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शनिवार, 26 अक्टूबर 2019

आतिशी मायाजाल का करिश्मा

आप सभी मित्रों, परिजनों और "अनदेखे अपनों" को ह्रदय की गहराइयों से इस पावन पर्व की ढेरो व अशेष शुभकामनाएं। परमपिता की असीम कृपा से हम सब का जीवन पथ सदा प्रशस्त व आलोकित रहे ! राग-द्वेष दूर हों, सुख-शांति का वास हो, आने वाला समय भी शुभ और मंगलमय हो !


#हिन्दी_ब्लागिंग 
दीपावली का शुभ दिन पड़ता है अमावस्या की घोर काली रात को। शुरू होती है अंधेरे और उजाले की जंग। अच्छाई की बुराई पर जीत की जद्दो-जहद। निराशा को दूर कर आशा की लौ जलाने रखने की पुरजोर कोशिश। इसमें अपनी छोटी सी जिंदगी को दांव पर लगा अपने महाबली शत्रु से जूझती हैं सूर्यदेव की अनुपस्थिति में उनका प्रतिनिधित्व करने वाली रश्मियाँ।  


हम भारतवासियों दृढ का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है। दीवाली यही चरितार्थ करती है, असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय। दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है।अंधकार कितना भी गहरा क्यों ना हो, ये छोटे-छोटे रोशनी के सिपाही अपनी सीमित शक्तियों के बावजूद एक मायाजाल रच, विभिन्न रूप धर, चाहे कुछ क्षणों के लिए ही सही अंधकार को मात देने के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगा देते हैं। ताकि समस्त जगत को खुशी और आनंद मिल सके। 

ऐसा होता भी है, इसकी परख निश्छल मन वाले बच्चों के चेहरे पर फैली मुस्कान और हंसी को देख कर अपने-आप हो जाती है। एक बार अपने तनाव, अपनी चिंताओं, अपनी व्यवस्तताओं को दर-किनार कर यदि कोई अपने बचपन को याद कर, उसमें खो कर देखे तो उसे भी इस दैवीय एहसास का अनुभव जरूर होगा। यही है इस पर्व की विशेषता, इसके आतिशी मायाजाल का करिश्मा, जो सबको अपनी गिरफ्त में ले कर उन्हें चिंतामुक्त कर देने की, चाहे कुछ देर के लिए ही सही, क्षमता रखता है।  
एक बार फिर आप सब मित्रों, परिजनों और "अनदेखे अपनों" को ह्रदय की गहराइयों से शुभकामनाएं।  
हम सब के लिए आने वाला समय भी शुभ और मंगलमय हो।    

बुधवार, 24 जुलाई 2019

नदी का ख्वाब

हमारे यहां तो आस्था, प्रेम, विश्वास की पराकाष्ठा रही है ! प्रेम इतना कि हर जीव-जंतु से अपनत्व बना लिया ! आदर इतना कि पत्थर को भी पूजनीय बना दिया ! ममता इतनी कि नदियों को माँ मान लिया ! जल, वायु, ऋतुओं यहां तक कि राग-रागिनियों तक को एक इंसानी रूप दे दिया गया ! शायद इसलिए कि एक आम आदमी को भी सहूलियत रहे, समझने में, ध्यान लगाने और मन को एकाग्र करने में। उसी आकार वाली बात को लेकर एक कल्पना जगी कि जब इन सब को इंसान का रूप मिला है  तो शायद उसके गुण भी प्राप्त हुए होंगे ! इसी सोच का नतीजा है, नदी का ख्वाब ! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 
अभी रात का धुंधलका पूरी तरह छंटा नहीं था ! वैसे में ही सूखी नदी के प्रवाह क्षेत्र के किनारे खड़े बूढ़े बरगद ने देखा कि रोज एक परित्यक्ता, बीमार, मरियल सी घिसटती, रेंगती, ठिठकती धार जो कभी रास्ते के पत्थरों के अवरोध से रूकती-चलती मजबूरन सी आगे बढ़ती थी, आज जैसे बाधा रहित, उमंग भरी, प्रफुल्लित सी हो, किसी नागिन की तरह तेजी से सरसराती हुई दौड़ी जा रही है ! बरगद से रहा नहीं गया, उसने जोर से पूछा, ''क्यों बहिनी, आज तो बड़ी खुश नज़र आ रही हो !''

''हाँ, दद्दा ! सुबह भोर के तारे के जाने के पहले, मैंने स्वप्न देखा कि मैं पानी से लबालब भरी हुई हूँ ! इस छोर से उस छोर तक सिर्फ मैं ही मैं हूँ ! फिर से जीवन दायिनी नदी बन गयी हूँ ! सारे अवरोध ख़त्म हो चुके हैं और मैं दोनों तटों का हाथ थामे दौड़ी जा रही हूँ, दौड़ी जा रही हूँ ! उसके बाद से ही सब कुछ अच्छा और बदला-बदला सा लग रहा है !

बरगद मुस्कुरा उठा ! उसने अपनी फुनगी ऊपर उठा हवा को सूँघा और समझ गया सावन जो आ गया है !

शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

भगवान को सरल जन ही प्रिय हैं !

बेचारा दौड़ा-दौड़ा महात्मा जी के पास गया और बोला महाराज आज रसोई ठंडी पड़ी है, कुछ बन नहीं रहा ! महात्मा जी बोले, अरे तुम्हें बताना भूल गया था, आज एकादशी है, ना कुछ बनेगा, नाहीं मिलेगा। सबका उपवास रहेगा। ये बोला, मेरा भी ? महात्मा बोले, हाँ ! सभी का। यह बोला, महाराज आपके इतने चेले हैं, उनसे करवा लो ! महात्मा बोले, नहीं सभी को करना होता है। यह घबड़ाया, बोला महाराज यदि मैंने आज एकादशी कर ली तो मैं तो द्वादशी देख ही नहीं पाऊँगा ! महात्मा समझ गए कि ये भूखा नहीं रह सकता...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
सरलता का अर्थ है, अंदर-बाहर से एक जैसा होना। मन, वचन और कर्म में समान होना। ऐसे लोगों मे दर्प, दंभ, अहम आदि दुर्गुण नहीं होते ! सरलता में मित्रता है, प्रेम है, अपनापन है, जोड़ने की शक्ति है। यही जोड़ने की शक्ति व्यक्ति को व्यक्ति से, समाज से और फिर परमात्मा तक से जोड़ देती है। पिछले दिनों इसी पर एक कथा पढ़ने को मिली, बहुत अच्छी लगी तो लगा सबसे साझा करनी चाहिए ! कुछ लम्बी जरूर है पर मनोरंजक भी है। 

किसी गांव में एक किसान अपने तीन बेटों के साथ रहा करता था। उसका छोटा बेटा सीधा-सादा, सरल ह्रदय, भोला-भाला था। किसान के दोनों बेटे खेत में अपने पिता का हाथ बटाते थे पर छोटे को भोजन बहुत प्रिय था। उसकी खुराक भी कुछ ज्यादा ही थी। वह खाता था और पड़ा रहता था। समय की मार एक दिन किसान का निधन हो गया। अब दोनों भाइयों को निठ्ठला छोटा भाई भार लगने लगा। काम का ना काज का दुश्मन अनाज का ! उन्होंने उसे एक दिन घर से निकाल दिया। अब वह कहां जाता ! ऐसे ही बिसूरते हुए गांव के बाहर बैठा हुआ था कि उसे एक महात्मा अपने शिष्यों के साथ आते दिखे। सभी हट्टे-कट्टे, स्वस्थ नजर आ रहे थे। इसने सोचा सब मोटे-ताजे, तंदरुस्त नजर आ रहे हैं, यह सब खूब खाते होंगे ! मुझे भी भोजन मिल जाएगा। यही सोच वह महात्माजी के चरणों में लोट गया और अपने को भी चेला बनाने की और साथ ले चलने की विनती करने लगा। महात्मा दयालु थे, उन्होंने उसे तुलसी की माला पहना दी, नाम रख दिया, मंत्र दे दिया ! बोले चलो ! यह ठहरा भोला बंदा, पूछने लगा, करना क्या होगा ? महात्मा बोले, कुछ नहीं, पूजा-आरती में खड़े रहना है। भगवान का नाम लेते रहना है। उनका ध्यान करना है, बस। पर इसको तो अपने भोजन की चिंता थी ! सो फिर पूछा, महाराज खाने को ? महात्मा मुस्कुराए, बोले, दोनों समय प्रेम से, भरपेट ! पर महाराज मेरा दो वक्त से....! महात्मा हंसने लगे, बोले तुम्हें चार बार मिलेगा, अब खुश ! उसको लगा यह तो स्वर्ग मिल गया ! करना कुछ नहीं, खाना भरपूर। वह साथ हो लिया।

पर उसे क्या पता था की यहां भी मुसीबत आएगी। एक दिन उठ कर देखा तो भंडार में सब वैसे ही पड़ा था, चूल्हे भी ठंडे पड़े थे, कोई हलचल नहीं। बेचारा दौड़ा-दौड़ा महात्मा जी के पास गया और बोला महाराज आज रसोई ठंडी पड़ी है, कुछ बन नहीं रहा ! महात्मा जी बोले, अरे तुम्हें बताना भूल गया था, आज एकादशी है, ना कुछ बनेगा, नाहीं मिलेगा। सबका उपवास रहेगा। ये बोला, मेरा भी ? महात्मा बोले, हाँ ! सभी का। यह बोला, महाराज आपके इतने चेले हैं, उनसे करवा लो ! महात्मा बोले, नहीं सभी को करना होता है। यह घबड़ाया, बोलै महाराज यदि मैंने आज एकादशी कर ली तो मैं तो द्वादशी देख ही नहीं पाऊँगा ! महात्मा समझ गए कि ये भूखा नहीं रह सकता ! बोले नियमानुसार तो भोजन नहीं बन सकता पर भगवान के भोग के रूप में बना लो और उनका भोग जरूर लगाना। जाओ भंडारे से सामान ले कर बाहर जा बना लो। बंदा खुश उसने सामान लिया, नदी किनारे जा, जैसा बन पड़ा बना, भोग लगाने को प्रभु को पुकारने लगा कि आइए भोग लगा लीजिए ! उसे लगा कि यूँ ही बुलाने पर भगवान आते होंगे और भोजन ग्रहण करते होंगे ! पर प्रभू नहीं आए ! इसको लग रही थी भूख ! बार-बार बुलाने पर भी जब प्रभू नहीं आए तो इसे लगा कि इस रूखे-सूखे भोजन को देख वे नहीं आ रहे हैं सो इसने ऊँची आवाज में कहा, सुनो आज मंदिर के भरोसे मत रहना, आज पूरी हलवा नहीं मिलेगा। आज एकादशी है वहां कुछ नहीं बना, भूखे रह जाओगे ! आज तो यही सूखी रोटी और नदी का पानी है। जल्दी आ जाओ, मुझे भी जोरों की भूख लगी है। उसकी इस सरलता पर प्रभू रीझ गए और प्रकट हो गए। पर वे अकेले नहीं आए, उनके साथ सीता माता भी थीं। अब जब इसने प्रभू और सीता माता को देखा तो उनकी सुंदर जोड़ी को देखता ही रह गया, तन-मन आनंद से भर गए पर साथ ही उदास भी हो गया ! सोचने लगा गुरु जी ने एक भगवान के लिए कहा था ये तो दो आ गए ! अब वो कभी भगवान जी को देखता तो कभी भोजन की ओर ! प्रभू भी कौतुक कर रहे थे, बोले क्या हुआ ? बोला, कुछ नहीं एक के इंतजाम की बात थी, आप दो जने आ गए ! थोड़ी एकादशी तो करवा ही दोगे ! चलो कोई बात नहीं ! विराजो। भगवान बैठ गए ! भोजन परोस दिया। बोला, मैं कुछ भूखा तो रहा पर आपको देख कर बहुत अच्छा लगा ! चलो आज का तो हो गया, मैं समझ गया कि आप दो आते हो; अगली एकादशी पर मैं ज्यादा इंतजाम कर के रखुंगा। पर आज की तरह परेशान मत करना जल्दी आ जाना। भगवान ने कहा, ठीक है और चले गए।

इधर इसने आ कर गुरु जी से कुछ नहीं बताया क्योंकि इसे लग रहा था भगवान ऐसे ही आते होंगे, गुरु जी को मालुम ही होगा, इसमें बताने वाली बात ही क्या है। इतना सरलचित्त ! अगली एकादशी आई तो महात्मा जी से बोला, गुरूजी कुछ सामान बढ़वाओ ! उन्होंने पूछा, क्यों ? तो बोला, वहां दो भगवान आते हैं। गुरूजी समझे इस बार भूखा रह गया होगा; इसी से ऐसा कह रहा है। उन्होंने सामान बढ़वा दिया। अब इसने सारा सामान ले, नदी किनारे पहुंच, भोजन बना, प्रभू को पुकारा ! भगवान तो इंतजार ही कर रहे थे। प्रकट हो गए। पर इस बार साथ में लक्ष्मण जी भी थे ! अब इसने जो तीन को देखा तो बोला, हद हो गयी; एक को बुलाओ तो दो आते हैं; दो का इंतजाम करो तो तीन आते हैं ! अब यह कौन है ? प्रभू बोले, ये मेरे छोटे भाई लक्ष्मण हैं। भोले बंदे को शक ! पूछने लगा, सच कह रहे हो या ऐसे ही पकड़ लाए हो ? प्रभू मुस्कुराते हुए बोले, नहीं-नहीं, सच में मेरे छोटे भाई हैं। ये परेशान, बोला, गुरु जी ने तो सिर्फ ठाकुर जी को भोग लगाने को कहा था, यहां तो पूरा परिवार ही आ गया ! उसकी बात पर प्रभू और सीता मैया तो खूब हँसे पर लक्ष्मण जी सोचने लगे, प्रभू कहाँ ले आए ! क्या स्वागत हुआ है। बंदा बोला, चलो कोई बात नहीं, भूखा भले ही रह जाऊं, पर आपलोगों को देख कर मुझे अच्छा बहुत लगता है। चलिए विराजिए, एक ही तो ज्यादा है, हो जाएगा। सबने भोग लगाया। प्रभू जब चलने लगे तो इसने बार-बार उनके चरणों में सर नवाया, बोलने लगा, आप लोग बहुत अच्छे लगते हो, बहुत सुंदर हो ! कहते-कहते उसकी आँखों में आंसू भर आए। तभी अचानक उसने भगवान से कहा, प्रभू , अगली एकादशी का अभी से बता जाओ कितने आओगे, ताकि मैं उतने का इंतजाम कर रखूँ। यही एक बात है पहले से बता दिया करो कितने आओगे ! और कोई परेशानी नहीं है। प्रभू तो कौतुक कर ही रहे थे, बोले, तुम चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा, हम आ जाएंगे !

इस बार भी इसने महात्मा जी को कुछ नहीं बताया। अगली एकादशी भी आ गयी। अब गुरु जी से सामान कैसे बढ़वाऊं यह सोच कर परेशान था। इसे कुछ उदास सा देख महात्मा जी ने ही पूछ लिया, क्या बात है बच्चा ? कोई परेशानी हो तो बताओ ! जब उन्होंने पूछ ही लिया तो इसने कहा, क्या बताएं, वहाँ बहुत से भगवान आते हैं, हर बार भोजन कम पड जाता है। राशन दोगुना करवा दें। महात्मा जी ने सोचा, इतना तो यह खा नहीं सकता ! जरूर बेच देता होगा। पर बोले कुछ नहीं और उसके कहे मुताबिक़ राशन दिलवा दिया। पर करता क्या है यह देखने उसके पीछे-पीछे जाने की ठानी। यह सरल ह्रदय सामान ले जा पहुंचा नदी तट पर। पर इस बार उसने भोजन बनाया नहीं, सोचा पहले बुला कर देख लूँ, कितने आते हैं, फिरउसी हिसाब से बनाऊंगा। सो इसने प्रभू को पुकारा ! इसके पुकारते ही भगवान भी आ गए। पर अकेले नहीं इस बार लक्ष्मण जी के साथ-साथ भरत जी, शत्रुघ्न जी तथा हनुमान जी भी साथ थे, यानी पूरा राम दरबार ! इसने देखा तो परेशान, बोला, प्रभू यह तो हद है ! एक को बुलाया तो दो आए, फिर तीन आज तो इतने सारे ! इंसान तो इंसान आप तो वानर को भी साथ ले आए। तो सुन लो मैंने भी भोजन नहीं बनाया है ! प्रभू ने पूछा,  ऐसा क्यों ? तो बोला, जब मुझे मिलना ही नहीं, तो मैं क्यों बनाऊँ ? यह सारा सामान पड़ा है, बनवा लो और भोग लगा लो ! इतना कह वो एक किनारे पेड़ के नीचे जा कर बैठ गया। भगवान भी भक्त के वश ! भोजन व्यवस्था संभाल ली गयी। भरत जी और हनुमान जी ने सफाई वगैरह की, लक्ष्मण जी लकड़ी-पानी ले कर आए। शत्रुघ्न जी ने सामान व्यवस्थित किया और सीता जी ने रसोई संभाली। अब जब साक्षात अन्नपूर्णा को भोजन बनाते देखा तो जितने ऋषि-मुनि-संत-महात्मा थे वे सब भी आ उपस्थित हुए, माँ के हाथों का प्रसाद पाने को। उधर इतना कुछ हो रहा था और इधर हमारा भक्त आँख बंद किए बैठा था। जब प्रभू ने पूछा, भाई आँख क्यों मूँदे बैठे हो ? तो बोला, पहले तो कुछ मिल भी जाता था आज इतनी भीड़ में जब कुछ मिलना ही नहीं है तो देखने से क्या फायदा !

इधर गुरु जी भी यह देखने पहुँच गए कि देखें ये सामान का करता क्या है ! तो देखते क्या हैं कि ये आँखें मूंदे बैठा है और सामने सामान यूँ ही पड़ा हुआ है ! अचरज में पड़ वे बोले, क्यों बच्चा, क्या हो रहा है ? उनकी आवाज सुन ये उठा और बोला आपने तो अच्छी मुसीबत में डाल दिया ! देखिए कितने भगवान आए हुए हैं ! गुरु जी ने इधर-उधर देखा उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दिया, बोले, यहाँ तो कोई भी नहीं है ! तुम दिख रहे हो और सामान दिख रहा है बस ! सामने खड़े प्रभू मुस्कुरा रहे थे। इसने सामने खड़े भगवान से कहा, गुरु जी ने तो मुझसे एक भी एकादशी नहीं करवाई, तुमने पूरी करवा दी और उन्हें पता भी नहीं लगने दे रहे हो ! इनको क्यों नहीं दिखते ? इनको भी दिखो ! प्रभू बोले, मैं इनको नहीं दिख सकता ! क्यों नहीं दिख सकते ? ये मेरे गुरु हैं, विद्वान हैं, नेक हैं, महान हैं। प्रभू बोले, इसमें कोई संदेह नहीं, तुम्हारे गुरु बहुत महान हैं, विद्वान हैं, योग्य हैं, भजनानंदी हैं फिर भी मैं उन्हें नहीं दिखूंगा ! आँखों में आंसू ला वह बोला, इतना सब है फिर क्यों नहीं दिखोगे ? इसलिए क्योंकि वे तुम्हारी तरह सरल नहीं हैं। मैं तो सरल के लिए सरलता से मिलता हूँ। उसको बड़बड़ाते देख गुरूजी ने पूछा, क्या हुआ बच्चा ? क्यों रो रहे हो ? तो बोला, भगवान् कह रहे हैं कि आप सरल नहीं हो ! इतना सुनते ही गुरु जी की आँखों से अविरल जल बहने लगा ! बोले, सचमुच सब कुछ जीवन में मिला पर सरलता नहीं मिल पाई ! जिससे भगवान् के दर्शन होते थे वही नहीं मिला तो मेरा तप-पूजा-पाठ यहां तक कि जीवन भी व्यर्थ है ! उनके आंसू थमते नहीं थे ! उनका ऐसा पश्चाताप देख प्रभू भी पिघल गए और उन्हें भी दर्शन दे कृतार्थ किया।          

बुधवार, 28 नवंबर 2018

पंजाब फिर बनेगा सिरमौर

पंजाब के दो दिन के प्रवास में जो भी देखा-पाया, वह प्रदेश के बारे में फैले या फैलाए गए दुष्प्रचार के बिल्कुल विपरीत था। हालांकि यह आकलन सिमित समय और दायरे का ही था पर हांडी में पक रहे चावलों का अंदाज उसके एक कण से ही लग जाता है। पर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वहां सब कुछ चाक-चौबंद या दुरुस्त है पर वैसा भी नहीं है जैसा पूरे देश को बताया जा  रहा था। पर ऐसा हुआ क्यों ? लोगों का मानना है कि  पहले आपसी सहयोग से ही खेती-खलिहानी होती थी। फिर जैसे प्रकृति में किसी जगह हवा गर्म हो ऊपर उठती है तो तत्काल आस-पास की वायु उस रिक्त स्थान की पूर्ति करने पहुंच जाती है, वैसे ही जब पंजाब के हर घर से लोग विदेश जाने लगे तो उसकी खानापूर्ति के लिए यू.पी., बिहार, यहां तक कि बांग्लादेशी भी अपनी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ रोजगार के सिलसिले में यहां आ बसे। शायद तभी से कुछ गलत आदतें यहां पनपी ! फिर भी पहले से हालात में बहुत सुधार हुआ है।  अच्छा लगा मोबाइल थामने की जगह बच्चों को दौड़ते-भागते-खेलते देख कर ................!

#हिन्दी_ब्लागिंग
वर्षों बाद पिछले हफ्ते पंजाब जाना हुआ। साथ थीं, तरह-तरह की आशंकाऐं, भ्रांतियां, गैर-जिम्मेदराना मिडिया द्वारा प्रदत्त, नशे और पंजाब को एक दूसरे का पर्याय बताने वाली उल्टी-सीधी जानकारियां,  पर वहां के दो दिन के प्रवास में जो भी देखा-पाया वह प्रदेश के बारे में फैले या फैलाए गए दुष्प्रचार के बिल्कुल विपरीत था। हालांकि यह आकलन सिमित समय और दायरे का ही था पर हांडी में पक रहे चावलों का अंदाज उसके एक कण से ही लग जाता है। पर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वहां सब कुछ चाक-चौबंद या दुरुस्त है पर वैसा भी नहीं है जैसा पूरे देश को बताया जा  रहा था। 

यात्रा के दौरान मुझे तीन गांवों में जाने का अवसर मिला। पहला अपने ननिहाल हदियाबाद, जो फगवाड़ा शहर से ड़ेढेक की. मी. की दूरी पर फगवाड़ा-नूरमहल रोड पर स्थित है, पर अब शहर का ही हिस्सा बन गया है। वहां जाने के लिए फगवाड़ा बस-अड्डे से कुछ आगे शुगर मिल से बाएं मुड़ते ही वह रामगढ़िया कालेज है, जहां फिल्म स्टार धर्मेंद्र ने अपनी शुरुआती पढ़ाई की थी, संयोगवश मेरे चाचाजी भी वहीं पढ़े थे। वहाँ मेरे बड़े मामाजी के दोस्त दो शिक्षक हैं, घर के कार्यक्रम में उनसे मिलना हुआ, कुछ देर बात की। गांव में भी पूरा दिन गुजरा, पर कहीं भी कुछ अस्वाभाविक जैसा नहीं लगा। उल्टे आत्मीयता, प्रेम, भाईचारे का ही माहौल मिला। वहाँ की तक़रीबन सौ साल पुरानी पाठशाला और सरकारी स्कूल के गुरुजनों से भी युवाओं के बारे में, पंजाब के हालात के बारे में बात हुई। पर किसी ने भी परिस्थिति को चिंताजनक नहीं बताया।

दूसरा पड़ाव था, जालंधर शहर के जमशेर कस्बे के पास का गांव, चननपुरा। यहां मेरे मौसाजी का पुश्तैनी घर है। भाई जीवन के साथ रात में वहीं बसेरा था। वहां का नजारा ही कुछ और था ! बढती ठंड के बावजूद रात के आठ-साढ़े आठ बजे गांव के बच्चे फ्लड लाइट में फ़ुटबाल खेल रहे थे। यहां अक्सर इस खेल की प्रतियोगिताएं होती रहती हैं। दूसरा दिन छुट्टी का था। अल-सुबह भी बच्चे खेल-कूद में व्यस्त दिखे ना कि मोबाइल में ! वहीं भाई के पडोसी स्थानीय वैद्य श्री विनोद जी ने प्रदेश में नशे इत्यादि के चलन को सिरे से तो नहीं नकारा, पर इस गांव में किसी के भी लती होने की या उनसे ऐसे किसी व्यक्ति के इलाज करवाने की किसी भी बात से इंकार किया। लत तो यहां मोबाईल की भी नहीं दिखी किसी में भी !

तीसरा पड़ाव था होशियारपुर के पास का एक और छोटा सा गांव रिहाणा-जट्टा, कभी देहात हुआ करता यह गांव आज सीवर युक्त पक्के मार्ग, अच्छे-खासे घरों, दुकानों, बिजली-पानी जैसी जरूरतों से युक्त साफ़-सुथरी जगह है। हमारे वहां पहुंचने पर घर का युवक, घर में बाइक होने के बावजूद सायकिल ले कर कुछ लाने निकला। जीतनी देर भी हम वहां रहे, किसी ने भी मोबाइल को हाथ नहीं लगाया। बाद में ध्यान दिया तो वहां अधिकांश लोग सायकिल का उपयोग करते दिखे। सुविधा व सम्पन्नता होने के बावजूद ! अच्छा लगा यह देख कर।

कार्यक्रम के दौरान एक सज्जन से भेंट हुई जो ''लवली यूनिवर्सिटी'' में प्रोफ़ेसर हैं। बातचीत के दौरान इशारों में ही वहां के युवा और नशे की बात छेड़ी तो उन्होंने बे-बाक हो कहा कि पहले आपसी सहयोग से ही खेती-खलिहानी होती थी। फिर लोगों में विदेश जाने का मोह बहुत बढ़ गया। फिर जैसे प्रकृति में किसी जगह हवा गर्म हो ऊपर उठती है तो तत्काल आस-पास की वायु उस रिक्त स्थान की पूर्ति करने पहुंच जाती है। वैसे ही जब पंजाब के हर घर से लोग विदेश जाने लगे तो उसकी खानापूर्ति के लिए यू.पी., बिहार, यहां तक कि बांग्लादेशी भी अपनी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ रोजगार के सिलसिले में यहां आ बसे। शायद तभी से कुछ गलत आदतें यहां पनपीं ! फिर भी पहले से हालात में बहुत सुधार हुआ है। यहां के मुख्य मंत्री #कैप्टन_अमरिंदर_सिंह इस बारे में बहुत गंभीर हैं और पूरी तरह प्रदेश को नशे की गिरफ्त से छुटकारा दिलाने को प्रतिबद्ध हैं। कानून-व्यवस्था भी काफी सुधरी है। आशा है पंजाब फिर अपना खोया गौरव प्राप्त कर लेगा, जल्दी।

अपनी इस संक्षिप्त यात्रा में एक बात जो सबसे अच्छी लगी वह यह कि छोटे से छोटे गांवों में भी खेलने के लिए अच्छे-खासे मैदान उपलब्ध कराए गए हैं, बिजली की सुविधा के साथ। वहाँ के बच्चे-युवा-युवतियां भी खेलों में रूचि रखते हैं जो एक सकारात्मक निशानी है, लोगों के जागरूक होने की। तसल्ली यह भी हुई कि पंजाब के हालात सुधार की ओर हैं। वैसे नशाखोरी कहां नहीं होती हमारे देश में ! कुछ प्रदेशों में तो शराब वितरण भी वहाँ की सरकारें ही करती हैं। और तो और देश की राजधानी की हालत भी बहुत अच्छी तो नहीं ही कही जा सकती ! इसलिए इस जहर से अपनी नस्लों-पीढ़ियों को बचाने की मुहीम आम जनता को ही छेड़नी पड़ेगी, बिना सरकार का मुंह जोहे !  

बुधवार, 19 सितंबर 2018

एक मंत्र, जिसके सिद्ध होने पर हनुमान जी आज भी दर्शन देते हैं

हनुमान जी के चिरंजीवी होने के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए पिदुरु के आदिवासियों की हनु पुस्तिका आजकल " सेतु एशिया" नामक आध्यात्मिक संगठन के पास है। सेतु के संत पिदुरु पर्वत की तलहटी में स्थित अपने आश्रम में इस पुस्तिका को समझकर इसका आधुनिक भाषाओं में अनुवाद करने की चेष्टा में जुटे हुए हैं। लेकिन इन आदिवासियों की भाषा की कलिष्टता और हनुमान जी की रहस्य्मयी लीलाएं इतनी पेचीदा हैं कि उसको समझने में ही काफी समय लग रहा है। पिछले 6 महीने में केवल 3 अध्यायों का ही अनुवाद हो पाया है........!

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हनुमान जी ! देश के, सबसे लोकप्रिय, प्रसिद्ध, पूजनीय पांच देवताओं में से एक। अकेले ऐसे पात्र, जिनकी मौजूदगी रामायण और महाभारत दोनों ग्रंथों में पाई जाती है। जिनके बारे में यह मान्यता है कि वे अजर-अमर
और चिरंजीवी हैं और अपने भक्तों की रक्षा के लिए आज भी धरती पर विचरण करते हैं। उनका निवास हिमालय में माना जाता है, जहां से वे अपने भक्तों की पुकार पर उनकी सहायता करने मानव समाज में आते हैं लेकिन किसी को आँखों से दिखाई नहीं देते। लेकिन उन्हीं का दिया हुआ एक ऐसा मंत्र भी है जिसके जाप से हनुमान जी अपने सच्चे भक्त के सामने साक्षात प्रकट हो जाते हैं। इसके पीछे एक लोक मान्यता है 

रामायण में अभिन्न रूप से जुडी लंका की एक आदिवासी जनजाति का यह दावा है कि हनुमान जी की उन पर असीम कृपा है। उनके अनुसार जब प्रभु राम जी ने अपना मानव जीवन पूरा कर समाधि ले गो-लोक प्रस्थान किया तो हनुमान जी ने भी व्यथित हो अयोध्या यह सोच कर छोड़ दी कि जब मेरे प्रभू ही यहां नहीं हैं तो मेरा क्या काम ! उन्होंने जंगलों को अपना आवास बना लिया था। पर मन जब अपने इष्ट के बिना ज्यादा
व्यथित हो जाता था तो वह देशाटन के लिए निकल जाते थे। ऐसे ही एक बार वे भ्रमण करते हुए लंका के जंगलों में भी चले गए थे जहाँ उस समय विभीषण का राज्य था। वहां उन्होंने प्रभु राम के स्मरण में पिदुरु (पिदुरुथालागाला) जो श्री लंका का सबसे ऊँचा पर्वत है, वहां बहुत दिन गुजारे थे। उसी दौरान वहां रहने वाले मातंग आदिवासियों, जो कि लंका की पुरानी जन-जाति वेद्दाह की एक उप-जाति है, ने उनकी खूब सेवा की थी। हनुमान जी भी उनसे बहुत घुल-मिल गए थे। जब वे वहां से लौटने लगे तब वहां के लोग बहुत दुखी हो गए, बोले प्रभू हमें अब कौन राह दिखाएगा ! कौन हमें उबारेगा ! इन लोगों ने हनुमान जी को रोकने की बहुत कोशिश की ! पर रमता जोगी बहता पानी कब एक जगह ठहरता है ! पर उनका प्रेम देख भक्तवत्सल हनुमान जी ने यह मंत्र उनको देते हुए कहा, मैं आपकी सेवा, प्रेम और समर्पण से अति प्रसन्न हूँ। जब भी आप लोगों को मेरी जरुरत हो, इस मंत्र का जाप करना, मै प्रकाश की गति से आपके पास आ जाऊँगा। यह कह कर उन्होंने वह अमोघ मंत्र उनके मुखिया को सौंप दिया। जो इस प्रकार था -

                     "कालतंतु कारेचरन्ति एनर मरिष्णु , निर्मुक्तेर कालेत्वम अमरिष्णु"

मंत्र देने के साथ ही हनुमान जी ने इस मंत्र को सिद्ध करने की दो शर्तें भी रखी थीं। पहली कि जाप करने वाले को अपनी आत्मा का मेरे साथ संबंध होने का बोध होना चाहिए, ऐसा ना होने पर यह मंत्र काम नहीं करेगा। 
दूसरी जब इस मंत्र का जाप किया जाए तो 980 मीटर की दूरी तक कोई ऐसा इंसान नहीं होना चाहिए जो पहली शर्त पूरी न कर पा रहा हो। यानी इस मंत्र का जाप या तो बिल्कुल अकेले में हो या फिर वहां सिर्फ वही लोग हों जिनकी आत्मा को मेरे साथ संबंध होने का बोध हो।  

मंत्र तो मिल गया पर मुखिया के मन में उसे पाने के बाद एक चिंता उठी, जिसके निवारण हेतु उसने प्रभू से पूछा, हे प्रभु; हम इस मंत्र को तो यथाशक्ति गुप्त रखेंगे; लेकिन फिर भी अगर किसी को इस मंत्र का पता चल गया और वह इस मंत्र का दुरुपयोग करने लगा ! तो क्या होगा ? हनुमान जी ने उसकी दुविधा दूर करते हुए कहा, आप उसकी चिंता न करें ! अगर कोई ऐसा व्यक्ति इस मंत्र का जाप करेगा, जिसको अपनी आत्मा के मेरे साथ संबंध का बोध नहीं होगा तो यह मंत्र काम नहीं करेगा। 
पर मुखिया की दुविधा अभी भी जारी थी, उसने फिर पूछा, भगवन ! आपने हमें तो आत्मा का ज्ञान दे दिया है जिससे हम तो अपनी आत्मा के आपके साथ संबंध से परिचित हैं। लेकिन हमारे बच्चों और आने वाली पीढ़ियों का क्या होगा ? उनके पास तो ना तो आत्मा का ज्ञान होगा नहीं उन्हें अपनी आत्मा के आपके साथ संबंध का बोध होगा ! तब उनका उद्धार कैसे होगा ? तब हनुमान जी ने उन्हें यह वचन दिया कि मै आपके कुटुंब के साथ समय बिताने हर 41 साल बाद यहां आता रहूँगा और आकर आपकी आने वाली पीढ़ियों को भी आत्म ज्ञान देता रहूंगा; जिससे समय के अंत तक आपके कुनबे के लोग यह मंत्र जाप करके कभी भी मेरे साक्षात दर्शन कर सकेंगे।

उस आदिवसी जन-जाति के वंशज अभी भी श्री लंका के जंगलों में रहते हैं। उन्होंने अपने आप को सभ्य जगत से दूर ही रखा हुआ है। किसी को भी कुछ महीनों पहले तक उन पर की हनुमान कृपा का जरा सा भी आभास नहीं था, जब तक कि कुछ अन्वेषकों ने उनकी अनोखी और कुछ असामान्य गतिविधियों को देख नहीं लिया। खोज-खबर लेने के पश्चात पता चला कि यह कर्म-काण्ड वह "चरण पूजा" है जिसे हर 41 साल बाद प्रभू हनुमान की अगवानी के लिए किया जाता है। उन्होंने बताया कि 2014 में हनुमान जी उनके साथ थे, जिन्हें सिर्फ वही लोग देख सकते थे। उनके साथ कुछ दिन रहने और नई पीढ़ी को "आत्म-ज्ञान" देने के पश्चात 27 मई 2014 को भगवान वापस  चले गए। अब उनका आगमन 41 वर्षों के पश्चात 2055 में होगा। पर यदि     बहुत ही आवश्यक हुआ तो उस दैवी मंत्र के जाप से उनका आह्वान बीच में भी किया जा सकता है। इसी के साथ बिरादरी के मुखिया, बाबा मातंग, ने यह भी बताया कि हनुमान जी के आगमन, उनके यहां निवास, उनके प्रवचन, उनके कहे गए हरेक शब्द, उनके द्वारा किए गए कार्यों का, एक-एक मिनट का पूरा ब्यौरा, हम अपनी हनु पुस्तिका (पंजी या लॉग बुक) में दर्ज करते हैं।  2014 के प्रवास के दौरान हनुमान जी द्वारा जंगल वासियों के साथ की गई सभी लीलाओं का विवरण भी इसी पुस्तिका में नोट किया गया है।

आजकल यह पंजी, लॉग बुक, सेतु एशिया नामक आध्यात्मिक संगठन के पास है। सेतु के संत पिदुरु पर्वत
की तलहटी में स्थित अपने आश्रम में इस पुस्तिका को समझकर इसका आधुनिक भाषाओं में अनुवाद करने की चेष्टा में जुटे हुए हैं, ताकि हनुमान जी के चिरंजीवी होने के रहस्य का पर्दा उठ सके। लेकिन इन आदिवासियों की भाषा की कलिष्टता और हनुमान जी की रहस्य्मयी लीलाएं इतनी पेचीदा हैं कि उसको समझने में ही काफी समय लग रहा है। पिछले 6 महीने में केवल 3 अध्यायों का ही अनुवाद हो पाया है। जब भी इस पुस्तिका में का कोई नया अध्याय अनुवादित होता है तो सेतु संगठन का कोलम्बो ऑफिस उसका औपचारीक घोषणा करता है। अभी तक जिन अध्यायों के विवरण प्राप्त हुए हैं वे इस प्रकार हैं -
अध्याय 1 : चिरंजीवी हनुमान जी का आगमन : इस अध्याय में इस घटना का विवरण है कि पिछले साल एक रात हनुमान जी कैसे पिदुरु पर्वत के शिखर पर इन जंगल वासियों को दिखाई दिए। हनुमान जी ने उसके बाद एक बच्चे के पिछले जन्म की कहानी सुनाई, जो दो माताओं के गर्भ से पैदा हुआ था। 
अध्याय 2 : हनुमान जी के साथ शहद की खोज : इस अध्याय में इस बात का विवरण है कि अगले दिन हनुमान जी जंगल वासियों के साथ शहद खोजने निकले और वहां पर क्या घटनाएं घटित हुईं। 
अध्याय 3 : काल के जाल में चिरंजीवी हनुमान : यह सबसे रोचक अध्याय है। हनुमान जी द्वारा दिए गए  ऊपर दिए गए मंत्र का अर्थ इसी अध्याय में समाहित है। उदाहरण के तौर पर जब हम मनुष्य समय के बारे में सोचते हैं तो हमारे मन में घडी का विचार आता है; लेकिन जब भगवान समय के बारे में सोचते हैं तो उन्हें समय के धागों (तंतुओं ) का विचार आता है। इस मंत्र में “काल तंतु कारे” का अर्थ समय के धागों का जाल है।

आज विश्व भर के हनुमान भक्तों को बेसब्री से नए अध्याय की जानकारी का इंतजा रहता है, क्योंकि हर

ऐसी जानकारी उन्हें इस मंत्र की पहली शर्त पूरी करने के करीब ले जाती है; जिसे पूरी करने के बाद कोई भी भक्त इस दैवी मंत्र के जाप से हनुमान जी को अपने पास पा उनके वास्तविक रूप के दर्शन कर उनकी असीम कृपा का भागी बन सकता है। पर क्या खुद को इस लायक बना पाना इतना आसान है ? मार्ग तो सैंकड़ों वर्ष पहले तुलसीदास जी भी बता गए थे -
संकट ते हनुमान छुड़ावै, मन-क्रम-बचन ध्यान जो लावै।
यानी संकट पड़ने पर जिस वीर हनुमान के नाम का लोग मन, कर्म और वचन से जाप करते हैं, ध्यान लगाते हैं , उन्हें  हर संकट से मुक्ति मिल जाती है। पर कितने लोग मन-कर्म और वचन से निष्ठावान हो पाए। फिर भी यदि उपरोक्त सारी खोज फलीभूत हो जाती है तो यह हम सब के लिए गौरव का विषय तो होगा ही हमारी पौराणिकता की सच्चाई इसको कोरी कल्पना कहने-मानने वालों के लिए एक सबक होगी। 

*संदर्भ -  SPEAKINGTREE

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