मैदा बनाया जाता है। यानी पहले गेहूं और उसका आटा, फिर सूजी और फिर मैदा ! तो हुई ना सूजी आटे मैदे की  मंझली बहन ! 

तो अगली बार जब भी इन व्यंजनों का लुत्फ़ लेने का मौका मिले तो इनके लाभ-हानि के साथ-साथ इनके आपसी रिश्ते को भी याद कर लें ! 

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

ऐसे लोगों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए

यह सब देखने के बाद मैंने कैटरिंग के मालिक की खोज की तो पता चला कि वह घर चला गया है, फ्लोर मैनेजर पर जिम्मेदारी छोड़। मैंने उसी को घेरा, ''इतनी ठंड है पर आपके काम करने वालों के पास उचित कपडे नहीं हैं !'' पहले तो वह चौंका, फिर बोला, ''इनमें ज्यादातर परमानेंट नहीं हैं, काम और जरुरत के अनुसार इन्हें रखा जाता है।'' मैंने कहा, ''वह तो ठीक है, पर वे भी तो इंसान हैं, जैसे ये पोशाकें इन्हें उपलब्ध करवाते हैं, वैसे ही मौसम के अनुसार कपडे दिए जा सकते हैं !'' 
''अब ये तो भैया जी ही कर सकते हैं, मैं क्या बोलूँ !'' 

#हिन्दी_ब्लागिंग     
कल हरियाणा के रेवाड़ी नगर में एक विवाह समारोह में जाने का अवसर मिला। खुले पार्क में भव्य आयोजन था। तरह-तरह की सजावट, बिजली की चकाचौंध, ढेर सारे स्टॉल, छोटे-बड़े-बच्चे-बुजुर्ग सब के लायक भिन्न-भिन्न तरह के ढेरों भोजन-व्यंजनों की व्यवस्था। पर सब खुले में ! जाहिर है दिसंबर का महीना, रात का समय, बढती ओस की मौजूदगी, हल्की सी बयार उस खुले-खुले वातावरण में सिहरन ला दे रही थी। पर भले ही ठंड ज्यादा थी पर उसके बावजूद घराती-बाराती-मेहमान सभी मौसमानुसार शीतकालीन पोशाकों में प्रकृति के इस रूप का भी भरपूर आनंद ले रहे थे। हल्का-फुल्का खुशनुमा माहौल था। पता ही नहीं चला कब घडी की सूई ग्यारह के आंकड़े को पार कर गयी। हमें दिल्ली वापस भी लौटना था। सो उदर-पूर्ती के लिए निर्दिष्ट जगहों की ओर रुख किया ! इसी रुख को इस ब्लॉग पोस्ट का कारण बनना था !

मैं कुछ ज्यादा ही मिष्टान प्रिय इंसान हूँ। इसलिए जहां लोग मुख्य भोजन के बाद जाते हैं मैं उल्टे तौर पर वहीं से शुरु करता हूँ, भले एक-एक चम्मच ही लूँ। शुरुआत में वहां लोग भी कम ही होते हैं ! जैसा कि आजकल आम चलन है, खाना बड़े-बड़े डोंगों में किसी ताप-प्रदत्त यंत्र पर रखा रहता है और उसके साथ ही आपकी सहायता के लिए कैटरर का कर्मचारी एक आकर्षक वेश भूषा में वहां तैनात रहता है। यहां भी वही दस्तूर था। मैंने वहां जा एक चम्मच गाजर के हलुए की फरमाइश की ! वहां तैनात इंसान ने बड़ी शालीनता से मुझे पेश भी किया, तभी मैंने गौर किया कि उसका हाथ काँप रहा है। जानते हुए भी मेरे मुंह से निकल गया, ''ठंड लग रही है ?" उसने हौले से सिर हिलाया और धीरे से कहा, ''हाँ ! सर, ठंड तो है !''  
खाने से मेरा मन कुछ उचट गया और अब पूरा ध्यान विवाह के उल्लासपूर्ण माहौल से हट वहां खातिरदारी करने में जुटे तीस-चालीस लोगों पर जा अटका ! उनकी पोशाक पर गौर किया तो पाया कि कोट नुमा वस्त्र, सूती है और कइयों ने तो सिर्फ बनियान के ऊपर ही पहन रखा है ! जो इस ठंड में बिल्कुल नाकाफी था, खासकर मैदान में घूम-घूम कर सर्व करने वालों के लिए। पर स्टॉल के पीछे खड़े होने वालों की हालत भी खराब ही थी, तंदूर के पास काम करने वालों को छोड़ कर। उसी समय एक और बात दिखी कि तंदूर के पास के स्टॉल के कर्मचारी कुछ-कुछ देर बाद किसी ना किसी बहाने तंदूर के पास 10-20 सेकेंड के लिए जा खड़े होते हैं,  जितनी भी गर्मी मिल जाए !

यह सब देखने के बाद मैंने कैटरिंग के मालिक की खोज की तो पता चला कि वह घर चला गया है। फ्लोर मैनेजर पर जिम्मेदारी छोड़। मैंने उसी को घेरा, ''इतनी ठंड है पर आपके काम करने वालों के पास उचित कपडे नहीं हैं !'' पहले तो वह चौंका, फिर बोला, ''इनमें ज्यादातर परमानेंट नहीं हैं, काम और जरुरत के अनुसार इन्हें रखा जाता है।'' मैंने कहा, ''वह तो ठीक है, पर वे भी तो इंसान हैं, जैसे ये पोशाकें इन्हें उपलब्ध करवाते हैं, वैसे ही मौसम के अनुसार कपडे दिए जा सकते हैं !'' 
''अब ये तो भैया जी ही कर सकते हैं, मैं क्या बोलूँ !'' 

बहरहाल बात यहीं ख़त्म हो गयी, पर कुछ सवाल जरूर छोड़ गयी कि क्या यह भी शोषण नहीं है ? ऐसे ताम-झाम पर तक़रीबन तीस-पैंतीस लाख यानी एक चौथाई करोड़ से भी ऊपर का बिल थमा दिया जाता है, जिसमें कम से कम पच्चीस-तीस प्रतिशत की बचत तो होती ही होगी ! तो क्या उसमें से सिर्फ दस-पंद्रह हजार अपने लिए ही काम कर रहे लोगों पर खर्च नहीं किए जा सकते ? चलिए उतना बड़ा दिल नहीं है तो कम से कम काम के दौरान जरुरत के अनुसार तो कुछ सुविधा दी ही जा सकती है ! ठंड में ढंग की यूनिफार्म तो उपलब्ध करवाई जा ही सकती है ! इससे अपरोक्ष रूप से संस्था को ही फायदा होगा, जब कर्मचारी मन से काम करेगा। यह ठीक है कि काम के बदले वेतन दिया जाता है ! पर किसी मजबूरीवश उसके उपस्थित ना हो पाने पर किसी और की उपलब्धता भी तो सदैव बनी रहती है ! जब सक्षम हैं तो सामाजिकता, मानवता, इंसानियत पर भी तो कुछ ध्यान दिया जाना चाहिए ! 
इसी उहापोह में था की श्रीमती जी की आवाज से तंद्रा लौटी, ''साढ़े ग्यारह बज गए हैं, कुछ लिया कि नहीं ? वापस नहीं जाना है ? पहुंचते-पहुंचते दो बज जाएंगे''     

बुधवार, 12 दिसंबर 2018

''अहम् ब्रह्मास्मि'' होने का वहम

आम इंसान को तो वे अहमकाना नीतियां भी समझ नहीं आतीं जिनमें एक तरफ तो पर्यावरण के नाम पर निजी वाहनों के उपयोग को निरुत्साहित किया जाता है और दूसरी तरफ मेट्रो और बसों के किराए बढ़ा दिए जाते हैं। तो जब इस हार का विश्लेषण हो तो उन अर्थशास्त्रियों, सलाहकारों, विशेषज्ञों को भी जरूर तलब किया जाना चाहिए जो अपने वातानुकूलित कक्ष में बैठ बिना किसी की परेशानी को समझ सिर्फ अपने आकाओं को खुश करने की खातिर किसी भी कीमत पर पेट्रोल-गैस के दाम कम करने के खिलाफ थे। तख्तनशीं लोगों को भी समझ लेना चाहिए कि चुनाव में तेल कंपनियों को खुश करने की बजाय जनता का साथ ज्यादा जरुरी होता है। यदि समय रहते 10-15 रुपये की राहत दे दी गयी होती तो शायद..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग  
पांच राज्यों में हुए चुनावों के परिणाम कइयों को अर्श से फर्श और फर्श से अर्श की तरफ ले आए। तरह-तरह के आकलन शुरू हो गए। अपनी कमजोरी को नजरंदाज कर दूसरों पर दोष मढ़े जाने लगे ! जीत पर अपनी ही पीठ थपथपाई जाने लगी ! और उधर हार के कारण गिनाए जाने लगे हैं। पर जरुरत है वास्विकता को समझने की। बातें हो रही हैं पदस्तता के विरुद्ध जनमत की ! सत्ता विरोधी लहर की ! थोपी गयी नीतियों की ! पूरे न किए गए वादों की ! अति आत्मविश्वास की ! सत्ता के गरूर की ! किसानों की अनदेखी की ! मौकापरस्तों की कलाबाजियों की ! पर इनमें ऐसी कौन सी बात है जो पहले कभी नहीं हुई ? किस सत्तारूढ़ दल को यह सब नहीं झेलना पड़ा ? फिर क्यों नहीं सबक लिया गया ? क्यों नहीं समय रहते चिड़ियों से खेत बचाया गया ? क्यों हवा के घोड़े पर सवार नेताओं को रोते-बिलखते-हैरान-निरीह लोग और उनकी परेशानियों, उनकी जद्दो-जहद नजर आनी बंद हो गयी ? जवाब वही पुराना है, सत्ता का नशा ! जिसमें आदमी अपने को ''अहम् ब्रह्मास्मि'' समझने लगता है ! इस हार का भी यही कारण रहा ! 

सच्ची बात तो यह है कि आम आदमी को फौरी तौर पर इससे कोई मतलब नहीं है कि पकिस्तान की करेंसी क्यों रसातल में चली गयी या जापान हमारे करीब क्यों आ गया या अमेरिका हमें क्यों गलबहियां डालने लगा है ! उसे मतलब होता है अपने रोजमर्रा के बढ़ते अनाप-शनाप खर्च से ! जब घर में रसोई गैस ख़त्म हो जाने पर चार सौ के बदले हजार रुपये का इंतजाम करना पड़ता है ! रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं को लेने के फेर में महीने के अंतिम दिन गुजारने मुश्किल हो जाते हैं ! घर के बुजुर्गों-बच्चों की जरूरतों को टालना पड़ता रहता है ! सुबह काम पर निकलते ही गाडी में पेट्रोल डलवाते समय हर बार कुछ ना कुछ ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं और कीमतें ना घटा पाने के बिना सिर-पैर के बहाने सुनने को मिलते हैं ! उसे तो वे अहमकाना नीतियां भी समझ नहीं आतीं जिनमें एक तरफ तो पर्यावरण के नाम पर निजी वाहनों के उपयोग को निरुत्साहित किया जाता है और दूसरी तरफ मेट्रो और बसों के किराए बढ़ा दिए जाते हैं। तो जब इस हार का विश्लेषण हो तो उन अर्थशास्त्रियों, सलाहकारों, विशेषज्ञों को भी जरूर तलब किया जाना चाहिए जो अपने वातानुकूलित कक्ष में बैठ बिना किसी की परेशानी को समझ सिर्फ अपने आकाओं को खुश करने की खातिर किसी भी कीमत पर पेट्रोल-गैस के दाम कम करने के खिलाफ थे। तख्तनशीं लोगों को भी समझ लेना चाहिए कि चुनाव में तेल कंपनियों को खुश करने की बजाय जनता का साथ ज्यादा जरुरी होता है। यदि समय रहते 10-15 रुपये की राहत दे दी गयी होती तो शायद जनता का आक्रोष कुछ कम किया जा सकता था ! पर उस समय सत्तामद में सिर्फ खजाना ही नजर आ रहा था !

कहते हैं ना कि जैसा राजा वैसी प्रजा, तो आज प्रजा का एक ख़ास तबका भी चुस्त-चालाक हो गया है ! वर्षों के अनुभव से वह भी समझ गया है कि जो सुविधा एक बार उपलब्ध होने लग जाए उसे फिर कोई रोक नहीं सकता, हाँ उससे ज्यादा मिलने की गुंजाइश जरूर हो जाती है। इसीलिए वह सत्ताविहीन दल द्वारा मुफ्त में मिलने वाले  लुभावने प्रस्तावों को लपकने के लिए सदा पाला बदलने के लिए तैयार रहने लगा है ! अब इसे भले ही पदस्तता के विरुद्ध यानी एंटी कम्बंसेंसी का नाम दे दिया जाए। ऐसी खैरातें बांटने में कोई भी दल पीछे नहीं रहता ! पर उसे उस एक बड़े तबके के रोष की खबर नहीं रहती जिसे आम भाषा में मध्यम वर्ग के नाम से जाना जाता है। इस तबके को सदा ही हाशिए पर रखा गया है, ना कभी इसकी जरूरतों पर ध्यान दिया जाता है ना ही उसकी मूलभूत सुविधाओं पर और ना ही उसकी परेशानियों पर ! जबकि यही लोग सरकार के खजाने को भरने में अपना सबसे ज्यादा योगदान देते है ! सरकारों द्वारा दी गयी हर खैरात पर इनकी जेब पर ही सबसे ज्यादा भार बढ़ता है। ना इनका कोई रहनुमा है ना कोई सुनने वाला ! क्योंकि अपनी विशाल आबादी के बावजूद यह आपस में ही बंटा-कटा हुआ है ! 

एक ख़ास बात, मुझ जैसा साधारण सा अराजनैतिक इंसान जिसका किसी भी पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है जब उसे कुछ अटपटा लग सकता है तो जानकार-विद्वान लोगों को यह क्यों नहीं समझ आता कि खैरात बाँट कर या मुफ्त में वस्तुएं वितरित कर किसी का भी लम्बे समय तक भला नहीं होता ! ना जनता का और नहीं बांटने वाले का ! दसियों उदहारण हैं इसके। वादा-खिलाफी अविश्वसनीय का लेबल चिपकवा देती है ! कड़वी-अभद्र-बेलगाम जुबान को लोग सिरे से नापसंद करते हैं ! अपनी कमियों-नाकामियों को दूर करने के बजाय दूसरों के अवगुणों को गिनाना जनता को रास नहीं आता। इससे तात्कालिक तौर पर भले ही तालियां बज जाएं पर दूरगामी परिणाम खोटे ही निकलते हैं। धर्म-जाति-भाषा के बिना राजनीती नहीं हो सकती पर इसको माध्यम बना किसी को नीचे दिखाना बहुत मंहगा साबित हो सकता है। आत्मविश्वास एक गुण है पर अति-आत्मविश्वास आत्मघाती ही सिद्ध होता है। 

अब यह सब तो एक आम आदमी का नजरिया है ! माननीय लोग कब समझेंगे क्या पता ? प्रभू सबको सद्बुद्धि प्रदान करें, आमीन  

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

एक मंदिर जहां वहीं के राजा का प्रवेश वर्जित है

धीरे-धीरे राजा प्रतापमल्ल को रोज-रोज इतनी दूर मंदिर में आना-जाना अखरने लगा तो उन्होंने नीलकंठ भगवान की एक मूर्ति राजमहल में ही स्थापित करवा ली। इससे भगवान नाराज हो गये और उन्होंने स्वप्न में आ राजा को श्राप दिया कि अब से तुम या तुम्हारा कोई भी उत्तराधिकारी यदि बूढा नीलकंठ हमारे दर्शन करने आएगा तो वह मृत्यु को प्राप्त होगा ! तब से सैकड़ों सालों के बाद आज भी  राजपरिवार का कोई भी सदस्य वहां जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया है.......!

#हिन्दी-ब्लागिंग 

पिछले दिनों हमारे यहां मंदिर  प्रवेश को लेकर काफी गुल-गपाड़ा मचा रहा। जिसमें इसकी-उसके अधिकार की बातें, कोर्ट-कचहरी, धर्म-अधर्म, राजनीती-सियासत सब तरह के रंग सामने आते रहे। ऐसे में एक ऐसे मंदिर की भी बात सामने आई, जहां खुद वहाँ के राजा का भी प्रवेश निषेद्ध है ! जी हाँ ! नेपाल में विष्णु भगवान का एक ऐसा मंदिर है जिसमें वहां के राजा को भी प्रवेश की मनाही है। जिसका कारण राजा खुद ही था !




राजधानी काठमांड़ू से नौ-दस की.मी. की दूरी पर शिवपुरी पहाड़ी के पास बूढ़ा नीलकंठ मंदिर स्थित है। प्रवेश-द्वार के सामने ही विशाल जलकुंड बना  हुआ है। जिसमें शेषनाग के ग्यारह फणों के छत्र वाली शेष शैय्या पर शयन कर रहे भगवान विष्णु की चर्तुभुजी प्रतिमा स्थापित है। प्रतिमा का निर्माण काले पत्थर की एक ही शिला से हुआ है।प्रतिमा की लम्बाई 5 मीटर है एवं जलकुंड की लम्बाई करीब 13 मीटर की है। जिसे बूढा नीलकंठ के नाम से जाना जाता है। मंदिर का नाम नीलकंठ है जो भगवान शिव का एक नाम है। द्वार पर भी श्री कार्तिकेय और गणेश जी की प्रतिमाएं लगी पर यहां मूर्ति भगवान विष्णु जी की है ! तब इसका नाम बूढ़ा नीलकंठ कैसे हो गया ? इसके पीछे जनश्रुति है कि समुद्र-मंथन के समय विषपान करने के पश्चात जब भगवान शिव का कंठ जलने लगा तब उन्होंने विष के प्रभाव शांत करने के लिए जल की आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक स्थान पर आकर त्रिशूल का प्रहार किया जिससे एक झील का निर्माण हुआ। मान्यता है कि बूढा नीलकंठ में वहीं से जल आता है, जिसको गोसाईंकुंड के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि सावन के महीने में विष्णु प्रतिमा के साथ भगवान शिव के विग्रह का प्रतिबिंब भी जल में दिखाई देता है। 

इसकी स्थापना की किंवदन्ती के अनुसार एक किसान खेत की जुताई कर रहा था तभी उसका हल एक पत्थर से टकराया तो वहां से रक्त निकलने लगा। जब उस भूमि को खोदा गया तो बूढ़ा नीलकंठ की यह प्रतिमा प्राप्त हुई, जिसके पश्चात उसे यथास्थान पर स्थापित कर दिया गया। तभी से नेपाल के निवासी बूढ़ा नीलकंठ का अर्चन-पूजन करते आ रहे हैं। पर एक विचित्र बात जो यहां से जुडी हुई है कि राजा, जो खुद भगवान का प्रतिनिधि होता है, उसी का यहां प्रवेश निषेद्ध है ! वैसे इसका जिम्मेवार राजा खुद ही था। 

बात तक़रीबन 17वीं शताब्दी की है। जब नेपाल के तत्कालीन नरेश राजा प्रतापमल्ल रोज भगवान के दर्शन करने हनुमान ढोका स्थित अपने महल से यहां आया करते थे। पर मतिभ्रम के चलते उन्होंने खुद को ही विष्णु का अवतार घोषित कर दिया। धीरे-धीरे उन्हें रोज इतनी दूर आना-जाना अखरने लगा तो उन्होंने नीलकंठ भगवान की एक मूर्ति राजमहल में ही स्थापित करवा ली। इससे भगवान नाराज हो गये और उन्होंने स्वप्न में आ राजा को श्राप दिया कि अब से तुम या तुम्हारा कोई भी उत्तराधिकारी यदि बूढा नीलकंठ हमारे दर्शन करने आएगा तो वह मृत्यु को प्राप्त होगा। तब से आज तक राजपरिवार का कोई भी सदस्य वहां जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया है।

वैसे भगवान विष्णु के इसी स्वरूप की एक और मूर्ती राजधानी के निकट बालाजू उद्यान में भी स्थित है जो असली मूर्ति से कुछ छोटी है। राजपरिवार के सदस्य यहीं प्रभू के दर्शन करने जाते हैं। नवम्बर माह में मुख्य मंदिर के साथ ही देव उठनी एकादशी को यहां भी बड़ा भारी मेला लगता है, दूर-दूर से लोग अपनी मनौतियां ले कर आते हैं। इस मंदिर की भी काफी मान्यता है।

सोमवार, 3 दिसंबर 2018

वायु प्रदुषण से बचाव के कुछ उपाय

 विशेषज्ञों का कहना है, वायु प्रदुषण से बचाव के लिए घर के अंदर कुछ पौधे अवश्य लगाएं। मच्छरों से बचाव के लिए आने वाले क्वॉयल या केमिकल का प्रयोग ना ही करें। इन दिनों हो सके तो अगरबत्ती या धूप भी ना जलाएं। पानी में एक चम्मच हल्दी डाल भाप लें। नियमित कसरत करें। कफ-कारक खाद्य लेने से बचें। तुलसी, काली मिर्च,  छोटी पिपली, इलायची, इत्यादि का सेवन जरूर करें। खाने के बाद करीब एक तोला गुड़ जरूर खाएं, इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स और मिनरल भी प्रचुर मात्रा में होते हैं। नाक की नली को साफ़ रखने के लिए रात सोते समय दो-दो बूँद गाय का घी दोनों नथुनों में डालें जिससे वहां प्रदूषक तत्वों का जमावडा न हो सके..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग
काफी दिनों से, दिनों से क्या सालों से अक्तूबर के बाद से ही दिल्ली की हवा यहां के रहवासियों की हवा खराब करने से बाज नहीं आ रही। लाख हल्ला मचे, गुल-गपाड़ा हो, एक दूसरे पर तोहमत थोपी जाए, पर जिम्मेवार लोग कभी इस मुद्दे पर गंभीर होते नहीं दिखते। नाही लगता है कि उनको किसी की चिंता या फ़िक्र है। इधर हमने भी जैसे खाद्यपदार्थों व पानी की मिलावट और अशुद्धता पर जान के जोखिम के बावजूद समझौता सा कर लिया है ! पर प्राणवायु  का क्या किया जाए ! जिसके बिना एक मिनट भी ज़िंदा रहना असंभव होता है ! अपने घर पर कोई कितना भी वायु शुद्धिकरण के उपाय कर ले, पर बाहर तो निकलना ही पड़ता है ! और ऐसा भी नहीं है कि इसके बिना कुछ घंटे रह लिया जा सके ! तो फिर उपाय क्या है ? इसका एक ही जवाब मिल पाया कि अपने शरीर को ही कुछ मजबूती और सुरक्षा प्रदान कर दी जाए !
ऐसा जहर जब अंदर जाएगा तो शरीर क्या करेगा ?
इस बार अपने पंजाब प्रवास के दौरान वहां वैद्य श्री विनोद शर्मा जी के पड़ोस में रहने का संयोग मिला तो उनसे इस विषय में सलाह लेने का मौका भी मिल गया। उन्होंने बताया, पहले वातावरण में कोहरा छाता था जो ठंड में हवा में स्थित वाष्पकणों पर धूल-मिट्टी इत्यादि के जमने से बनता था, सूर्य की तपिश पाते ही हवा की नमी के साथ-साथ यह भी गायब हो जाता था। पर अब धूल के अति बारीक कण और धुएं ने उसका स्थान ले लिया है। जो गर्मी पा कर भी गायब नहीं हो पाते ! यह समस्या मैदानी इलाकों में तकरीबन सभी जगह पैर पसार रही है। पर सांस तो लेनी ही है, उसके बिना गुजारा भी नहीं है। श्वास की बीमारियों वाले या बुजुर्गों को ज्यादा सतर्क रहने की जरुरत है। बाहर तो बदलना आसान नहीं है ! इसके लिए अपने शरीर को ही तैयार करना पडेगा। जिसके लिए कुछ सावधानियों के साथ-साथ अपने खान-पान में भी कुछ चीजों का समावेश जरुरी है।
कुछ हद तक वायु को साफ़ कर ही देते हैं 
वायु प्रदूषण से बचाव के लिए घर के अंदर कुछ पौधे अवश्य लगाएं। जैसे सर्प पौधा, नागबेल या मनीप्लांट इत्यादि। मच्छरों से बचाव के लिए आने वाले क्वॉयल या केमिकल का प्रयोग ना करें। इन दिनों हो सके तो अगरबत्ती या धूप भी ना जलाएं। एक दिन के अंतराल पर पानी में एक चम्मच हल्दी डाल भाप लें। नियमित कसरत करें। कफ-कारक खाद्य लेने से बचें। तुलसी, काली मिर्च, छोटी पिपली, इलायची, जीरे, हल्दी इत्यादि का सेवन जरूर करें। खाने के बाद करीब एक तोला गुड़ जरूर खाएं, यह भोजन तो हजम करता ही है श्वास के रोगियों की ठंड में आतंरिक गर्मी की जरुरत भी पूरी करता है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स और मिनरल भी प्रचुर मात्रा में होते हैं। नाक की नाली को साफ़ रखने के लिए रात सोते समय दो-दो बूँद गाय का घी नाक में डालें जिससे वहां प्रदूषक तत्वों का जमावडा न हो सके। रात को सोते समय गुनगुने पानी के साथ एक-दो दिन के अंतराल में त्रिफला चूर्ण लेते रहें। वातावरण बहुत ज्यादा ही खराब हो तो नाक पर कपड़ा लपेट कर निकलें, खासकर बाइक इत्यादि चलाते समय तो यह सावधानी जरूर बरतें।      

मंगलवार, 27 नवंबर 2018

पंजाब फिर बनेगा सिरमौर

पंजाब के दो दिन के प्रवास में जो भी देखा-पाया, वह प्रदेश के बारे में फैले या फैलाए गए दुष्प्रचार के बिल्कुल विपरीत था। हालांकि यह आकलन सिमित समय और दायरे का ही था पर हांडी में पक रहे चावलों का अंदाज उसके एक कण से ही लग जाता है। पर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वहां सब कुछ चाक-चौबंद या दुरुस्त है पर वैसा भी नहीं है जैसा पूरे देश को बताया जा  रहा था। पर ऐसा हुआ क्यों ? लोगों का मानना है कि  पहले आपसी सहयोग से ही खेती-खलिहानी होती थी। फिर जैसे प्रकृति में किसी जगह हवा गर्म हो ऊपर उठती है तो तत्काल आस-पास की वायु उस रिक्त स्थान की पूर्ति करने पहुंच जाती है, वैसे ही जब पंजाब के हर घर से लोग विदेश जाने लगे तो उसकी खानापूर्ति के लिए यू.पी., बिहार, यहां तक कि बांग्लादेशी भी अपनी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ रोजगार के सिलसिले में यहां आ बसे। शायद तभी से कुछ गलत आदतें यहां पनपी ! फिर भी पहले से हालात में बहुत सुधार हुआ है।  अच्छा लगा मोबाइल थामने की जगह बच्चों को दौड़ते-भागते-खेलते देख कर ................!

#हिन्दी_ब्लागिंग
वर्षों बाद पिछले हफ्ते पंजाब जाना हुआ। साथ थीं, तरह-तरह की आशंकाऐं, भ्रांतियां, गैर-जिम्मेदराना मिडिया द्वारा प्रदत्त, नशे और पंजाब को एक दूसरे का पर्याय बताने वाली उल्टी-सीधी जानकारियां,  पर वहां के दो दिन के प्रवास में जो भी देखा-पाया वह प्रदेश के बारे में फैले या फैलाए गए दुष्प्रचार के बिल्कुल विपरीत था। हालांकि यह आकलन सिमित समय और दायरे का ही था पर हांडी में पक रहे चावलों का अंदाज उसके एक कण से ही लग जाता है। पर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वहां सब कुछ चाक-चौबंद या दुरुस्त है पर वैसा भी नहीं है जैसा पूरे देश को बताया जा  रहा था। 

यात्रा के दौरान मुझे तीन गांवों में जाने का अवसर मिला। पहला अपने ननिहाल हदियाबाद, जो फगवाड़ा शहर से ड़ेढेक की. मी. की दूरी पर फगवाड़ा-नूरमहल रोड पर स्थित है, पर अब शहर का ही हिस्सा बन गया है। वहां जाने के लिए फगवाड़ा बस-अड्डे से कुछ आगे शुगर मिल से बाएं मुड़ते ही वह रामगढ़िया कालेज है, जहां फिल्म स्टार धर्मेंद्र ने अपनी शुरुआती पढ़ाई की थी, संयोगवश मेरे चाचाजी भी वहीं पढ़े थे। वहाँ मेरे बड़े मामाजी के दोस्त दो शिक्षक हैं, घर के कार्यक्रम में उनसे मिलना हुआ, कुछ देर बात की। गांव में भी पूरा दिन गुजरा, पर कहीं भी कुछ अस्वाभाविक जैसा नहीं लगा। उल्टे आत्मीयता, प्रेम, भाईचारे का ही माहौल मिला। वहाँ की तक़रीबन सौ साल पुरानी पाठशाला और सरकारी स्कूल के गुरुजनों से भी युवाओं के बारे में, पंजाब के हालात के बारे में बात हुई। पर किसी ने भी परिस्थिति को चिंताजनक नहीं बताया।

दूसरा पड़ाव था, जालंधर शहर के जमशेर कस्बे के पास का गांव, चननपुरा। यहां मेरे मौसाजी का पुश्तैनी घर है। भाई जीवन के साथ रात में वहीं बसेरा था। वहां का नजारा ही कुछ और था ! बढती ठंड के बावजूद रात के आठ-साढ़े आठ बजे गांव के बच्चे फ्लड लाइट में फ़ुटबाल खेल रहे थे। यहां अक्सर इस खेल की प्रतियोगिताएं होती रहती हैं। दूसरा दिन छुट्टी का था। अल-सुबह भी बच्चे खेल-कूद में व्यस्त दिखे ना कि मोबाइल में ! वहीं भाई के पडोसी स्थानीय वैद्य श्री विनोद जी ने प्रदेश में नशे इत्यादि के चलन को सिरे से तो नहीं नकारा, पर इस गांव में किसी के भी लती होने की या उनसे ऐसे किसी व्यक्ति के इलाज करवाने की किसी भी बात से इंकार किया। लत तो यहां मोबाईल की भी नहीं दिखी किसी में भी !

तीसरा पड़ाव था होशियारपुर के पास का एक और छोटा सा गांव रिहाणा-जट्टा, कभी देहात हुआ करता यह गांव आज सीवर युक्त पक्के मार्ग, अच्छे-खासे घरों, दुकानों, बिजली-पानी जैसी जरूरतों से युक्त साफ़-सुथरी जगह है। हमारे वहां पहुंचने पर घर का युवक, घर में बाइक होने के बावजूद सायकिल ले कर कुछ लाने निकला। जीतनी देर भी हम वहां रहे, किसी ने भी मोबाइल को हाथ नहीं लगाया। बाद में ध्यान दिया तो वहां अधिकांश लोग सायकिल का उपयोग करते दिखे। सुविधा व सम्पन्नता होने के बावजूद ! अच्छा लगा यह देख कर।

कार्यक्रम के दौरान एक सज्जन से भेंट हुई जो ''लवली यूनिवर्सिटी'' में प्रोफ़ेसर हैं। बातचीत के दौरान इशारों में ही वहां के युवा और नशे की बात छेड़ी तो उन्होंने बे-बाक हो कहा कि पहले आपसी सहयोग से ही खेती-खलिहानी होती थी। फिर लोगों में विदेश जाने का मोह बहुत बढ़ गया। फिर जैसे प्रकृति में किसी जगह हवा गर्म हो ऊपर उठती है तो तत्काल आस-पास की वायु उस रिक्त स्थान की पूर्ति करने पहुंच जाती है। वैसे ही जब पंजाब के हर घर से लोग विदेश जाने लगे तो उसकी खानापूर्ति के लिए यू.पी., बिहार, यहां तक कि बांग्लादेशी भी अपनी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ रोजगार के सिलसिले में यहां आ बसे। शायद तभी से कुछ गलत आदतें यहां पनपीं ! फिर भी पहले से हालात में बहुत सुधार हुआ है। यहां के मुख्य मंत्री #कैप्टन_अमरिंदर_सिंह इस बारे में बहुत गंभीर हैं और पूरी तरह प्रदेश को नशे की गिरफ्त से छुटकारा दिलाने को प्रतिबद्ध हैं। कानून-व्यवस्था भी काफी सुधरी है। आशा है पंजाब फिर अपना खोया गौरव प्राप्त कर लेगा, जल्दी।

अपनी इस संक्षिप्त यात्रा में एक बात जो सबसे अच्छी लगी वह यह कि छोटे से छोटे गांवों में भी खेलने के लिए अच्छे-खासे मैदान उपलब्ध कराए गए हैं, बिजली की सुविधा के साथ। वहाँ के बच्चे-युवा-युवतियां भी खेलों में रूचि रखते हैं जो एक सकारात्मक निशानी है, लोगों के जागरूक होने की। तसल्ली यह भी हुई कि पंजाब के हालात सुधार की ओर हैं। वैसे नशाखोरी कहां नहीं होती हमारे देश में ! कुछ प्रदेशों में तो शराब वितरण भी वहाँ की सरकारें ही करती हैं। और तो और देश की राजधानी की हालत भी बहुत अच्छी तो नहीं ही कही जा सकती ! इसलिए इस जहर से अपनी नस्लों-पीढ़ियों को बचाने की मुहीम आम जनता को ही छेड़नी पड़ेगी, बिना सरकार का मुंह जोहे !  

सोमवार, 26 नवंबर 2018

'तूँ प्रकाशो दा मुंडा वें ?''.......मेरे पंजाब की बात ही कुछ और है

''काका; सुणीं !'' मैंने मुड कर देखा, एक घर के दरवाजे में बैठीं,  एक बुजुर्ग-वृद्ध महिला मेरी ओर मुखातिब थीं ! मैं उनके पास गया पंजाबी तहजीब के अनुसार उनके चरण स्पर्श किए, उन्होंने ढेरों आशीर्वाद देने के बाद पूछा ''तूँ प्रकाशो दा मुंडा हैं ना; गोगी ?''  प्रकाशवती मेरी माताजी का नाम है और वहां मेरे बचपन का नाम गोगी ही था। माँ का स्वर्गवास हुए दो साल हो चुके हैं। वे भी मेरे साथ ही वर्षों पहले वहां गयीं थीं। मेरा चौंकना स्वाभाविक था, एक तो इतने लंबे अंतराल के बाद मेरा वहां जाना हुआ था, दूसरे वृद्धावस्था में ऐसे ही यादाश्त कमजोर हो जाती है, तीसरा समय के साथ-साथ चेहरे-मोहरे में अनेकों परिवर्तन हो जाते हैं ! चौथा वे हमारे परिवार की सदस्य नहीं थीं, चार-पांच घर छोड़, पडोसी थीं; फिर भी मुझे पहचान रही थीं ...............!

#हिन्दी_ब्लागिंग     
पिछले हफ्ते, करीब सोलह-सत्रह साल बाद अपने ननिहाल हदियाबाद जाने का मौका मिला। इतने सालों में पंजाब तो दो बार गया था, पर यहां नहीं जा पाया था। इस यात्रा के दौरान मुझे दो-तीन जगह सुदूर गावों में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। पहला तो अपने ननिहाल हदियाबाद, जो फगवाड़ा शहर से ड़ेढेक की. मी. की दूरी पर फगवाड़ा-नूरमहल रोड पर स्थित है, पर अब शहर का ही हिस्सा बन गया है। वहीं मेरे बड़े और छोटे मामाजी के विदेश गए सदस्यों में बचे हुए सदस्य रहते हैं। दोनों घरों में कुछ ही मीटर का फैसला है। पंजाब के बाहर रहते हुए इन दिनों तरह-तरह की फैली या फैलाई जा रही अफवाहें, खबरें, भ्रामक जानकारियां मिलने-जानने-सुनने की वजह से मन कुछ आशंकित सा था। पर वहां पहुंच कर जो माहौल मिला वह सिर्फ आत्मीयता, प्रेम, वात्सल्य का ही था। वहां के एक नहीं दो-दो वाकयों ने मेरी आँखें नम कर दीं। जिन्हें शायद ही कभी भूल पाऊं ! 

हुआ कुछ यूं कि हदियाबाद के कार्यक्रम के दौरान मैं एक घर से दूसरे घर जा रहा था कि पीछे से आवाज आई ''काका; सुणीं !'' मैंने मुड कर देखा, एक घर के दरवाजे में बैठीं,  एक बुजुर्ग-वृद्ध महिला मेरी ओर मुखातिब थीं ! मैं उनके पास गया पंजाबी तहजीब के अनुसार उनके चरण स्पर्श किए, उन्होंने ढेरों आशीर्वाद देने के बाद पूछा ''तूँ प्रकाशो दा मुंडा हैं ना; गोगी ?''  प्रकाशवती मेरी माताजी का नाम है और वहां मेरे बचपन का नाम गोगी ही था। माँ का स्वर्गवास हुए दो साल हो चुके हैं। वे भी मेरे साथ ही वर्षों पहले वहां गयीं थीं। मेरा चौंकना स्वाभाविक था, एक तो इतने लंबे अंतराल के बाद मेरा वहां जाना हुआ था, दूसरे वृद्धावस्था में ऐसे ही यादाश्त कमजोर हो जाती है, तीसरा समय के साथ-साथ चेहरे-मोहरे में अनेकों परिवर्तन हो जाते हैं ! चौथा वे हमारे परिवार की सदस्य नहीं थीं, चार-पांच घर छोड़, पडोसी थीं; फिर भी मुझे पहचान रही थीं ! भावुक मन और नम आँखें लिए कुछ देर उनके पास बैठा, उतनी ही देर में पचास-साठ सालों का इतिहास ताजा हो गया। फिर इजाजत ले उठ तो गया, पर अभी भी मन में यह बात घुमड़ रही है कि शहरों में बीसियों साल रहने के बाद भी जहां आपकी ज्यादातर पहचान आपके सरनेम या आपके मकान नंबर से ही होती है वहीं सुदूर गांव की एक पड़ोसी महिला को भी पचास-साठ साल बाद भी आपकी माँ और आपका नाम चेहरे समेत याद रहता है ! 

दूसरा वाकया भी ऐसा ही हैरतंगेज था। दूसरे दिन मेरा अपने मौसा जी के बड़े बेटे जीवन तथा उनकी पत्नी सुषमा  जी के साथ उनकी बुआजी के घर जाना हुआ। वे होशियारपुर के पास एक गांव में रहती हैं, मुझे नहीं याद कि मैं उनसे कब मिला था ! शायद चालीस साल पहले इन्हीं भाई की शादी में ! पर उन्हें नब्बे से ज्यादा की उम्र में भी मेरी पहचान थी, सिर्फ एक बार याद दिलाना पड़ा था कि कलकत्ते वाली मासीजी के बेटे हैं ! बस; सब कुछ याद आ गया था ! मेरा नाम तक ! अब वहां से आना मुश्किल ! रात रहने की जिद ! वर्षों बाद मिलने की दुहाई ! 

सोचता हूँ क्या है यह ? कौन सा अपनत्व है ? कौन सा लगाव है ? कौन सी ममता है ? कौन सा रिश्ता है जो वर्षों बाद मिले दूर-दराज के रिश्ते के लोगों को भी गले लगा, अपना वात्सल्य उड़ेलने को तत्पर रहता है ? आज जहां सगे भाई-बहन अपना फर्ज भूलाए बैठे हों वहाँ यह पीढ़ी जग को अपना बनाने से परहेज नहीं करती। आधुनिकता और कमाई की होड़ में जहां आज माँ-बाप से बात तक करने की फुर्सत नहीं मिलती वहीं कुछ लोगों को अपने पराये का भेद ही मालुम नहीं हैं ! यही फर्क है आजकी और पुरानी पीढ़ी का  ! यही फर्क है शहर और गांव का ! यही फर्क है आधुनिकता और पुरातनता का ! यही फर्क है दिल और दिमाग का ! 

गुरुवार, 22 नवंबर 2018

ब्लैक फ्राइडे, अजीब से नाम वाला एक खरीददारी दिवस

इस दिन से ही अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों में क्रिसमस की खरीददारी की शुरुआत होती है। इस दिन बडी-बडी कंपनियां तरह-तरह के ऑफर तो देती ही हैं, बाजार के छोटे तथा खुदरा व्यापारी भी ग्राहकों को लुभाने और खरीदने को प्रेरित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। पिछले कई सालों से यह दिन खरीददारी का सबसे व्यस्त, बड़ा और लाभप्रद दिन माना जाता है। इसकी कुछ-कुछ तुलना हम अपने यहां के ''धन तेरस'' या चीन के "सिंगल या बैचलर डे''  से कर सकते हैं पर बिक्री के लिहाज से इसकी कोई बराबरी नहीं है.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग     
पश्चिमी देशों में बाइबल से जुड़े होने के कारण शुक्रवार का एक अलग महत्व तो है ही उसके अलावा सप्ताहंत दिवस होने के कारण भी यह महत्वपूर्ण हो जाता है, और यदि वह किसी उत्सव से जुड़ जाए तो ? ऐसा ही एक शुक्रवार है ''ब्लैक फ्राइडे'' यानी काला शुक्रवार ! नाम जरूर अजीब है पर इस दिन से ही वहां क्रिसमस की खरीदारी की शुरुआत होती है। इस दिन बडी बडी कंपनियां तरह-तरह के ऑफर तो देती ही हैं, बाजार के छोटे तथा खुदरा व्यापारी भी ग्राहकों को लुभाने और खरीदने को प्रेरित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। पिछले कई सालों से यह दिन खरीददारी का सबसे व्यस्त, बड़ा और लाभप्रद दिन माना जाता है। इसकी कुछ-कुछ तुलना हम अपने यहां के ''धन तेरस'' या चीन के "सिंगल या बैचलर डे''  से कर सकते हैं पर बिक्री के लिहाज से इसकी कोई बराबरी नहीं है।


अमेरिका का एक दिन है थैंक्स-गिविंग डे यानि धन्यवाद दिवस ! जो नवंबर के चौथे गुरुवार को मनाया जाता है। यह हमारे यहां मनाए जाने वाले फसल पर्व की तरह ही है। वहां नवंबर तक फसलों की कटाई हो जाती है, इस काम में आपसी सहयोग के लिए, एक-दूसरे का आभार जताने के लिए इसे मनाते हैं। यह वहां का राष्ट्रीय पर्व है।  इसीके अगले दिन को ब्लैक फ्राइडे कहते हैं, जो तक़रीबन 23 और 29 नवम्बर के बीच आता है। इसी दिन से पारंपरिक तौर पर क्रिसमस की खरीदारी की शुरुआत होती है। इस मोके पर कई विक्रेता अपनी दुकानें बहुत जल्दी, अक्सर 4.00 बजे सबेरे या उससे भी पहले खोल लेते हैं और बिक्री बढ़ाने और ग्राहकों को लुभाने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन यथा, ब्‍लैक फ्राइडे डील, स्‍पेशल सेल, क्रिसमस छूट जैसे ऑफर मार्केट में पेश करते हैं। कुछ खुदरा विक्रेता तो इस तिमाही में इतना कमा लेते हैं कि उन्हें वर्ष भर का मुनाफ़ा मिल जाता है। ब्लैक फ्राइडे अमेरिका में एक उत्‍सव की तरह मनाया जाता है। वैसे यह छुट्टी का दिन नहीं होता लेकिन बहुत से नियोक्ता अपने कर्मचारियों को इस दिन छुट्टी दे देते हैं जिससे बाजार में ग्राहकों की संख्या में कई गुना इजाफा हो जाता है।




अब सवाल यह है कि जब यह ग्राहकों के लिए खरीदारी, मौज-मस्ती वाला दिन है, अगर यह दिन खुदरा विक्रेताओं के लिए वर्ष की बिक्री का सबसे बड़ा दिन है तो इसे ब्लैक फ्राइडे क्यों कहा जाता है ? देखा जाए तो यह नाम उन लोगों द्वारा पड़ा, जिनकी मुसीबत इस दिन बढ़ जाती है ! चूँकि यह दिन वर्ष का सबसे व्यस्त खरीदारी का दिन होता है और लगता है, जैसे देश का हर वाशिंदा कुछ न कुछ खरीदने को बाजार में आ निकला है ! लोग जमकर खरीदारी का आनंद लेते हैं, जैसे आज नहीं तो फिर नहीं। इसी कारण वहां गलियों, सड़कों, दुकानों, बाजार-हाट में इतनी भीड़ बढ़ जाती है कि व्यवस्था बनाए रखना और उसे संभालना, यातायात को सुचारु बनाए रखना पुलिस के लिए दूभर हो जाता है। सार्वजनिक वाहनों का चलना-चलाना कष्टसाध्य हो जाता है। दुकानों के रास्ते जाम हो जाते हैं, स्वचालित सीढ़ियों पर लोगों का अंबार लग जाता है, बेकाबू भीड़ का कोई ओर-छोर नहीं होता ! इसी वजह से कई असामान्य व प्रतिकूल परिस्थितियां भी बन जाती हैं, जिनकी वजह से  पुलिस की मुसीबतें-परेशानियां और दिनों की अपेक्षा ज्यादा बढ़ जाती हैं। टैक्सी और बस चालक घंटों जाम में फसे रहने के कारण इस दिन को मुसीबत भरा, सिर दर्द व तनाव बढ़ाने वाला मानते हैं ! उनके अलावा इस दिन परेशान होने वाले वे लोग भी हैं जो दुकानों इत्यादि में काम करते हैं, इस दिन उन्हें अतिरिक्त मेहनत से बिना थके काम करना पड़ता है ! यह कर्मचारियों के लिए कड़ी मेहनत का एक लंबा दिन होता है। इन्हीं सब के चलते इस दिन को ये सब लोग 'ब्लैक फ्राइडे' कहने लग गए जो धीरे-धीरे इस दिन का पर्याय ही बन गया।


विदेशी वस्तुओं, फैशन, रहन-सहन और आयातित त्योहारों की तरह भले ही हम इसे भी अपने यहां मनाने लग जाएं पर दुनिया के कई देश इस दिन को फिजूल और बिना जरुरत की खरीददारी से जोड कर देखते हुए इसे  ''बाय नथिंग डे'' के रूप में मनाते हैं। इस दिन ख़ासकर खरीददारी का विरोध किया जाता है। लोग अपने क्रेडिट कार्ड्स तक को जला देते है और खरीददारी न करने का भी मैसेज प्रचारित-प्रसारित करते हैं ! दुनिया के करीब 65 देश इस दिन को नकारात्मक दिवस के रूप में मनाते है। जिनमें जापान, नीदरलैंड, नार्वे, फ्रांस और युनाइटेड किंगडम जैसे देश शामिल हैं। काश ! हम ''उनसे'' नहीं ''इनसे'' कुछ सीखें ! 

मंगलवार, 20 नवंबर 2018

जयंति, पुण्यतिथि वही, जिससे राजनितिक लाभ मिल सके !

किसी को सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ अली, भीकाजी कामा, कमला देवी चट्टोपाध्याय जैसी अनेकानेक महिलाओं के बारे में भी कुछ जानकारी है ? क्या इन आदरणीय महिलाओं का देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में दिया गया योगदान किसी को भी याद नहीं ! या फिर इनकी जंयती या पुण्यतिथि कोई राजनितिक लाभ नहीं दे सकती इसलिए इन्हें याद ही नहीं किया जाता ! इस ओर तो कभी महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलवाने का शोर मचाने वाले, महिलाओं की हालत पर ग्लिसरिनी आंसू बहाने वाले, तथाकथित लेखक-लेखिकाओं, बुद्धिजीवियों, नाट्य-कर्मियों की तरफ से कोई बयान पढ़ा-सुना नहीं ! ऐसा क्यूँ ? क्या सिर्फ इसलिए क्यूंकि उससे नाहीं दाम मिलता है ना हीं नाम ! नाहीं कोई ''फ़ायदा''..................!

#हिन्दी_ब्लागिंग   
होता होगा किसी जमाने में राजनीती का मतलब देश की सेवा और देशवासियों का उत्थान ! पहले भी मताविरोध होता था, सबका अलग-अलग नजरिया था, अलग-अलग सोच भी थी, पर पक्ष-विपक्ष का ध्येय एक ही होता था, देश की तरक्की और देशवासियों को खुशहाली। पर आज यह अधिकाँश के लिए सिर्फ अपना और अपने कुटुंब को तारने का जरिया हो गया है। हर तरफ झूठ, फरेब, धोखा, छल का बोलबाला नजर आता है। ना कोई आस्था बची है ना हीं कोई निष्ठा ! ना किसी का लिहाज नाहीं किसी का सम्मान ! हरेक को सिर्फ सत्ता चाहिए ! वह भले ही कहीं से, किसी भी तरह, किसी के द्वारा भी मिले ! हालात ऐसे हो गए हैं कि कोई सच भी बोलता है तो लोग शक करने लगते हैं। कोई ईमानदारी से काम करना चाहता है तो उसमें भी खोट खोजा जाने लगा है। 

आज लोगों का विश्वास पूरी तरह से नेता बिरादरी से उठ गया है। ज्यादातर लोग उनकी चालों को समझने लगे हैं। उनके कहने को कोई गंभीरता से नहीं लेता ! ये बात महानुभाव लोग भी समझ गए हैं इसीलिए इन दिनों एक नया चलन सामने आया है ! वह यह कि चुनाव इत्यादि के समय, साफ़-सुथरी छवि वाले, किसी नामी खानदान से जुड़े, अराजनीतिक लोगों से कोई ऐसी बात कहलवाना जिससे उकसाने वाले की मंशा पूरी हो जाए ! इससे अजीब सा माहौल हो गया है ! कोई भी उठ कर कुछ भी कहने लगता है ! जैसे, नीयत कुछ भी हो, अभी भाजपा ने ग्वालियर की राजमाता सिंधिया की जन्मशती मनाई। ग्वालियर कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा की सीट है। उसे लगा होगा कि कहीं चुनावी ऊंट करवट ना बदल दे ! पर इस आयोजन का विरोध भी नहीं किया जा सकता। पर कुछ तो होना ही चाहिए था, शायद इसी लिए  अब एक व्यक्तव्य तारा भट्टाचार्य, की तरफ से आया या दिलवाया गया है कि ''मोदी सरकार राजमाता सिंधिया की जन्मशती मना रही है लेकिन ''कस्तूरबा गांधी जी'' की 150वीं जयंती मनाने के लिए कोई राष्ट्रीय समिति नहीं बनी !''

अभी सरदार पटेल की मूर्ति का विवाद थमा नहीं है, जिसमें बार-बार भाजपा पर आरोप लगता है कि उसने कांग्रेस के नेता को अपना बनाने की कोशिश की है। तो यदि इधर से कस्तूरबा जी की 150 जयंती का आयोजन भी कर दिया जाए तो विघ्नसंतोषी क्या गांधी जी का भी भगवाकरण करने का आरोप नहीं लगाएंगे ? क्योंकि गंदी राजनीती ने देश तो देश, नेताओं को भी बाँट कर रख दिया है। अब उनके कर्मों, उनके देश के लिए किए गए बलिदान, उनके त्याग की बात नहीं देखी जाती, सिर्फ उनके समय उनकी पार्टी को देख-दिखा कर उनका दर्जा तय किया जाता है। इसके साथ ही सवाल यह भी उठता है कि क्या इसके पहले ''बा'' की 50वीं या 100वीं जयंती मनाई गयी थी ? जो इसी बार अनदेखा होने की बात की जा रही है ! क्या इस बारे में कोई प्रस्ताव भेजा गया था या सिर्फ मौके को ताड़ कर आलोचना शुरू कर दी गयी है ! ज्यादा संभावना तो इसी बात की है कि चुनाव के कारण राजमाता के कार्यक्रम का विरोध भारी पड़ जाएगा इसलिए  इस बात को कहलवाया गया है ! जिसने भी यह बात उठवाई है क्या उसे सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ अली, भीकाजी कामा, कमला देवी चट्टोपाध्याय जैसी महिलाओं के बारे में भी कुछ जानकारी है ? ये तो कुछ नाम हैं, ऐसी अनगिनत महिलाओं ने अपनी जान, घर, परिवार की चिंता किए बगैर अपने आप को स्वतंत्रता के लिए होम कर दिया ! इसके बदले में उनके परिवार ने भी कभी देश से कुछ नहीं चाहा ! शायद इसी कारण उन्हें भुला भी दिया गया ! पर जिनके नाम याद भी हैं, उन आदरणीय महिलाओं की किसी को भी याद नहीं आती ? या फिर इनकी जंयती या पुण्यतिथि कोई राजनितिक लाभ नहीं दे सकती इसलिए इन्हें याद ही नहीं किया जाता ! इस ओर तो कभी महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलवाने का शोर मचाने वाले, महिलाओं की हालत पर ग्लिसरिनी आंसू बहाने वाले, तथाकथित लेखक लेखिकाओं, बुद्धिजीवियों, नाट्य-कर्मियों की तरफ से कोई बयान पढ़ा-सुना नहीं ! ऐसा क्यूँ ? क्या सिर्फ इसलिए क्यूंकि उससे नाहीं दाम मिलता है ना हीं नाम ! नाहीं कोई ''फ़ायदा'' !
इस पर भी कभी कोई सोचेगा, बात उठाएगा, धरना देगा ! शायद नहीं !!  

सोमवार, 19 नवंबर 2018

विश्व टॉयलेट दिवस

यदि खुले में शौच जाना बंद हो जाए तो हर साल करीब सवा दो करोड़ जानें बचाई जा सकती हैं ! एक सर्वे के अनुसार सौ ग्राम इंसानी मल में करीब दो अरब हानिकारक परजीवी कीटाणु-जीवाणु पाए जाते हैं। अंदाज लगाया जा सकता है कि हम जाने-अनजाने कितना विष रोज वातावरण में घोलते जाते हैं। पहले की बात अलग थी आबादी काफी कम हुआ करती थी। लोग खेतों-जंगलों में निवृत हो आते थे तो प्रकृति संभाल लेती थी। पर अब जब जंगलात वगैरह खत्म हो रहे हैं, खेतों में रसायनों का चलन बढ़ रहा है तो उन्हें और दूषित कर हम अपराध ही तो कर रहे हैं..........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग    
आज  विश्व टॉयलेट दिवस है। इसे प्रत्येक वर्ष आज के ही दिन 19 नवंबर को इस उद्देश्य के साथ मनाया जाता है कि लोगों को गंदगी के खिलाफ जागरूक किया जाए, उन्हें स्वच्छता का महत्व बताया जाए जिससे असमय इंसानी गंदगी से होने वाली करोड़ों जानों को असमय कालल्वित होने से बचाया जा सके ! इसी दिन 19 नवंबर 2001 को सिंगापुर में जैक सिम नाम के एक जागरूक इंसान ने 15 सदस्य देशों के साथ एक
अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संस्था ''विश्व शौचालय संगठन'' की शुरूआत की थी। इसी संस्था ने दुनिया के कई देशों में लोगों को जागरुक करने के लिए विश्व शौचालय सम्मेलन आयोजित किए। जिससे प्रभावित हो कर बारह साल बाद संयुक्त राष्ट्र ने मान्यता दी। उन्हीं के अनुसार आज भी विश्व की तकरीबन ढाई अरब की आबादी को पर्याप्त स्वच्छता मयस्सर नहीं है ! इसके अलावा करीब एक अरब लोग खुले में निवृत होने को मजबूर हैं, जिनमें से लगभग आधे हमारे देश में ही हैं ! इस विवशता के कारण सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं और बालिकाओं को होती है।दुनिया में हर तीन में से एक महिला को सुरक्षित शौचालय की सुविधा उपलब्ध नहीं है। खुले में जाने से बीमारियां तो फैलती ही हैं पर्यावरण भी दूषित होता है। इसी कारण, देर से ही, सरकार द्वारा चलाए गए स्वच्छ भारत अभियान का स्वागत होना चाहिए ! पर उसके पूर्णतया सफल होने में कुछ दिक्कतें भी आ रही हैं। पहली तो सरकारी अमले की तरफ से ही है ! अपना ''टारगेट'' पूरा करने के लिए आधे-अधूरे शौचालयों का निर्माण, जो बने भी हैं उनमें पानी अनुपलब्धता, जल-मल का अनुचित प्रबंधन ! इसके साथ ही हमारे लोगों की मानसिकता भी एक अड़चन है, जिनके मुताबिक खुले में शौच जाना ज्यादा सुविधाजनक उपाय है।



यह तो बाहर-अंदर की बात हुई ! एक और बहस तकनिकी पर भी जोरों-शोरों से चल रही है और वह है कि कौन सा टायलेट या ढंग, शौच जाने के लिए बेहतर है, योरोपियन या भारतीय ! इसमें भारतीय पद्यति के पक्ष में कुछ बातें जाती हैं, जैसे उकडूँ बैठ कर निवृत होने की क्रिया प्राकृतिक मुद्रा है। इसमें तो दो राय नहीं है: प्रकृति ने भी माँ के गर्भ में जीव को उँकड़ू हो कर ही पलने दिया है। इस मुद्रा में जाघों का दवाब आँतों पर पड़ने से पेट ठीक से साफ़ होता है। इससे आँतों की क्रियाशीलता बढ़ती है। कब्ज की शिकायत नहीं रहती। पाचन ठीक से होता है और सबसे बड़ी बात आँतों के कैंसर की संभावना कम हो जाती है। कमोड से शरीर के ज्यादा हिस्से का सम्पर्क नहीं होने से यह स्वास्थ्यप्रद भी है। इसमें थोड़ी वर्जिश भी हो जाती है। गर्भवती महिलाओं के लिए भी यह लाभदायक होता है। इन बातों को तो अब योरोप के डॉक्टर भी मानने लगे हैं। हाँ एक बात इसके विरुद्ध यह जाती है कि ज्यादा उम या किसी रोग से कमजोर पुरुषों व महिलाओं को इस पर बैठ कर उठने में बहुत कष्ट होता है। ऐसे लोगों या उनके लिए जो किसी भी कारणवश सीट वाले टॉयलेट का उपयोग नहीं छोड़ना चाहते वे अपने पैरों के नीचे एक सात-आठ इंच ऊंचा स्टूल रख लें जिससे घुटने कुछ दवाब के साथ पेट से जा लगें। इससे सीट पर बैठने से होने वाली समस्याओं का कुछ हद तक निदान हो सेहोने वाली समस्याओं का कुछ हद तक निदान हो जाएगा।



एक सर्वे के अनुसार यदि खुले में शौच बंद हो जाए तो हर साल करीब सवा दो करोड़ जानें बचाई जा सकती हैं। उनके अनुसार सौ ग्राम इंसानी मल में करीब दो अरब हानिकारक परजीवी कीटाणु-जीवाणु पाए जाते हैं। अंदाज लगाया जा सकता है कि हम जाने-अनजाने कितना विष रोज वातावरण में घोलते जाते हैं। पहले की बात अलग थी आबादी का थी लोग खेतों जंगलों में निवृत हो जाते थे तो प्रकृति संभाल लेती थी। पर अब जब जंगलात वगैरह खत्म हो रहे हैं, खेतों में रसायनों का चलन बढ़ रहा है तो उन्हें और दूषित कर हम अपराध ही तो कर रहे हैं। 

इस बारे में लोगों की सोच तो बदलते-बदलते ही बदलेगी। पर अभी सभी का ध्यान ऐसे शौचालयों के निर्माण की ओर हैं जो पर्यावरण मित्र भी हों और उनमें पानी की खपत भी ना हो ! क्योंकि अभी दूर-दराज के क्षेत्रों में, जहां ना ''सीवरेज'' की सुविधा होती ही नहीं पाइपों द्वारा जल-मल को दूर भेजा जा सकता है ! गड्ढे इत्यादि बना कुछ तो हल निकलता है पर उसमें भी दसियों दिक्कतें रहती ही हैं। इसलिए शौचालय तो बन जाते हैं पर निस्तारण की समस्या खड़ी हो जाती है। सारे संसार में इस ओर कोशिशें हो रही हैं कुछ देशों ने अति आधुनिक व्यवस्था खोज भी ली है। आशा है जल्दी ही इस विश्व-व्यापी समस्या का निदान हो जाएगा। 

गुरुवार, 15 नवंबर 2018

प्रणाम, एक प्रभावी प्रक्रिया, इसकी आदत बचपन से ही डालें

यदि बचपन से ही बड़ों के पैर छू कर उनका आशीर्वाद लेने के संस्कार बच्चों में डाले जाएं तो घरों में कभी भी अप्रिय स्थिति बनने की नौबत ही ना आए। अनुशासन बना रहे, क्रोध व अहंकार को स्थान ना मिले, आदर-सत्कार की भावना प्रबल हो जाए । यह सिर्फ कहने की नहीं आजमाने की बात है। यदि घर का नियम हो कि हर छोटे सदस्य को सुबह उठते ही सबसे पहला काम बड़ों का आशीर्वाद लेना है तो विगत रात चाहे जैसा भी भारी माहौल रहा हो, किसी कारण कटुता  फ़ैल गयी हो, कुछ मनमुटाव ही क्यों ना हो गया हो यदि घर के बच्चे  सुबह-सबेरे बड़ों के चरण स्पर्श करते हैं तो ऐसा कोई भी बुजुर्ग सदस्य नहीं होगा जो सब कुछ भूल निर्मल मन से आशीर्वाद ना दे ! बस यहीं से सब कुछ ''नार्मल'' हो जाता है और घर में शांति स्थाई हो जाती है। हमारे ग्रंथों में कहा भी गया है कि जो व्यक्ति रोज बड़े-बुजुर्गों के सम्मान में प्रणाम और चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करता है, उसकी उम्र, विद्या, यश और शक्ति बढ़ती ही जाती है ...........!       


#हिन्दी_ब्लागिंग           

अपने से बड़ों का अभिवादन करने के लिए चरण छूने की परंपरा हमारे यहां सदियों से चली आ रही है। अपने से बड़े के आदर स्वरुप उनके चरण स्पर्श करना बहुत उत्तम माना गया है। शास्त्रों में भी कहा गया है कि रोज बड़ों के चरण स्पर्श करके उनसे आशीर्वाद लेने से घर में सुख-शांति तथा समृद्धि का वास होता है। विशेष
तौर पर जब आप किसी जरूरी काम से कहीं जा रहे हों या कोई नया काम शुरू कर रहे हों, कोई ख़ास दिन या त्यौहार हो तब तो जरूर ही। आज के तथाकथित विद्वान या अपने को आधुनिक मानने वाले लोग इस पर विश्वास करें न करें पर जब भी हम किसी का झुक कर चरण स्पर्श करते हैं तो हम में विनम्रता का भाव आ जाता है, हम विनीत हो जाते है, नम्र हो जाते हैं जिससे हमारे शरीर की उर्जा की नकारात्मकता श्रेष्ठ व्यक्ति में पहुंचकर नष्ट हो जाती है, तथा उनकी सकारात्मक ऊर्जा आशीर्वाद के रूप में हमें मिल जाती है। पर इसके लिए हमारे मन में अपने बड़ों के प्रति, अपने गुरुजनों के प्रति श्रद्धा जरूर का होना जरुरी होता है। चरण स्पर्श करते समय हमेशा दोनों हाथों से दोनों पैरों को छूना चाहिए। एक हाथ से पांव छूने के तरीके को शास्त्रों में गलत बताया गया है।


आज घर-बाहर जो बड़ों के प्रति अवहेलना, तिरस्कार, अपमान जैसी परस्थितियां देखने में आती हैं उसका एक कारण जाने-अनजाने की गयी उनकी उपेक्षा भी है। यदि बचपन से ही बड़ों के पैर छू कर उनका आशीर्वाद लेने के संस्कार बच्चों में डाले जाएं तो घरों में कभी भी अप्रिय स्थिति बनने की नौबत ही ना आए, अनुशासन बना रहे, क्रोध व अहंकार को स्थान ना मिले, आदर-सत्कार की भावना प्रबल हो जाए। यह सिर्फ कहने की नहीं आजमाने की बात है। यदि घर का नियम हो कि हर छोटे सदस्य को सुबह उठते ही सबसे पहला काम बड़ों का आशीर्वाद लेना है तो विगत रात चाहे जैसा भी भारी माहौल रहा हो, किसी कारण कटुता  फ़ैल गयी हो, कुछ मनमुटाव ही क्यों ना हो गया हो यदि घर के बच्चे बड़ों के चरण स्पर्श करते हैं तो ऐसा कोई भी बुजुर्ग सदस्य नहीं होगा जो सब कुछ भूल निर्मल मन से आशीर्वाद ना दे ! बस यहीं से सब कुछ ''नार्मल'' हो जाता है। ग्रंथों में कहा भी गया है कि जो व्यक्ति रोज बड़े-बुजुर्गों के सम्मान में प्रणाम और चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करता है, उसकी उम्र, विद्या, यश और शक्ति बढ़ती जाती है। 

हमारे महान ग्रंथों में भी प्रणाम की महत्ता बताई गयी है। रामायण में तो प्रभू खुद ही गुरुजनों को आगे बढ़ प्रणाम कर एक आदर्श हमारे सामने रखते हैं। यहां तक की अपने सबसे बड़े बैरी रावण के अंतिम समय में लक्ष्मण जी को उसके पास ज्ञान-अर्जन के लिए जाने को कहते हैं तो उन्हें पहले प्रणाम करने की सीख दे कर भेजते हैं।

महाभारत में जब भीष्म अगले दिन पूरे पांडवों के वध की कसम लेते हैं तो श्री कृष्ण द्रौपदी को उनके पास ले जाकर प्रणाम करवा उसे अखंड सौभाग्यवती होने के वरदान दिलवा पांडवों की रक्षा करवाते हैं। साथ ही अत्यंत दुःख के साथ कहते हैं कि यदि दोनों परिवारों की स्त्रियां अपने और एक-दूजे के वरिष्ठ व गुरुजनों को प्रणाम किया करतीं तो यह युद्ध कभी भी नहीं होता। 

एक प्रणाम से तो ऋषि मार्कण्डेय जी, जिनका अल्पायु योग था ख़त्म हो गया था। जब उनके पिता महामुनि मृकण्डु को यह बात पता चली तो उन्होंने उनका जनेऊ संस्कार कर खा कि जो भी तुम्हारे सामने पड़े उसके सामने तुम झुक कर प्रणाम कर आशीर्वाद लेना। मार्कण्डेय जी ने पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर वैसा ही करना शुरू कर दिया। ऐसे ही एक दिन उनके सामने सप्तऋषि आ गए मार्कण्डेय जी ने झुककर सप्तऋषियों का चरण स्पर्श किया। अनजाने में सप्तऋषियों ने मार्कण्डेय जी को दीर्घायु का आशीर्वाद दे दिया। जब उन्हें पता चला कि मार्कण्डेय जी अल्पायु हैं तो वे चिंता में पड़ गये। सप्तऋषि बालक मार्कण्डेय को ब्रह्मा जी के पास ले गये। मार्कण्डेय जी ने ब्रह्मा जी का भी चरण स्पर्श किया। ब्रह्मा जी ने भी मार्कण्डेय को दीर्घायु का आशीर्वाद दिया जिससे यमराज भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाए।           

पर यदि प्रणाम करने वाले के लिए कुछ नियम हैं तो जिन्हें प्रणाम किया जा रहा हो, वह चाहे स्त्री हो या पुरुष  उनका भी फर्ज होता है कि जब भी कोई चरण स्पर्श करे वे उसे हाथ उठा कर या उसके सर पर हाथ रख कर आशीर्वाद जरूर दें।  साथ ही भगवान या अपने इष्टदेव को भी याद करना चाहिए। क्योंकि पैर का किसी को लगना अशुभ कर्म माना गया है। तो जब कोई हमारे पैर छूता है तो हमें भी इस दोष से बचने के लिए मन ही मन भगवान से क्षमा मांगनी चाहिए। जब हम भगवान को याद करते हुए किसी को सच्चे मन से आशीर्वाद देते हैं तो उसे लाभ अवश्य मिलता है। किसी के लिए अच्छा सोचने पर हमारा पुण्य भी बढ़ता है। 

सोमवार, 12 नवंबर 2018

विज्ञापनों में सार्थक और सकारात्मक संदेश होने चाहिए

कंपनी को ऐसे विज्ञापन ही बनवाने चाहिए जिनमें यह संदेश हों कि आपकी अत्यधिक व्यस्तता के समय हम आपकी भोजन संबंधी परेशानियों को दूर करते हैं.........!

#हिन्दी_ब्लागिं
आज कंप्यूटर गेम, फ़ास्ट फूड, मोबाईल फोन की लत बच्चों और युवाओं में उस हद तक जा पहुंची है जिसके बहुत ही गंभीर परिणाम हो सकते हैं। विशेषज्ञों तथा डाक्टरों का मानना है कि समय रहते इससे छुटकारा पाना बहुत जरुरी है नहीं तो बात हाथ से निकल सकती है ! पर एक तरफ जहां लोगों में जागरूकता लाने की कोशिश की जा रही है, वहीं कुछ ऐसे लोग और कंपनियां हैं, जो इस बात को गंभीरता से नहीं ले रहे ! ऐसी ही एक कंपनी है #SWIGGY.


इसे अपने विज्ञापनों पर जरूर गौर करना कीजिए -
1) एक माँ अपने बेटे के साथ अपने घर में मोबाइल गेम खेल रही है। दोनों के हाव-भाव ऐसे हैं जैसे कोई जंग लड़ रहे हों ! खेलते-खेलते बेटा कहता है कि "माँ भूख लगी है !'' माँ स्विगी को फोन करती है और कुछ ही देर में किसी रेस्त्रां से उनके यहां खाना पहुँच जाता है।

2) एक कुछ ओवरवेट माँ टी.वी. के सामने खड़े हो बेतरतीब तरीके से उसमें दिखाई जा रही कसरत को दोहरा रही है ! इतने में उसकी बेटी आ पूछती है "माँ खाने में क्या है ?'' महिला दसियों आयटम गिना कर कहती है ''कुछ भी मंगा लो !'' वहाँ भी कुछ ही देर में स्विगी से खाना पहुंच जाता है। एक तरफ तो मोहतरमा अपनी सेहत को ले चिंतित हैं पर दूसरी ओर उनको बाहर के खाने का चस्का भी है।

3) इसी के एक विज्ञापन में तीन पीढ़ियां अपने सर में तेल लगवा रही हैं और ख़ास व्यंजन की याद आते ही स्विगी हाजिर हो जाता है। यह कुछ-कुछ युक्तिसंगत लगता है कि यदि समय कम है तो हमें याद करें। मेरे ख्याल से कंपनी को ऐसे विज्ञापन ही बनवाने चाहिए जिनमें यह संदेश हों कि आपकी अत्यधिक व्यस्तता के समय हम आपकी भोजन संबंधी परेशानियों को दूर करते हैं।

ऐसे विज्ञापनों से ऐसा भी लगता है जैसे हिदायतें सिर्फ आम जनता को देने की एक खानापूर्ति है ! उसको गंभीरता से कोई नहीं लेता और ना हीं उसे प्रभावी तौर पर लागू करवाने की किसी की कोई मंशा होती है ! जबकि देश के हर नागरिक को अपनी जिम्मेदारी का अहसास, समाज के प्रति अपना उत्तरदायित्व तथा आने वाली पीढ़ी की भी चिंता होनी चाहिए !

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