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गुरुवार, 6 अगस्त 2020

मैं और मेरे चश्मे

चश्मा लगने के साथ ही शुरू हो गयी उनकी बेहाली की कहानी भी ! उनका टूटना थमता ही ना था। एक बार चश्मा दिलाने मेरे वेद चाचाजी मुझे कलकत्ते के बहूबाजार, जो चश्मों का गढ़ होता था, ले गए और ऐसे ही मुझसे पूछ लिया कि कौन सा फ्रेम अच्छा लगता है ! तो मैंने जिस ओर इशारा किया उसे देख वे हस पड़े और बोले ''धुत्त पगला'' ! और फिर उन्होंने मेरे इतिहास और चश्मे के भविष्य की परवाह ना कर मुझे एक अच्छा-खासा फ्रेम दिलवा दिया। दूकान से बाहर आ उन्होंने मुझसे पूछा की मैंने वह फ्रेम क्यों चुना था ? मैंने बताया कि मुझे लगा कि वह कानों को अच्छी तरह पकडेगा, जिससे झटके से गिरेगा नहीं, इसलिए ! बाद में गांधीजी वाले उस फ्रेम की बात सोच अक्सर हंसी आ जाती रही...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
मेरा और चश्मे का संबंध बहुत ही पुराना है। बालपन में ही इसने मेरे कानों का सहारा ले मेरी नाक पर कब्जा जमा लिया था। शुरुआत में तो हमारी आपस में काफी तनातनी रही ! तूफानी धमाचौकड़ी वाला मिजाज होने के कारण कोई भी चश्मा नाक पर ज्यादा देर कब्जा जमाए नहीं रख पाता था ! एक-दो पखवाड़े में एक चश्में का शहीद होना निश्चित था। शाम के समय खेलने-कूदने जाओ और जब तक मुझे कुछ समझ आए, तब तक ये भू-लुंठित हो जाते थे ! घर पहुंचते ही ''आदर-सत्कार'' जैसे मेरा इंतजार ही कर रहा होता था। ये टूटना इतना आम हो गया था कि हर बार घर से निकलते समय माँ की हिदायत होती थी कि ''चश्मा मत तुड़वा कर आना !'' मैं कोई जान बूझ कर थोड़े ही तोड़ता था......टूट जाता था !

मेरा बचपन करीब चार साल तक पंजाब में अपने दादा-दादी जी के साथ ही बीता था। सुना है कि उन्हीं दिनों मेरी आँखों में कोई बड़ा इंफेक्शन हो गया था ! उन दिनों चिकित्सा व्यवस्था इतनी व्यापक और उत्कृष्ट नहीं थी ! खैर जैसा भी था रोग पर काबू पा लिया गया। पर उसका दुष्परिणाम नजरंदाज हो गया या उसका पता ही नहीं चल पाया होगा ! फिर मेरा ''ट्रांस्फर'' कलकत्ता हो गया। उन दिनों पढ़ाई और स्कूलों की इतनी मारा-मारी नहीं थी। स्कूल भी कम और दूर-दूर हुआ करते थे। तब हम बंगाल के कोन्नगर में रहा करते थे। जब बाबूजी के कार्यस्थल से पांच-छह बच्चों का जत्था स्कूल जाने लायक हो गया तो हम सब एक-एक रिक्से में दो-दो जने लद रिसरा विद्यापीठ में जाने लगे। जो घर नौ-दस किलोमीटर दूर था। मेरा स्कूल में दाखिला चौथी कक्षा में हुआ था। उसके पहले की पढ़ाई घर पर ही हुई थी। इसलिए आँखों की खामी सामने नहीं आ पाई। 

रोज रात को सोने के पहले बाबूजी तरह-तरह से मुझे कुछ न कुछ सिखाया करते थे। उसमें एक कैलेण्डर की भी अहम भूमिका होती थी जो बेड के सिरहाने टंगा होता था। एक दिन उन्होंने मुझसे कैलेण्डर से संबंधित कुछ पूछा, तो मैं उठ कर उसके नजदीक जा देखने लगा ! इस पर उन्होंने इतना पास जा कर देखने का कारण पूछा तो मैंने बताया कि मुझे दूर से अक्षर साफ़ नजर नहीं आते ! बाबूजी को शंका हुई, आँखों का परिक्षण हुआ और उन्हें कमजोर पाया गया। जब मुझसे पूछा गया तो मैंने कहा कि मुझे लगता था कि सबको ऐसा ही दिखता होगा ! 
चश्मा तो लग गया साथ ही शुरू हो गयी उनकी बेहाली की कहानी भी ! उनका टूटना थमता ही ना था। ऐसे ही एक हादसे के बाद, एक बार चश्मा दिलाने मेरे वेद चाचाजी मुझे कलकत्ते के बहूबाजार, जो चश्मों का गढ़ होता था, ले गए और दूकान के शोकेस में सजे चश्मों को देख यूँही मुझसे पूछ लिया कि कौन सा फ्रेम अच्छा लगता है ! तो मैंने जिस ओर इशारा किया उसे देख वे हस पड़े और बोले ''धुत्त पगला'' ! और फिर उन्होंने मेरे इतिहास और चश्मे के भविष्य की परवाह ना कर मुझे एक अच्छा-खासा फ्रेम दिलवा दिया। दूकान से बाहर आ उन्होंने मुझसे पूछा की मैंने वह फ्रेम क्यों चुना था ? मैंने बताया कि मुझे लगा कि वह कानों को अच्छी तरह पकडेगा, जिससे झटके से गिरेगा नहीं, इसलिए ! बाद में गांधीजी वाले उस फ्रेम की बात सोच अक्सर हंसी आ जाती रही। 

आज चश्मा बहुत आम बात हो गई है। हर छोटे से छोटे बच्चे को भी लगा दिखता है। पर उन दिनों चश्मा लगना, कौतुहल और कमजोरी की निशानी माना जाता था। बड़े शहरों में तो उतना नहीं, पर छोटे शहरों-कस्बों में इसे पहनने वाला और वह भी बच्चा, अजूबा ही बन जाता था। मुझे भी इसके कारण कई बार बड़ी विचित्र स्थितियों का सामना करना पड़ा है। 

पंजाब तब सेहत का गढ़ माना जाता था। माँ के साथ एक-दो साल के अंतराल में जब भी वहां का चक्कर लगता तो ननिहाल में मेरा घर से निकलना दूभर हो जाता था। पहले दिन मुझ चश्माधारी को देख, आस-पड़ोस के बच्चे पता नहीं क्या मुनादी फिराते थे कि दूसरे दिन पता नहीं कहां कहां से ढेर सारे बच्चे हमारे घर के पास ऐसे इकठ्ठा हो जाते जैसे सर्कस में किसी नए जानवर को देखने आए हों ! मुझे देखते ही खुसुर-पुसुर शुरू हो जाती ''ओए ! निक्के जए मुण्डे नू ऐनक लग्गी ऐ !'' हंसी-ठिठोली-फब्तियां कसी जातीं ! मैं रुंआसा हो अंदर जाता तो मामा लोग आ कर उन्हें खदेड़ते।  बच्चे तो बच्चे, वहां बड़े भी मेरे चश्मे को लेकर माँ से ऐसे बात करते जैसे मुझे कोई बिमारी लग गई हो। 

आजआज ज़माना कितना बदल गया है ! चश्मे कहां से कहां पहुँच गए हैं ! व्यक्तित्व और सम्पन्नता की निशानी बन गए हैं ! विज्ञान ने इनमें तरह-तरह की विशेषताएं जोड़ दी हैं। गुणवत्ता ऊँचे दर्जे की हो गई है। अब ये टूटते नहीं, वैसे ही बदलने पड़ते हैं। ये जिंदगी का एक अभिन्न अंग ही बन गए हैं। बुद्धीजीवी होने का प्रमाण बन गए हैं। पर कहां भूलते है वह पुराने दिन ! वह टूटे चश्में, वह गांधी जी का फ्रेम, वह बच्चों की ठिठोली, ढीली निक्कर और भारी चश्मे को संभालने की कवायद, चश्मे के साथ आ जुडी उपमाऐं ! नहीं भूलती और ना भूलेंगी ताउम्र !! 

सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

उस दिन कुछ भी हो सकता था, एक संस्मरण

भयंकर और डरावना दृश्य था !आगे-आगे एक इंसान को घसीटते ले जाती गाडी और पीछे कुछ भी कर गुजरने पर उतारू, डंडे-लाठी उठाए चीखते-चिल्लाते-आक्रोषित लोगों का सागर ! लगातार बजते हार्न को सुन दरबान के साथ जैसे ही उन्होंने गेट से बाहर देखा, पलक झपकते ही उन्हें सारा माजरा समझ में आ गया ! उन्होंने तुरंत पूरा गेट खुलवाया और गाडी अंदर आते ही हतबुद्धि दरबान के साथ मिल उसे तुरंत बंद करवा दिया। गाडी को रोकते ही दुबे ने जोर से कहा, माँ जी लोग, जल्दी से कहीं भी जा कर छिप जाइये और इतना कह खुद भागता चला गया, क्योंकि वह जानता था कि यदि कहीं भीड़ के हाथ पड़ गया तो उसका क्या हश्र होगा ............! 

#हिंदी_ब्लागिंग  
घटना काफी पुरानी है पर जेहन में गहराई तक पैबस्त है ! अखबार इत्यादि में यदा-कदा वैसी दुर्घटनाओं का जिक्र देख वह दिन जैसे फिर आँखों के सामने साकार हो उठता है ! सन तो ठीक-ठीक याद नहीं पर शायद 64-65 के वर्षांत का अपराह्न था, क्योंकि उस दिन मील के बाहर की एक टीम के साथ क्रिकेट का मैच चल रहा था और हम जीत की कगार पर थे। तभी अचानक एक भीषण शोर की आवाज उठी, देखा तो सैंकड़ों की बेकाबू भीड़ क्लब वाले गेट की तरफ से घुसी चली आ रही है। कैसे-क्यूँ-क्या हुआ, कुछ पता नहीं, आज तक ऐसा कभी कुछ घटा नहीं था ! अफरा-तफरी मच गयी ! जिसके जहां सींग समाए जा दुबका ! कौन कहां गया कुछ पता नहीं ! हम चार-पांच बच्चे ऊपर दूसरे माले पर जा, रेलिंग से लटक कर नीचे ताकने लगे ! नीचे कोहराम मचा हुआ था ! नरमुंड ही नरमुंड ! सारा पार्क उजाड़ दिया गया था ! लोग बढे ही चले आ रहे थे ! करीब आधे घंटे के तांडव के बाद पुलिस पहुंची ! लाठी-चार्ज हुआ ! भगदड़ मची ! सबको खदेड़ने के बाद करीब चार-पांच बोरी चप्पलें-जूते और तक़रीबन दस-पंद्रह सायकिलें जब्त की गयीं। पार्क का यह हाल था जैसे कोई हाथी उसे रौंद गया हो ! 

मील के अधिकारी वर्ग और कामगारों के बीच सदा तनाव भरा रिश्ता रहा है ! संस्थान के अपने कामगारों की भलाई के लाख प्रयासों के बावजूद कुछ मतलब-परस्त मजदूर नेता सिर्फ अपनी रोटी सेंकने के लिए, कामगारों में स्टाफ के प्रति जहर उगल नफरत की दिवार बनाए रखते थे। ऐसे लोग दोनों तरफ के हितैषी बन अपना उल्लू सीधा करने में अत्यंत दक्ष होते थे। इसी नफ़रत, द्वेष, रोष के कारण उस दिन एक छोटी सी घटना ने विकराल रूप ले लिया था।  

क्यों ऐसी अनहोनी घटी ! उस दिन सुबह। मंजू भाभी (डागाजी की पुत्रवधु) भंडारी तथा राजगढ़िया आंटी तथा मेरी माता जी, सुबह किसी काम से मील की अम्बैसडर कार में बाहर गयीं हुई थीं। मील का सबसे विश्वसनीय-भरोसेमंद-दक्ष ड्राइवर दुबे भइया थे। जाहिर है वही गाडी चला रहे थे। लौटते समय कांकिनाड़ा के संकरे बाज़ार से गुजरते हुए एक नौसिखिए, लापरवाह, बेखबर सायकिल सवार बालक को कार छू गयी ! घबड़ाहट और डर के मारे वह सायकिल समेत गिर पड़ा ! हालांकि उसे कोई चोट नहीं लगी थी पर हल्ला मच गया कि मील की गाडी ने बच्चे का एक्सीडेंट कर दिया है। पहले दुबे ने सोचा कि उतर कर देखें बच्चे को, पर बढ़ते हुजूम, गाडी में महिलाओं की उपस्थिति और आक्रोषित आवाजों को देख-सुन उसने गाडी आगे बढ़ा दी ! इससे लोग और भड़क गए और एक ''हीरो'' उछल कर गाडी के बोनट पर चढ़ने की कोशिश में फिसल कर गाडी के अगले बाएं चक्के में जा फंसा ! गाडी की महिलाएं इस हादसे से अनजान थीं और बार-बार दुबे को गाडी रोकने को कह रहीं थीं, पर दुबे को तो हकीकत समझ में आ चुकी थी, उसको अपने से ज्यादा माँ समान महिलाओं की चिंता थी ! इसीलिए कभी आँख भी ना उठाने वाले युवक को मजबूरन जोर से कहना पड़ा, ''माँ जी, आपलोग चुपचाप बैठिए, गाडी अंदर जा कर ही रुकेगी !'' इधर हर राह चलते की नजर जब गाडी से घिसटती मानव देह पर पड़ती तो पहले तो वह एकबारगी सन्न रह जाता पर अगले ही पल भीड़ का अंग बन, रोको, मारो, मारो चिल्लाते गाडी के पीछे दौड़ने लगता ! देखते-देखते सैंकड़ों की संख्या में गुस्साए लोग जो हाथ लगा ले, गाडी के पीछे लग गए ! भयंकर और डरावना दृश्य था। आगे-आगे एक इंसान को घसीटते ले जाती गाडी और पीछे कुछ भी कर गुजरने पर उतारू, डंडे-लाठी उठाए चीखते-चिल्लाते-आक्रोषित लोगों का सागर !   

दुबे के लिए तो यह जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा की घडी थी ! बहुत बड़ा भार था उसके ऊपर ! चार संभ्रांत महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी ! करीब तीन पहियों पर दौड़ रही गाडी का संचालन ! परिस्थितिवश ही सही एक इंसान की मौत का खौफ ! इतने तनाव के बावजूद संयत रहना, दिलो-दिमाग पर काबू रखना बहुत बड़ी बात थी ! उसका सिर्फ एक ही लक्ष्य था, किसी भी तरह गाडी को मील परिसर में पहुंचा देना इसके लिए उसने एक तरह से अपनी जान की बाजी लगा दी थी। डेढ़-दो की.मी. की दूरी जैसे ख़त्म ही नहीं हो रही थी। 

मैनेजर गेट के लिए जैसे ही गाडी बायीं तरफ मुड़ी दुबे ने हार्न बजाना शुरू कर दिया। संयोगवश वहां दरबान के अलावा एक और सज्जन भी मौजूद थे ! लगातार बजते हार्न को सुन दरबान के साथ जैसे ही उन्होंने गेट से बाहर देखा, पलक झपकते ही उन्हें सारा माजरा समझ में आ गया ! उन्होंने तुरंत पूरा गेट खुलवाया और गाडी अंदर आते ही हतबुद्धि दरबान के साथ मिल उसे तुरंत बंद करवा दिया। गाडी को रोकते ही दुबे ने जोर से कहा, माँ जी लोग, जल्दी से कहीं भी जा कर छिप जाइये और इतना कह खुद भागता चला गया, क्योंकि वह जानता था की यदि कहीं भीड़ के हाथ पड़ गया तो उसका क्या हश्र होगा ! गाडी में आगे मेरी माताजी बैठीं थीं वह जैसे ही उतरीं उनका पैर लाश से जा टकराया, वे तो जैसे होश ही गंवा बैठीं ! बाकियों का भी क्या हुआ, क्या हुआ करते जब वास्तविकता से सामना हुआ तो सारी जैसे जड़ हो गयीं ! तभी उन सज्जन ने, जिनका नाम याद आते-आते भी नहीं आ रहा है, तुरंत सब को झिंझोड़ कर अपने साथ ले जा एक जगह बंद कर दिया, इस हिदायत के साथ कि कोई बाहर झांकेगा भी नहीं। 

तब तक गेट पीटना आरंभ हो चुका था ! तभी दो चार अति उत्साहित जनों ने गेट के ऊपर से आ उसे खोल दिया ! फिर क्या था टिडडी दल की तरह लोग सब तरफ छा गए ! ''दुबे को बाहर निकालो ! उसे हमारे हवाले करो ! उसे छोड़ेंगे नहीं ! साहब लोगों का जुलुम नहीं सहा जाएगा !'' जैसी आवाजें कानफोड़ू शोर बन गयीं थीं ! जैसे बाढ़ अपने किनारों को तहस-नहस कर चारों ओर कहर बरपा देती है उसी तरह हजारों बेकाबू लोग घुसे चले आ रहे थे ! सारा गुस्सा पेड़-पौधों, फूलों-क्यारियों पर उतारा जा रहा था।

अंदर आने वालों की संख्या भले ही हजारों में थी पर उसमें 95 प्रतिशत से भी ज्यादा वे तमाशबीन लोग थे जिन्होंने मील के इस हिस्से के कभी दर्शन नहीं किए थे। मील के अंदर, वह भी रिहायशी इलाके में आना उनके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी, जिसका ख्वाब भी उन्होंने कभी नहीं देखा था। इसीलिए बाग़-बगीचे को ही नुक्सान पहुंचा वह भी इतनी बड़ी बेतरतीब-बेकाबू भीड़ के कारण ! इसके अलावा कोई तोड़-फोड़, पथराव या आगजनी की हरकत को अंजाम नहीं दिया गया।  यहां तक कि गेट पर ही खड़ी गाडी को भी कुछ डेंटों के अलावा ज्यादा नहीं छेड़ा गया।   

कुछ ही देर बाद पुलिस का आगमन हुआ ! लोगों को गेट के बाहर निकाला गया ! दुबे को जीप में उनको दिखाते हुए कि गिरफ्तार कर लिया गया है, थाने ले जाया गया ! केस चला, गलती ना पाए जाने से दुबे बरी हुए ! उन्हें मामला ठंडा होने तक गांव भेज दिया गया ! पीड़ितों को हर्जाना मिला और एक दुर्घटना पैबस्त हो गयी जेहन में, कभी-कभी यादों में उभर आने के लिए ! पर यह सोच कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि यदि उस दिन प्रभु का साथ न होता, गाडी बाजार में ही रोक ली जाती, कार का इंजन रास्ते में ही बंद या खराब हो जाता, चक्के जाम ही हो जाते, दुबे आपा खो संतुलन बिगाड़ बैठता, वो सज्जन गेट पर ना होते, आपाधापी में गेट बंद ही ना हो पाता...तो ..तो...... ?

गुरुवार, 26 सितंबर 2019

ढीली-ढीली सी वो निक्कर, खुली-खुली बनियान..

पांच-छह साल के सात-आठ बच्चों का समूह ! जो बिना किसी जंतर-पाती (instruments) के खेलों से लेकर अमरुद की टेढ़ी डालियों से बनी हॉकी, ईंटों के विकेट वाली क्रिकेट, सबसे सस्ता खेल फ़ुटबाल, हर खेल खेलता था। पूरी फौज में हथियार यानी क्रिकेट का बैट मेरे ही पास होता था फिर ऊपर से मकर राशि ! जाहिर है सबका अगुआ कायनात ने मुझे ही निश्चित किया हुआ था ! पर यह जबरदस्ती की अगुआई भारी भी पड़ती थी ! कहीं जो गलत-सलत हुआ (जो अक्सर होता ही रहता था) तो डांट-डपट और कभी-कभी....भी मेरे ही हिस्से आती थी। क्योंकि समय तो साथियों का भी आता ही था ना ! समय के साथ हथियार तो कॉमन हो गए पर परंपरा रिलायंस तक जारी रही ............

#हिन्दीब्लागिंग 
साठ-इकसठ का समय, लक्ष्मीनारायण जूट मिल, कोननगर, प. बंगाल !
लगभग एक से पहरावे, घुटने तक की चौड़ी सी ढीली-ढाली निक्कर और बुश्शर्ट। कभी-कभी तो गर्मी के कारण सिर्फ कोहनी तक की बनियान (निक्कर के साथ) ! स्कूल में तक़रीबन एक क्लास आगे-पीछे पढ़ने वाले पांच-छह साल के सात-आठ बच्चों का समूह ! जो बिना जंतर-पाती के खेलों से लेकर अमरुद की टेढ़ी डालियों से बनी हॉकी, ईंटों के विकेट वाली क्रिकेट, सबसे सस्ता खेल फ़ुटबाल, हर खेल खेलता था। पर विशाल परिसर, पेड़-पौधे उद्यान, घनी झाड़ियां ''चोर-पुलिस'' के लिए बड़े मुफीद थे और यही सबसे ज्यादा खेला जाने वाला खेल भी था। पूरी फौज में हथियार यानी क्रिकेट का बैट मेरे ही पास होता था फिर ऊपर से मकर राशि ! जाहिर है सबका अगुआ मुझे ही होना था ! पर यह जबरदस्ती की अगुआई भारी भी पड़ती थी ! कहीं जो गलत-सलत हुआ (जो अक्सर होता ही रहता था) तो डांट-डपट और कभी-कभी....भी मेरे ही हिस्से आती थी।

तो बात हो रही थी "चोर-पुलिस'' की जिसमें अपनी पारी पर किसी एक को अपने छिपे हुए साथियों को खोजना पड़ता था और पहले किसी भी साथी को देख लेने पर खेल ख़त्म हो जाता था, अगली पारी की शुरुआत के लिए। पर रोज-रोज के एक जैसे ढर्रे से उकता एक दिन मेरे मन में एक नया विचार आया कि क्यों ना खेल को लंबा किया जाए ! उसके लिए जुगत निकाली कि अबसे किसी एक छिपे हुए साथी को नहीं बल्कि खेलने वाले सभी साथियों को ढूंढना पडेगा और इसी बीच यदि ढूंढने वाले के बिना जाने उसकी पीठ पर, किसी बिन खोजे खिलाड़ी ने ''थप्पा'' दे दिया तो उस खोजने वाले को फिर से अपनी ''दान'' देनी पड़ेगी। आयडिया क्लिक कर गया और बहुत पॉपुलर हुआ ! जब एक-डेढ़ साल बाद रिलायंस आना हुआ तो ये भी मेरे साथ वहां आ, स्थापित हो गया।इसका नाम आइस-पाइस भी शायद यहीं आकर पड़ा ! कैसे और क्यूँ  यह बिलकुल याद नहीं। कभी-कभी लगता है कि इस ''देश प्रसिद्ध खेल'' की ईजाद मैंने ही तो नहीं की थी ! 
इसी सुंदर से लॉन में ट्रेंचेस खोदी गयी थीं 
रिलायंस में हम कुछ बड़े भी हो गए थे और ''चतुर'' भी ! इसी चतुराई की तहत कई बार यदि किसी छिपे हुए प्रतिभागी को भूख लग जाती थी या दीर्घ शंका हो जाती थी तो वह चुपचाप घर सटक लेता था और खोजने वाला बेचारा बिना फल की चिंता किए हुए उसे झाडी-झाडी, पत्ते-पत्ते के नीचे खोजता हुआ अपना कर्म करता रह जाता था ! अभी ऐसे एक महान प्रतियोगी का नाम जो मुझे याद है वह था हरषन या हरीश भंडारी ! यह खेल अपने चरम पर तब पहुंचा जब 65 के भारत-पाक युद्ध के दौरान फ्लैटों के सामने पूरे लॉन में सर्पीली ट्रेंचेस (खन्दक) खोद दी गयीं थीं। उन दिनों सारे घरों के शीशों पर कागज चढ़ा दिया गया था, खंबों पर लगे बल्बों को कवर कर दिया गया था ! रौशनी सिर्फ उतनी जितने की बहुत ही जरुरत हो ! उन दिनों के बच्चों पर अघोषित रूल लागू था जिसके तहत शाम को छह-साढे छह बजते-बजते घर आ जाना जरुरी होता था। पर उन दिनों जब सब जगह बाहर निकलने की सख्ती और पाबंदी लगी हुई थी, परिसर में बच्चों को बाहर निकलने की छूट सी मिल गयी थी। सुरमयी अँधेरे का माहौल, छिपने के लिए खन्दकें, दर्शकों के रूप में काका-चाचा लोग ! खेल अपने पूरे शबाब पर !

अब जब कभी मन उचाट हो जाता है या अजीब सी बेचैनी तारी हो जाती है तो दिलो-दिमाग को बरबस खींच कर ले जाता हूँ उन्हीं दिनों की यादों में, उन्हीं सुखद पलों के बीच उन्हीं जिंदगी के सबसे हसीन क्षणों में और फेंक देता हूँ अपने-आप को उसी तरण ताल में ! 

बुधवार, 19 जून 2019

जब भजन मंडली ने दो-दो कंबल ओढ़वाए

वह गायन लय-ताल के साथ अपने में शिक्षा, उपदेश, भजन सब कुछ समेटे था। तक़रीबन सारे यात्रियों का ध्यान उस ओर खिंच कर रह गया था। एक दो घंटे के बाद भोजनोपरांत, सोने के पहले, आधेक घंटे के लिए वही माहौल फिर बना। गीत-भजनों का सार था, सर्वजन हिताय ! सर्व जन सुखाये ! हर जीव में भगवान है ! खुद कष्ट सह कर भी दूसरों का उपकार करो ! सब पर दया करो ! सब एक ही परमात्मा की संतानें हैं इत्यादि, इत्यादि ! पर कुछ देर बाद ही इस दिखावे की पोल खुल गयी ! जब गर्मी से बचाव के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर खरीदी गयी ठंड से निजात पाने के लिए मजबूरन दो-दो कंबल ओढ़ने पड़े......!  

#हिन्दी_ब्लागिंग   
अभी पिछले हफ्ते मुंबई से दिल्ली आना हो रहा था। सहयात्रियों में एक 24-25 जनों की टोली भी थी। जिसमें युवा से अधेड़ उम्र के पढ़े-लिखे, सभ्रांत, शांत, सौम्य दिखते लोग शामिल थे, जो शायद देवस्थलों के भ्रमण के लिए निकले थे। गाडी चलने के बाद चाय-नाश्ता निपटने के उपरांत दो महिलाओं के गायन की स्वर लहरी सुनाई पड़ी जो कुछ ही देर बाद मंद, कर्णप्रिय समूह गान में परिवर्तित हो गयी। बीस-पच्चीस मिनट का वह गायन लय-ताल के साथ अपने में शिक्षा, उपदेश, भजन सब कुछ समेटे था। सारे यात्रियों का ध्यान उसी ओर था। एक दो घंटे के बाद भोजनोपरांत, सोने के पहले, आधेक घंटे के लिए वही माहौल फिर बना, गीत-भजनों का सार था, सर्व जन हिताय ! सर्व जन सुखाये ! हर जीव में भगवान है ! खुद कष्ट सह कर भी दूसरों का उपकार करो ! सब पर दया करो ! सब एक ही परमात्मा की संतानें हैं इत्यादि, इत्यादि !  
   
कुछ ही देर बाद जब हरेक यात्री सोने का उपक्रम कर रहा था तभी ऐसा लगा कि कोच का तापमान अचानक कम हो गया है। सबको कुछ ज्यादा ही ठंड महसूस होने लगी ! अटेंडेंट को बुला कर तापमान बढ़ाने को कहा तो उसने बताया कि कुछ लोगों ने जबरन ऐसा करवाया है। फिर भी उसने नॉर्मल करने की बात कही।  कुछ देर तो ठीक रहा उसके बाद फिर ठंड बढ़ गयी तो मैंने सम्बंधित कर्मचारी को फिर कहा, तो उसने फिर वही बात दोहराई और बताया कि उस मंडली के दो-तीन लोग लड़ने पर उतारू हो तापमान नीचे करवा रहे हैं ! उसने बताया कि, उन्हें दूसरे यात्रियों की परेशानियों का हवाला भी दिया, यह भी कहा कि बुजुर्ग यात्रियों को तकलीफ हो रही है ! पर वे नहीं माने ! वे सिर्फ अपनी बेआरामी की बात कर रहे हैं ! फिर उसने सुझाव दिया कि, सर, आप लोग एक-एक कंबल और ले लीजिए, बेकार इतनी रात को बात बढ़ाने से कोई फायदा तो है नहीं ! खैर बात वहीँ ख़त्म कर दी गयी ! हालांकि एक-दो लोग कक्ष के बाहर जा कर बैठे भी दिखे ! अजीब विडंबना थी ! पहले गर्मी से बचाव के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर ठंड का इंतजाम करो; और फिर उसी खरीदी गयी ठंड से निजात पाने के लिए कंबल ओढो ! 

मैं कभी भी यात्रा के दौरान उपलब्ध कंबलों का इस्तेमाल नहीं करता पर उस दिन मजबूरी में चादर के ऊपर पैरों तक ओढ़ यही सोचता रहा कि मुंह से गाये या दिए गए उपदेश लोग कब अपने दिलों में भी उतारेंगे ! कब दूसरों की तकलीफों, उनकी परेशानियों को भी समझेंगे ! कब सिर्फ दिखावे, रूटीन या दूसरों को उपदेश देने, सुनाने के बजाय खुद भी उनका अनुसरण करेंगे ! कब ! 

मंगलवार, 26 मार्च 2019

बहुत बडे दिल वाला हुआ करता था बंगाल

जब-जब देश के किसी भी प्रदेश के रहवासी को यदि रोजगार के लिए किसी दूसरे राज्य में जाने की जरुरत महसूस होती थी तो उसके जेहन में सबसे पहले कलकत्ते का ही नाम आता था और इसने भी खुली बाँहों से सबका स्वागत बिना भेद-भाव के किया ! कहते हैं बम्बई अपने मेहमान का कठिन इम्तहान ले कर तब उसे अपनाती है ! पर बंगाल तो सदा सहृदय मेजबान रहा ! वहां तो दूध के भरे गिलास में चीनी की तरह, बिना उसको छलकाए लोग आते गए और घुलते-मिलते गए, रोजगार पाते गए और वहीं के हो कर के रह गए। इसी कारण देश के किसी भी शहर के पहले कलकत्ते ने एक करोड़ की आबादी का आंकड़ा पार कर लिया था.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग
वैसे तो हमारे देश का हर राज्य अपनी भौगोलिक स्थिति, संस्कृति, परंपराओं या प्रकृति की नेमतों की वजह से अपने-आप में खास है, पर इनमें बंगाल अपना अलग ही स्थान रखता है। चाहे गीत-संगीत हो, राजनीती हो, देश प्रेम हो, शिक्षा हो, आध्यात्म हो, शौर्य हो, ललित कला हो, वास्तु हो, खेल हो, पठन-पाठन हो, नेतृत्व हो, प्रेम हो, भाईचारा हो, खान-पान हो, उत्पादन हो, किसी भी विधा में यह पीछे नहीं रहा। ऐसे ही इस धरती का नाम ''सोनार बांग्ला'' नहीं पड़ गया था। कई-कई बार विदेशों में इसने अपने देश का नाम रौशन करवाया है। इतना ही नहीं जब-जब देश के किसी भी प्रदेश के रहवासी को यदि रोजगार के लिए किसी दूसरे राज्य में जाने की जरुरत महसूस होती थी तो उसके जेहन में सबसे पहले कलकत्ते का ही नाम आता था और इसने भी खुली बाँहों से सबका स्वागत बिना भेद-भाव के किया ! कहते हैं बम्बई अपने मेहमान का कठिन इम्तहान ले कर तब उसे अपनाती है ! पर बंगाल तो सदा सहृदय मेजबान रहा ! वहां तो दूध के भरे गिलास में चीनी की तरह, बिना उसको छलकाए लोग आते गए और घुलते-मिलते गए, रोजगार पाते गए और वहीं के हो कर के रह गए। इसी कारण देश के किसी भी शहर के पहले कलकत्ते ने एक करोड़ की आबादी का आंकड़ा पार कर लिया था। उन दिनों हर तबके,  स्तर के लोगों के लिए वहां रहना-गुजर करना आसान था।



शुरू में एक कहावत हुआ करती थी कि ''आज जो बंगाल सोचता है, वही कल पूरे देश की सोच होती है'' इसका एक कारण भी था बंगाल की शिक्षा दर, बुद्धि जीवी वर्ग, जागरूकता देश के बाकी हिस्सों पर भारी पड़ती थी। इसका एहसास वहां के वाशिंदों को था ! हालांकी गुणी जनों का आदर सत्कार करने में वे कभी पीछे नहीं रहते थे पर किसी बाहर वाले से जल्दी मिलते-जुलते भी नहीं थे। शायद अपने खोल में बने रहने की आदत के कारण ही आजादी के वर्षों बाद तक बंगाली युवा देश के दूसरे हिस्सों में रोजगार तलाशने में कतराते रहे। जो मिला है उसी में खुश रहने वाले हुआ करते थे बंगाली परिवार। ज्यादातर शारीरिक मशक्कत और व्यापार से दूरी बनाए रखने वाला युवा वर्ग ''सफ़ेद कॉलर'' या सरकारी नौकरी, एक अपना घर जिसमे छोटा सा तालाब हो, सादगी भरी वेशभूषा और अपने पसंदीदा फ़ुटबाल क्लब की जीत-हार के साथ संतुष्ट रहता था। अलबत्ता ताश के खेल ब्रिज तथा ''अड्डा-बाजी'' उसका प्रमुख शगल हुआ करता था जहां दुनिया-जहान की बातों और मसलों पर वाद-विवाद होते रहते थे। यही कारण था कि मेहनत-मजदूरी के कामों में यहां यूपी, बिहार व पंजाब के लोगों का वर्चस्व रहता आया है। मिलों-फैक्ट्रियों में कामगारों, दरवानों के अलावा कलकत्ते में चलने वाली  ''ट्राम'' में चालक और कंडक्टर ज्यादातर बिहार-यूपी के ही हुआ करते थे। परिवहन में टैक्सी के व्यवसाय में पंजाब से आई सिख बिरादरी का बोल-बाला हुआ करता था। उस समय पलम्बर का मतलब हुआ करता था ओडिसावासी ! मारवाड़ी, गुजराती तथा पंजाबी भाइयों ने यहां का व्यवसाय संभाला हुआ था। देश के अन्य भागों से आए हुए लोगों की भी यहां अच्छी-खासी तादाद थी। यहां तक की 60-70 के भयंकर उथल-पुथल वाले दिनों में भी गैर-बंगाली परिवार चिंतित तो जरूर हुए पर यहां से जाने की किसी ने नहीं सोची, यह थी उस मिट्टी की ममता !
कोलकाता मैदान 

धापा का इलाका 
बहुत बडे दिल वाला हुआ करता था बंगाल, जिसने कभी भी किसी से भेद-भाव नहीं किया। भले ही वह कोई भी भाषा-भाषी हो, किसी भी देश-प्रदेश का हो, किसी भी जाति-धर्म का हो ! जिसने भी इसको चाहा इसने उतनी ही शिद्दत से उसे अपनाया। देश तो देश, विदेशी लोगों को भी यहां उतना ही संरक्षण मिला। अंग्रेज तो खैर यहां थे ही, उनके अलावा फ्रेंच, रशियन, पारसी, यहूदी, नेपाली, एंग्लोइंडियन, आर्मेनियन, ग्रीक, लंका और बर्मा जैसे देशों के लोग भी यहां अपना जीवन यापन करते मिल जाते थे। बासठ के युद्ध के बावजूद चीनियों की तादाद यहां दूसरे प्रवासियों से ज्यादा थी। उनका मुख्य रोजगार चमड़े से बनी वस्तुएं, रेस्त्रां और दंत चिकित्सा हुआ करता था। सही कहा जाए तो उन्होंने कलकत्ता के पूर्वीय हिस्से में स्थित धापा नामक जगह को अपना गढ़ जैसा बना लिया था। वहां उन लोगों की चमड़ा फैक्ट्रियां लगी हुई थीं। चीनियों की सघन आबादी के कारण उस जगह को चायना टाउन कहा जाने लगा था, धीरे-धीरे वह जगह असामाजिक तत्वों की शरण-स्थली बनती चली गयी जिससे आम आदमी उधर जाने से कतराने भी लगा था।

समय के साथ-साथ बहुत कुछ बदलता चला गया। देश-विदेश की नई पीढ़ी बेहतर रोजगार की तलाश में समुंदर भी लांघ गयी। विदेशियों की आबादी भी धीरे-धीरे कम होती चली गयी। तरह-तरह की सरकारें और उनकी नीतियों ने भी अपना-अपना असर डाला। एक समय ऐसा भी आया कि इस प्यारे, खूबसूरत महलों के शहर को ''डाइंग सिटी'' तक कह दिया गया था। तरह-तरह के कुप्रबंधन, अदूरदर्शी नेताओं, आत्मघाती निर्णयों, केंद्र से टकराव के बावजूद बंगाल के मुकुट के इस हीरे ने अपनी असाधारण जीजीविषा के बलबूते अपनी खोई चमक को वापस प्राप्त किया ! आज फिर वह उसी दम-ख़म के साथ पुन: गर्व से सीना ताने खड़ा है। मेरा सौभाग्य रहा है कि मुझे इसी की छत्र-छाया में लिखने-पढ़ने-काम करने-जिंदगी को जानने -समझने का अवसर प्राप्त हुआ। आज भी कोई मेरा पसंदीदा शहर पूछे तो मेरा एकमात्र उत्तर होगा..सिर्फ और सिर्फ ''कोलकाता'' । 

सोमवार, 18 मार्च 2019

होली, रिलायंस की, यादें बचपन की !

शाम को पांच बजे के आस-पास लॉन में ठंडाई का कार्यक्रम भी पूरे उत्साह के साथ संपन्न होता था। उसके बाद कभी-कभी वहीं ''स्क्रीन'' लगा किसी फिल्म का भी प्रदर्शन हो जाता था। पूरा दिन कैसे छू-मंतर हो जाता था, पता ही नहीं चलता था।  उसके बाद थके-हारे कैसे बिस्तर पर पहुंचते थे, कब नींद आती थी, कब सुबह होती थी कुछ नहीं पता ! पता था तो सिर्फ यह कि होली का इंतजार उसी दिन से फिर शुरू हो जाता था............!      

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होली आ रही है साथ ही ला रही है बीते दिनों की रंग में सराबोर बचपन की यादें। वैसे तो समय के साथ-साथ जैसे-जैसे निज़ाम बदलते गए, मिल के वाशिंदों के आचार-व्यवहार-त्यौहार आदि में भी थोड़ा-बहुत बदलाव आता चला गया, जोकि लाज़िमी भी था। पर आज जो बात बतला रहा हूँ, वह बिल्कुल शुरू के कुछ वर्षों में मनाई-खेली जाने वाली होली की है। 

उन दिनों सर, मैडम, मिसेज या अंकल-आंटी जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं के बराबर ही होता था। जो पंद्रह-बीस परिवार परिसर में रहते थे, उनकी महिला सदस्य एक-दूसरे को संबोधित करने के लिए भैन (बहन) या भैन जी तथा एक-दो अपवादों को छोड़, पुरुष सदस्यों के लिए उनका उपनाम या भाई जी का प्रयोग ही हुआ करता था। आज तो मुझे लगता था कि शायद मिल के स्टाफ का पूरा नाम तो सिर्फ कैशियर अंकल ही जानते होंगे, जिन्हें सैलरी देने के लिए पूरे नामों की जरुरत पड़ती होगी ! हाँ बच्चा पार्टी बिना भेद-भाव,जात-पात के सिर्फ नाम से पुकारी जाती थी। 

तो बात हो रही थी होली की ! वैसे तो सारा परिसर एक ही परिवार था ! पर पुरुष वर्ग की ''क्रिमी लेयर'' के पांच-सात लोग बहुत ही मित्त-भाषी, सादगी प्रिय, गंभीर और एक अनुशासित ''औरा'' में ही रहने वाले थे ! ऐसा नहीं था कि वे स्वभाव से कठोर या अहम वाले थे ! वे सब बहुत प्रेमिल थे, पर अपने पर और अपनी भावनाओं पर उनका पूरा नियंत्रण हुआ करता था। समय-समय पर उनकी जिंदादिली भी सामने आती रहती थी पर कभी-कभी, किसी पूर्णिमा पर या एकादशी पर ! ये सब इसलिए बता रहा हूँ कि जिससे एक खाका खिंच सके, उस समय का। 

मिल में होली की दस्तक हफ्ते भर पहले ही शुरू हो जाती थी, उसके स्वागत में मिल का युवा स्टाफ रात दस बजे के बाद एक किनारे बने ''बेबी क्रेश'' में चंग या ढपली के साथ राजस्थानी फाग गीतों की स्वर लहरी छेड़ उसके पदचाप की ध्वनि सब तक पहुंचा देता था। होली के दिन भांग जरूर घुटा करती थी, जिसका पूरा सामान कलकत्ते से दो दिन पहले पहुँच जाता था। भांग-ठंडाई, बिना किसी मशीन या बाहरी इंसान की सहायता के खुद ही बनाई जाती थी। यह भी एक बड़ा कार्यक्रम होता था ! 60-70 लोगों के लिए इसको बनाना कोई हंसी-खेल नहीं था। सारी सामग्री, घटकों तथा मसालों का सही अनुपात-मात्रा का पूरा ज्ञान और ध्यान रख पूरी तन्मयता और एकांत में उसका निर्माण किया जाता था। भांग बच्चों के लिए पूरी और कठोरता से निषिद्ध थी। होली के एक दिन पहले होलिका दहन की रस्म पूरे रीती-रिवाजों के साथ पूरी की जाती थी और फिर आ जाता था वह दिन जिसका इंतजार हम बच्चे साल भर से करते रहते थे। 

होली की चहल-पहल सुबह साढ़े आठ-नौ बजे शुरू हो जाती थी। महिलाओं-लड़कियों का अलग गुट होता था जो मैनेजर गेट के पास बांए हाथ के छोटे से मैदान में जुटता था। बाकी छोटे-बड़े पुरुष सामने लॉन में रंगों की धूम मचाते थे। गंगा सामने थीं, पानी इफरात था, रंगों की पूर्ती मिल से होती थी। हम अपनी हाफ पैंटों-निकरों की जेबों में तरह-तरह के रंगों को संजोए मोर्चे पर निकलने को तैयार होने लगते थे। ये दूसरी बात है कि ज्यादातर बच्चों की जेबों में कागज की पुड़ियों में रखे रंग पानी से मिलीभगत कर उन्हीं के बदन को ज्यादा रंगीन कर जाते थे। शुरुआत होती थी उन ''पांच-सात देव-पुरुषों'' से जो झक्क सफ़ेद शर्ट-पैंट में मंथर गति से चलते हुए आ कर लॉन में एक-दूसरे को बधाई दे, जरा-जरा सा गुलाल लगा खड़े हो जाते थे। फिर उनके युवा सहकर्मी उन्हें गुलाल लगा आशीर्वाद पाते थे और फिर उस एक दिन को मिली छूट का पूरा लाभ उठा वानर सेना के सेनानी, बिना अपने-पराए का भेद-भाव कर, पिल पड़ते थे अपने हथियारों समेत उन पर और जब तक उनके लिबास में चिन्दी भर भी सफेदी नज़र आती थी तब तक रंगों की बरसात जारी रहती थी। उसी बीच मिठाई का आदान-प्रदान भी बदस्तूर चलता रहता था। हमारी हसरतें पूरी होते ही वे आपस में विदा ले अपने-अपने घरों को बढ़ लेते थे।  आज वह सब सोच कर उन पर तरस और प्यार के साथ आँखें भी नम हो जाती हैं कि कैसे वे लोग चुप-चाप खड़े रह कर हमें खुश होने का भरपूर मौका दिया करते थे। तीन-चार घंटों के हुड़दंग के बाद, माओं के, बाथरूम को गंदा ना कर ध्यान से नहाने के कड़े निर्देशों का पालन करते हुए हम सब अपने-अपने जिद्दी रंगों को छुड़ाने की मशक्कत में जुट जाते थे। यह दूसरी बात है कि रंगों और हमारा स्नेह दो-तीन दिनों तक तो बना ही रहता था। 


शाम को पांच बजे के आस-पास लॉन में ठंडाई का कार्यक्रम भी पूरे उत्साह के साथ संपन्न होता था। उसके बाद कभी-कभी वहीं ''स्क्रीन'' लगा किसी फिल्म का भी प्रदर्शन हो जाता था। पूरा दिन कैसे छू-मंतर हो जाता था, पता ही नहीं चलता था।  उसके बाद थके-हारे कैसे बिस्तर पर पहुंचते थे, कब नींद आती थी, कब सुबह होती थी कुछ नहीं पता ! पता था तो सिर्फ यह कि होली का इंतजार उसी दिन से फिर शुरू हो जाता था।
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@कुछ दिनों बाद, रिलायंस के इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना, जो आज भी रोंगटे खड़े कर देती है !   

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

रिलायंस जूट मील, स्वर्गादपि गरीयसी

आज के बच्चे और उनके कुछ पहले के युवा तो शायद हमारे उन सुनहरे दिनों की कल्पना भी नहीं कर सकते, जब रिलायंस के बच्चे ही नहीं पूरा स्टाफ एक परिवार की तरह हुआ करता था ! हरेक का सुख-दुःख, ख़ुशी-गमी, सफलता-असफलता, रीती-रिवाज सबके हुआ करते थे ! हम बच्चे सबके सांझा थे, मजाल है कि खाने-नाश्ते के समय आप किसी और के घर पर हों और बिना खाए रह जाओ ! अच्छा लगा होगा यह पढ़ कर ! पर इसके साथ ही यह भी था कि शरारत-बदमाशी-मस्ती करते पकडे जाने पर शिकायत के लिए पापा या मम्मी का इंतजार नहीं किया जाता था, जो भी काका-काकी सामने होते थे वही, वहीं ''लपेट-लपुट'' कर मामला निपटा देते थे  :-)

#हिन्दी-ब्लागिंग   
कभी-कभी यादों के लगातार थपेड़ों से जब यादाश्त पर जमी काई की कुछ परत छटती है तो कभी-कभी ऐसे नायाब और बेशकीमती मोती उभर कर सामने आ जाते हैं, जिन्हें अपने पास रखा ही नहीं जा सकता वे होते ही हैं बांटने के लिए ! बचपन से युवावस्था तक का समय जहां गुजरा हो उसे भूल पाना असंभव होता है ! इसीलिए जब-जब रिलायंस ग्रुप की पिक्स सामने आती हैं तब-तब दिमाग के स्क्रीन पर पुरानी यादें आ-आ कर पुराने दिनों को साकार कर देती हैं। आज के बच्चे और उनके कुछ पहले के युवा तो शायद हमारे उन सुनहरे दिनों की कल्पना भी नहीं कर सकते, जब रिलायंस के बच्चे ही नहीं पूरा स्टाफ एक परिवार की तरह हुआ करता था ! हरेक का सुख-दुःख, ख़ुशी-गमी, सफलता-असफलता, रीती-रिवाज सबके हुआ करते थे ! हम बच्चे सबके सांझा थे, मजाल है कि खाने-नाश्ते के समय आप किसी और के घर पर हों और बिना खाए रह जाओ ! अच्छा लगा होगा यह पढ़ कर ! पर इसके साथ ही यह भी था कि शरारत-बदमाशी-मस्ती करते पकडे जाने पर शिकायत के लिए पापा या मम्मी का इंतजार नहीं किया जाता था, जो भी काका-काकी सामने होते थे वही, वहीं ''लपेट-लपुट'' कर मामला निपटा देते थे ! आज उन्हीं दिनों एक किस्सा झाड़-पोछ कर सबके सामने रखने की कोशिश करता हूँ !  

बीच वाली बिल्डिंग 
अंग्रजों द्वारा बंगाल के चौबीस परगना के भाटपारा में स्थापित #रिलायंस_जूट_मील पर 1963-64 में कानोरिया परिवार का मालिकाना हक़ हुआ। उस समय तीन ही बिल्डिंग्स हुआ करती थीं। जेटी के पास वाली, बीच वाली और उधर गेट के पास तीसरी। उस समय डागा जी, चीफ एग्जेक्युटिव थे। शांत स्वभाव के बुजुर्ग, रोब-दाब भरी गंभीर शक्शियत, समय और काम के पाबंद, उसूलों के पक्के ! सुलझे हुए एडमिनिस्ट्रेटर। इस सबके बावजूद उन्हें कभी गुस्से में जोर से बोलते किसी ने नहीं सुना। हम सब के दादाजी के समान। 
पैदल पथ 
आज की जेनेरेशन को सुन कर अजीब लगेगा कि उन दिनों फ्रिज, गीजर, एसी वगैरह तो हुआ नहीं करते थे ! यहां तक कि रसोई गैस भी नहीं थी। तब हर घर में कोयले की सिगड़ी पर ही खाना बनता था। कोयला ठीक से सुलगने के पहले बहुत धुआं देता है सो घरों में काम करने वाले सहायक/सहायिकाएं चूल्हे को सुलगा कर घरों के बाहर रख देते थे, फिर धुआं ख़त्म होने के पश्चात उसे रसोई में ले जाया जाता था। तब हर घर के लिए रोज 15 कीलो कोयला, 5 कीलो बर्फ फ्रिज की जगह, जिसे ''मील-मेड आइस बॉक्स'' में रखा जाता था और गर्म पानी के लिए घरों के पिछवाड़े की ओर बड़े-बड़े सिलिंडर हुआ करते थे, जिनमें कोयले से पानी गर्म कर घरों में भेजा जाता था। एक चौपहिया वाहन ''एम्बैसडर'' हुआ करता था जो वक्त-जरुरत सबके लिए उपलब्ध था। मील के अंदर हर छोटा-बड़ा पैदल ही चलता था। 

इन सीढ़ियों के पास ही अंगीठी सुलग रही थी, यहीं से धुआं अंदर जा ऊपर तक धुआं-धुआं किए दे रहा था 
मैं जो बताने जा रहा हूँ वह बात शायद 64-65 की है। तीनों बिल्डिंग्स में बाहर-बाहर रंग-पुताई हुई थी। उन दिनों भी सिर्फ बाहर के रंग-रोगन में 15 से 20 हजार का खर्च आ जाता था जो एक बड़ी रकम हुआ करती थी। रंग वगैरह हुए हफ्ता-दस दिन ही हुए थे। एक शाम डागा जी शाम के समय मेन आफिस से घर आ रहे थे। जब वे बीच वाली बिल्डिंग के पास पहुंचे तो देखा वहां एक सिगड़ी सुलग-सुलग कर धुऐं का गुबार उगल रही है। उस दिन हवा भी जेटी की तरफ से इधर की ओर चल रही थी; सो धूआँ मजे से सीढ़ियों से होता हुआ ऊपर दूसरी मंजिल तक जा रहा था। अपने इस सफर में वह पहली और दूसरी मंजिल की बड़ी-बड़ी खिड़कियों से बाहर भी किसी मनचले की तरह ताका-झाँकी करने से बाज नहीं आ रहा था ! डागा जी यह देखते ही खड़े हो गए ! ना कोई पूछ-ताछ की, ना हीं गुस्से से चिल्लाए ! उधर लॉन में एक माली काम कर रहा था; उसे बुलाया और चूल्हा उठवा कर गंगा में फिंकवा दिया !! उसी दम वापस लौटे, आफिस गए, एक साथ पच्चीस गैस कनेक्शन का आर्डर पास किया, इस हिदायत के साथ कि दो घंटे के अंदर हर घर में गैस पहुंच जानी चाहिए ! मील के बाहर ही पेट्रोल पंप था (अभी भी होगा) उन्हीं के पास गैस की भी एजेंसी थी ! उस रात रिलायंस में सबके घर धुंआ रहित वातावरण में खाना बना। 
जिधर से चूल्हा गंगा धाम सिधारा 
ऐसे हुआ करते थे एडमिनिस्ट्रेटर ! जो संस्था को अपना समझ चलाते थे। पर अपने स्टाफ का दुःख-दर्द भी समझते थे। वे जानते थे कि कोयले का उपयोग ही होता है भोजन बनाने में उसके सिवा और कोई चारा नहीं है। पर दूसरी तरफ संस्था का नुक्सान भी अनदेखा नहीं किया जा सकता था ! त्वरित निर्णय ने दोनों समस्याएं हल कर दीं। तभी तो छोटा-बड़ा हर स्टाफ, कर्मचारी, सदस्य उन्हें अपना मान उनकी इज्जत करता था तथा अपना बेहतर देने को तत्पर रहता था। 

@यह संस्मरण पसंद आए तो कुछ और रोचक प्रसंग याद करने की कोशिश को प्रोत्साहन मिलेगा। यदि इससे किसी को कुछ और याद आ जाए तो साझा जरूर करे !      

सोमवार, 26 नवंबर 2018

'तूँ प्रकाशो दा मुंडा वें ?''.......मेरे पंजाब की बात ही कुछ और है

''काका; सुणीं !'' मैंने मुड कर देखा, एक घर के दरवाजे में बैठीं,  एक बुजुर्ग-वृद्ध महिला मेरी ओर मुखातिब थीं ! मैं उनके पास गया पंजाबी तहजीब के अनुसार उनके चरण स्पर्श किए, उन्होंने ढेरों आशीर्वाद देने के बाद पूछा ''तूँ प्रकाशो दा मुंडा हैं ना; गोगी ?''  प्रकाशवती मेरी माताजी का नाम है और वहां मेरे बचपन का नाम गोगी ही था। माँ का स्वर्गवास हुए दो साल हो चुके हैं। वे भी मेरे साथ ही वर्षों पहले वहां गयीं थीं। मेरा चौंकना स्वाभाविक था, एक तो इतने लंबे अंतराल के बाद मेरा वहां जाना हुआ था, दूसरे वृद्धावस्था में ऐसे ही यादाश्त कमजोर हो जाती है, तीसरा समय के साथ-साथ चेहरे-मोहरे में अनेकों परिवर्तन हो जाते हैं ! चौथा वे हमारे परिवार की सदस्य नहीं थीं, चार-पांच घर छोड़, पडोसी थीं; फिर भी मुझे पहचान रही थीं ...............!

#हिन्दी_ब्लागिंग     
पिछले हफ्ते, करीब सोलह-सत्रह साल बाद अपने ननिहाल हदियाबाद जाने का मौका मिला। इतने सालों में पंजाब तो दो बार गया था, पर यहां नहीं जा पाया था। इस यात्रा के दौरान मुझे दो-तीन जगह सुदूर गावों में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। पहला तो अपने ननिहाल हदियाबाद, जो फगवाड़ा शहर से ड़ेढेक की. मी. की दूरी पर फगवाड़ा-नूरमहल रोड पर स्थित है, पर अब शहर का ही हिस्सा बन गया है। वहीं मेरे बड़े और छोटे मामाजी के विदेश गए सदस्यों में बचे हुए सदस्य रहते हैं। दोनों घरों में कुछ ही मीटर का फैसला है। पंजाब के बाहर रहते हुए इन दिनों तरह-तरह की फैली या फैलाई जा रही अफवाहें, खबरें, भ्रामक जानकारियां मिलने-जानने-सुनने की वजह से मन कुछ आशंकित सा था। पर वहां पहुंच कर जो माहौल मिला वह सिर्फ आत्मीयता, प्रेम, वात्सल्य का ही था। वहां के एक नहीं दो-दो वाकयों ने मेरी आँखें नम कर दीं। जिन्हें शायद ही कभी भूल पाऊं ! 

हुआ कुछ यूं कि हदियाबाद के कार्यक्रम के दौरान मैं एक घर से दूसरे घर जा रहा था कि पीछे से आवाज आई ''काका; सुणीं !'' मैंने मुड कर देखा, एक घर के दरवाजे में बैठीं,  एक बुजुर्ग-वृद्ध महिला मेरी ओर मुखातिब थीं ! मैं उनके पास गया पंजाबी तहजीब के अनुसार उनके चरण स्पर्श किए, उन्होंने ढेरों आशीर्वाद देने के बाद पूछा ''तूँ प्रकाशो दा मुंडा हैं ना; गोगी ?''  प्रकाशवती मेरी माताजी का नाम है और वहां मेरे बचपन का नाम गोगी ही था। माँ का स्वर्गवास हुए दो साल हो चुके हैं। वे भी मेरे साथ ही वर्षों पहले वहां गयीं थीं। मेरा चौंकना स्वाभाविक था, एक तो इतने लंबे अंतराल के बाद मेरा वहां जाना हुआ था, दूसरे वृद्धावस्था में ऐसे ही यादाश्त कमजोर हो जाती है, तीसरा समय के साथ-साथ चेहरे-मोहरे में अनेकों परिवर्तन हो जाते हैं ! चौथा वे हमारे परिवार की सदस्य नहीं थीं, चार-पांच घर छोड़, पडोसी थीं; फिर भी मुझे पहचान रही थीं ! भावुक मन और नम आँखें लिए कुछ देर उनके पास बैठा, उतनी ही देर में पचास-साठ सालों का इतिहास ताजा हो गया। फिर इजाजत ले उठ तो गया, पर अभी भी मन में यह बात घुमड़ रही है कि शहरों में बीसियों साल रहने के बाद भी जहां आपकी ज्यादातर पहचान आपके सरनेम या आपके मकान नंबर से ही होती है वहीं सुदूर गांव की एक पड़ोसी महिला को भी पचास-साठ साल बाद भी आपकी माँ और आपका नाम चेहरे समेत याद रहता है ! 

दूसरा वाकया भी ऐसा ही हैरतंगेज था। दूसरे दिन मेरा अपने मौसा जी के बड़े बेटे जीवन तथा उनकी पत्नी सुषमा  जी के साथ उनकी बुआजी के घर जाना हुआ। वे होशियारपुर के पास एक गांव में रहती हैं, मुझे नहीं याद कि मैं उनसे कब मिला था ! शायद चालीस साल पहले इन्हीं भाई की शादी में ! पर उन्हें नब्बे से ज्यादा की उम्र में भी मेरी पहचान थी, सिर्फ एक बार याद दिलाना पड़ा था कि कलकत्ते वाली मासीजी के बेटे हैं ! बस; सब कुछ याद आ गया था ! मेरा नाम तक ! अब वहां से आना मुश्किल ! रात रहने की जिद ! वर्षों बाद मिलने की दुहाई ! 

सोचता हूँ क्या है यह ? कौन सा अपनत्व है ? कौन सा लगाव है ? कौन सी ममता है ? कौन सा रिश्ता है जो वर्षों बाद मिले दूर-दराज के रिश्ते के लोगों को भी गले लगा, अपना वात्सल्य उड़ेलने को तत्पर रहता है ? आज जहां सगे भाई-बहन अपना फर्ज भूलाए बैठे हों वहाँ यह पीढ़ी जग को अपना बनाने से परहेज नहीं करती। आधुनिकता और कमाई की होड़ में जहां आज माँ-बाप से बात तक करने की फुर्सत नहीं मिलती वहीं कुछ लोगों को अपने पराये का भेद ही मालुम नहीं हैं ! यही फर्क है आजकी और पुरानी पीढ़ी का  ! यही फर्क है शहर और गांव का ! यही फर्क है आधुनिकता और पुरातनता का ! यही फर्क है दिल और दिमाग का ! 

मंगलवार, 4 सितंबर 2018

मेरे बचपन की पुस्तकें-पत्रिकाएं, जो आज भी मुझे संजोए हुए हैं

पिताजी को पढ़ने का बहुत शौक था। जब मैं कुछ बड़ा हुआ तो मेरे लिए भी उस समय का बाल साहित्य घर आने लगा। सारी बाल पत्रिकाओं के नाम तो मुझे आज भी याद हैं; मनमोहन, बालक, चंदामामा, चुन्नू-मुन्नू जिनमें फिर पराग का नाम भी जुड़ गया। इसके अलावा पाठ्य पुस्तकों के इतर, तरह-तरह की देसी-विदेशी बाल साहित्य की रोचक पुस्तकें भी मेरे लिए लाते-मंगवाते रहते थे, फिर वह चाहे पंचतंत्र हो, ईसप की कथाएं हों, अलादीन हो, एलिस हो या फिर हमारे महान ग्रंथों का बाल संस्करण हो। उन दिनों बच्चों के सर्वांगीण विकास और उनके चरित्र निर्माण, उनके बचपन का बहुत ध्यान रखा जाता था, इसीलिए हर पुस्तक-पत्रिका में ज्ञान-विज्ञान के साथ-साथ पौराणिक-इतिहासिक कहानियों का समावेश  भी जरूर हुआ करता था, हाँ आज की तरह अपने गुरुवरों या बड़ों का मजाक, खिल्ली उड़ाने वाली ना कथाएं होती थीं ना हीं चुटकुले..........  

#हिन्दी_ब्लागिंग 
पिताजी का कार्य-क्षेत्र कलकत्ता (आज का कोलकाता) होने के कारण मेरा बचपन भी वहीं बीता। ददिहाल व ननिहाल पंजाब में थे। उस लिहाज से जैसा कहते हैं ना कि छुटपन में दादी-नानी की पौराणिक, ऐतिहासिक, परियों की कथा-कहानियां सुनी-सुनाई जाती थीं, वैसा मेरे साथ नहीं हो पाया। पर इस मामले में मैं सौभाग्यशाली रहा ! पिताजी को पढ़ने का बहुत शौक था। घर पर दो कांच की आलमारियां तरह-तरह की पुस्तकों से भरी पड़ी थीं। जब मैं कुछ बड़ा हुआ तो मेरे लिए भी उस समय का बाल साहित्य घर आने लगा। सारी बाल पत्रिकाओं के नाम तो मुझे अभी भी याद हैं, मनमोहन, बालक, चंदामामा, चुन्नू-मुन्नू जिनमें फिर पराग का नाम भी जुड़ गया। इसके अलावा पाठ्य पुस्तकों के इतर, तरह-तरह की देसी-विदेशी बाल पुस्तकें भी लाते-मंगवाते रहते थे। फिर वह चाहे पंचतंत्र हो, ईसप की कथाएं हों, अलदीन हो या फिर हमारे महान ग्रंथों का बाल संस्करण हो। 

उन्होंने कभी पढ़ने पर ना जोर दिया नाहीं दवाब बनाया ! पता नहीं कैसे उन्हें मेरे इस रुझान का अंदाज लग गया ! शायद अपने संकलन में मेरी ताक-झाँक को परख कर। इसी के चलते पुस्तकों के बहुमूल्य खजाने का द्वार मेरे लिए खोल दिया गया। इतना ही नहीं जिस पुस्तकालय ने उन्हें आग्रह कर अपना सदस्य बनाया था, वहाँ से भी मुझे सद्साहित्य की प्राप्ति होने लगी। सस्ती का जमाना था पर लोगों की आमदनी भी वैसी ही होती थी सो मेरे तक़रीबन सभी संगी-साथी इस अवर्चनीय सुख से वंचित रहते थे, पाठ्य-पुस्तकों के अलावा किसी और किताब की कल्पना किसी-किसी घर में ही हो पाती थी वह भी इक्का-दुक्का ! मेरे पास तो भंडार था और दिल दरिया ! फिर क्या था, हरेक के लिए हर पुस्तक उपलब्ध, जो उनके परिवार के बड़े भी पढ़ा करते थे। पर शर्त यही रहती थी कि संभाल कर पढ़ा जाए और सही सलामत, बिना कटे-फटे वापस की जाए। क्योंकि वे पुस्तकें मुझे निर्जीव नहीं सजीव लगा करती थीं, अपने परिवार के सदस्यों की तरह। 

दैनिक अखबार ''अमृत बाज़ार पत्रिका", जिसका प्रकाशन 1991 में 123 साल के बाद किन्हीं कारणों से बंद हो गया, के साथ-साथ साप्ताहिक हिन्दुस्तान तथा धर्मयुग नियम से आते थे। कभी-कभार माया, सरिता, मनोरमा या फ़िल्मी-पत्रिका फिल्म फेयर हावड़ा स्टेशन के A. H. Wheeler के स्टाल से आ जाए तो आ जाए, पर किसी हल्के या सतही पुस्तक या पत्रिका को कभी भी घर में प्रवेश नहीं मिला ! अपने समय की सर्वाधिक बिक्री वाली मनोहर कहानियां को तो कभी भी नहीं। 

पिताजी की कृपा से ही उन सब बातों का असर आज दिख रहा है। पढ़ने की भूख, जिज्ञासु प्रवृत्ति, हर क्षेत्र के बारे में कुछ ना कुछ जानकारी प्राप्त करने की इच्छा अभी भी अपने चरम पर है। आज की पीढ़ी को और उनके
भी छोटे बच्चों को अपनी पौराणिक, ऐतिहासिक, सामयिक कथा कहानियों की जानकारी प्रदान करना बहुत सुहाता है। किसी भी लोकप्रिय कथा-साहित्य-पुस्तक के मुख्य मार्ग से हट कर जब उसके गली-कूचों की बात बताई जाती है तो उनके मुख खुले के खुले रह जाते हैं। क्योंकि आज की शिक्षा पद्यति में उन सब बातों को सम्मलित करना फिजूल माना जाता है, जिनको पहले स्वस्थ मन, दृढ चरित्र, विकसित मस्तिष्क और मानव धर्म के लिए जरुरी समझा जाता था। आज ज्ञान नहीं सिर्फ जानकारी को आगे रख, रोजगार प्राप्ति को ही सर्वोपरि बना सारे मापदंड तय किए जाते हैं, पर विडंबना है कि फिर भी बेरोजगारी बढ़ती जा रही है ! याने ना माया मिली ना राम !

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