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शुक्रवार, 18 जनवरी 2019

संतरा और कीनू, फर्क क्या है ?

आम धारणा है कि एक जैसी चीजों में यदि किसी एक वस्तु की कीमत दूसरी से कम है तो उसकी गुणवत्ता में भी जरूर कुछ कमी होगी ¡ जैसे संतरे की तुलना में कीनू की कीमत में फर्क होने के कारण इसको कुछ कम कर के आंका जाता है ¡ जब की यह हर लिहाज से संतरे के पासंग है। सस्ता होने के बावजूद यह ऊर्जाप्रद, खनिज, विटामिन और लाभकारी पोषण तत्वों से भरपूर फल है । इसका रस और फल बड़ों और बच्चों सभी के लिए संतरे के समान ही सुरक्षित है। यह सबसे स्वस्थकर साइट्रस फलों में से एक माना जाता है ....... ¡

#हिन्दी_ब्लागिंग 
जैसे  गर्मियों में फलों के राजा आम की बहार रहती है वैसे ही सर्दियों में संतरा या नारंगी अपने स्वाद, सुगंध और
कीनू 
अपनी गुणवत्ता के कारण सबका चहेता बना रहता है। हालांकि यह फ़रवरी-मार्च तक आसानी से उपलब्ध रहता है पर इस बार यह हाट-बाज़ार-नुक्कड़-ढेले सब  ठीयों से अचानक ही गायब हो गया है और उसकी जगह, अफरात रूप में हर जगह उसी परिवार का एक सदस्य कीनू या किन्नू नजर आने लगा है। पर संतरे की बनिस्पत कहीं सस्ता होने के बावजूद लोग इसे लेने में थोड़ा हिचकिचाते हैं। आम धारणा है कि यह संतरे जितना लाभदायक नहीं है ! मेरी भी कुछ ऐसी ही सोच थी पर पिछले महीने पंजाब प्रवास पर सारे भ्रम दूर हो गए ! 

पंजाब में मेरे मामाजी के दोस्त हैं श्री रामपाल जी, उनके पुश्तैनी कीनू के बाग़ हैं। इस बार उनसे मिलना हुआ और बाग़ की सैर भी ! बीस-बीस फुट ऊँचे पेड़ों पर पत्तियां कम कीनू फल ही ज्यादा नजर आ रहे थे। सारा
पेड़ों पर लदे कीनू 
वातावरण जैसे नारंगी रंग में रंग गया हो। रामपाल जी ने ही बताया कि संतरे और कीनू एक ही बिरादरी के फल हैं। पर जहां संतरे का अस्तित्व बहुत पहले का है वहीं कीनू संतरे और माल्टे की संकर प्रजाति है। संतरे की तुलना में उसकी गुणवत्ता में कोई कमी या फर्क नहीं होता। उल्टा कीनू में ज्यादा मिठास और रस होता है ! और यह 
सबसे स्‍वस्‍थ साइट्रस फलों में से एक माना जाता है। रंग-रूप तक़रीबन एक जैसे होने के बावजूद दोनों में बहुत मामूली सा अंतर होता है, जिससे लोगों को इनमें फर्क करने में दिक्कत होती है। कीनू का आकार कुछ बड़ा होता है। इसका छिलका कुछ पतला, चमकदार और मुलायम होता है तथा इसमें बीजों की मात्रा संतरे से ज्यादा होती है। हाँ ''पैकिंग'' के लिहाज से संतरे का अंदुरुनी भाग कुछ सफाई और सलीकेदार होता है और आसानी से छिला जा सकता है, जबकि कीनू का थोड़ा बेतरतीब ! वह भी शायद उसके बचाव की दृष्टि हेतु। इसका उत्पादन भी संतरे की बनिस्पत बहुत ज्यादा होता है। जो किसानों के लिए भी आर्थिक दृष्टि से लाभप्रद है। 

मेरे यह पूछने पर कि इतने गुणों के बावजूद इसकी कीमतें संतरे से इतनी कम क्यों होती हैं ! इस पर रामपालजी ने इसके दो प्रमुख कारण बताए ! पहला तो यह कि कीनू का छिलका बहुत नरम होता है, अतः इसे पेड़ से तोड़ना और पैक करके एक्सपोर्ट करना कुछ मुश्किल काम है। इसके ढीले छिलके के कारण, कीनू को
संतरे 
एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के दौरान अतिरिक्त देखभाल की आवश्यकता होती है, क्योंकि यह आसानी से क्षतिग्रस्त हो जाता है। दूसरे इसमें बीजों की अधिकता से इसका जूस या स्क्वैश बनाना थोड़ा कठिन होता है क्योंकि ऐसा करते समय यदि इसका एक भी बीज भी पिस जाए तो सारे रस का स्वाद बिगड़ जाता है ! व्यावसायिक उपयोग
 तथा एक्सपोर्ट नहीं होने के कारणों से ही इसकी कीमत संतरे से कम भी उतना हो जाती है वरना यह भी उतना ही लाभदायक फल है। इसमें कैलौरी कम होती है पर पोषक तत्वों की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। 


इसलिए यदि संतरे और कीनू को लेकर कोई संदेह मन में हो तो उसे नि:संकोच त्याग, कम कीमत में इस 


ऊर्जावान, लाभप्रद, खनिज, विटामिन और पोषक तत्वों से भरपूर फल का रोज सेवन करें। किन्नू का रस और फल बड़ों और बच्चों सभी के लिए सुरक्षित है। पर अति तो हर चीज की नुकसानदायक होती है सो इसका भी हर खाद्य पदार्थ की तरह उचित मात्रा में ही उपयोग किया जाना चाहिए। बाकि तो सब ठिक्के है.........!

गुरुवार, 3 जनवरी 2019

गुणों की खान है, गुड़

प्रकृति और इंसान के आपसी ताल-मेल की अद्भुत उपज है, गुड़। धरा ने आदमी की मेधा की परख के लिए द्रव्य रूप में अमृत रूपी रस को डंडों में भर खेतों में उपजाया तो इंसान ने उसे ठोस रूप दे एक बहुगुणी वस्तु की शक्ल दे दी। वस्तु भी कैसी, जिसका उपयोग वर्षों तक शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार, सामान्य व शुभ अवसरों पर सदियों से अमीरों और ग़रीबों में मीठे और कुछ-कुछ ओषधि के रूप में होता रहा। भले ही विदेशी बाजार अपने मतलब के लिए इसे कितना ही अस्वास्थयकर कहे, पुरातन कहे पर सही मायने में यह अत्यंत गुणकारी, फायदेमंद, सेहतप्रद और सर्वसुलभ प्रकृति की देन है.........!


#हिन्दी_ब्लागिंग   

हमारे देश में व्यापार की अनंत संभावनाओं को देखते हुए विदेशी व्यापारियों ने यत्र-तत्र-सर्वत्रअपना जाल तो फैलाया ही है साथ ही हनारी कई उपयोगी-स्वास्थयकर और गुणकारी वस्तुओं, जैसे घी, तेल, मसाले, वनौषधियों, जड़ी-बूटियों इत्यादि के बारे में भ्रामक अफवाहें फैला उन्हें हानिकारक और निरुपयोगी सिद्ध करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है ! ऐसी ही एक अत्यंत उपयोगी वस्तु है गुड़ !


प्रकृति और इंसान के आपसी ताल-मेल की अद्भुत उपज है, गुड़। धरा ने आदमी की मेधा की परख के लिए द्रव्य रूप में अमृत रूपी रस को डंडों में भर खेतों में उपजाया तो इंसान ने उसे ठोस रूप दे एक बहुगुणी वस्तु की शक्ल दे दी। वस्तु भी कैसी, जिसका उपयोग वर्षों तक शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार, सामान्य व शुभ अवसरों पर सदियों से अमीरों और ग़रीबों में मीठे और कुछ-कुछ ओषधि के रूप में होता रहा। हालांकि समय के साथ इसको परिष्कृत कर इसके और शुद्ध रूपों की ईजाद, शक्कर तथा चीनी के रूपों में हुई, पर उनमे इसके लाभकारी गुणों का समावेश नहीं हो पाया।
सर्दियों की फसल, गन्ने से तैयार होने वाला गर्म तासीर वाला गुड़, मनुष्य को प्रकृति की अनुपम देन है। चिकित्सा-शास्त्र भी इसमें पाए जाने वाले खनिजों के कारण, मानता है कि यह इंसानों के साथ-साथ जानवरों के लिए भी उतना ही उपयोगी व गुणकारी है। इस बात का ज्ञान हमारे पूर्वजों को बहुत पहले से ही रहा है इसीलिए वे अपने पालतू पशुओं के लिए भी इसका उपयोग बेझिझक करते आ रहे हैं। पर बाजार के बहकावे में आ आधुनिक पीढ़ी और शहरवासी उचित जानकारी के अभाव में इसका उपयोग करने से कतराते हैं जबकि यह चीनी से ज्यादा सुरक्षित, फायदेमंद और गुणकारी है।
खजूर का गुड़ 
आधुनिकता भले ही इसे कितना ही अस्वास्थयकर कहे, पुरातन कहे पर सही मायने में यह अत्यंत गुणकारी, फायदेमंद, सेहतप्रद और सर्वसुलभ प्रकृति की देन है। उचित मात्रा में इसके सेवन से पाचन तंत्र सही रहता है, भोजन पचाने में सहायता करता है, भूख बढ़ाता है, पेट की व्याधियों को दूर करता है, अनीमिया से बचाता है, यादाश्त तेज करता है, रक्त-चाप ठीक रखता है, ऊर्जा का बेहतरीन स्रोत है,  खून को शुद्ध करता है, आँखों के लिए फायदेमंद है, सर्दी में शरीर का तापमान ठीक रखता है, हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है, सर्दी-जुकाम-खांसी-एलर्जी, जोड़ों के दर्द आदि में भी फायदा पहुंचाता है। आयुर्वेद में रात के भोजनोपरांत रोज इसकी करीब एक तोला मात्रा लेने की सलाह दी जाती है। हाँ शुगर के रोगियों को थोड़ा परहेज जरुरी है।
नारियल गुड़ 

गुड़ का उत्पादन हमारे देश के अलावा श्री लंका, नेपाल, पकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, जापान, इंडोनेशिया, मेक्सिको, ब्राजील इत्यादि अनेक देशों में किया जाता है। हर जगह के वातावरण के अनुसार ही इसके स्वाद, गुण और विशेषताएं होती हैं। जो बहुत कुछ इसको बनाने वाले के हुनर और कार्यकुशलता पर भी निर्भर करती हैं।जहां श्री लंका के गुड़ को सर्वोपरि माना जाता है, वहीं हमारे देश में पंजाब का गुड़ और शक्कर बेहतरीन मानी जाती है। ईख के अलावा हमारे देश के पूर्वोत्तर और दक्षिणी राज्यों में खजूर के रस से भी गुड़ बनाया जाता है, जो हल्की या कुछ कम मिठास पसंद करने वालों के लिए बेहतरीन विकल्प है। इधर नारियल के रस से भी गुड़ बनाया जाने लगा है पर उसके गुण-शक्लो-सूरत चीनी के ज्यादा करीबी होते हैं। 


गुड़ चक्की 
वैसे तो इसका सेवन साल भर किया जा सकता है पर अभी इस सर्दी के मौसम में तो गुड़ के सेवन का बेहतरीन अवसर है। भले ही इसका सीधा उपयोग करें या फिर इससे बने ढेरों सुस्वादु खाद्य पदार्थों का सेवन करें ! पर जरा-ज़रा सा रोज जरूर खाएं और साल भर सेहतमंद रहने का फायदा उठाएं। 

रविवार, 23 दिसंबर 2018

सूजी आटे-मैदे की मंझली बहन है

यह मैदा और सूजी किस चीज से बनते हैं भई SS ? नई पीढ़ी को तो शायद ही पता होना था, बीच वाली भी सोच में पड़ी दिखी ! कुछ देर के बाद जवाब आया ! मैदा तोआटे से बनता है: सूजी का...पता नहीं ! घूम-फिर कर करीब एक दर्जन निगाहें मेरी तरफ ! आप ही बताओ ! सवाल ने ''बूमरैंग'' हो मेरे को ही आ घेरा था ! सच्चाई यह थी कि मैदे का प्रोसेस तो कुछ-कुछ मुझे मालुम था, पर सूजी के बारे में यहां भी  निल बटे सन्नाटा ही था........ ! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 
कल रात मजे-मजे में एक ऐसी बात हो गयी: जो अजीब तो थी पर गरीब बिल्कुल नहीं थी ! क्योंकि उससे यह बात निकल कर सामने आई कि  ऐसी बहुत सी चीजें है, खासकर खाद्य-पदार्थ जिन्हें हम वर्षों, पीढी दर पीढ़ी उपयोग में  तो लाते रहते हैं पर उनके बारे में पूरी जानकारी नहीं होती हमें ! अब जैसे मैदे और सूजी को ही लें ! शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहां इनका प्रयोग ना होता हो ! पर यह बनते कैसे हैं, बहुतों को नहीं पता ! 

तो हुआ कुछ यूँ कि कई दिनों की मसरूफियत के बाद कल रात मेरे कानूनी भाई के यहां इकट्ठा होने का मौका निकाला गया। जाहिर है भोजन का बंदोबस्त भी वहीं होना था, तो उदर-पूर्ति के लिए जो बनाया गया, वह था छोले-भटूरे और सूजी का हलवा। हल्का-फुल्का माहौल, ठंड का मौसम, स्वादिष्ट व्यंजन, दूसरे दिन अवकाश ! सब जने निश्चिंतता से संगत का लुत्फ़ उठा ही रहे थे कि अचानक मेरे जेहन में एक प्रश्न ने सर उठाया कि पूछूं तो सही कि यह मैदा और सूजी किस चीज से बनते हैं ? नई पीढ़ी को तो खैर क्या ही पता होना था: बीच वाली भी इसे ले, सोच में पड़ी दिखी ! कुछ देर के बाद जवाब आया, मैदा तो आटे से बनता है: सूजी का...पता नहीं ! घूम-फिर कर करीब एक दर्जन निगाहें मेरी तरफ ! आप ही बताओ ! सवाल ने ''बूमरैंग'' की तरह मेरे को ही आ घेरा था ! सच्चाई यह थी कि मैदे का प्रोसेस तो मुझे मालुम था, पर सूजी के बारे में यहां भी निल बटे सन्नाटा ही था। सब को यह बात बताई और कहा कल ब्लॉग में खुलासा करूंगा ! फिर वही हुआ जो ऐसे में होता है..''गूगलम शरणम गच्छामी''.. तो पेश है दूसरे दिन का लब्बो लुआब !

यह तो जग जाहिर है कि सेहत और पौष्टिकता के लिए आटा सर्वोपरि है। पर मैदा भले ही सेहत के लिए कुछ नुकसानदायक हो, इसके द्वारा बने अनगिनत व्यंजन होते तो सुस्वादु ही हैं। इसी कारण इसका प्रचलन कभी ख़त्म नहीं होता। इसको बनाने वाली मशीनें गेहूँ का आटा बनाने वाली चक्कियों से अलग होती हैं। जहां पहले गेहूँ को अच्छी तरह धो-सूखा कर उनकी सहायता से उसकी ऊपरी परत को निकाल देते हैं। फिर बचे हुए सफ़ेद भाग को बहुत ही महीन पीसा जाता है जिसके फलस्वरूप जो चिकना-हल्का पाउडर जैसा पदार्थ मिलता है वही मैदा कहलाता है। अब सवाल यह उठता है कि जब मैदा भी गेहूँ से ही बनता है तो फिर उससे परहेज करने को क्यों कहा जाता है ! इसका कारण है, इसके बनाने की विधि, जिसके दौरान ज्यादातर पौष्टिक पदार्थ जैसे मिनरल, विटामिन, प्रोटीन और फाइबर नष्ट हो जाते हैं पर कैलोरी बढ़ जाती है। फाइबर के ना होने से मैदा ठीक से पच नहीं पाता: वहीं अपनी चिकनाई की वजह से यह आँतों में चिपक भी जाता है, जिससे कब्ज इत्यादि की शिकायत बढ़ जाती है। इसके अलावा इसमें तेल इत्यादि को सोखने की नहुत क्षमता होती है जो खाद्य-पदार्थों को भारी बना देती है जिससे पेट से संबंधित अनेक परेशानियां होने लगती हैं। इसीलिए इसका कम से कम उपयोग करने की सलाह दी जाती है। 

अब रही सूजी की बात ! तो यह जान कर बड़ा आश्चर्य होगा कि सूजी, आटे-मैदे की मंझली बहन है ! वो ऐसे कि गेहूँ को मैदा बनाने के पहले चरण के दौरान उसकी ऊपरी परत हटाई जाती है तो इस प्रक्रिया में वह मोटे टुकड़ों में टूट जाता है। इन टुकड़ों में से भूसी को निकाल कर अलग करने के बाद जो बारीक बचे हुए कण प्राप्त होते हैं, उन्हीं को सूजी के नाम से जाना जाता है। जिनको फिर महीन पीस कर मैदा बनाया जाता है। यानी पहले गेहूं और उसका आटा, फिर सूजी और फिर मैदा ! तो हुई ना सूजी आटे मैदे की  मंझली बहन ! 

तो अगली बार जब भी इन व्यंजनों का लुत्फ़ लेने का मौका मिले तो इनके लाभ-हानि के साथ-साथ इनके आपसी रिश्ते को भी याद कर लें ! 

विशिष्ट पोस्ट

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