मंगलवार, 26 मार्च 2019

बहुत बडे दिल वाला हुआ करता था बंगाल

जब-जब देश के किसी भी प्रदेश के रहवासी को यदि रोजगार के लिए किसी दूसरे राज्य में जाने की जरुरत महसूस होती थी तो उसके जेहन में सबसे पहले कलकत्ते का ही नाम आता था और इसने भी खुली बाँहों से सबका स्वागत बिना भेद-भाव के किया ! कहते हैं बम्बई अपने मेहमान का कठिन इम्तहान ले कर तब उसे अपनाती है ! पर बंगाल तो सदा सहृदय मेजबान रहा ! वहां तो दूध के भरे गिलास में चीनी की तरह, बिना उसको छलकाए लोग आते गए और घुलते-मिलते गए, रोजगार पाते गए और वहीं के हो कर के रह गए। इसी कारण देश के किसी भी शहर के पहले कलकत्ते ने एक करोड़ की आबादी का आंकड़ा पार कर लिया था.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग
वैसे तो हमारे देश का हर राज्य अपनी भौगोलिक स्थिति, संस्कृति, परंपराओं या प्रकृति की नेमतों की वजह से अपने-आप में खास है, पर इनमें बंगाल अपना अलग ही स्थान रखता है। चाहे गीत-संगीत हो, राजनीती हो, देश प्रेम हो, शिक्षा हो, आध्यात्म हो, शौर्य हो, ललित कला हो, वास्तु हो, खेल हो, पठन-पाठन हो, नेतृत्व हो, प्रेम हो, भाईचारा हो, खान-पान हो, उत्पादन हो, किसी भी विधा में यह पीछे नहीं रहा। ऐसे ही इस धरती का नाम ''सोनार बांग्ला'' नहीं पड़ गया था। कई-कई बार विदेशों में इसने अपने देश का नाम रौशन करवाया है। इतना ही नहीं जब-जब देश के किसी भी प्रदेश के रहवासी को यदि रोजगार के लिए किसी दूसरे राज्य में जाने की जरुरत महसूस होती थी तो उसके जेहन में सबसे पहले कलकत्ते का ही नाम आता था और इसने भी खुली बाँहों से सबका स्वागत बिना भेद-भाव के किया ! कहते हैं बम्बई अपने मेहमान का कठिन इम्तहान ले कर तब उसे अपनाती है ! पर बंगाल तो सदा सहृदय मेजबान रहा ! वहां तो दूध के भरे गिलास में चीनी की तरह, बिना उसको छलकाए लोग आते गए और घुलते-मिलते गए, रोजगार पाते गए और वहीं के हो कर के रह गए। इसी कारण देश के किसी भी शहर के पहले कलकत्ते ने एक करोड़ की आबादी का आंकड़ा पार कर लिया था। उन दिनों हर तबके,  स्तर के लोगों के लिए वहां रहना-गुजर करना आसान था।



शुरू में एक कहावत हुआ करती थी कि ''आज जो बंगाल सोचता है, वही कल पूरे देश की सोच होती है'' इसका एक कारण भी था बंगाल की शिक्षा दर, बुद्धि जीवी वर्ग, जागरूकता देश के बाकी हिस्सों पर भारी पड़ती थी। इसका एहसास वहां के वाशिंदों को था ! हालांकी गुणी जनों का आदर सत्कार करने में वे कभी पीछे नहीं रहते थे पर किसी बाहर वाले से जल्दी मिलते-जुलते भी नहीं थे। शायद अपने खोल में बने रहने की आदत के कारण ही आजादी के वर्षों बाद तक बंगाली युवा देश के दूसरे हिस्सों में रोजगार तलाशने में कतराते रहे। जो मिला है उसी में खुश रहने वाले हुआ करते थे बंगाली परिवार। ज्यादातर शारीरिक मशक्कत और व्यापार से दूरी बनाए रखने वाला युवा वर्ग ''सफ़ेद कॉलर'' या सरकारी नौकरी, एक अपना घर जिसमे छोटा सा तालाब हो, सादगी भरी वेशभूषा और अपने पसंदीदा फ़ुटबाल क्लब की जीत-हार के साथ संतुष्ट रहता था। अलबत्ता ताश के खेल ब्रिज तथा ''अड्डा-बाजी'' उसका प्रमुख शगल हुआ करता था जहां दुनिया-जहान की बातों और मसलों पर वाद-विवाद होते रहते थे। यही कारण था कि मेहनत-मजदूरी के कामों में यहां यूपी, बिहार व पंजाब के लोगों का वर्चस्व रहता आया है। मिलों-फैक्ट्रियों में कामगारों, दरवानों के अलावा कलकत्ते में चलने वाली  ''ट्राम'' में चालक और कंडक्टर ज्यादातर बिहार-यूपी के ही हुआ करते थे। परिवहन में टैक्सी के व्यवसाय में पंजाब से आई सिख बिरादरी का बोल-बाला हुआ करता था। उस समय पलम्बर का मतलब हुआ करता था ओडिसावासी ! मारवाड़ी, गुजराती तथा पंजाबी भाइयों ने यहां का व्यवसाय संभाला हुआ था। देश के अन्य भागों से आए हुए लोगों की भी यहां अच्छी-खासी तादाद थी। यहां तक की 60-70 के भयंकर उथल-पुथल वाले दिनों में भी गैर-बंगाली परिवार चिंतित तो जरूर हुए पर यहां से जाने की किसी ने नहीं सोची, यह थी उस मिट्टी की ममता !
कोलकाता मैदान 

धापा का इलाका 
बहुत बडे दिल वाला हुआ करता था बंगाल, जिसने कभी भी किसी से भेद-भाव नहीं किया। भले ही वह कोई भी भाषा-भाषी हो, किसी भी देश-प्रदेश का हो, किसी भी जाति-धर्म का हो ! जिसने भी इसको चाहा इसने उतनी ही शिद्दत से उसे अपनाया। देश तो देश, विदेशी लोगों को भी यहां उतना ही संरक्षण मिला। अंग्रेज तो खैर यहां थे ही, उनके अलावा फ्रेंच, रशियन, पारसी, यहूदी, नेपाली, एंग्लोइंडियन, आर्मेनियन, ग्रीक, लंका और बर्मा जैसे देशों के लोग भी यहां अपना जीवन यापन करते मिल जाते थे। बासठ के युद्ध के बावजूद चीनियों की तादाद यहां दूसरे प्रवासियों से ज्यादा थी। उनका मुख्य रोजगार चमड़े से बनी वस्तुएं, रेस्त्रां और दंत चिकित्सा हुआ करता था। सही कहा जाए तो उन्होंने कलकत्ता के पूर्वीय हिस्से में स्थित धापा नामक जगह को अपना गढ़ जैसा बना लिया था। वहां उन लोगों की चमड़ा फैक्ट्रियां लगी हुई थीं। चीनियों की सघन आबादी के कारण उस जगह को चायना टाउन कहा जाने लगा था, धीरे-धीरे वह जगह असामाजिक तत्वों की शरण-स्थली बनती चली गयी जिससे आम आदमी उधर जाने से कतराने भी लगा था।

समय के साथ-साथ बहुत कुछ बदलता चला गया। देश-विदेश की नई पीढ़ी बेहतर रोजगार की तलाश में समुंदर भी लांघ गयी। विदेशियों की आबादी भी धीरे-धीरे कम होती चली गयी। तरह-तरह की सरकारें और उनकी नीतियों ने भी अपना-अपना असर डाला। एक समय ऐसा भी आया कि इस प्यारे, खूबसूरत महलों के शहर को ''डाइंग सिटी'' तक कह दिया गया था। तरह-तरह के कुप्रबंधन, अदूरदर्शी नेताओं, आत्मघाती निर्णयों, केंद्र से टकराव के बावजूद बंगाल के मुकुट के इस हीरे ने अपनी असाधारण जीजीविषा के बलबूते अपनी खोई चमक को वापस प्राप्त किया ! आज फिर वह उसी दम-ख़म के साथ पुन: गर्व से सीना ताने खड़ा है। मेरा सौभाग्य रहा है कि मुझे इसी की छत्र-छाया में लिखने-पढ़ने-काम करने-जिंदगी को जानने -समझने का अवसर प्राप्त हुआ। आज भी कोई मेरा पसंदीदा शहर पूछे तो मेरा एकमात्र उत्तर होगा..सिर्फ और सिर्फ ''कोलकाता'' । 

10 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर रिपोर्ताज

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सुशील जी, हार्दिक धन्यवाद

Kamini Sinha ने कहा…

बड़ी ही खूबसूरती से आपने "कोलकाता "घुमा दिया आभार आप का ,मजेदार लेख ,सादर

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (27-03-2019) को "अपनी औकात हमको बताते रहे" (चर्चा अंक-3287) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कामिनी जी, हौसला अफजाई के लिए शुक्रिया

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी, हार्दिक धन्यवाद

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व रंगमंच दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

हर्ष जी, आपका और ब्लॉग बुलेटिन का हार्दिक आभार

Anita ने कहा…

कोलकाता को सिटी ऑफ़ जॉय भी कहा गया है, इस शहर के खूबसूरत मिजाज से परिचय कराता सुंदर आलेख !

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अनिता जी, कुछ अलग सा पर सदा स्वागत है

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