हमारे यहां तो आस्था, प्रेम, विश्वास की पराकाष्ठा रही है ! प्रेम इतना कि हर जीव-जंतु से अपनत्व बना लिया ! आदर इतना कि पत्थर को भी पूजनीय बना दिया ! ममता इतनी कि नदियों को माँ मान लिया ! जल, वायु, ऋतुओं यहां तक कि राग-रागिनियों तक को एक इंसानी रूप दे दिया गया ! शायद इसलिए कि एक आम आदमी को भी सहूलियत रहे, समझने में, ध्यान लगाने और मन को एकाग्र करने में। उसी आकार वाली बात को लेकर एक कल्पना जगी कि जब इन सब को इंसान का रूप मिला है तो शायद उसके गुण भी प्राप्त हुए होंगे ! इसी सोच का नतीजा है, नदी का ख्वाब !
#हिन्दी_ब्लागिंग
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अभी रात का धुंधलका पूरी तरह छंटा नहीं था ! वैसे में ही सूखी नदी के प्रवाह क्षेत्र के किनारे खड़े बूढ़े बरगद ने देखा कि रोज एक परित्यक्ता, बीमार, मरियल सी घिसटती, रेंगती, ठिठकती धार जो कभी रास्ते के पत्थरों के अवरोध से रूकती-चलती मजबूरन सी आगे बढ़ती थी, आज जैसे बाधा रहित, उमंग भरी, प्रफुल्लित सी हो, किसी नागिन की तरह तेजी से सरसराती हुई दौड़ी जा रही है ! बरगद से रहा नहीं गया, उसने जोर से पूछा, ''क्यों बहिनी, आज तो बड़ी खुश नज़र आ रही हो !''
''हाँ, दद्दा ! सुबह भोर के तारे के जाने के पहले, मैंने स्वप्न देखा कि मैं पानी से लबालब भरी हुई हूँ ! इस छोर से उस छोर तक सिर्फ मैं ही मैं हूँ ! फिर से जीवन दायिनी नदी बन गयी हूँ ! सारे अवरोध ख़त्म हो चुके हैं और मैं दोनों तटों का हाथ थामे दौड़ी जा रही हूँ, दौड़ी जा रही हूँ ! उसके बाद से ही सब कुछ अच्छा और बदला-बदला सा लग रहा है !
बरगद मुस्कुरा उठा ! उसने अपनी फुनगी ऊपर उठा हवा को सूँघा और समझ गया सावन जो आ गया है !