pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2022

मरतबान, बरनी या इमर्तवान

मर्तबान, मृद्भांडों के परिवार का सदस्य है। जिसका एक भाई-बंद भांड या कुल्हड़ कहलाता है ! भांड शब्द आजकल बहुत कम सुनाई पड़ता है ! जबकि गाँवों-कस्बों की भाषा अभी भी इसका चलन है। बंगाल जैसे प्रांत में अभी भी चाय वगैरह के कुल्हड़ों को भांड ही कहा जाता है ! चीनी मिटटी की बनी चाय की केतलियों की याद तो अभी भी बहुत से लोग भूले नहीं होंगे ! मिट्टी इत्यादि से बने ऐसे बर्तन पर्यावरण के साथ-साथ मानवोपयोगी भी होते हैं ! इनमें रखी वस्तुएं ना जल्दी खराब होती हैं नाहीं उनमें कोई रासायनिक परिवर्तन होता है ! इसके अलावा मिट्टी की एक अलग तासीर सी भी इनमें शामिल हो जाती है ..............!

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मरतबान, मर्तबान, बरनी या इमर्तवान ! अचार, घी, आदि रखने का चीनी मिट्टी या सादी मिट्टी आदि का चौड़े मुँह एवं हत्थे या बिना हत्थे का ढक्कनदार रोगन किया हुआ बर्तन ! किसी समय यह हर रसोई का एक अहम हिस्सा हुआ करता था ! बदलते फैशन और पश्चिम के अंधानुकरण से भले ही यह शहरी रसोइयों से दूर हो गया हो पर गांव-देहात या कस्बों में इसका प्रचलन बदस्तूर जारी रहा। होम्योपैथी, आयुर्वेद तथा यूनानी हकीमों के यहां आज भी भूरे और सफ़ेद रंग के मर्तबान या बरनियों को उपयोग में आता देखा जा सकता है। वैसे इस बहुपयोगी पात्र ने फिर वापसी की है और इस बार ज्यादा तड़क-भड़क, रंग-बिरंगे, चटकीले, आकर्षक और शिल्पयुक्त विभिन्न आकारों और आकृतियों में अवतरित हो, घरों की साज-सज्जा में चार चाँद लगा रहा है ! आजकल आधे फुट से लेकर चार-पाँच फुट तक के सजावट के काम आने वाले विभिन्न आकार के इन मर्तबानों का प्रयोग गुलदस्ते की तरह भी किया जा रहा है, जिनमें सजे फूलों से इनकी सुंदरता और भी बढ़ जाती है। 



मर्तबान नगर, भारत की पूर्वी सीमा से सटे हुए बर्मा राज्य के पेगू प्रदेश के इस शहर में बहुत पहले से चीनी मिट्टी के पात्र बनाए जाते रहे थे, जहां से इनका निर्यात होता था। इस नगर के नाम पर ही इन पात्रों को विदेश में 'मर्तबान' कहा जाने लगा । माले, चीन, तिब्बत, जापान, कोरिआ और ओमान जैसी जगहों में भी इनको बनाने का चलन रहा है। मध्य काल में भारत में ये उपलब्ध होने लग गए थे। विदेशी यात्री इब्नबतूता ने अपनी भारत यात्रा के विवरण में इनका वर्णन किया है। मर्तबान शब्द को यूँ तो अरबी मूल का माना जाता है और इसकी व्युत्पत्ति "मथाबान" से बताई जाती है !      


मर्तबानमृद्भांडों के परिवार का सदस्य है। जिसका एक भाई-बंद भांड या कुल्हड़ कहलाता है ! भांड शब्द आजकल बहुत कम सुनाई पड़ता है ! जबकि गाँवों-कस्बों की भाषा अभी भी इसका चलन है। बंगाल जैसे प्रांत में अभी भी चाय वगैरह के कुल्हड़ों को भांड ही कहा जाता है ! चीनी मिटटी की बनी चाय की केतलियों की याद तो अभी भी बहुत से लोग भूले नहीं होंगे ! मिट्टी इत्यादि से बने ऐसे बर्तन पर्यावरण के साथ-साथ मानवोपयोगी भी होते हैं ! इनमें रखी वस्तुएं ना जल्दी खराब होती हैं नाहीं उनमें कोई रासायनिक परिवर्तन होता है ! इसके अलावा मिट्टी की एक अलग तासीर सी भी इनमें शामिल हो जाती है ! वर्षों पहले जब आधुनिक मशीनें नहीं थीं तब से गृहणियां इन्हीं बर्तनों में अचार-मुरब्बा-घी वगैरह सुरक्षित रखती आ रही हैं।
                                


समय के साथ-साथ हमारे यहां अब इनका प्रयोग विदेश टोटके, फेंग्शुई जैसी विधाओं में भी होने लगा है ! उसके अनुसार पीले और लाल रंग के मर्तबान सबसे प्रभावशाली होते हैं और इनका सही उपयोग घर व कार्यालय में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने, आपसी संबंधों को मधुर बनाने तथा सुख-शान्ति के लिए प्रभावशाली साबित होता है। प्राचीन चीनी वास्तुकला में भी ये अत्यंत उपयोगी माने जाते रहे हैं। जरूरत है सिर्फ सही चयन और उनके उचित उपयोग की।

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022

कोलकाता की रसगुल्ले वाली चाय

कुछ सालों पहले एक उद्यमी ने सौ विभिन्न स्वादों में रसगुल्ले बनाए थे ! उत्सुकतावश कुछ दिन तो बहुत हो-हल्ला रहा फिर धीरे-धीरे उनके प्रति लोगों का रुझान कम होता चला गया ! कुछ लोग समोसे में आलू की जगह मटर, चने, काजू इत्यादि का इस्तेमाल करते हैं पर जो सनातन बात आलू भरे समोसे की होती है वह दूसरी चीजों से नहीं बन पाती ! वही बात रसगुल्ले की भी है ! जो बात कोमल, मुलायम, दूधिया रसगुल्ले के स्वाद में है वह और कहाँ..........!

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जितनी विविधता हमारे रहन-सहन में है उतनी ही हमारे खान-पान में भी है ! वैसे तो आज हर चीज हर जगह उपलब्ध है फिर भी किसी-किसी व्यंजन विशेष का अपने प्रदेश में स्वाद कुछ और ही होता है ! इस खासियत को बचाए रखने के साथ-साथ उसमें और भी बढ़ोत्तरी के लिए खान-पान की दुनिया में तरह-तरह के प्रयोग चलते ही रहते हैं ! जिससे भोजन प्रेमियों को कुछ और नया जायका या स्वाद मिल सके ! इन्हीं प्रयोगों के चलते कभी-कभी अचानक कुछ ऐसा बन जाता है जिसकी विशेषता व नवीनता उसे रातोंरात भोजन प्रेमियों का चहेता बना देती है ! जैसा वर्षों पहले रसगुल्ले की ईजाद पर हुआ था ! कभी कभी खाद्य निर्माता पुरानी चीजों के साथ भी प्रयोग करते रहते हैं जो कमोबेश लोकप्रिय भी हो जाती हैं ! उदाहरण स्वरूप समोसे को लिया जा सकता है जिसमें आलू की जगह तरह-तरह की अन्य सामग्रियों को भर उसे नया स्वाद देने की कोशिश की जाती रहती है ! 
इसी संदर्भ में, आजकल कोलकाता में रसगुल्ले वाली चाय ''वायरल'' हो रही है ! हालांकि दोनों का कोई मेल नहीं है फिर भी जो चल जाए वही सफल ! यह अलग बात है कि ऐसे प्रयोग धूमकेतु ही सिद्ध होते हैं फिर भी जब तक हैं, तो हैं ! अब बात आती है कि इसकी ईजाद कैसे हुई ! तो एक बंगाली भद्रलोक, जिनकी अपनी एक अच्छी-खासी चाय की दूकान कोलकाता के साउथ सिटी मॉल के पास है, कहीं जा रहे थे तो एक जगह गर्मागर्म रसगुल्ले बनते देखे ! ज्ञातव्य है कि रसगुल्ला गर्म और ठंडा दोनों स्थितियों में स्वादिष्ट लगता है ! तो वे सज्जन अपने को रोक नहीं सके और रसगुल्ले का सेवन करते हुए चाय भी ले ली  ! टेस्ट अच्छा लगा,  तभी उनके दिमाग में इस ''फ्युजन'' का विचार आया ! दूसरे दिन अपनी दूकान में उन्होंने अपने मित्रों को अपना आयडिआ पेश किया जो ''वायरल'' हो गया ! बंगाल के भद्र लोगों का प्यार रसगुल्ला और चाय ! एक साथ !
कुछ एक उत्पादों को छोड़ दिया जाए, जैसे राजभोग, तो इस तरह के प्रयोग मूल वस्तु के सामने ज्यादा दिन नहीं टिकते ! कुछ सालों पहले एक उद्यमी ने सौ विभिन्न स्वादों में रसगुल्ले बनाए थे ! भले आदमी ने एक में तो मिर्ची का स्वाद भी डाल दिया था ! उत्सुकतावश कुछ दिन तो बहुत हो-हल्ला रहा फिर धीरे-धीरे उनके प्रति लोगों का रुझान कम होता चला गया ! कुछ लोग समोसे में आलू की जगह मटर, चने, काजू इत्यादि का इस्तेमाल करते हैं पर जो सनातन बात आलू भरे समोसे की होती है वह दूसरी चीजों से नहीं बन पाती ! वही बात रसगुल्ले की भी है ! जो बात कोमल, मुलायम, दूधिया रसगुल्ले के स्वर्गिक स्वाद में है, वह और कहाँ ! फिर भी स्वाद बदलने के लिए कुछ दिन, कुछ और सही !  

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

बाबिया, एक शाकाहारी मगरमच्छ

मंदिर के पदाधिकारियों के अनुसार वर्षों पहले भी इस झील में एक मगरमच्छ रहता था।  जिसे बाबिया कह कर पुकारा जाता था। 1942 में उसे एक ब्रिटिश अधिकारी मार कर अपने साथ ले गया था ! पर कुछ ही दिनों बाद उसकी सांप के काटने से मौत हो गयी थी ! इस घटना के बाद आश्चर्यजनक रूप से झील में एक और मादा मगर दिखाई पड़ने लगी ! भक्तों ने उसका नाम भी बाबिया रख दिया ! वह यही बाबिया थी, जिसने भक्तों तथा मंदिर द्वारा प्रदत्त प्रसाद पर ही अपनी तक़रीबन दो तिहाई जिंदगी  गुजार दी ! पर जाते-जाते भी वह यह संदेश दे गई कि कदाचार से सदाचार, आचरण बदलते ही जीव वंदनीय हो जाता है ...........!

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मगरमच्छ, वह भी शाकाहारी ! सहसा विश्वास ही नहीं होता ! यह ठीक वैसा ही लगता है जैसे कोई कहे कि शेर घास खा कर जिंदा है ! ज्यादातर पानी में रहने वाले, इस डरावने उभयचर का नाम सुनते ही डर से रोंगटे खड़े हो जाते हैं ! जिस प्राणी से पानी में शेर और हाथी जैसे ताकतवर जानवर भी सामना करने से कतराएं ! जिसके खूंखार दांत एक झटके में किसी के भी टुकड़े-टुकड़े कर सकने में सक्षम हों ! जो पानी में रहने वाले जीवों का काल हो ! वह शाकाहारी .....! पर हमारा संसार भरा पड़ा है, विस्मित करने वाले  आश्चर्यजनक, अविश्वसनीय, हैरतंगेज कारनामों से ! इस जगत में क्या कुछ नहीं हो सकता !

बाबिया 

केरल के कासरगोड जिले के माजेश्वरम नामक स्थान में  स्थित आनंदपद्मनाभ स्वामी मंदिर ! ऐसी मान्यता है कि पद्मनाभस्वामी जी का पूजास्थल तिरुवंतपुरम में जरूर है पर उनका मूलस्थान यह मंदिर है। इसी की एक गुफा में प्रभु अंतर्ध्यान हुए थे ! इसी की झील में एक मादा मगरमच्छ रहा करती थी, नाम था बाबिया ! लोक मत है कि बाबिया इस मंदिर और इसकी गुफा की रखवाली  पिछले सत्तर साल से करती आ रही थी। मंदिर प्रशासन के अनुसार वह पूर्णतया शाकाहारी थी और सिर्फ मंदिर का प्रसाद ही खाती थी। यहां तक कि उसने झील में रहने वाले किसी अन्य प्राणी को किसी भी तरह का कभी भी कोई नुकसान नहीं पहुंचाया ! इतने सालों में किसी ने भी उसे मछली तक खाते नहीं देखा ! 

आनंदपद्मनाभ मंदिरऔर झील 

प्रसाद ग्रहण

अद्भुत 
मंदिर के पदाधिकारियों के अनुसार वर्षों पहले भी इस झील में एक मगरमच्छ रहता था।  जिसे बाबिया कह कर पुकारा जाता था। 1942 में उसे एक ब्रिटिश अधिकारी मार कर अपने साथ ले गया था ! पर कुछ ही दिनों बाद उस अधिकारी की सांप के काटने से मौत हो गयी थी ! इस घटना के बाद आश्चर्यजनक रूप से झील में फिर एक मादा मगर दिखाई पड़ने लगी ! भक्तों ने उसका नाम भी बाबिया रख दिया ! यह वही बाबिया थी, जिसने भक्तों तथा मंदिर द्वारा प्रदत्त प्रसाद पर ही अपनी तकरीबन दो तिहाई जिंदगी  गुजार दी ! प्रत्यक्ष दर्शियों के अनुसार सुबह और शाम की पूजा के बाद आरतियों की घंटियों के साथ ही वह भोजन ग्रहण करने के लिए झील के किनारे आ जाती थी, पर कभी भी उसने किसी को नुक्सान तो दूर की बात डराने तक की कोशिश नहीं की ! यही कारण है कि उसको देखने के लिए लोगों की भीड़ लगी रहती थी ! अब तो यह माना जाने लगा था कि उसकी एक झलक देखे बिना इस मंदिर की यात्रा अधूरी है ! 


उमड़ते लोग 
मंदिर प्रशासन के अनुसार करीब अस्सी साल की बाबिया की पोस्ट-मॉर्टम रिपोर्ट में उसकी मौत बढ़ती उम्र से संबंधित कारणों से हुई बताई गई है। इधर कुछ समय से वह बीमार चल रही थी और  09 अक्टूबर 2022, रविवार को उसकी इहलीला समाप्त हो गई ! पर जाते-जाते भी वह यह संदेश दे गई कि कदाचार से सदाचार, आचरण बदलते ही जीव वंदनीय हो जाता है ! कुछ ही समय में उसकी मौत की खबर चारों ओर फैल गई ! लाखों लोगों का हुजूम मंदिर की ओर उमड़ पड़ा ! मंदिर प्रशासन ने उस दिन मंदिर बंद रख उसके मृत शरीर को फ्रीजर में रखवा दिया, जिससे लोग उसके अंतिम दर्शन कर सकें ! दो दिन बाद पूरे विधि-विधान से उसका दाह संस्कार किया गया और मंदिर की बाहरी दिवार के साथ उसकी समाधि बना दी गई ! जहां बाद में उसका स्मारक बनाने पर भी विचार चल रहा है ! इसके साथ ही लोगों का विश्वास है मंदिर की रखवाली के लिए बाबिया की जगह कोई और जरूर आएगा, जैसे बाबिया आई थी ! 

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2022

लेपाक्षी मंदिर का हवा में झूलता खंबा

कुर्मासेलम की पहाडियों पर बना कछुए के आकार का यह पूजास्थल पुरातन काल से अपने खंभों की विशेषता के कारण आज तक लोगों की उत्सुकता का व‍िषय बना हुआ है। बड़े अचंभे की बात है कि 70 खंभों पर बने इस मंदिर का एक खंभा जमीन को छूता ही नहीं है बल्कि उससे करीब आधा इंच ऊपर हवा में झूलता रहता है। यही वजह है कि इस मंदिर को हैंगिंग टेंपल के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर के ये अनोखे खंभे आकाश स्तंभ के नाम से भी जाने जाते हैं...........!

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हमारा देश में धर्म की अपनी महत्ता है ! सो यहां मंदिरों को तो होना ही है ! वह भी इतने कि गिनती कम पड़ जाए ! उस पर ऐसी कलात्मकता, विशालता, भव्यता कि देखने वाले को अपनी ही आँखों पर विश्वास ना हो ! कुछ की कारीगरी ऐसी है कि यकीन ही नहीं होता कि ये इंसानों के द्वारा बनाए गए होंगे ! कुछ इतने दुर्गम कि वहां पहुँचने में अच्छे-अच्छे जीवटधारी हिम्मत नहीं कर पाते ! कुछ अपने आप में ऐसे रहस्य समेटे हैं, जिनका पार पाना आज की मानव बुद्धि के वश में नहीं लगता ! एक ऐसा ही विलक्षण मंदिर आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में, बेंगलुरु शहर से करीब 120 किमी दूर स्थित है, जो भगवान शिव के वीरभद्र स्वरूप और रामायण के श्रीराम-जटायु प्रसंग से संबंधित है ! दुनिया भर के वैज्ञानिक अब तक इसके खंबों के रहस्य को सुलझाने में नाकामयाब रहे हैं ! 

जमीन से करीब आधा इंच उठा हुआ स्तंभ 
दक्षिण भारत का लेपाक्षी मंदिर ! कुर्मासेलम की पहाडियों पर बना कछुए के आकार का यह पूजास्थल पुरातन काल से अपने खंभों की विशेषता के कारण आज तक लोगों की उत्सुकता का व‍िषय बना हुआ है। बड़े अचंभे की बात है कि 70 खंभों पर बने इस मंदिर का एक खंभा जमीन को छूता ही नहीं है बल्कि उससे करीब आधा इंच ऊपर हवा में झूलता रहता है। यही वजह है कि इस मंदिर को हैंगिंग टेंपल के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर के ये अनोखे खंभे आकाश स्तंभ के नाम से भी जाने जाते हैं। 

                                      

इस मंदिर का जिक्र रामायण में भी मिलता है ! यही वह जगह है जहां रावण से युद्ध के दौरान जटायु घायल हो गिर गए थे ! जब श्री राम सीता जी को खोजते यहां पहुंचे तो उन्होंने घायल जटायु को गोद में ले सहारा देते हुए कहा था, पक्षी उठो-पक्षी उठो ! तेलगु भाषा में इसका अनुवाद लेपाक्षी होता है, इसीलिए इस जगह का नाम लेपाक्षी पड़ा। इसी जगह जटायु जी ने श्रीराम को सारी घटना बता परलोक गमन किया था ! 

मंदिर के न‍िर्माण को लेकर अलग-अलग मत हैं। इस धाम में मौजूद एक स्वयंभू शिवलिंग भी है जिसे शिव के रौद्र रूप यानी वीरभद्र का प्रतीक माना जाता है। यह श‍िवलिंग 15वीं शताब्दी तक खुले आसमान के नीचे ऐसे ही विराजमान था। लेकिन 1538 में दो भाइयों विरुपन्ना और वीरन्ना ने मंदिर का न‍िर्माण क‍िया था जो कि विजयनगर राजा के यहां खजांची थे। वहीं पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार लेपाक्षी मंदिर परिसर में स्थित वीरभद्र मंदिर का निर्माण ऋषि अगस्‍त्‍य ने करवाया था।

                                

लेपाक्षी मंदिर को लेकर एक और कहानी मिलती है। इसके मुताबिक एक बार वैष्णव यानी विष्णु और शिव भक्तों के बीच अपने इष्ट देव् के सर्वश्रेष्ठ होने की बहस शुरू हो गई। जो कि सद‍ियों तक चलती रही। जिसे रोकने के लिए ही अगस्‍त्‍य मुनि ने इस स्‍थान पर तप क‍िया और अपने तपोबल के प्रभाव से उन्होंने सभी भक्‍तों को यह भान करा कि विष्णु और शिव एक दूसरे के पूरक हैं, बहस का खात्मा करवाया ! मंदिर के पास ही विष्णु जी के एक अद्भुत रूप रघुनाथेश्वर की प्रतिमा भी स्थित है ! जिसमें विष्णु जी को भगवान शंकर की पीठ पर रघुनाथ स्वामी के रूप में आसन सजाए दिखाया गया है ! इसीलिए वे रघुनाथेश्‍वर कहलाए जाते हैं !

                                     
मंदिर परिसर में एक ही पत्थर को तराश कर बनाई गई एक विशाल नागलिंग प्रतिमा भी स्थापित है जिसे देश की सबसे बड़ी नागलिंग प्रतिमा माना जाता है। काले ग्रेनाइट पत्थर से बनी इस प्रतिमा में शिवलिंग के ऊपर सात फन वाले नाग को उकेरा गया है। उसी के दूसरी तरफ पैर का निशान बना हुआ है प्रचलित मान्यता के अनुसार यह माता सीता के पैर की छाप है। कहते हैं कि जब रावण माता सीता को पुष्पक विमान में लंका ले जा रहा था और जटायु घायल होकर यहाँ गिर गए थे तब माता सीता ने श्रीराम को संदेश देने के लिए अपने पैर की एक छाप यहाँ छोड़ी थी।

                                         
मंदिर का कोई भी हिस्सा, कोना या जगह ऐसी नहीं है जहां आकर्षक कलाकारी, भित्तिचित्र या कोई प्रतिमा ना बनाई गई हो ! हर जगह रामायण से लेकर महाभारत काल की घटनाओं, विष्णु जी के सभी अवतारों, देवी-देवताओं, नर्तक, अप्सराएं, पशु-पक्षी, पेड़-पौधों के चित्रों को विस्तृत रूप से और कलात्मक बारीकी से उकेरा गया है, जो अनायास ही दर्शकों का मन मोह उसे ठिठकने पर मजबूर कर देता है।

चरण चिन्ह 
मंदिर का निर्माण पूरे होने की तिथि को लेकर विभिन्न मत हैं जैसे कि कोई इसे 1518 ईसवीं में बना हुआ मानता हैं तो कोई इसे 1583 ईसवीं का बताता है। पर ऐसा अनुमान है कि मंदिर का निर्माण 1520 ईसवीं से लेकर 1585 ईसवीं के बीच में पूरा हो गया था। यहां देश के किसी भी हिस्से से वायु, रेल या सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है ! 

बुधवार, 5 अक्टूबर 2022

रावण का मरना भी असंभव है

आज देश भर में दशहरे के दिन, भले ही सांकेतिक रूप से ही सही, रावण को मारने, उसके पुतले का दहन करने का जिम्मा कौन लेता है या किसको दिया जाता है ! रावण को अग्नि के हवाले करने और करवाने वालों ने क्या कभी अपने गिरेबान में झाँक कर देखा है ! इस दिन पार्कों में, चौराहों पर, कालोनियों में या मैदानों में जो रावण के पुतले फूंके जाते हैं, उनको फूंकने में अगुवाई करने वाले अधिकांश तो खुद बुराइयों के पुतले होते हैं ! उनकी तो खुद की लंकाऐं होती हैं, काम-क्रोध-मद-लोभ जैसी बुराइयों से भरपूर ! तो बुराई ही बुराई पर क्योंकर विजय पाती होगी ...................!

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दशहरा, देश के बड़े त्योहारों में से एक। बुराई पर अच्छाई की प्रतीतात्मक जीत को दर्शाने का माध्यम। रामलीला का मंचन, धूम-धड़ाका, आतिशबाजी, हाट-मेला-बाज़ार, भीड़-भाड़, लोगों का रेला, मौज-मस्ती,
उत्साही बच्चे। ऊँचे से ऊँचे पुतले बनाने की होड़, दिन ब दिन बढ़ते आयोजन ! इन सब के चलते छुटभइए नेताओं को भी अपनी दूकान सजाने-चलाने के लिए मिलते अवसर ! 

एक समय था, जब दशहरे पर सार्वजनिक पुतला दहन, वह भी कहीं-कहीं आयोजित होता था। पर समय के साथ, आपसी होड़ और मतलबपरस्ती के तहत अब जैसे गणेशोत्सव, दुर्गा पूजा, होली-दिवाली मिलन, इन सबके कार्यक्रम हर गली-मौहल्ले में होने लगे हैं, उसी क्रम में अब दशहरे में पुतला दहन का भी आयोजन जगह-जगह होने लगा है ! एक ही कॉलोनी में आपसी स्पर्द्धा, अहम और वैमनस्य के चलते दो-तीन पुतले खड़े कर दिए जाते हैं ! जगह न हो तो छोटे-छोटे पार्कों में भी खतरा मोल ले, तीन-तीन पुतलों का दहन किया जाने लगा है ! इसी बहाने कुछ लोगों को अपना वर्चस्व, पहुंच व तथाकथित प्रभुत्व दिखाने तथा भविष्य का मंच तैयार करने का अवसर हाथ लग जाता है ! 
रावण को मारने के लिए राम का होना जरुरी है और राम ऐसे ही कोई नहीं बन जाता ! उसके लिए उसमें प्रबल शक्ति का होना तो अवश्यंभावी है ही, साथ ही उसे कर्त्वयनिष्ठ, सत्यनिष्ठ, दृढ़निश्चयी, करुणामय, ज्ञानी, वचन पालक, संयमी, ईर्ष्या मुक्त, विवेकी, निरपेक्ष, शरणागत वत्सल, दयालु, समदर्शी, काम-क्रोध-मोह विहीन होना भी बहुत जरुरी है
समय में कितना बदलाव आ गया है, अब भीड़ के लिए दशहरे का दिन रावण के नाम रहता है ! उसके पुतलों की भव्यता आकर्षण का केंद्र बन जाती है ! बड़ी रामलीलाओं में रावण का किरदार निभाने के लिए खास और जाने-माने चेहरों को चुना जाता है ! रावण के पुतले को अग्नि के सुपुर्द करने का जिम्मा भी किसी बड़ी हस्ती को ही दिया जाता है ! जितनी बड़ी रामलीला कमेटी उतना ही बड़ा आदमी ! जितना बड़ा आदमी उतनी ही बड़ी कमेटी की प्रतिष्ठा !
अत्यंत खेद के साथ यह कहना और सहना पड़ता है ! बहुत कटु है ! पर सच्चाई यही है कि इस दिन प्रभू राम तो जैसे गौण हो जाते हैं ! किसी भी बड़े आयोजन को देख लें ! श्रीराम पक्ष के कुछ किरदारों की आरती-तिलक की ओपचारिकता पूरी होते ही सब का ध्यान पधारे हुए विशिष्ट जनों पर सिमट कर रह जाता है ! जितनी आव-भगत उन में से हरेक की होती है उतनी तो पूरे राम-दल की भी नहीं होती ! फिर होड़ सी लग जाती है रावण के पुतले पर तीरों की बौछार करवाने में ! यह सब देख ऊपर बैठा रावण भी हाथ जोड़ कर कहता होगा, हे प्रभू, उस समय तो अपने कर्मों के कारण आपने मेरा वध किया था, वह सम्मानजनक अंत था मेरा ! तब  मुझे उतनी तकलीफ नहीं हुई थी पर इस अपमानजनक स्थिति से हर साल दो-चार होने में बहुत कष्ट होता है ! किसी तरह मुझे निजात दिलवाइए इन अज्ञानी-मूढ़ों के चंगुल से !
देश भर में दशहरे के दिन, भले ही सांकेतिक रूप से ही सही, रावण को मारने, उसके पुतले का दहन करने का जिम्मा कौन किसको देता है यह सब अपनी मिलीभगत और स्वार्थसिद्धि पर निर्भर करता है ! आज पार्कों में, चौराहों पर, कालोनियों में या मैदानों में जो रावण के पुतले फूंके जाते हैं, उनको फूंकने में अगुवाई करने वाले अधिकांश तो खुद बुराइयों के पुतले होते हैं ! उन्होंने कभी अपने गिरेबाँ में झांक कर देखा है ! उनकी तो खुद की अपनी लंकाऐं होती हैं, काम-क्रोध-मद-लोभ जैसी बुराइयों से भरपूर ! ऐसा करते हुए उन्हें जरा सी भी ग्लानि नहीं होती ! ऐसे में बुराई ही बुराई पर क्योंकर विजय पाएगी ? 
आज बुराई पर अच्छाई की विजय निश्चित करने के लिए किसीको उसके गुणों का आकलन कर के नहीं बल्कि उसकी हैसियत देख कर चुना जाता है। आज रावण दहन के लिए उसे ''धनुष'' थमाया जाता है जो अपने क्षेत्र में येन-केन-प्रकारेण अगुआ हो ! फिर चाहे वह राजनीतिज्ञ हो, चाहे कलाकार हो, चाहे व्यापारी हो या फिर अपने इलाके का प्रमुख ही हो, जैसे किसी कॉलोनी या हाऊसिंग सोसायटी का प्रेजिडेंट ! अगुआ होना ही उसकी लियाकत है भले ही कर्मों से वह दुर्योधन ही क्यों न हो ! 
रावण अपने आप में ज्ञानी-ध्यानी, सबसे बड़ा शिव भगत, पुरातत्ववेता, ज्योतिष का जानकार, विद्वान, युद्ध-विशारद के साथ-साथ महाबली योद्धा था ! उससे बड़ा महा पंडित उस युग में कोई दूसरा नहीं था ! ऐसा नहीं होता तो क्या श्रीराम उसे अपने यज्ञ का पुरोहित बनाते ! उस पर राम जो सारे जगत के पालनहार हैं, नियोजक हैं, सर्व शक्तिमान हैं, सारे चराचर के स्वामी हैं, उन्हें भी उस रावण पर विजय पाने में ढाई महीने लग गए थे ! तब जा कर कहीं उसका वध हुआ था ! रावण को मारने के लिए राम का होना जरुरी है और राम ऐसे ही कोई नहीं बन जाता ! उसके लिए उसमें प्रबल शक्ति का होना तो अवश्यंभावी है ही, साथ ही उसे कर्त्वयनिष्ठ, सत्यनिष्ठ, दृढ़निश्चयी, करुणामय, ज्ञानी, वचन पालक, संयमी, ईर्ष्या मुक्त, विवेकी, निरपेक्ष, शरणागत वत्सल, दयालु, समदर्शी, काम-क्रोध-मोह विहीन होना भी बहुत जरुरी है ! क्या आज एक ही इंसान में इतने गुणों  होना संभव है ?    
नहीं ! 
तो रावण का मरना भी असंभव है !     

शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

मिसिंग टाइल सिंड्रोम, जो पास नहीं है उसका दुःख

जीवन में आगे बढ़ना, तरक्की करना, बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उद्यम कर उसे हासिल करने की कोशिश करते रहना बुरी बात नहीं है ! ऐसा होना भी चाहिए ! परन्तु हमेशा इसी का चिंतन करके परेशान रहना, जो हासिल है उसे नजरंदाज करना, तनाव को बुलावा देना है ! फिर ऐसा भी नहीं है कि जो हमारे पास नहीं है, वह यदि किसी तरह हमें मिल जाए तो हम संतुष्ट हो जाएंगे ! लालसा एक ऐसी मनोवृत्ति है जो कभी संतुष्ट नहीं होती, एक चीज मिली तो दूसरी के लिए यह जागृत हो जाएगी ! यही अनियंत्रितता हमें कभी भी खुश नहीं रहने दे सकती ! खुश रहने के सैंकड़ों कारण होने के बावजूद दुखी होने का एक कारण हमें विचलित कर देता है...........! 

#हिंदी_ब्लागिंग 
एक बार एक शहर में एक व्यवसाई ने अपने होटल के नवीकरण के दौरान उसमें एक विश्वस्तरीय स्विमिंग पूल बनवाया। साफ-स्वच्छ पानी के इंतजाम के साथ-साथ उसमें चारों ओर बेहतरीन इटैलियन टाइल्स लगवाए ! परन्तु संयोगवश एक स्थान पर एक टाइल नहीं लग पाया ! होटल के खुलने पर वहाँ पर्यटकों की लाइन लग गई ! जो भी आता वह स्विमिंग पूल की सुंदरता का कायल हुए बिना नहीं रहता ! हरेक का ध्यान बेहतरीन टाइल्स की खूबसूरती पर मुग्ध हो रह जाता ! हर कोई बड़े ध्यान से इस कलाकारी को देखता और प्रशंसा करते नहीं थकता ! पर जैसे ही उसकी नजर उस मिसिंग टाइल पर पड़ती, वहीं अटक कर रह जाती ! उसके सारे हाव-भाव बदल जाते ! वह दुखी व खिन्न हो जाता ! वहाँ से लौटने वाले हर व्यक्ति की एक ही शिकायत होती कि पूल में एक टाइल मिसिंग है। हजारों टाइल्स की सुंदरता के बावजूद वह एक टाइल उसके दिमाग में पैबस्त हो रह जाती ! हरेक को उस टाइल की जगह को देख कर बहुत दुःख होता कि इतना परफेक्ट बनाने के बावजूद एक टाइल रह ही गई। तो कई लोग प्रबंधन को सलाह भी देते कि जैसे भी हो उस जगह को ठीक करवा दिया जाए। बहरहाल वहां से कोई भी खुश नहीं निकलता ! इतना सुन्दर निर्माण भी लोगों को खुशी नहीं दे पाया !
दरअसल उस स्विमिंग पूल में वो मिसिंग टाइल एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग था, इस बात को सिद्ध करने के लिए कि हमारा ध्यान कमियों की तरफ ही जाता है ! कितना भी खूबसूरत कुछ बन पड़ रहा हो पर यदि कहीं जरा सी चूक रह गई तो हमारा ध्यान उसी पर जाएगा ! उदाहरण स्वरूप आप कहीं साफ-स्वच्छ, कितना भी कीमती कपड़ा टांग कर उस पर तिल भर का एक काला दाग लगा दें तो लोगों की निगाह कपडे की सुंदरता पर न जा कर उस दाग पर ही जाएगी ! अभी हाल ही में मैंने अपनी संस्था की पत्रिका निकाली ! वर्तनी की जांच के बावजूद प्रिंटर से एक चूक हो गई ! अब पत्रिका की दसियों अच्छाइयों के बावजूद लोग मुझे उस कमी के बारे में बताने से नहीं चूकते !  
यह टाइल वाली बात एक मनोवैज्ञानिक समस्या है, जिसे ''मिसिंग टाइल सिंड्रोम'' नाम दिया गया है और जो कमोबेस तकरीबन हर इंसान में मौजूद होती है ! किसी चीज की ''मिसिंग'' पर ही हमारा ध्यान जाना, हमारी जिंदगी के दुःख का सबसे बड़ा कारण है ! जो हमारे पास है, उससे हम उतना खुश नहीं होते जितना कि जो हमारे पास नहीं है उसके लिए दुखी होते हैं
यह टाइल वाली बात एक मनोवैज्ञानिक समस्या है, जिसे ''मिसिंग टाइल सिंड्रोम'' नाम दिया गया है और जो कमोबेस तकरीबन हर इंसान में मौजूद होती है ! किसी चीज की ''मिसिंग'' पर ही हमारा ध्यान जाना, हमारी जिंदगी के दुःख का सबसे बड़ा कारण है ! जो हमारे पास है, उससे हम उतना खुश नहीं होते जितना कि जो हमारे पास नहीं है उसके लिए दुखी होते हैं ! अपने आस-पास ही हमें ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जाएंगे, जिसमें लोग उन्हें क्या-क्या मिला है, उस पर खुश होने की जगह उन्हें क्या-क्या नहीं मिल पाया है, उस पर दुखी रहते हैं। अपनी उसी एक कमी के पीछे सारा जीवन परेशान रहते हैं। 
जीवन में आगे बढ़ना, तरक्की करना, बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उद्यम कर उसे हासिल करने की कोशिश करते रहना बुरी बात नहीं है ! ऐसा होना भी चाहिए ! परन्तु हमेशा इसी का चिंतन करके परेशान रहना, जो हासिल है उसे नजरंदाज करना तनाव को बुलावा देना है ! फिर ऐसा भी नहीं है कि जो हमारे पास नहीं है, वह यदि किसी तरह हमें मिल जाए तो हम संतुष्ट हो जाएंगे ! लालसा एक ऐसी मनोवृत्ति है जो कभी संतुष्ट नहीं होती, एक चीज मिली तो दूसरी के लिए यह जागृत हो जाएगी ! यही अनियंत्रितता हमें कभी भी खुश नहीं रहने दे सकती ! खुश रहने के सैंकड़ों कारण होने के बावजूद दुखी होने का एक कारण हमें विचलित कर देता है ! इसकी वजह से ही कई तरह की बीमारियां हमें आ दबोचती हैं ! इसलिए सही समय पर इस मनोवृत्ति पर काबू पाना बहुत जरुरी है ! इसके लिए जो कुछ भी अपने पास है उसके लिए प्रभु को धन्यवाद दें ! उसका शुक्र मनाएं उसके द्वारा दिए गए अनगिनत उपहारों हेतु ! सदा खुश रहने का यह सीधा-सादा सबसे सरल तरीका है !  

रविवार, 18 सितंबर 2022

चीते आ गए, स्वागत है

छाता प्रजाति जीवों की उन विशेष श्रेणी को कहा जाता है, जिनके संरक्षण से धरती की अन्य प्रजातियों को भी संरक्षित कर पर्यावरण को संतुलित करने में सहायता मिलती है ! इनमें पशु और पक्षी दोनों ही सामान रूप से सम्मिलित होते हैं ! ये संरक्षण क्षेत्रों के आकार, संरचना और पारिस्थितिक तंत्र को बचाए रखने में भी मदद करते हैं। ये भले ही अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, अन्य जीवों को रहत पहुंचते हैं, इसीलिए इन्हें छाता या अंब्रेला प्रजाति कहा जाता है .......!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

हमारे यहां एक प्रथा कुछ वर्षों से काफी चलन में है, वह है विरोध ! सरकार द्वारा कुछ भी हो रहा हो या किया जाए तुरंत एक खास पूर्वाग्रही, कुंठित, विघ्नसंतोषी तबका उसके विरोध में चिल्ल-पों मचाना शुरू कर देता है ! उस काम के औचित्य पर, उसके प्रयोजन पर, उसके परिणाम पर सवाल उठाने आरंभ कर दिए जाते हैं ! भले ही वह काम देश के या लोगों के हित में ही क्यों ना हो ! अभी देश की ग्रासलैंड इकोलॉजी को सुधारने के लिए विलुप्त हो चुके चीतों के पुनर्स्थापन की योजना के तहत नामीबिया से आठ चीते, जिनमें पांच मादा तथा तीन नर हैं, लाए गए ! इस पर उनको लाने और जगह विशेष में बसाने पर भी ऐसे लोगों को राजनीती नजर आने लगी ! जबकि यह पर्यावरण के लिए बहुत आवश्यक था !

चीतों का लाना इस लिए जरुरी था क्योंकि इसे ''अंब्रेला प्रजाति का जीव'' माना जाता है. जिसका स्थान ''फूड चेन'' में सबसे ऊपर होता है ! अगर इसे नहीं लाया जाता तो हमारा बिगड़ता हुआ फूड चेन का संतुलन पूरी तरह से खतरे में पड़ जाता ! रही बात मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क के चयन की तो वह इसलिए सर्वाधिक उचित था, क्योंकि वहां पर नवांगतुकों को भोजन की कोई समस्या नहीं होगी ! वहां पर्याप्त मात्रा में चीतों के शिकार करने लायक जीव हैं ! जिनमें उनकी खास पसंद चीतल भी काफी संख्या में मौजूद हैं ! एहतियाद के तौर पर दो सौ के करीब और चीतलों को भी वहां छोड़ा गया है !


छाता प्रजाति जीवों की उन विशेष श्रेणी को कहा  जाता है, जिनके संरक्षण से धरती  की अन्य प्रजातियों को भी संरक्षित कर  पर्यावरण को संतुलित करने में  सहायता मिलती  है ! इनमें  पशु और पक्षी दोनों  ही सामान रूप से सम्मिलित  होते हैं ! ये संरक्षण क्षेत्रों के आकार, संरचना और  पारिस्थितिक तंत्र को बचाए रखने में भी बहुत मददगार होते हैं। ये भले ही अप्रत्यक्ष  रूप से ही सही, अन्य जीवों को  राहत पहुंचाते हैं, इसीलिए इन्हें छाता या अंब्रेला प्रजाति कहा जाता है !

किसी भी देश से दूसरे देश में जीवों को लाने ले जाने के IUCN (International Union for Conservation of Nature) के कुछ नियम हैं, जिनका पालन करना जरुरी होता है ! उसी के तहत चीतों के लिए  पांच राज्यों के 10 जगहों को तय किया गया था ! जो सात अलग-अलग तरह के लैंडस्केप पर मौजूद हैं. छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास नेशनल पार्क ! गुजरात में बन्नी ग्रासलैंड्स ! मध्यप्रदेश में डुबरी वाइल्डलाइफ सेंचुरी, संजय नेशनल पार्क, बागडारा वाइल्डलाइफ सेंचुरी, नॉराडेही वाइल्डलाइफ सेंचुरी और कूनो नेशनल पार्क ! राजस्थान में डेजर्ट नेशनल पार्क वाइल्डलाइफ सेंचुरी और शाहगढ़ ग्रासलैंड्स और उत्तर प्रदेश की कैमूर वाइल्डलाइफ सेंचुरी !

फिर काफी सोच-विचार मश्शकत के बाद राजस्थान के मुकुंदारा हिल्स टाइगर रिजर्व, शेरगढ़ वाइल्डलाइफ सेंचुरी और भैंसरोर गढ़ वाइल्डलाइफ सेंचुरी तथा मध्यप्रदेश की गांधी सागर वाइल्डलाइफ सेंचुरी, माधव नेशनल पार्क को भी आजमाया गया ! पर अंत में हर दृष्टिकोण से श्योपुर स्थित कूनो नॅशनल पार्क ही हर कसौटी पर खरा उतरा ! जहां स्पेशल हवाई जहाज से, विशेष व्यवस्था और निगरानी के तहत नए मेहमानों को ला कर, प्रधान मंत्री मोदी जी द्वारा उनके इस नए आवास में छोड़ा गया !

कूनो को सर्वाधिक उपयोगी इसलिए पाया गया ! क्योंकि चीतों को खुले जंगलों में रहने के बजाए थोड़ी ऊँची घास वाले ऐसे मैदानी इलाके पसंद होते हैं जहां वातावरण में थोड़ा सूखापन हो, ज्यादा उमस, ठंड व बारिश न हो ! इसके साथ ही लोगों की आवाजाही भी कम से कम हो ! ऐसे में कूनो का 748 वर्ग किलोमीटर का इलाका पूरी तरह खरा उतरता है ! यहां पानी की प्रचुर मात्रा लिए कूनो नदी है ! बिना तेज ढाल वाली पहाड़ियां हैं और साथ ही इफरात मात्रा में भोजन भी उपलब्ध है !

चीते का हमारे संस्कृत ग्रंथों में चित्रक यानी चित्तीदार के रूप में विवरण मिलता है ! नवपाषाण युग की गुफाओं में भी इनके चित्र मिलते हैं ! आशा है, करीब सत्तर साल बाद आए, दुनिया के सबसे तेज धावक,  हमारे इन नए मेहमानों को यहां स्थाई निवासी बनने, रहने, पनपने में कोई अड़चन नहीं आएगी ! उनका परिवार फलेगा-फूलेगा ! इसके साथ ही इस इलाके में पर्यटन बढ़ेगा ! लोग चीतों को देखने आएंगे ! जिससे राज्य और देश को भी फायदा होगा ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से, आभार 

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