रविवार, 31 मार्च 2019

रिलायंस और रिलायंस, नाम एक पर संस्थान अलग-अलग

रिलायंस जूट मिल ऐंड इंडस्ट्रीज में गुजरे बचपन के संस्मरण लिखते समय अक्सर यह बात दिमाग से निकल जाती थी कि आज के दिन बंगाल के बाहर इसे जानने वालों की संख्या बहुत कम है ! आज जब भी कहीं रिलायंस का नाम आता है तो सब के जेहन में धीरू भाई अंबानी द्वारा स्थापित रिलायंस इंडस्ट्रीज की छवि ही उभरती है ! पर रिलायंस जूट मिल के बारे में जानकारी ना होने के बावजूद उससे संबंधित मेरी ब्लॉग रचनाओं को मेरे स्नेही जनों से जो प्रतिसाद मिलता रहा है वह तो मेरा सौभाग्य ही है ! आज की यह पोस्ट एक ही नाम के उन दो संस्थानों की थोड़ी सी जानकारी के साथ-साथ उनके लिए भी जिनके लिए रिलायंस जूट मिल का नाम अनजाना-अनसुना और शायद हैरत प्रदान करने वाला भी हो........!    

#हिन्दी_ब्लागिंग 
कभी-कभी जब दिन भर की गहमा-गहमी के बाद रात के नितांत अकेलेपन में समय के अवगुंठन को धीरे से हटा कर जब वर्षों पुरानी यादें करवट लेती हैं तो सबसे पहले रिलायंस जूट मिल में गुजरे बचपन के दिन साक्षात साकार हो मुझे खींच कर अपने बीच ले जाते हैं ! आज चार दशक से ऊपर हो जाने के बावजूद यह सिलसिला बदस्तूर जारी है, हो भी क्यों ना ! जिंदगी का बेहतरीन कालखंड जो था वह ! 

यादों के उसी स्वरुप को जब शब्दों में बांध, वाक्यों में पिरोने की कोशिश करता हूँ तो अक्सर यह बात दिमाग से निकल जाती है कि आज के दिन रिलायंस जूट मिल ऐंड इंडस्ट्रीज को बंगाल के बाहर जानने वालों की संख्या बहुत कम है ! आज जब भी कहीं रिलायंस का नाम आता है तो सब के जेहन में धीरू भाई अंबानी द्वारा स्थापित रिलायंस इंडस्ट्रीज की छवि ही उभरती है ! पर रिलायंस जूट मिल के बारे में जानकारी ना होने के बावजूद उससे संबंधित मेरी ब्लॉग रचनाओं को मेरे स्नेही जनों से जो प्रतिसाद मिलता रहा है वह तो मेरा सौभाग्य ही है ! आज की यह पोस्ट मेरे बचपन के संगी साथियों, स्नेहीजनों के साथ-साथ उन मित्रों, अनजाने अपनों के नाम जिन्होंने मेरे ब्लॉग लेखन को ढेरों खामियों के बावजूद प्रोत्साहित किया है और जिनके लिए रिलायंस जूट मिल का नाम अनजाना-अनसुना और शायद हैरत प्रदान करने वाला भी हो ! 

पहले रिलायंस जूट मिल ! जिसके नाम में समय के साथ-साथ उसकी सफलता के कारण कुछ ना कुछ नया जुड़ता रहा है ! जैसे रिलायंस जूट मिल, या फिर रिलायंस जूट ऐंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड या फिर रिलायंस जूट मिल्स इंटरनेशनल लिमिटेड आदि ! तब देश अभिभाजित था। संसार की बेहतरीन जूट बंगाल में ही उत्पन्न होती थी। उसका भरपूर लाभ उठाने के लिए बंगाल के उत्तरी चौबीस परगना जिले के, कलकत्ता से करीब 21-22 मील (35 की.मी.) दूर, भाटपाड़ा इलाके में बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में अंग्रेजों द्वारा स्थापित की गयी थी। सड़क मार्ग की बनिस्पत यहां रेल मार्ग से पहुंचना ज्यादा आसान रहा है। इसके लिए कोलकाता के दूसरे बड़े स्टेशन सियालदह से इधर आने वाली लोकल ट्रेनों से कांकिनाड़ा स्टेशन पर उतरना होता है, जिसके लिए बमुश्किल 50-55 मिनटों का समय लगता है जबकि कार वगैरह से करीब डेढ़ से दुगना समय लग जाता है। स्टेशन से पैदल पांच-सात मिनट का समय चाहिए होता है मिल तक पहुँचने के लिए। 

आजादी के बाद बदहाल पड़ी इस मिल को 1963 में कनोडिया परिवार द्वारा अपनी मिल्कियत में शामिल कर लिया गया। यह उनकी दूरदर्शिता, कुशल प्रबंधन, व्यापारिक कौशल और अपने स्टाफ पर पूरा भरोसा ही था जो रिलायंस जूट मिल बंगाल की अग्रणी मिलों में शुमार रही। मालिकों द्वारा प्रदत्त सहूलियतें, बिना किसी हस्तक्षेप के काम करने की पूरी छूट, परिवारों की सुख-सुविधा का पूरा ख्याल, सुख-दुःख में सदा उनके साथ होने के दिलासे के कारण सारा स्टाफ उनके प्रति समर्पित था। काम को अपना काम समझ कर काम किया जाता था। सत्तर का दशक रिलायंस का स्वर्ण काल रहा। 

अब बात दूसरी रिलायंस की। इसे धीरू भाई अंबानी और चंपक लाल दमानी ने 1960 में साथ मिल कर खड़ा किया था पर 1965 आते-आते दोनों जने अलग हो गए, और धीरू भाई ने 1966 में रिलायंस टेक्सटाइल इंडस्ट्री की नींव महाराष्ट्र में रखी, जो सिंथेटिक धागे बनाने का काम करती थी। कंपनी ने समय के साथ अपार सफलता प्राप्त की। उसका ''बिमल'' ब्रांड का कपड़ा जन-जन की पसंद बन गया। आज यह रिलायंस देश के नवरत्नों में शामिल है। देश-विदेश में ख्याति अर्जित करने वाले इस बहुमुखी और सफलतम संस्थान को आज किसी पहचान की जरुरत नहीं है। देश के बच्चे-बच्चे की जुबान पर इसका नाम है।

तो यह थी एक ही नाम के दो संस्थानों की कहानी। एक के संस्थापक राजस्थान से आए, बंगाल को अपना कर्म-क्षेत्र चुना। जूट के पौधे से धागे बना कर देश में उस क्षेत्र में अग्रणी स्थान बनाया। 
दूसरे ने गुजरात से आ महाराष्ट्र की जमीन पर, अथक मेहनत, दूरदर्शिता, व्यापार कौशल तथा अपनी लगन से अपने सपनों को साकार करते हुए देश की सीमाएं लांघ कर आसमान छू लिया। 
दोनों में समानता यही थी कि उन्होंने धागे बनाने के काम से शुरुआत की और अपने संस्थानों का नाम रिलायंस रखा ! क्योंकि उन्हें खुद पर भरोसा था। अपनी आत्म-निर्भरता पर विश्वास था।  

4 टिप्‍पणियां:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति 47वीं पुण्यतिथि - मीना कुमारी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। एक बार आकर हमारा मान जरूर बढ़ाएँ। सादर ... अभिनन्दन।।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

हर्ष जी, हार्दिक धन्यवाद

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (02-04-2019) को "चेहरे पर लिखा अप्रैल फूल होता है" (चर्चा अंक-3293) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
अन्तर्राष्ट्रीय मूख दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

नमस्कार, शास्त्री जी

विशिष्ट पोस्ट

हिंदी, अपनाना है तो दिल से अपनाएं

ठीक है अंग्रेजी का महत्व अपनी जगह है। पर उसके कारण, अकारण ही हम अपनी भाषा को हीन समझते हैं, उसे दोयम दर्जे की मान लेते हैं ! दुःख तो तब होता...