सोमवार, 26 नवंबर 2018

'तूँ प्रकाशो दा मुंडा वें ?''.......मेरे पंजाब की बात ही कुछ और है

''काका; सुणीं !'' मैंने मुड कर देखा, एक घर के दरवाजे में बैठीं,  एक बुजुर्ग-वृद्ध महिला मेरी ओर मुखातिब थीं ! मैं उनके पास गया पंजाबी तहजीब के अनुसार उनके चरण स्पर्श किए, उन्होंने ढेरों आशीर्वाद देने के बाद पूछा ''तूँ प्रकाशो दा मुंडा हैं ना; गोगी ?''  प्रकाशवती मेरी माताजी का नाम है और वहां मेरे बचपन का नाम गोगी ही था। माँ का स्वर्गवास हुए दो साल हो चुके हैं। वे भी मेरे साथ ही वर्षों पहले वहां गयीं थीं। मेरा चौंकना स्वाभाविक था, एक तो इतने लंबे अंतराल के बाद मेरा वहां जाना हुआ था, दूसरे वृद्धावस्था में ऐसे ही यादाश्त कमजोर हो जाती है, तीसरा समय के साथ-साथ चेहरे-मोहरे में अनेकों परिवर्तन हो जाते हैं ! चौथा वे हमारे परिवार की सदस्य नहीं थीं, चार-पांच घर छोड़, पडोसी थीं; फिर भी मुझे पहचान रही थीं ...............!

#हिन्दी_ब्लागिंग     
पिछले हफ्ते, करीब सोलह-सत्रह साल बाद अपने ननिहाल हदियाबाद जाने का मौका मिला। इतने सालों में पंजाब तो दो बार गया था, पर यहां नहीं जा पाया था। इस यात्रा के दौरान मुझे दो-तीन जगह सुदूर गावों में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। पहला तो अपने ननिहाल हदियाबाद, जो फगवाड़ा शहर से ड़ेढेक की. मी. की दूरी पर फगवाड़ा-नूरमहल रोड पर स्थित है, पर अब शहर का ही हिस्सा बन गया है। वहीं मेरे बड़े और छोटे मामाजी के विदेश गए सदस्यों में बचे हुए सदस्य रहते हैं। दोनों घरों में कुछ ही मीटर का फैसला है। पंजाब के बाहर रहते हुए इन दिनों तरह-तरह की फैली या फैलाई जा रही अफवाहें, खबरें, भ्रामक जानकारियां मिलने-जानने-सुनने की वजह से मन कुछ आशंकित सा था। पर वहां पहुंच कर जो माहौल मिला वह सिर्फ आत्मीयता, प्रेम, वात्सल्य का ही था। वहां के एक नहीं दो-दो वाकयों ने मेरी आँखें नम कर दीं। जिन्हें शायद ही कभी भूल पाऊं ! 

हुआ कुछ यूं कि हदियाबाद के कार्यक्रम के दौरान मैं एक घर से दूसरे घर जा रहा था कि पीछे से आवाज आई ''काका; सुणीं !'' मैंने मुड कर देखा, एक घर के दरवाजे में बैठीं,  एक बुजुर्ग-वृद्ध महिला मेरी ओर मुखातिब थीं ! मैं उनके पास गया पंजाबी तहजीब के अनुसार उनके चरण स्पर्श किए, उन्होंने ढेरों आशीर्वाद देने के बाद पूछा ''तूँ प्रकाशो दा मुंडा हैं ना; गोगी ?''  प्रकाशवती मेरी माताजी का नाम है और वहां मेरे बचपन का नाम गोगी ही था। माँ का स्वर्गवास हुए दो साल हो चुके हैं। वे भी मेरे साथ ही वर्षों पहले वहां गयीं थीं। मेरा चौंकना स्वाभाविक था, एक तो इतने लंबे अंतराल के बाद मेरा वहां जाना हुआ था, दूसरे वृद्धावस्था में ऐसे ही यादाश्त कमजोर हो जाती है, तीसरा समय के साथ-साथ चेहरे-मोहरे में अनेकों परिवर्तन हो जाते हैं ! चौथा वे हमारे परिवार की सदस्य नहीं थीं, चार-पांच घर छोड़, पडोसी थीं; फिर भी मुझे पहचान रही थीं ! भावुक मन और नम आँखें लिए कुछ देर उनके पास बैठा, उतनी ही देर में पचास-साठ सालों का इतिहास ताजा हो गया। फिर इजाजत ले उठ तो गया, पर अभी भी मन में यह बात घुमड़ रही है कि शहरों में बीसियों साल रहने के बाद भी जहां आपकी ज्यादातर पहचान आपके सरनेम या आपके मकान नंबर से ही होती है वहीं सुदूर गांव की एक पड़ोसी महिला को भी पचास-साठ साल बाद भी आपकी माँ और आपका नाम चेहरे समेत याद रहता है ! 

दूसरा वाकया भी ऐसा ही हैरतंगेज था। दूसरे दिन मेरा अपने मौसा जी के बड़े बेटे जीवन तथा उनकी पत्नी सुषमा  जी के साथ उनकी बुआजी के घर जाना हुआ। वे होशियारपुर के पास एक गांव में रहती हैं, मुझे नहीं याद कि मैं उनसे कब मिला था ! शायद चालीस साल पहले इन्हीं भाई की शादी में ! पर उन्हें नब्बे से ज्यादा की उम्र में भी मेरी पहचान थी, सिर्फ एक बार याद दिलाना पड़ा था कि कलकत्ते वाली मासीजी के बेटे हैं ! बस; सब कुछ याद आ गया था ! मेरा नाम तक ! अब वहां से आना मुश्किल ! रात रहने की जिद ! वर्षों बाद मिलने की दुहाई ! 

सोचता हूँ क्या है यह ? कौन सा अपनत्व है ? कौन सा लगाव है ? कौन सी ममता है ? कौन सा रिश्ता है जो वर्षों बाद मिले दूर-दराज के रिश्ते के लोगों को भी गले लगा, अपना वात्सल्य उड़ेलने को तत्पर रहता है ? आज जहां सगे भाई-बहन अपना फर्ज भूलाए बैठे हों वहाँ यह पीढ़ी जग को अपना बनाने से परहेज नहीं करती। आधुनिकता और कमाई की होड़ में जहां आज माँ-बाप से बात तक करने की फुर्सत नहीं मिलती वहीं कुछ लोगों को अपने पराये का भेद ही मालुम नहीं हैं ! यही फर्क है आजकी और पुरानी पीढ़ी का  ! यही फर्क है शहर और गांव का ! यही फर्क है आधुनिकता और पुरातनता का ! यही फर्क है दिल और दिमाग का ! 

4 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (27-11-2018) को "जिन्दगी जिन्दगी पे भारी है" (चर्चा अंक-3168) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी, हार्दिक धन्यवाद

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व पर्यावरण संरक्षण दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

हर्ष जी, बहुत-बहुत धन्यवाद। इसे ज्यादा से ज्यादा लोग पढें यही कामना है

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