pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: Reality
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गुरुवार, 9 मई 2019

पानी को ले कर भ्रमित न हों

हमारी एक सांसद वर्षों से एक ख़ास कंपनी की RO मशीन खरीदने की सिफारिश करती आ रही हैं, जबकि विशेषज्ञ यह कहते हैं कि पानी को साफ़ करने की RO विधि बहुत उपयोगी नहीं है। हर जगह इसकी जरुरत भी नहीं होती। इस प्रक्रिया में पानी के बहुत सारे गुण और तत्व नष्ट हो जाते हैं। इसके अलावा इससे जितना पानी साफ़ होता है उससे तीन गुना पानी बर्बाद भी हो जाता है। एक तरफ तो हमें पानी की बचत का पाठ पढ़ाया जाता है तो दूसरी तरफ तरह-तरह की खामियों, दोषों और अनुपयोगिता के बावजूद  ऐसी मशीन खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है , जो पानी को साफ़ कम बर्बाद ज्यादा करती है ............!

#हिन्दी_ब्लागिंग     
कल यहीं बात की थी कि कैसे पानी की कोई कमी ना होने के बावजूद लोगों को भरमा-डरा कर, 50-60 साल पहले 1965 में बोतल बंद पानी की शुरुआत बिसलरी ने तब की बंबई में कर दी थी। देखा जाए तो बोतलबंद पानी का पहला व्यापार 1845 से ही पोलैंड के मैनी शहर में होना शुरू हो चुका था। आज दुनिया में दस हजार से भी ज्यादा कंपनियां इस धंधे में लगी हुई हैं। दुनिया भर में तेजी से फ़ैल रहे इस धंदे का खेल आज सैंकड़ों अरब डॉलर का हो चुका है। अपनी ही बात करें तो हमारे यहां तीन रूपये की लागत लगा बीस रुपये वसूलने वाली तकरीबन 200 छोटी-बड़ी कंपनियां करीब 15 हजार करोड़ रुपए का खेल खेल रही हैं। जबकि दुनिया जानती है कि इस तरह का पानी सेहत के लिए हानिकारक भी हो सकता है। पर पानी की बूंद-बूंद से पैसा कमाने में लगी देशी विदेशी कंपनियों ने अपने विज्ञापनों के जरिए लोगों के मन में यह विश्वास जमा दिया है कि वे जो पानी पी रहे हैं वो पूरी तरह से सुरक्षित है। जबकि हाल ही के दिनों में कई ब्रांडों के बोतलबंद पानी के नमूनों में मानक से कई गुणा ज्यादा कीटनाशक पाए गए। कई बार तो बोतलें ही खतरनाक स्टार तक अशुद्ध पाई गयीं। इसके अलावा जहाँ भी पानी के फ़िल्टर प्लांट लगते हैं वहां भू-जल का स्तर खतरनाक रूप से कम हो जाता है। प्लास्टिक की बोतलें और उनका अनैतिक उपयोग जो कहर ढाता है, वो अलग !

विडंबना तो यह है कि ऐसे पानी की जांच का कोई सरल और सुलभ तरीका है ही नहीं ! इसलिए हम सिर्फ भरोसा कर बिना सही-गलत जाने उसका उपयोग करते चले जा रहे हैं। पानी ही तो है इसलिए किसी बात पर ज्यादा ध्यान भी नहीं देते ! जबकी कुछ सावधानियां बहुत जरुरी होती हैं, इस तरह के पानी का इस्तेमाल करते समय। जैसे कि चलती कार में बोतलबंद पानी नहीं पीना चाहिए, क्योंकि कार में बोतल खोलने पर कार के वातावरण और पानी में मिले रसायनों की प्रतिक्रियाएं काफी तेजी से होती हैं और पानी अधिक खतरनाक हो जाता है। यही बात तेज धूप में बोतल से पानी पीने पर लागू होती है। 

वैसे तो बोतल का पानी उपयोग में ना ही लाया जाए तो बेहतर है पर आज के समय इस बात को कठोरता से लागू भी नहीं किया जा सकता। ऐसा भी नहीं है कि सारी कंपनियां नियमों का उल्लंघन कर रही हैं और बोतलबंद पानी सेहत के लिए एक दम से खराब है। जरूरत है तो बोतलबंद पानी को लेकर जागरुक रहने की। तो ऐसे में कुछ सावधानियां जरूर बरतें ! पानी या कोई भी बोतल बंद द्रव्य लेते समय उस पर लीटर का मानक मार्क अंग्रेजी का अक्षर ‘एल’ लिखा हो। पानी का पाउच या बोतल खरीदते समय एक बार उसकी जांच जरूर कर लें। बिना एक्सपायरी डेट लिखे पानी के पाउच और बोतल ना खरीदें। 
आज दुनिया भर के देश इस तरह के प्लांट को दरकिनार कर उन पर रोक लगा रहे हैं। पर दुर्भाग्यवश हमारे देश में यह व्यापार दिन दूनी, रात चौगुनी रफ़्तार से बढ़ रहा है। भ्रमित करने वाले विज्ञापनों ने हमारी आँखों पर पट्टी बाँध दी है ! जबकि विशेषज्ञ यह कहते हैं कि पानी को साफ़ करने की RO विधि बहुत उपयोगी नहीं है। हर जगह इसकी जरुरत भी नहीं होती। इस प्रक्रिया में पानी के बहुत सारे गुण और तत्व नष्ट हो जाते हैं। इसके अलावा यह जितना पानी साफ़ करती है उससे तीन गुना पानी बर्बाद भी हो जाता है। एक तरफ तो हमें पानी की बचत का पाठ पढ़ाया जाता है तो दूसरी तरफ ऐसी मशीन खरीदने के लिए प्रतिष्ठित लोगों द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है ! हमारी एक सांसद तो वर्षों से एक ख़ास कंपनी की RO मशीन खरीदने की सिफारिश करती आ रही हैं। क्या उसकी खामियों, उसके दोषों, उसकी अनुपयोगिता का उन्हें पता नहीं है। 

यह सच है कि सर्वजन को पानी उपलब्ध करवाना सरकार का जिम्मा है। पर उसके उपयोग, संचय, बचत, रख-रखाव, का कर्तव्य अवाम का ही है। पर कड़वी और डरावनी सच्चाई तो यह है कि अपनी मूर्खताओं के कारण हमने इस अति आवश्यक प्राकृतिक नेमत की कीमत नहीं समझी, और उसी का फल हम आज तरह-तरह से भुगतने को मजबूर हैं। पानी की उपलब्धता बहुत तेजी से घटती जा रही है पर हालात बिल्कुल ही बेकाबू हो गए हों ऐसा भी नहीं है ! हजारों लोग इसका समाधान निकाल रहे हैं। पुरानी परम्पराओं को जीवित किया जा रहा है। रेगिस्तान को नखलिस्तान और ुसार को जंगल में बदला जा रहा है। अभी पैमाना छोटा है पर सब मिल के जुट जाएं तो फिर सूखी नदियां, झीलें, सरोवर, तालाब पुनर्जीवित हो लहलहा उठेंगे।  

बुधवार, 28 नवंबर 2018

पंजाब फिर बनेगा सिरमौर

पंजाब के दो दिन के प्रवास में जो भी देखा-पाया, वह प्रदेश के बारे में फैले या फैलाए गए दुष्प्रचार के बिल्कुल विपरीत था। हालांकि यह आकलन सिमित समय और दायरे का ही था पर हांडी में पक रहे चावलों का अंदाज उसके एक कण से ही लग जाता है। पर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वहां सब कुछ चाक-चौबंद या दुरुस्त है पर वैसा भी नहीं है जैसा पूरे देश को बताया जा  रहा था। पर ऐसा हुआ क्यों ? लोगों का मानना है कि  पहले आपसी सहयोग से ही खेती-खलिहानी होती थी। फिर जैसे प्रकृति में किसी जगह हवा गर्म हो ऊपर उठती है तो तत्काल आस-पास की वायु उस रिक्त स्थान की पूर्ति करने पहुंच जाती है, वैसे ही जब पंजाब के हर घर से लोग विदेश जाने लगे तो उसकी खानापूर्ति के लिए यू.पी., बिहार, यहां तक कि बांग्लादेशी भी अपनी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ रोजगार के सिलसिले में यहां आ बसे। शायद तभी से कुछ गलत आदतें यहां पनपी ! फिर भी पहले से हालात में बहुत सुधार हुआ है।  अच्छा लगा मोबाइल थामने की जगह बच्चों को दौड़ते-भागते-खेलते देख कर ................!

#हिन्दी_ब्लागिंग
वर्षों बाद पिछले हफ्ते पंजाब जाना हुआ। साथ थीं, तरह-तरह की आशंकाऐं, भ्रांतियां, गैर-जिम्मेदराना मिडिया द्वारा प्रदत्त, नशे और पंजाब को एक दूसरे का पर्याय बताने वाली उल्टी-सीधी जानकारियां,  पर वहां के दो दिन के प्रवास में जो भी देखा-पाया वह प्रदेश के बारे में फैले या फैलाए गए दुष्प्रचार के बिल्कुल विपरीत था। हालांकि यह आकलन सिमित समय और दायरे का ही था पर हांडी में पक रहे चावलों का अंदाज उसके एक कण से ही लग जाता है। पर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वहां सब कुछ चाक-चौबंद या दुरुस्त है पर वैसा भी नहीं है जैसा पूरे देश को बताया जा  रहा था। 

यात्रा के दौरान मुझे तीन गांवों में जाने का अवसर मिला। पहला अपने ननिहाल हदियाबाद, जो फगवाड़ा शहर से ड़ेढेक की. मी. की दूरी पर फगवाड़ा-नूरमहल रोड पर स्थित है, पर अब शहर का ही हिस्सा बन गया है। वहां जाने के लिए फगवाड़ा बस-अड्डे से कुछ आगे शुगर मिल से बाएं मुड़ते ही वह रामगढ़िया कालेज है, जहां फिल्म स्टार धर्मेंद्र ने अपनी शुरुआती पढ़ाई की थी, संयोगवश मेरे चाचाजी भी वहीं पढ़े थे। वहाँ मेरे बड़े मामाजी के दोस्त दो शिक्षक हैं, घर के कार्यक्रम में उनसे मिलना हुआ, कुछ देर बात की। गांव में भी पूरा दिन गुजरा, पर कहीं भी कुछ अस्वाभाविक जैसा नहीं लगा। उल्टे आत्मीयता, प्रेम, भाईचारे का ही माहौल मिला। वहाँ की तक़रीबन सौ साल पुरानी पाठशाला और सरकारी स्कूल के गुरुजनों से भी युवाओं के बारे में, पंजाब के हालात के बारे में बात हुई। पर किसी ने भी परिस्थिति को चिंताजनक नहीं बताया।

दूसरा पड़ाव था, जालंधर शहर के जमशेर कस्बे के पास का गांव, चननपुरा। यहां मेरे मौसाजी का पुश्तैनी घर है। भाई जीवन के साथ रात में वहीं बसेरा था। वहां का नजारा ही कुछ और था ! बढती ठंड के बावजूद रात के आठ-साढ़े आठ बजे गांव के बच्चे फ्लड लाइट में फ़ुटबाल खेल रहे थे। यहां अक्सर इस खेल की प्रतियोगिताएं होती रहती हैं। दूसरा दिन छुट्टी का था। अल-सुबह भी बच्चे खेल-कूद में व्यस्त दिखे ना कि मोबाइल में ! वहीं भाई के पडोसी स्थानीय वैद्य श्री विनोद जी ने प्रदेश में नशे इत्यादि के चलन को सिरे से तो नहीं नकारा, पर इस गांव में किसी के भी लती होने की या उनसे ऐसे किसी व्यक्ति के इलाज करवाने की किसी भी बात से इंकार किया। लत तो यहां मोबाईल की भी नहीं दिखी किसी में भी !

तीसरा पड़ाव था होशियारपुर के पास का एक और छोटा सा गांव रिहाणा-जट्टा, कभी देहात हुआ करता यह गांव आज सीवर युक्त पक्के मार्ग, अच्छे-खासे घरों, दुकानों, बिजली-पानी जैसी जरूरतों से युक्त साफ़-सुथरी जगह है। हमारे वहां पहुंचने पर घर का युवक, घर में बाइक होने के बावजूद सायकिल ले कर कुछ लाने निकला। जीतनी देर भी हम वहां रहे, किसी ने भी मोबाइल को हाथ नहीं लगाया। बाद में ध्यान दिया तो वहां अधिकांश लोग सायकिल का उपयोग करते दिखे। सुविधा व सम्पन्नता होने के बावजूद ! अच्छा लगा यह देख कर।

कार्यक्रम के दौरान एक सज्जन से भेंट हुई जो ''लवली यूनिवर्सिटी'' में प्रोफ़ेसर हैं। बातचीत के दौरान इशारों में ही वहां के युवा और नशे की बात छेड़ी तो उन्होंने बे-बाक हो कहा कि पहले आपसी सहयोग से ही खेती-खलिहानी होती थी। फिर लोगों में विदेश जाने का मोह बहुत बढ़ गया। फिर जैसे प्रकृति में किसी जगह हवा गर्म हो ऊपर उठती है तो तत्काल आस-पास की वायु उस रिक्त स्थान की पूर्ति करने पहुंच जाती है। वैसे ही जब पंजाब के हर घर से लोग विदेश जाने लगे तो उसकी खानापूर्ति के लिए यू.पी., बिहार, यहां तक कि बांग्लादेशी भी अपनी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ रोजगार के सिलसिले में यहां आ बसे। शायद तभी से कुछ गलत आदतें यहां पनपीं ! फिर भी पहले से हालात में बहुत सुधार हुआ है। यहां के मुख्य मंत्री #कैप्टन_अमरिंदर_सिंह इस बारे में बहुत गंभीर हैं और पूरी तरह प्रदेश को नशे की गिरफ्त से छुटकारा दिलाने को प्रतिबद्ध हैं। कानून-व्यवस्था भी काफी सुधरी है। आशा है पंजाब फिर अपना खोया गौरव प्राप्त कर लेगा, जल्दी।

अपनी इस संक्षिप्त यात्रा में एक बात जो सबसे अच्छी लगी वह यह कि छोटे से छोटे गांवों में भी खेलने के लिए अच्छे-खासे मैदान उपलब्ध कराए गए हैं, बिजली की सुविधा के साथ। वहाँ के बच्चे-युवा-युवतियां भी खेलों में रूचि रखते हैं जो एक सकारात्मक निशानी है, लोगों के जागरूक होने की। तसल्ली यह भी हुई कि पंजाब के हालात सुधार की ओर हैं। वैसे नशाखोरी कहां नहीं होती हमारे देश में ! कुछ प्रदेशों में तो शराब वितरण भी वहाँ की सरकारें ही करती हैं। और तो और देश की राजधानी की हालत भी बहुत अच्छी तो नहीं ही कही जा सकती ! इसलिए इस जहर से अपनी नस्लों-पीढ़ियों को बचाने की मुहीम आम जनता को ही छेड़नी पड़ेगी, बिना सरकार का मुंह जोहे !  

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