रविवार, 23 दिसंबर 2018

सूजी आटे-मैदे की मंझली बहन है

यह मैदा और सूजी किस चीज से बनते हैं भई SS ? नई पीढ़ी को तो शायद ही पता होना था, बीच वाली भी सोच में पड़ी दिखी ! कुछ देर के बाद जवाब आया ! मैदा तोआटे से बनता है: सूजी का...पता नहीं ! घूम-फिर कर करीब एक दर्जन निगाहें मेरी तरफ ! आप ही बताओ ! सवाल ने ''बूमरैंग'' हो मेरे को ही आ घेरा था ! सच्चाई यह थी कि मैदे का प्रोसेस तो कुछ-कुछ मुझे मालुम था, पर सूजी के बारे में यहां भी  निल बटे सन्नाटा ही था........ ! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 
कल रात मजे-मजे में एक ऐसी बात हो गयी: जो अजीब तो थी पर गरीब बिल्कुल नहीं थी ! क्योंकि उससे यह बात निकल कर सामने आई कि  ऐसी बहुत सी चीजें है, खासकर खाद्य-पदार्थ जिन्हें हम वर्षों, पीढी दर पीढ़ी उपयोग में  तो लाते रहते हैं पर उनके बारे में पूरी जानकारी नहीं होती हमें ! अब जैसे मैदे और सूजी को ही लें ! शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहां इनका प्रयोग ना होता हो ! पर यह बनते कैसे हैं, बहुतों को नहीं पता ! 

तो हुआ कुछ यूँ कि कई दिनों की मसरूफियत के बाद कल रात मेरे कानूनी भाई के यहां इकट्ठा होने का मौका निकाला गया। जाहिर है भोजन का बंदोबस्त भी वहीं होना था, तो उदर-पूर्ति के लिए जो बनाया गया, वह था छोले-भटूरे और सूजी का हलवा। हल्का-फुल्का माहौल, ठंड का मौसम, स्वादिष्ट व्यंजन, दूसरे दिन अवकाश ! सब जने निश्चिंतता से संगत का लुत्फ़ उठा ही रहे थे कि अचानक मेरे जेहन में एक प्रश्न ने सर उठाया कि पूछूं तो सही कि यह मैदा और सूजी किस चीज से बनते हैं ? नई पीढ़ी को तो खैर क्या ही पता होना था: बीच वाली भी इसे ले, सोच में पड़ी दिखी ! कुछ देर के बाद जवाब आया, मैदा तो आटे से बनता है: सूजी का...पता नहीं ! घूम-फिर कर करीब एक दर्जन निगाहें मेरी तरफ ! आप ही बताओ ! सवाल ने ''बूमरैंग'' की तरह मेरे को ही आ घेरा था ! सच्चाई यह थी कि मैदे का प्रोसेस तो मुझे मालुम था, पर सूजी के बारे में यहां भी निल बटे सन्नाटा ही था। सब को यह बात बताई और कहा कल ब्लॉग में खुलासा करूंगा ! फिर वही हुआ जो ऐसे में होता है..''गूगलम शरणम गच्छामी''.. तो पेश है दूसरे दिन का लब्बो लुआब !

यह तो जग जाहिर है कि सेहत और पौष्टिकता के लिए आटा सर्वोपरि है। पर मैदा भले ही सेहत के लिए कुछ नुकसानदायक हो, इसके द्वारा बने अनगिनत व्यंजन होते तो सुस्वादु ही हैं। इसी कारण इसका प्रचलन कभी ख़त्म नहीं होता। इसको बनाने वाली मशीनें गेहूँ का आटा बनाने वाली चक्कियों से अलग होती हैं। जहां पहले गेहूँ को अच्छी तरह धो-सूखा कर उनकी सहायता से उसकी ऊपरी परत को निकाल देते हैं। फिर बचे हुए सफ़ेद भाग को बहुत ही महीन पीसा जाता है जिसके फलस्वरूप जो चिकना-हल्का पाउडर जैसा पदार्थ मिलता है वही मैदा कहलाता है। अब सवाल यह उठता है कि जब मैदा भी गेहूँ से ही बनता है तो फिर उससे परहेज करने को क्यों कहा जाता है ! इसका कारण है, इसके बनाने की विधि, जिसके दौरान ज्यादातर पौष्टिक पदार्थ जैसे मिनरल, विटामिन, प्रोटीन और फाइबर नष्ट हो जाते हैं पर कैलोरी बढ़ जाती है। फाइबर के ना होने से मैदा ठीक से पच नहीं पाता: वहीं अपनी चिकनाई की वजह से यह आँतों में चिपक भी जाता है, जिससे कब्ज इत्यादि की शिकायत बढ़ जाती है। इसके अलावा इसमें तेल इत्यादि को सोखने की नहुत क्षमता होती है जो खाद्य-पदार्थों को भारी बना देती है जिससे पेट से संबंधित अनेक परेशानियां होने लगती हैं। इसीलिए इसका कम से कम उपयोग करने की सलाह दी जाती है। 

अब रही सूजी की बात ! तो यह जान कर बड़ा आश्चर्य होगा कि सूजी, आटे-मैदे की मंझली बहन है ! वो ऐसे कि गेहूँ को मैदा बनाने के पहले चरण के दौरान उसकी ऊपरी परत हटाई जाती है तो इस प्रक्रिया में वह मोटे टुकड़ों में टूट जाता है। इन टुकड़ों में से भूसी को निकाल कर अलग करने के बाद जो बारीक बचे हुए कण प्राप्त होते हैं, उन्हीं को सूजी के नाम से जाना जाता है। जिनको फिर महीन पीस कर मैदा बनाया जाता है। यानी पहले गेहूं और उसका आटा, फिर सूजी और फिर मैदा ! तो हुई ना सूजी आटे मैदे की  मंझली बहन ! 

तो अगली बार जब भी इन व्यंजनों का लुत्फ़ लेने का मौका मिले तो इनके लाभ-हानि के साथ-साथ इनके आपसी रिश्ते को भी याद कर लें ! 

4 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (24-12-2018) को हनुमान जी की जाति (चर्चा अंक-3195) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी, आपका हार्दिक आभार

Shah Nawaz ने कहा…

बढ़िया :)

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शाह नवाज जी, "कुछ अलग सा" पर सदा स्वागत है

विशिष्ट पोस्ट

हिंदी, अपनाना है तो दिल से अपनाएं

ठीक है अंग्रेजी का महत्व अपनी जगह है। पर उसके कारण, अकारण ही हम अपनी भाषा को हीन समझते हैं, उसे दोयम दर्जे की मान लेते हैं ! दुःख तो तब होता...