शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2008

वाल्मिकी काल में यदि पशु-पक्षी संरक्षण बोर्ड होता तो??

जरा सोचिए, यदि एनिमल वेलफेयर एसोसिएशन या पशु-पक्षी संरक्षण समिति जैसी संस्थाएं पौराणिक काल में ही अस्तित्व में आ जातीं तो इस संसार की तो छोड़िए हमारे देश का परिदृष्य कैसा होता ?
सिर्फ रामायण काल की ही बात करें तो शायद आज हम राक्षसराज रावण की पूजा कर रहे होते। क्योंकि महर्षि वाल्मिकी ना तो हिरण-वध करवा पाते नही सीता हरण होता। तो फिर युद्ध काहे का। वैसे रामजी लड़ते भी कैसे। वानर, भालुओं की सेना तो बनने नहीं दी जाती। हनुमानजी तो बेचारे तरह-तरह के आरोपों से परेशान रहते। संजीवनी के लिए द्रोणगिरी पर्वत हटाने से उत्तरांचल के लोग तो आज तक खफा हैं उनसे। अशोक वाटिका में हजारों पेड़-पौधे तहस नहस कर दिए थे उसका हिसाब मांगा जाता। यदि सेना किसी तरह बन भी जाती तो सेतु-बंध के नाम पर जो सागर किनारे की भूमि एकतरह से समतल ही कर दी गयी थी, उसका जांच आयोग के सामने जवाब देना मुश्किल हो जाता कि सारे वृक्ष, पेड़, पौधे, पर्वत शिलाओं को सागर में फेंकने से जो प्रकृति का संतुलन बिगड़ा इसका जवाबदार कौन है? लगता नही कि इन सब पचड़ों के बीच युद्ध हो पाता। अगर महासमर ना होता तो कल्पना ही की जासकती है रावण के साम्राज्य की।
हमारे धर्म-ग्रन्थों की तस्वीर भी अलग होती। शायद धरा पर असुरों का ही राज होता। क्योंकि सारे देवी-देवताओं ने अपने वाहनों के रूप में पशु-पक्षियों को ही प्रमुखता दे रखी है। तीनों महाशक्तियों को देखिए, शिवजी के परिवार में, बैल शंकरजी का वाहन है, मां पार्वती का वाहन सिंह है, कार्तिकेयजी मोर पर सवार हैं तो गणेशजी को चूहा पसंद है। विष्णुजी का भार गरुड़जी उठाते हैं तो मां लक्ष्मी की सवारी उल्लू है। ब्रह्माजी तथा मां सरस्वती हंस पर आते-जाते हैं। इंद्र को हाथी प्यारा है तो सूर्यदेव ने सात-सात घोड़े अपने रथ में जोड़ रखे हैं। कहां तक गिनायेंगे।
दूसरी ओर बेचारे असुर पैदल ही दौड़ते भागते रह कर ही लड़ते रहते थे। कोई बड़ा ओहदेदार हुआ तो उसे स्वचालित रथ वगैरह मिल जाते थे। अब यदि आज जैसी कोई संस्था होती तो लड़ाईयां बराबरी पर लड़ी जातीं । तब देवताओं की तो बोलती बंद होती और असुरों की तूती का शोर मचा होता।

2 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

शायद आज हम राक्षसराज रावण की पूजा कर रहे होते। शर्मा जी हम आज रावण की ही तो पुजा कर रहै है, सभी राज्यो मे कितने रावाण हे दिल्ली का नाम तो लकां ही रख देना चाहिये, हम इन रावणॊ को हर पांच साल बाद अपना खुन पीने के लिये आम्त्रित करते है, यह भी तो एक रावण पुजा है, इन रावणो के आगए गिड्गिडाते है, जेसे रामलीला मेदान मे रावण का पुतला देखने जाते है, जब यह रावण भी आते है तो हम सब कितनी ऊत्सुकता से इन की एक झलक देखने के लिये तडपते है.
धन्यवाद

संजीव तिवारी ने कहा…

Satya kah rahe hai, es post ko padh kar main es chintan par bhi akagra hua. Aabhar.

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