pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

हताश-निराश युवाओं को लिंकन की जीवनी जरूर पढनी चाहिए

आज के युवा जो किसी कारणवश अपने लक्ष्य से दूर रह हताश हो बैठ जाते हैं, ज़रा सी असफलता मिलते ही तनावग्रस्त हो अपनी जान तक देने पर उतारू हो जाते है, जो समझ नहीं पाते कि एक हार से जिंदगी ख़त्म नहीं हो जाती, उन्हें एक बार अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति की जीवनी जरूर पढनी चाहिए जो एक पूर्ण कर्मयोगी थे। पर क्या हर इंसान इतना मजबूत बन सकता है ? शायद हां ! इसी  "हां " को समझाने के लिए भगवान ने इस धरा पर गीता का संदेश दिया था  …… !

#हिन्दी_ब्लागिंग                       

अब्राहम लिंकन ने गीता तो शायद नहीं पढी होगी, पर उनका जीवन पूरी तरह एक कर्म-योगी का ही रहा। वर्षों-वर्ष असफलताओं के थपेड़े खाने के बावजूद वह इंसान अपने कर्म-पथ से नहीं हटा, इतनी हताशा, इतनी निराशा, इतनी असफलताऐं तो ऋषि-मुनियों का भी मनोबल तोड़ के रख दें ! पर धन्य था वह इंसान, जिसने दुनिया के सामने एक मिसाल कायम की ! अंत में तकदीर को ही झुकना पड़ा उसके सामने।

अब्राहम लगातार 28-30 सालों तक असफल होते रहे, जिस काम में हाथ ड़ाला वहीं असफलता हाथ आई। पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। लोगों के लिए मिसाल पेश की और असफलता को कभी भी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। लगे रहे अपने कर्म को पूरा करने में, जिसका फल भी मिला, दुनिया के सर्वोच्च पद के रूप में।

अब्राहम लिंकन का जन्म 12 फरवरी 1809 को इंग्लैण्ड से आकर केंटुकी के हार्डिन काउंटी में बसे एक अश्वेत गरीब परिवार में हुआ था। उन के पिता का नाम थॉमस लिंकन तथा माता का नाम नैंसी लिंकन था। उनके पिता ने कठिन मेहनत कर अपने परिवार को संभाला था ! 

अब्राहम लिंकन अमेरिका के सोलहवें राष्ट्रपति थे। इनका कार्यकाल 1861 से 1865 तक रहा। वे रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य थे ! वे प्रथम रिपब्लिकन थे जो अमेरिका के राष्ट्रपति बने। उन्होने अमेरिका को उसके सबसे बड़े संकट गृहयुद्ध से उबारा था ! अमेरिका में दास प्रथा के अंत का श्रेय  भी लिंकन को ही जाता है। पर उनको इस पद तक पहुंचने के पहले इतनी असफलताओं का सामना करना पड़ा कि हैरानी होती है कि कैसे उन्होंने तनाव तथा अवसाद को अपने पर हावी नहीं होने दिया होगा ! 

घर की आर्थिक स्थिति संभालने के लिए 20-22 साल की आयु में उन्होंने व्यापार करने की सोची, पर कुछ ही समय में घाटे के कारण सब कुछ बंद करना पड़ा। कुछ दिन इधर-उधर हाथ-पैर मारने के बाद फिर एक बार अपना कारोबार शुरु किया पर फिर असफलता हाथ आयी। 26 साल की उम्र में जिसे चाहते थे और विवाह करने जा रहे थे, उसी लड़की की मौत हो गयी। इससे उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया ! पर फिर उन्होंने अपने आप को संभाला और स्पीकर के पद के लिए चुनाव लड़ा पर वहां भी हार का सामना करना पड़ा ! 31 साल की उम्र में फिर चुनाव में हार ने पीछा नहीं छोड़ा ! 34 साल में कांग्रेस से चुनाव जीतने पर खुशी की एक झलक मिली पर वह भी अगले चुनाव में हार की गमी में बदल गयी ! पर 46 वर्षीय जीवट से भरे इस इंसान ने तो हार नहीं मानी पर हार भी कहां उनका पीछा छोड़ रही थी ! फिर सिनेट के चुनाव में पराजय ने अपनी माला उनके गले में डाल दी ! अगले साल उपराष्ट्रपति के चुनाव के लिए खड़े हुए पर हार का भूत पीछे लगा ही रहा ! अगले दो सालों में फिर सिनेट पद की जोर आजमाईश में सफलता दूर ही खड़ी मुस्कुराती रही ! 

पर कब तक भगवान परीक्षा लेता रहता, कब तक असफलता मुंह चिढाती रहती, कब तक जीत आंख-मिचौनी खेलती रहती ! दृढ प्रतिज्ञ लिंकन के भाग्य ने पलटा खाया और 51 वर्ष की उम्र में उन्हें राष्ट्रपति के पद के लिए चुन लिया गया। ऐसा नहीं था कि वह वहां चैन की सांस ले पाते हों वहां भी लोग उनकी बुराईयां करते रहते थे ! वहां भी उनकी आलोचना होती रहती थी ! पर लिंकन ने तनाव-मुक्त रहना सीख लिया था। उन्होंने कहा था कि कोई भी व्यक्ति इतना अच्छा नहीं होता कि वह राष्ट्रपति बने, परंतु किसी ना किसी को तो राष्ट्रपति बनना ही होता है। 

तो यह तो लिंकन थे जो इतनी असफलताओं का भार उठा सके ! पर क्या हर इंसान इतना मजबूत बन सकता है ? शायद हां ! इसी 'हां' को समझाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण जी ने इस धरा पर गीता का संदेश दिया था। क्योंकि वे जानते थे कि इस ''हां'' से आम-जन को परिचित करवाने के लिए, उसकी क्षमता को सामने लाने के लिए उसे मार्गदर्शन की जरूरत पड़ेगी।

मंगलवार, 15 नवंबर 2022

हाथ से खाना, बिना छुरी-कांटे के

भारत सरकार के औपचारीक भोजों में सभी को कटलरी का उपयोग करते हुए ही भोजन करने की इजाजत है ! यदि कोई हाथ से खाना चाहे तो इसकी अनुमति नहीं है ! हो सकता है कि विदेशी मेहमानों की उपस्थिति के कारण ऐसे नियम बने हों ! पर क्या इन्हें बदला नहीं जा सकता ! यूनानी या रोम वासी खाते समय कभी कटलरी का प्रयोग नहीं करते ! दुनिया के अनेक भागों में अतिथि को ऐसा भोजन परोसना, जो छुरी से काटना, फाड़ना या छेदना पड़े, असभ्यता माना जाता है....!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

जैसे-जैसे देश के लोगों में जागरूकता बढ़ रही है वैसे वैसे हमारी संस्कृति, परंपराओं, रीती-रिवाजों की अच्छाइयां सामने आने लगी हैं। देशी-विदेशी कुचक्रों के तहत हमारे संस्कारों को उपहास का पात्र बना, पीछे धकेलने की साजिशों से भी निजात पाई जा रही है। सनातन काल से चली आ रही हमारी दिनचर्या से जुडी आदतों, काम करने के तरीकों के वैज्ञानिक, पर्यावरण तथा सेहत के अनुकूल तथा हानिरहित होने के कारण अब तथाकथित विकसित देश भी उन्हें मानने और सम्मान देने लगे हैं। पर अपने ही घर में, अपने ही कुछ लोगों को अभी भी सद्बुद्धि की जरुरत है !

शरीर और जिंदगी के लिए सबसे जरुरी चीज है, भोजन ! एक ओर जहां पश्चिमी देशों में चम्मच-कांटे से खाने का चलन है तो हमारे यहां हाथों से खाना आम बात है। इस तरीके की काफी आलोचना होती रही है। अंग्रेजियत के खुमार से ग्रसित लोग इसे पिछड़ेपन की निशानी भी करार देते रहे हैं ! उनके अनुसार इससे संक्रमण का खतरा रहता है। लेकिन अब कई अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि हाथों से खाने पर भोजन का स्वाद बढ़ जाता है ! न्यूयॉर्क की स्टीवन्स यूनिवर्सिटी में लगभग 50 लोगों पर एक प्रयोग के दौरान सब को कुछ पनीर दिया गया, जिसे आधे प्रतिभागियों को हाथ से खाना था और आधे लोगों को चम्मच से ! निष्कर्ष यह निकल कर आया कि जिन लोगों ने हाथों से चीज़ खाई थी, वे उसे बेहद ज्यादा स्वादिष्ट बता रहे थे, जबकि बाकियों के लिए वह एकऔसत स्वाद था। 

भारत में हाथ से खाने का चलन तो है लेकिन अलग-अलग प्रदेशों में कुछ नियमों के तहत कई अलिखित सावधानियां भी बरती जाती हैं ! जिनमें भोजन के पहले जूते वगैरह उतार, हाथ-पैर धोना जरुरी होता है ! उत्तर भारत में खाते हुए अंगुलियों का ही इस्तेमाल किया जाता है, यहां पूरी हथेली से खाना अच्छा नहीं माना जाता ! पर वहीं दक्षिण में हथेली और अंगुलियों दोनों का ही उपयोग आम है ! इसके अलावा खाने के लिए दाहिने हाथ का ही ज्यादातर उपयोग किया जाता है ! ये चलन लगभग पूरे देश में है। पारंपरिक खाने के अलावा बहुत कम ही चीजें हैं, जिनके लिए चम्मच का उपयोग होता है, जैसे तरल पदार्थ, दही-खीर-हलुवा या आइसक्रीम वगैरह !

वैसे दक्षिण भारत में न केवल हाथ से खाने का चलन है, बल्कि यहां केले के पत्तों पर खाना खाया जाता है। आज भी वहां बहुत से घरों समेत रेस्त्रां में भी ये एक आम बात है। नई खोजों में यह बात सामने आई है कि केले के पत्तों में पॉलीफेनॉल्स नामक प्राकृतिक एंटी-ऑक्सिडेंट के साथ-साथ एंटी-बैक्टीरियल गुण भी पाए जाते हैं जिससे कई बीमारियों से बचाव हो जाता है। इसके अलावा सबसे बड़ा फायदा है ये है कि केले के पत्ते में भोजन करने से हमारे शरीर में कोई रासायनिक तत्व नहीं जाता है ! 

आयुर्वेद के अनुसार, हमारी पांच उंगलियां पांच तत्व हैं। अंगूठे को अग्नि, तर्जनी को वायु, मध्यम उंगली को आकाश, अनामिका यानी रिंग फिंगर को पृथ्वी और छोटी उंगली को जल का प्रतिनिधि कहा जाता है। जब व्यक्ति इन पांच उंगलियों की मदद से भोजन करता है, तो ये पांचों तत्व प्रेरित हो जाते हैंऔर उनकी ऊर्जा भोजन में प्रवेश कर हमारे शरीर में पहुंच जाती है ! हाथ से भोजन करने के दौरान जो एक मुद्रा बनती है, वह भोजन को शरीर केअनुकूल और पाचन में सहायक होती है। हमारे वेदों के अनुसार, हाथ से खाने का सीधा असर चक्रों पर पड़ता है और हाथ के इस्तेमाल से खून के प्रसार में भी इजाफा होता है ! हाथ से खाना खाने के समय हमारे हाथ "टेंपरेचर सेंसर" की तरह काम करते हैं। इसलिए हम बहुत ज्यादा गर्म या ठंडे खाने से होने वाले नुक्सान से भी बच जाते हैं ! 

ज्ञातव्य है कि भारत सरकार के औपचारीक भोजों में सभी को कटलरी का उपयोग करते हुए भोजन करने की इजाजत है ! यदि कोई हाथ से खाना चाहे तो इसकी अनुमति नहीं है ! हो सकता है कि विदेशी मेहमानों की उपस्थिति के कारण ऐसे नियम बने हों ! पर क्या इन्हें बदला नहीं जा सकता ! यूनानी या रोम वासी खाते समय कभी कटलरी का प्रयोग नहीं करते ! दुनिया के अनेक भागों में अतिथि को ऐसा भोजन परोसना, जो छुरी से काटना, फाड़ना या छेदना पड़े, असभ्यता माना जाता है ! 

सबसे मुख्य बात कि हमारा भारतीय भोजन ज्यादातर हाथ से खाने वाला ही होता है ! अब मक्के-बाजरे की रोटी या गेहूं के परांठे वगैरह छुरी कांटे से तो नहीं ही खाए जा सकते ! यहां तक कि आज का अत्यधिक लोकप्रिय खाद्य पिज्जा भी हाथ से ही बेहतर तरीके से खाया जा सकता है ! यदि आमिष भोजन की बात करें तो वह भी हाथ से खाने में ज्यादा सुरक्षित रहता है ! इसलिए हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि बिना किसी  दिखावे या पूर्वाग्रह के हम जहां तक हो सके हाथों से ही भोजन ग्रहण कर उसका पूरा फायदा और आनंद ले सकें।   

मंगलवार, 1 नवंबर 2022

केदारनाथ मंदिर, हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियो, वैज्ञानिकों की विद्वता का साक्षात प्रमाण

उस समय कितना बड़ा असम्भव कार्य रहा होगा ऐसी जगह पर इतने भव्य मन्दिर को बनाना, जहां ठंड के दिनों में भारी मात्रा में बर्फ जमी रहती हो और बरसात के मौसम में बहुत तेज गति से पानी का बहाव कहर बरपाता हो ! ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में 1200 साल से भी पहले ऐसा अप्रतिम मंदिर कैसे बनाया गया होगा, वह भी उन पत्थरों से जो यहां दूर दूर तक कहीं भी उपलब्ध नहीं है ! तो उनको वहां तक कैसे लाया गया होगा ! कैसे हमारे पुरातन भारतीय विज्ञान के जानकारों ने उस शिला को, जिसका उपयोग 6 फुट ऊंचे मंच के निर्माण के लिए किया गया है, मंदिर स्थल तक पहुंचाया होगा ! ढेरों सवाल हैं, जिनका कोई जवाब नहीं है.........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

केदारनाथ मंदिर भारत के उत्तराखंड में रुद्रप्रयाग जिले में भगवान शिव का विश्वप्रसिद्ध मंदिर है। हिमालय के दुर्गम क्षेत्र में स्थित मंदिर का शिवलिंग अति प्राचीन है ! यह बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ ही चार धाम और पंच केदारों में से भी एक है ! यहाँ की विषम जलवायु और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण इसके कपाट, प्रभु दर्शनार्थ सिर्फ अप्रैल से नवंबर माह के मध्य ही खुलते हैं ! पत्‍थरों से कत्यूरी शैली में बने इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पांडवों के पौत्र महाराजा जन्मेजय ने तथा इस का जीर्णोद्धार आदि शंकराचार्य जी ने करवाया था ! इसकी आयु का कोई ऐतिहासिक प्रमाण तो उपलब्ध नहीं है पर विज्ञान के अनुसार इसका निर्माण 8वीं शताब्दी में हुआ था ! वैसे तत्कालीन विवरणों के अनुसार यह मंदिर कम से कम 1200 वर्षों से अपने अस्तित्व में है !

मंदिर एक छह फीट ऊँचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है। इसके मुख्य भाग, मण्डप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। बाहर प्रांगण में नन्दी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं। मन्दिर को तीन भागों में बांटा जा सकता है, गर्भ गृह, मध्य भाग व सभा मण्डप। गर्भ गृह के मध्य में भगवान श्री केदारेश्वर जी का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग स्थित है, जिसके अग्र भाग पर गणेश जी की आकृति और साथ ही माँ पार्वती का श्री यंत्र विद्यमान है। ज्योतिर्लिंग पर प्राकृतिक यज्ञोपवीत और इसके पृष्ठ भाग पर प्राकृतिक स्फटिक माला को आसानी से देखा जा सकता है । श्रीकेदारेश्वर ज्योतिर्लिंग में नव लिंगाकार विग्रह विद्यमान हैं, इसी कारण इस ज्योतिर्लिंग को नवलिंग केदार भी कहा जाता है।

मंदिर के बारे में जो कथा यह है कि हिमालय के केदार शृंग पर भगवान् विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने प्रकट हो उनकी प्रार्थनानुसार यहां ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित है। इस दुर्गम स्थल तक की यात्रा आज भी सबसे कठिनताम यात्राओं में से एक है, जहां किसी भी गाड़ी का पहुँचना लगभग नामुमकिन है !

इसके एक तरफ 22,000 फीट ऊंची केदारनाथ की पहाड़ी है तो दूसरी तरफ 21,600 फीट ऊंची कराचकुंड और तीसरी तरफ 22,700 फीट ऊंचा भरतकुंड है ! इन तीन पर्वतों से होकर बहने वाली पांच नदियां हैं, मंदाकिनी, मधुगंगा, चिरगंगा, सरस्वती और स्वरंदरी। इन सब का ब्यौरा हमारे पुराणों में उपलब्ध है ! केदारनाथ के संबंध में लिखा गया है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किए बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल जाती है और केदारनाथ सहित नर-नारायण-मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों का नाश कर मोक्ष की प्राप्ति करवाता है।

यह क्षेत्र मंदाकिनी नदी का एकमात्र जल-संग्रहण क्षेत्र है। यह मंदिर अपने आप में एक अद्भुत कलाकृति है ! इसे देख कर हर इंसान सोच में पड़ जाता है कि उस समय कितना बड़ा असम्भव कार्य रहा होगा ऐसी जगह पर इतने भव्य मन्दिर को बनाना, जहां ठंड के दिनों में भारी मात्रा में बर्फ जमी रहती हो और बरसात के मौसम में बहुत तेज गति से पानी का बहाव कहर बरपाता हो ! ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में 1200 साल से भी पहले ऐसा अप्रतिम मंदिर कैसे बनाया गया होगा ! जबकि 1200 साल बाद भी उस क्षेत्र में अभी भी बिना हेलिकॉप्टर से कुछ भी ले जाया जाना असंभव सा है ! मशीनों के बिना आज भी जहां एक छोटा सा ढांचा खड़ा नहीं किया जा सकता, वहीं यह मंदिर वर्षों से खड़ा है और न सिर्फ खड़ा है, बल्कि बहुत मजबूती से टिका भी हुआ है !

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ जियोलॉजी, देहरादून ने केदारनाथ मंदिर की चट्टानों पर लिग्नोमैटिक डेटिंग का परीक्षण किया, जो "पत्थरों के जीवन" की पहचान करने के लिए किया जाता है। परीक्षण से पता चला कि मंदिर 14वीं सदी से लेकर 17वीं सदी के मध्य तक पूरी तरह से बर्फ में दब गया था !आश्चर्य की बात है कि फिर भी  मंदिर के निर्माण ढांचे में कहीं कोई नुकसान नहीं हुआ ! मंदिर ने प्रकृति के हर चक्र में अपनी ताकत बनाए रख अपने को सुरक्षित रखा है ! मंदिर के इन मजबूत पत्थरों को बिना किसी सीमेंट के "एशलर" तरीके से एक साथ चिपका दिया गया है। इसलिए पत्थर के जोड़ पर तापमान परिवर्तन का किसी भी तरह का प्रभाव नहीं पड़ता जो कि मंदिर की अभेद्य ताकत व क्षमता है। 

मंदिर निर्माण की एक अनोखी बात यह भी है कि इसमें इस्तेमाल किया गया पत्थर बहुत सख्त और टिकाऊ है। इस पत्थर की विशेषता यह है कि 400 साल तक बर्फ के नीचे दबे रहने के बाद भी इसके "गुणों" में कोई अंतर नहीं आता है ! इसके साथ ही एक खास बात यह है कि ऐसा पत्थर यहां से दूर दूर तक कहीं भी उपलब्ध नहीं है ! तो उस पत्थर को वहां तक कैसे ले जाया गया होगा ! जबकि उस समय इतने बड़े पत्थरों को ढोने के लिए विशेष अपकरण भी उपलब्ध नहीं थे ! कैसे हमारे पुरातन भारतीय विज्ञान ने उस शिला को, जिसका उपयोग 6 फुट ऊंचे मंच के निर्माण के लिए किया गया है, मंदिर स्थल तक पहुंचाया होगा ! ढेरों सवाल हैं, जिनका कोई जवाब नहीं है !

साल 2013 में केदारनाथ में आई विनाशकारी बाढ़ के बारे में सभी को पता है ! इस दौरान जहां लगभग सब कुछ तबाह हो गया था, वहीं इतनी बड़ी विभीषिका के बावजूद भी केदारनाथ मंदिर का पूरा ढांचा जरा भी प्रभावित नहीं हुआ ! भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के मुताबिक, बाढ़ के बाद भी मंदिर का 99 फीसदी ढांचा पूरी तरह सुरक्षित है ! "आईआईटी मद्रास" ने भी अपने "एनडीटी परीक्षण" में इसे पूरी तरह से सुरक्षित और मजबूत पाया है ! यानी विज्ञान के अनुसार मंदिर के निर्माण में जिस पत्थर और संरचना का इस्तेमाल किया गया है, तथा जिस दिशा में इसे बनाया गया उसी की वजह से यह मंदिर इस त्रासदी से बच पाया है ! कितने आश्चर्य की बात है कि सदियों पहले कैसे उस स्थान और दिशा की खोज की गई होगी, जहां पर मंदिर अपने निर्माण के सैकड़ों साल बाद भी सुरक्षित बना रह सके ! केदारनाथ मंदिर "उत्तर-दक्षिण" दिशा के अनुरूप बनाया गया है। जबकि भारत में लगभग सभी मंदिर "पूर्व-पश्चिम" दिशा के अनुरूप हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह मंदिर "पूर्व-पश्चिम" की स्थिति में होता तो पहले ही कब का नष्ट हो चुका होता !

यह इस जगह की दैवीय शक्ति और प्रभु की कृपा ही थी कि 2013 में, मंदिर के पिछले हिस्से में दैवयोग से पहाड़ की ऊंचाइयों की तरफ से एक बड़ी चट्टान आ कर फंस गई, जिससे विकराल पानी की धार दो भागों में विभाजित हो गई ! पानी का प्रचंड वेग मंदिर के दोनों किनारों पर बने निर्माणों को तो अपने साथ लेता चला गया, लेकिन मंदिर और मंदिर में शरण लेने वाले लोग सुरक्षित रहे ! जिन्हेंअगले दिन भारतीय वायुसेना ने एयरलिफ्ट कर सुरक्षित निकाल लिया ! सवाल यह नहीं है कि आस्था पर विश्वास किया जाए या नहीं ! लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि मंदिर के निर्माण के लिए स्थल, उसकी दिशा, उसकी निर्माण सामग्री और यहां तक ​​कि प्रकृति को भी ध्यान में रख इस भव्य मंदिर का निर्माण किया गया था जो 1200 वर्षों के बाद भी अपनी संस्कृति और ताकत को बनाए रख रहा है ! 

आज हम सदा नतमस्तक हैं, अपने ऋषि-मुनियों तथा प्राचीन वैज्ञानिकों के ज्ञान पर, उनकी महानता पर, जिन्होंने वास्तुकला, मौसम विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, आयुर्वेद में इतनी महारतता हासिल कर ली थी ! जिन्होंने तमाम प्राकृतिक विपदाओं, असंख्य अड़चनों और विपरीत परिस्थियों के बावजूद इस दुर्गम स्थल पर स्थित ज्योतिर्लिग पर एक भव्य मंदिर बनाने का संकल्प पूरा किया था ! यह एक उदाहरण है हमारे उन्नत तथा उत्कर्ष वैदिक हिंदू धर्म और संस्कृति का ! हमें गर्व है कि हम भारतीय हैं ! भारतीय संस्कृति हमारी धरोहर है और उसी आस्था व विश्वास पर भारत को नाज है जिसे सम्पूर्ण विश्व अचरज से देखता है किन्तु आधिपत्य स्वीकार करने से बचता है ! पर किसी के मानने  ना मानने से क्या होता है ! सच्चाई सदा सच्चाई रहेगी ! हम सबको विश्वास है अपनी आस्था, अपनी संस्कृति, अपनी परंपराओं पर जो सदैव मजबूत व बुलंद रहेंगी ! 

@संदर्भ और चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शनिवार, 29 अक्टूबर 2022

शिव वाहन नंदी

जिस तरह गायों में कामधेनु श्रेष्ठ मानी जाती हैं वैसे ही बैलों में नंदी को श्रेष्ठ माना गया है। आम तौर पर बल और शक्ति के प्रतीक, शांत और खामोश रहने वाले बैल का चरित्र उत्तम और समर्पण भाव वाला माना जाता है। पर मोह-माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला यह प्राणी जब क्रोधित होता है तो शेर से भिड़ने में भी नहीं कतराता ! शिवजी का वाहन नंदी पुरुषार्थ अर्थात परिश्रम का साक्षात प्रतीक है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

जितने विलक्षण हमारे देवाधिदेव शिव जी हैं, उतना ही अनोखा उनका परिवार भी है ! फिर वो चाहे मूषक हो ! चाहे सिंह हो ! मयूर हो या फिर शिव जी के प्रमुख गण नंदी ही क्यों ना हो ! परिवार का हर सदस्य अपने आप में अद्वितीय है ! हो भी क्यों ना ! देवों के भी देव का सानिध्य, उनकी कृपा, उनका सदा का साथ यूं ही तो नहीं मिल जाता ! इन सब के साथ अपनी-अपनी अद्भुत कथाएं भी जुडी हुई हैं ! इनमें सब से शक्तिशाली गण नंदी जी हैं ! संस्कृत में 'नन्दि' का अर्थ प्रसन्नता या आनन्द है। नंदी को शक्ति-संपन्नता और कर्मठता का प्रतीक माना जाता है ! इनके प्रादुर्भाव की कथा भी बहुत अनोखी है !

शिवपुराण की एक कथा के अनुसार जब शिलाद मुनि ने योग और तप के लिए ब्रह्मचर्य का व्रत अपना लिया तो उनके पितर अपना वंश समाप्त होते देख चिंतित हो गए ! आपसी परामर्श के बाद, वंश वृद्धि के लिए उन्होंने शिलाद मुनि को इंद्र देव से वरदान स्वरुप पुत्र की कामना करने को कहा। अपने पितरों की आज्ञानुसार शिलाद मुनि ने संतान की कामना के लिए इंद्र देव को प्रसन्न कर ऐसे पुत्र का वरदान तो मांगा, साथ ही यह शर्त भी जोड़ दी कि वह बालक जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो। इस पर इंद्र देव ने अपनी असमर्थता जाहिर कर उन्हें भगवान शिव के पास जाने की सलाह दी। इंद्रदेव की आज्ञा के अनुसार  शिलाद मुनि ने भगवान शंकर की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने शिलाद के पुत्र के रूप में अपने अंश के प्रकट होने का वरदान दिया। इसके कुछ समय के पश्चात ही हल जोतते हुए शिलाद मुनि को धरती से एक बालक की प्राप्ति हुई, जिसे शिव जी का वरदान मान उन्होंने उसका नाम नंदी रखा।   
जब नंदी कुछ बड़े हुए तब मित्र और वरुण नाम के दो ऋषि शिलाद मुनि के आश्रम आए ! उन्होंने नंदी के अल्पायु होने की बात बताई ! इससे शिलाद चिंतित हो गए ! उनकी चिंता का कारण जान नंदी हंसने लगे और कहा कि शिव जी की कृपा से आपने मुझे प्राप्त किया था, वही मेरी रक्षा करेंगे। इसके बाद नंदी ने भुवन नदी के किनारे शिव जी की कठिन तपस्या की। उनकी कठोर तपस्या और भक्तिभाव से प्रभु द्रवित हो गए और वर मांगने को कहा ! नंदी ने उम्र भर उनके सानिध्य में रहने की इच्छा जाहिर की। उनके समर्पण से शिवजी प्रसन्न हुए और उन्होंने नंदी जी को मृत्यु भय के साथ ही अन्य विभीषिकाओं से भी मुक्ति प्रदान कर माता पार्वती की सम्मति से गणों के अधिपति के रूप में अभिषेक कर नंदीश्वर का पद प्रदान कर उन्हें अपना वाहन और कैलाश पर अपने निवास का द्वारपाल नियुक्त कर दिया। 


एक बार शिव पार्वती के विहार के समय ऋषि भृगु उनके दर्शन करने आए तो नंदी जी ने बिना उनके क्रोध से डरे, निर्विकार रूप से उन्हें बाहर ही रोक दिया क्योंकि शिव-पार्वती जी की ऐसी ही आज्ञा थी। इससे ऋषि भृगु भी उनसे काफी प्रभावित हो गए ! इसी तरह जब रावण अपने अहम के चलते कैलाश पर्वत को उठाने की हिमाकत की थी तब भी नंदी ने क्रुद्ध होकर रावण को ऐसा जकड़ा कि लाख कोशिशों के बावजूद वह छूट नहीं पाया ! उसे मुक्ति तभी मिली जब उसने शिव जी की आराधना कर नंदी जी से क्षमा मांग अपनी गलती स्वीकार कर ली ! एक और कथा के अनुसार जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ था, उस वक्त भगवान शिव ने हलाहल विष पीकर इस संसार को बचाया था ! उस समय विष की कुछ बूंदे जमीन पर गिर गई थीं, जिसे नंदी ने बिना अपनी  परवाह किए जगत की रक्षा हेतु जीभ चाट लिया था ! नंदी का ये समर्पण देखकर भगवान शिव ने उन्हें अपने सबसे बड़े भक्त की उपाधि दी और ये आशीर्वाद दिया कि उनके दर्शन से पहले लोग नंदी के दर्शन करेंगे। 
                                           
कुछ समय पश्चात नंदी जी का विवाह मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ सम्पन्न करवा दिया गया ! उसी समय भगवान शिव ने उनको वरदान दिया कि जहां भी नंदी का निवास होगा, उसी स्थान पर मैं भी निवास करूंगा ! यही कारण है कि हर शिव मंदिर में नंदी की स्थापना की जाती है। जहां भी देवों के देव महादेव पूजे जाते हैं या उनका मंदिर होता है वहां नंदी का होना अवश्यम्भावी है। शिव की मूर्ति के सामने या मंदिर के बाहर शिव के वाहन नंदी की मूर्ति सदैव स्थापित होती है, जिसके नेत्र सदैव अपने इष्ट को देखते हुए उनका स्मरण करते रहते हैं। जिसका अर्थ है कि भक्ति के लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्राणी को क्रोध, अहम, दुर्गुणों को पराजित करने का सामर्थ्य होना चाहिए। नंदी पवित्रता, विवेक, बुद्धि और ज्ञान के प्रतीक माने जाते हैं।


जिस तरह गायों में कामधेनु श्रेष्ठ मानी जाती हैं वैसे ही बैलों में नंदी को श्रेष्ठ माना गया है। आम तौर पर बल और शक्ति के प्रतीक, शांत और खामोश रहने वाले बैल का चरित्र उत्तम और समर्पण भाव वाला माना जाता है। पर मोह-माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला यह प्राणी जब क्रोधित होता है तो शेर से भिड़ने में भी नहीं कतराता ! शिवजी का वाहन नंदी पुरुषार्थ अर्थात परिश्रम का साक्षात प्रतीक है।

नंदी जी का इस जगत को एक संदेश यह भी है कि जिस तरह वह भगवान शिव के वाहन है। ठीक उसी तरह हमारा शरीर आत्मा का वाहन है। जैसे नंदी की दृष्टि शिव की ओर होती है, उसी तरह हमारी दृष्टि भी आत्मा की ओर ही होनी चाहिए। हर व्यक्ति को अपने दोषों को देखना चाहिए। हमेशा दूसरों के लिए अच्छी भावना रखनी चाहिए ! तभी जीवन की सार्थकता है। 

@संदर्भ तथा चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2022

मरतबान, बरनी या इमर्तवान

मर्तबान, मृद्भांडों के परिवार का सदस्य है। जिसका एक भाई-बंद भांड या कुल्हड़ कहलाता है ! भांड शब्द आजकल बहुत कम सुनाई पड़ता है ! जबकि गाँवों-कस्बों की भाषा अभी भी इसका चलन है। बंगाल जैसे प्रांत में अभी भी चाय वगैरह के कुल्हड़ों को भांड ही कहा जाता है ! चीनी मिटटी की बनी चाय की केतलियों की याद तो अभी भी बहुत से लोग भूले नहीं होंगे ! मिट्टी इत्यादि से बने ऐसे बर्तन पर्यावरण के साथ-साथ मानवोपयोगी भी होते हैं ! इनमें रखी वस्तुएं ना जल्दी खराब होती हैं नाहीं उनमें कोई रासायनिक परिवर्तन होता है ! इसके अलावा मिट्टी की एक अलग तासीर सी भी इनमें शामिल हो जाती है ..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

मरतबान, मर्तबान, बरनी या इमर्तवान ! अचार, घी, आदि रखने का चीनी मिट्टी या सादी मिट्टी आदि का चौड़े मुँह एवं हत्थे या बिना हत्थे का ढक्कनदार रोगन किया हुआ बर्तन ! किसी समय यह हर रसोई का एक अहम हिस्सा हुआ करता था ! बदलते फैशन और पश्चिम के अंधानुकरण से भले ही यह शहरी रसोइयों से दूर हो गया हो पर गांव-देहात या कस्बों में इसका प्रचलन बदस्तूर जारी रहा। होम्योपैथी, आयुर्वेद तथा यूनानी हकीमों के यहां आज भी भूरे और सफ़ेद रंग के मर्तबान या बरनियों को उपयोग में आता देखा जा सकता है। वैसे इस बहुपयोगी पात्र ने फिर वापसी की है और इस बार ज्यादा तड़क-भड़क, रंग-बिरंगे, चटकीले, आकर्षक और शिल्पयुक्त विभिन्न आकारों और आकृतियों में अवतरित हो, घरों की साज-सज्जा में चार चाँद लगा रहा है ! आजकल आधे फुट से लेकर चार-पाँच फुट तक के सजावट के काम आने वाले विभिन्न आकार के इन मर्तबानों का प्रयोग गुलदस्ते की तरह भी किया जा रहा है, जिनमें सजे फूलों से इनकी सुंदरता और भी बढ़ जाती है। 



मर्तबान नगर, भारत की पूर्वी सीमा से सटे हुए बर्मा राज्य के पेगू प्रदेश के इस शहर में बहुत पहले से चीनी मिट्टी के पात्र बनाए जाते रहे थे, जहां से इनका निर्यात होता था। इस नगर के नाम पर ही इन पात्रों को विदेश में 'मर्तबान' कहा जाने लगा । माले, चीन, तिब्बत, जापान, कोरिआ और ओमान जैसी जगहों में भी इनको बनाने का चलन रहा है। मध्य काल में भारत में ये उपलब्ध होने लग गए थे। विदेशी यात्री इब्नबतूता ने अपनी भारत यात्रा के विवरण में इनका वर्णन किया है। मर्तबान शब्द को यूँ तो अरबी मूल का माना जाता है और इसकी व्युत्पत्ति "मथाबान" से बताई जाती है !      


मर्तबानमृद्भांडों के परिवार का सदस्य है। जिसका एक भाई-बंद भांड या कुल्हड़ कहलाता है ! भांड शब्द आजकल बहुत कम सुनाई पड़ता है ! जबकि गाँवों-कस्बों की भाषा अभी भी इसका चलन है। बंगाल जैसे प्रांत में अभी भी चाय वगैरह के कुल्हड़ों को भांड ही कहा जाता है ! चीनी मिटटी की बनी चाय की केतलियों की याद तो अभी भी बहुत से लोग भूले नहीं होंगे ! मिट्टी इत्यादि से बने ऐसे बर्तन पर्यावरण के साथ-साथ मानवोपयोगी भी होते हैं ! इनमें रखी वस्तुएं ना जल्दी खराब होती हैं नाहीं उनमें कोई रासायनिक परिवर्तन होता है ! इसके अलावा मिट्टी की एक अलग तासीर सी भी इनमें शामिल हो जाती है ! वर्षों पहले जब आधुनिक मशीनें नहीं थीं तब से गृहणियां इन्हीं बर्तनों में अचार-मुरब्बा-घी वगैरह सुरक्षित रखती आ रही हैं।
                                


समय के साथ-साथ हमारे यहां अब इनका प्रयोग विदेश टोटके, फेंग्शुई जैसी विधाओं में भी होने लगा है ! उसके अनुसार पीले और लाल रंग के मर्तबान सबसे प्रभावशाली होते हैं और इनका सही उपयोग घर व कार्यालय में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने, आपसी संबंधों को मधुर बनाने तथा सुख-शान्ति के लिए प्रभावशाली साबित होता है। प्राचीन चीनी वास्तुकला में भी ये अत्यंत उपयोगी माने जाते रहे हैं। जरूरत है सिर्फ सही चयन और उनके उचित उपयोग की।

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022

कोलकाता की रसगुल्ले वाली चाय

कुछ सालों पहले एक उद्यमी ने सौ विभिन्न स्वादों में रसगुल्ले बनाए थे ! उत्सुकतावश कुछ दिन तो बहुत हो-हल्ला रहा फिर धीरे-धीरे उनके प्रति लोगों का रुझान कम होता चला गया ! कुछ लोग समोसे में आलू की जगह मटर, चने, काजू इत्यादि का इस्तेमाल करते हैं पर जो सनातन बात आलू भरे समोसे की होती है वह दूसरी चीजों से नहीं बन पाती ! वही बात रसगुल्ले की भी है ! जो बात कोमल, मुलायम, दूधिया रसगुल्ले के स्वाद में है वह और कहाँ..........!

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जितनी विविधता हमारे रहन-सहन में है उतनी ही हमारे खान-पान में भी है ! वैसे तो आज हर चीज हर जगह उपलब्ध है फिर भी किसी-किसी व्यंजन विशेष का अपने प्रदेश में स्वाद कुछ और ही होता है ! इस खासियत को बचाए रखने के साथ-साथ उसमें और भी बढ़ोत्तरी के लिए खान-पान की दुनिया में तरह-तरह के प्रयोग चलते ही रहते हैं ! जिससे भोजन प्रेमियों को कुछ और नया जायका या स्वाद मिल सके ! इन्हीं प्रयोगों के चलते कभी-कभी अचानक कुछ ऐसा बन जाता है जिसकी विशेषता व नवीनता उसे रातोंरात भोजन प्रेमियों का चहेता बना देती है ! जैसा वर्षों पहले रसगुल्ले की ईजाद पर हुआ था ! कभी कभी खाद्य निर्माता पुरानी चीजों के साथ भी प्रयोग करते रहते हैं जो कमोबेश लोकप्रिय भी हो जाती हैं ! उदाहरण स्वरूप समोसे को लिया जा सकता है जिसमें आलू की जगह तरह-तरह की अन्य सामग्रियों को भर उसे नया स्वाद देने की कोशिश की जाती रहती है ! 
इसी संदर्भ में, आजकल कोलकाता में रसगुल्ले वाली चाय ''वायरल'' हो रही है ! हालांकि दोनों का कोई मेल नहीं है फिर भी जो चल जाए वही सफल ! यह अलग बात है कि ऐसे प्रयोग धूमकेतु ही सिद्ध होते हैं फिर भी जब तक हैं, तो हैं ! अब बात आती है कि इसकी ईजाद कैसे हुई ! तो एक बंगाली भद्रलोक, जिनकी अपनी एक अच्छी-खासी चाय की दूकान कोलकाता के साउथ सिटी मॉल के पास है, कहीं जा रहे थे तो एक जगह गर्मागर्म रसगुल्ले बनते देखे ! ज्ञातव्य है कि रसगुल्ला गर्म और ठंडा दोनों स्थितियों में स्वादिष्ट लगता है ! तो वे सज्जन अपने को रोक नहीं सके और रसगुल्ले का सेवन करते हुए चाय भी ले ली  ! टेस्ट अच्छा लगा,  तभी उनके दिमाग में इस ''फ्युजन'' का विचार आया ! दूसरे दिन अपनी दूकान में उन्होंने अपने मित्रों को अपना आयडिआ पेश किया जो ''वायरल'' हो गया ! बंगाल के भद्र लोगों का प्यार रसगुल्ला और चाय ! एक साथ !
कुछ एक उत्पादों को छोड़ दिया जाए, जैसे राजभोग, तो इस तरह के प्रयोग मूल वस्तु के सामने ज्यादा दिन नहीं टिकते ! कुछ सालों पहले एक उद्यमी ने सौ विभिन्न स्वादों में रसगुल्ले बनाए थे ! भले आदमी ने एक में तो मिर्ची का स्वाद भी डाल दिया था ! उत्सुकतावश कुछ दिन तो बहुत हो-हल्ला रहा फिर धीरे-धीरे उनके प्रति लोगों का रुझान कम होता चला गया ! कुछ लोग समोसे में आलू की जगह मटर, चने, काजू इत्यादि का इस्तेमाल करते हैं पर जो सनातन बात आलू भरे समोसे की होती है वह दूसरी चीजों से नहीं बन पाती ! वही बात रसगुल्ले की भी है ! जो बात कोमल, मुलायम, दूधिया रसगुल्ले के स्वर्गिक स्वाद में है, वह और कहाँ ! फिर भी स्वाद बदलने के लिए कुछ दिन, कुछ और सही !  

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

बाबिया, एक शाकाहारी मगरमच्छ

मंदिर के पदाधिकारियों के अनुसार वर्षों पहले भी इस झील में एक मगरमच्छ रहता था।  जिसे बाबिया कह कर पुकारा जाता था। 1942 में उसे एक ब्रिटिश अधिकारी मार कर अपने साथ ले गया था ! पर कुछ ही दिनों बाद उसकी सांप के काटने से मौत हो गयी थी ! इस घटना के बाद आश्चर्यजनक रूप से झील में एक और मादा मगर दिखाई पड़ने लगी ! भक्तों ने उसका नाम भी बाबिया रख दिया ! वह यही बाबिया थी, जिसने भक्तों तथा मंदिर द्वारा प्रदत्त प्रसाद पर ही अपनी तक़रीबन दो तिहाई जिंदगी  गुजार दी ! पर जाते-जाते भी वह यह संदेश दे गई कि कदाचार से सदाचार, आचरण बदलते ही जीव वंदनीय हो जाता है ...........!

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मगरमच्छ, वह भी शाकाहारी ! सहसा विश्वास ही नहीं होता ! यह ठीक वैसा ही लगता है जैसे कोई कहे कि शेर घास खा कर जिंदा है ! ज्यादातर पानी में रहने वाले, इस डरावने उभयचर का नाम सुनते ही डर से रोंगटे खड़े हो जाते हैं ! जिस प्राणी से पानी में शेर और हाथी जैसे ताकतवर जानवर भी सामना करने से कतराएं ! जिसके खूंखार दांत एक झटके में किसी के भी टुकड़े-टुकड़े कर सकने में सक्षम हों ! जो पानी में रहने वाले जीवों का काल हो ! वह शाकाहारी .....! पर हमारा संसार भरा पड़ा है, विस्मित करने वाले  आश्चर्यजनक, अविश्वसनीय, हैरतंगेज कारनामों से ! इस जगत में क्या कुछ नहीं हो सकता !

बाबिया 

केरल के कासरगोड जिले के माजेश्वरम नामक स्थान में  स्थित आनंदपद्मनाभ स्वामी मंदिर ! ऐसी मान्यता है कि पद्मनाभस्वामी जी का पूजास्थल तिरुवंतपुरम में जरूर है पर उनका मूलस्थान यह मंदिर है। इसी की एक गुफा में प्रभु अंतर्ध्यान हुए थे ! इसी की झील में एक मादा मगरमच्छ रहा करती थी, नाम था बाबिया ! लोक मत है कि बाबिया इस मंदिर और इसकी गुफा की रखवाली  पिछले सत्तर साल से करती आ रही थी। मंदिर प्रशासन के अनुसार वह पूर्णतया शाकाहारी थी और सिर्फ मंदिर का प्रसाद ही खाती थी। यहां तक कि उसने झील में रहने वाले किसी अन्य प्राणी को किसी भी तरह का कभी भी कोई नुकसान नहीं पहुंचाया ! इतने सालों में किसी ने भी उसे मछली तक खाते नहीं देखा ! 

आनंदपद्मनाभ मंदिरऔर झील 

प्रसाद ग्रहण

अद्भुत 
मंदिर के पदाधिकारियों के अनुसार वर्षों पहले भी इस झील में एक मगरमच्छ रहता था।  जिसे बाबिया कह कर पुकारा जाता था। 1942 में उसे एक ब्रिटिश अधिकारी मार कर अपने साथ ले गया था ! पर कुछ ही दिनों बाद उस अधिकारी की सांप के काटने से मौत हो गयी थी ! इस घटना के बाद आश्चर्यजनक रूप से झील में फिर एक मादा मगर दिखाई पड़ने लगी ! भक्तों ने उसका नाम भी बाबिया रख दिया ! यह वही बाबिया थी, जिसने भक्तों तथा मंदिर द्वारा प्रदत्त प्रसाद पर ही अपनी तकरीबन दो तिहाई जिंदगी  गुजार दी ! प्रत्यक्ष दर्शियों के अनुसार सुबह और शाम की पूजा के बाद आरतियों की घंटियों के साथ ही वह भोजन ग्रहण करने के लिए झील के किनारे आ जाती थी, पर कभी भी उसने किसी को नुक्सान तो दूर की बात डराने तक की कोशिश नहीं की ! यही कारण है कि उसको देखने के लिए लोगों की भीड़ लगी रहती थी ! अब तो यह माना जाने लगा था कि उसकी एक झलक देखे बिना इस मंदिर की यात्रा अधूरी है ! 


उमड़ते लोग 
मंदिर प्रशासन के अनुसार करीब अस्सी साल की बाबिया की पोस्ट-मॉर्टम रिपोर्ट में उसकी मौत बढ़ती उम्र से संबंधित कारणों से हुई बताई गई है। इधर कुछ समय से वह बीमार चल रही थी और  09 अक्टूबर 2022, रविवार को उसकी इहलीला समाप्त हो गई ! पर जाते-जाते भी वह यह संदेश दे गई कि कदाचार से सदाचार, आचरण बदलते ही जीव वंदनीय हो जाता है ! कुछ ही समय में उसकी मौत की खबर चारों ओर फैल गई ! लाखों लोगों का हुजूम मंदिर की ओर उमड़ पड़ा ! मंदिर प्रशासन ने उस दिन मंदिर बंद रख उसके मृत शरीर को फ्रीजर में रखवा दिया, जिससे लोग उसके अंतिम दर्शन कर सकें ! दो दिन बाद पूरे विधि-विधान से उसका दाह संस्कार किया गया और मंदिर की बाहरी दिवार के साथ उसकी समाधि बना दी गई ! जहां बाद में उसका स्मारक बनाने पर भी विचार चल रहा है ! इसके साथ ही लोगों का विश्वास है मंदिर की रखवाली के लिए बाबिया की जगह कोई और जरूर आएगा, जैसे बाबिया आई थी ! 

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