काम उन्हीं लोगों को दिया गया जो जमीन के नहीं, जी-हुजूरी में माहिर थे ! सड़क पर गिट्टी डालने वाले को जमीन पर हल चलाने का काम दे दिया गया ! मच्छर मारने की दवा छिड़कने वाले को पौधों की सुरक्षा संभलवा दी गई ! जिनको काली-पीली दाल का भी फर्क मालुम नहीं था, उन्हें बीजों के अंकुरण की जिम्मेदारी सौंप दी गई ! बड़बोले मौकापरस्तों को बाड़ की सुरक्षा हेतु तैनात कर दिया गया और तो और जिसके खुद की जमीन उसकी अज्ञानता से बंजर हो गई थी उसे ही बागीचे सौंदर्यीकरण का जिम्मा दे दिया गया
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
शनिवार, 19 मार्च 2022
उजड़ता बागीचा और घड़ियाली चमड़े के जूते
मंगलवार, 15 मार्च 2022
होली हो ले, उसके पहले सोचना तो बनता है
आज दोपहर बाद घर लौटते समय कालोनी के किसी ऊँचे से मकान से किसी बच्चे के हाथ से छूटी गुब्बारे रूपी मिसाइल मुझे मिस करती हुई सड़क से टकरा कर नष्ट हो गई ! अभी दो दिन बचे हैं त्यौहार के आने में, ऐसा ही कुछ सोच, टारगेट यानी मैंने तुरंत पलट कर देखा पर आशानुरूप ''लॉन्चर'' गायब था ! तभी पता नहीं कैसे विचारों ने पलटा खाया ! अपने बचपन के दिन याद आ गए, जब दसियों दिन पहले से इस आनंदमय उत्सव को मनाने का उत्साह जाग जाता था ! बड़े-छोटे-महिलाएं सब अपने-अपने तरीके से इसका स्वागत करने की तैयारियों में जुट जाते थे........!
#हिन्दी_ब्लागिंग
होली अपने समय पर फिर आ पहुंची है ! गांवों-कस्बों में तो भले ही कुछ जिंदादिली बची भी हो पर शहरों में तो सिर्फ औपचारिकता ही शेष रह गई है ! अब ना ही पहले जैसा उत्साह है, ना ही उमंग है, ना हीं कोई चाव ! ना ढफली ना चंग ना हीं ढोलक ! ना हीं फाग ना हीं संगीत ना हीं मस्ती ! ना घर में बने पकवान, ना ठंडाई, ना बेफिक्री का आलम ! सब तिरोहित होता चला गया समय के साथ-साथ ! उस पर सदा से किसी षड्यंत्र के तहत, तथाकथित बुद्धिजीवी, छद्म इतिहासकार, परजीवी सोशल मीडिया, मौकापरस्त वार्ताकार, अपनी आस्था, संस्कृति, परंपरा, उत्सवों में मीनमेख निकालने वालों की, ऐन मौके पर पानी बचाने की नसीहतें ढहती दिवार पर धक्के का काम करती रहीं !
हमारे त्योहारों पर ही मंहगाई, बेरोजगारी, जिंसों की कमियों का रोना क्यों रोया जाता है ! क्यों हमारे त्यौहार सिमटते चले जा रहे हैं ! क्यों एक दिवसीय आयातित उत्सव धीरे-धीरे हफ्तों तक मनवाए जाने लगते हैं ! क्यों हमारी पारंपरिक पकवानों-मिठाइयों को दरकिनार करवा कर चॉकलेट-पेस्ट्रियों को प्रमुखता दी जाने लग जाती है ! क्यों दीप जला कर वातावरण को प्रकाशमय बनाने की जगह दीप बुझा कर अंधेरे के आह्वान को उचित बताया जाने लगा है
अब बच्चों को भी पहले जैसे अवकाश नहीं मिलते ! उल्टे इन्हीं दिनों में परीक्षा का भूत उनके सर पर सवार करवा दिया जाता है ! फिर भी त्योहारों के प्रति उनका बालसुलभ उत्साह खत्म नहीं हुआ है ! सोचा जाए तो वे ही हैं, हमारे ध्वजवाहक, जो किसी भी बहाने सही, अपनी परंपराओं को जिंदा रखे हुए हैं ! इसलिए यदि कहीं से किसी बच्चे का कोई गुब्बारा या पिचकारी की धार आ कर आपके कपड़ों को भिगो भी जाती है तो मुस्कुरा कर उसे देखें, आपकी जरा सी मुसकुराहट उसको खुशी से लबरेज कर देगी ! कपड़ों का क्या है कुछ ही देर में सूख जाएंगे पर सारा वातावरण बच्चे की निश्छल हंसी, उसकी खुशी के रस से सराबोर हो जाएगा ! शायद इतने से उपक्रम से ही हम गायब होती परंपराओं को कुछ हद तक बचाने में कुछ सहयोग कर सकें !
आज दोपहर बाद घर लौटते समय कालोनी के किसी ऊँचे से मकान से किसी बच्चे के हाथ से छूटी गुब्बारे रूपी मिसाइल मुझे मिस करती हुई सड़क से टकरा कर नष्ट हो गई ! अभी दो दिन बचे हैं त्यौहार के आने में, ऐसा ही कुछ सोच, टारगेट यानी मैंने तुरंत पलट कर देखा पर आशानुरूप ''लॉन्चर'' गायब था ! तभी पता नहीं कैसे विचारों ने पलटा खाया ! अपने बचपन के दिन याद आ गए, जब दसियों दिन पहले से इस आनंदमय उत्सव को मनाने का उत्साह जाग जाता था ! बड़े-छोटे-महिलाएं सब अपने-अपने तरीके से इसका स्वागत करने की तैयारियों में जुट जाते थे !
उन दिनों पिताजी उस समय के कलकत्ता के पास एक जूट मील में अधिकारी थे ! मिल का पूरा स्टाफ एक परिवार की तरह था ! हर त्यौहार मिल-जुल कर ही मनाया जाता था, पर होली की बात सबसे निराली थी ! यह सबका सबसे प्रिय उत्सव हुआ करता था ! नई चंग या डफ लाई जाती थी ! उसका तरह-तरह से परिक्षण कर तैयार किया जाता था। इतने सारे परिवारों के लिए ठंडाई, गुझिया, मिठाई, नमकीन इत्यादि का पर्याप्त मात्रा में इंतजाम किया जाता था। रंग तो फैक्ट्री में उपलब्ध होते थे पर व्यक्तिगत पिचकारियों की खरीद उनका रख-रखाव एक अलग काम हुआ करता था। उन दिनों प्लास्टिक का चलन नहीं था। पिचकारियां लोहे या पीतल की, तीन आकारों में छोटी, मध्यम और बड़ी, हुआ करती थीं। उनमें दो तरह के "अड्जस्टमेंट" होते थे, एक फौव्वारे की तरह रंग फेंकता था, जिसकी दूरी के हिसाब से क्षमता कम होती थी, दूसरा एक धार वाला, जो कम से कम दस-बारह फुट तक पानी फेंक किसी को भिगो सकता था। सिर्फ रंग-गुलाल ! ना कीचड़ ना ग्रीस, ना कपड़ा फाडू हुड़दंग !
घंटों चलने वाले इन सब कार्यक्रमों के बाद संध्या समय होता था, प्रीतिभोज का। खाना-पीना मौज -मस्ती, गाना-बजाना या फिर मैदान में पर्दा लगा प्रोजेक्टर के माध्यम से किसी फिल्म का शो। पर उस शाम का मुख्य आकर्षण होती थी ठंडाई जो वहीं उचित देख-रेख में तैयार की जाती थी। जिसका स्वाद आज तक नहीं भुलाया जा सका है। उसके भी दो वर्ग हुआ करते थे, बच्चों और महिलाओं के लिए सादी और पुरुषों के लिए "बूटी" वाली। उधर युवा भी अपने से बड़ों का लिहाज कर ही उसका सेवन करते थे। जिस पर शिव जी की कृपा कुछ ज्यादा होने लगती वह चुपचाप वहां से खिसक लेता था। ना कभी हुड़दंग देखा- सुना गया ना हीं कभी किसी गलत हरकत को उभरते देखा गया ! कैसा समय था ! कैसे थे वे दिन और कैसे थे वे लोग !
क्या आज हमारी जिम्मेदारी नहीं बनती कि हम अपने गुम होते या सुनियोजित तरीके से गायब करवा दिए जा रहे त्योहारों, उत्सवों, परंपराओं को बचाने का उपक्रम करें ! सोचें कि हमारे त्योहारों पर ही मंहगाई, बेरोजगारी, जिंसों की कमियों का रोना क्यों रोया जाता है ! क्यों हमारे त्यौहार सिमटते चले जा रहे हैं ! क्यों एक दिवसीय आयातित उत्सव धीरे-धीरे हफ्तों तक मनवाए जाने लगे हैं ! क्यों हमारे ऋषि-मुनियों को भुलवा कर इम्पोर्टेड महापुरुषों को हम पर थोपा जाने लगा है ! क्यों हमारे पारंपरिक पकवानों, मिठाइयों को दरकिनार करवा कर चॉकलेट-पेस्ट्रियों को प्रमुखता दी जाने लगी है ! क्यों दीप जला कर वातावरण को प्रकाशमय बनाने की जगह दीप बुझा कर अंधेरे के आह्वान को उचित बताया जाने लगा है !ऐसे बहुत सारे क्यों हैं, जिन पर जरा सा थम कर विचार करने की जरुरत है !
क्या आप थमेंगे, जरा सा.........!!
बुधवार, 2 मार्च 2022
चमत्कार का यही चमत्कार है कि चमत्कार का एहसास ही नहीं हो पाता
तकलीफ बहुत बढ़ने पर कई बार गुहार की थी, ''क्या प्रभु ! यह जरा सा रोग नहीं दूर हो पा रहा !'' ऐसे में ही पता नहीं, पिछले दिनों कब और कैसे रात सोते वक्त नाक पर हाथ रख, मन ही मन ''नासै रोग हरे सब पीरा , जपत निरंतर हनुमत बीरा'' का तीन बार जप करना शुरू कर दिया था ! मेरा डॉक्टर और दवाइयों से यथाशक्ति परहेज ही रहता आया है ! तो क्या खांसी इसलिए शुरू हुई कि उसके बहाने मुझे अस्पताल जाना पड़े ! क्योंकि इसके पहले कभी भी इतने लंबे समय तक इसका प्रकोप नहीं हुआ था ! वहां जाने पर खांसी के चलते नाक की दवा भी मिली और वर्षों से चली आ रही ''एक्यूट'' तकलीफ से छुटकारा मिला ! अब यह क्या था........!
#हिन्दी_ब्लागिंग
भगवान सर्वव्यापी है ! रक्षक है ! तारणहार है ! सबकी सुनता है ! हरेक की सहायता करता है ! पर कभी अहसास नहीं होने देता ! खुद परोक्ष में रह, यश किसी और को दिलवा देता है ! चमत्कार होते हैं, पर इस तरह सरलता के साथ कि इंसान की क्षुद्र बुद्धि समझ ही नहीं पाती ! प्रभु चाहते हैं कि इंसान स्वाबलंबी बने, कर्म करे, उनके सहारे ना बैठा रहे ! इसीलिए वह ख्याल तो रखते हैं ! सहायता भी करते हैं ! पर किसी को एहसास नहीं होने देते ! होता क्या है कि मुसीबत में आदमी हाथ-पैर मारता ही है ! तरह-तरह के उपाय करता है ! इधर दौड़, उधर दौड़, यह आजमा, वह आजमा ! फिर जब ठीक हो जाता है तो अहसान भी उसी माध्यम का मानता है जो अंत में सहायक हुआ था ! तब तक वह भूल जाता है कि उसने परम पिता से भी सहायता मांगी थी और वह तो किसी को भी निराश नहीं करता ! यह भी भूल जाता है कि वह खुद भी उसी ईश्वर की रचना है उसकी बनाई प्रकृति, व्यवस्था का ही एक हिस्सा है, अपनी रचना की वह कभी उपेक्षा नहीं करता !
कभी-कभी मेरा अपने अतीत पर ध्यान जाता है तो ऐसे पचीसों हादसे याद आते हैं जब कुछ भी हो सकता था पर बचाव हुआ ! चाहे तालाब या कुएं में डूबने से बचा लिया गया होऊँ ! या सुनसान सड़क पर से तीन-चार साल की उम्र में भटक जाने पर कोई "अवतरित" हो सुरक्षित ले आया हो ! आग से बचाव, बिजली से बचाव, नौकरी के दौरान मशीनों से बचाव, ट्रेन से बचाव, सुनसान सड़क पर शहर से दूर निरुपाय हालत में किसी भी हादसे से बचाव ! खेल की चोट से बचाव, बिमारी से बचाव......! जितना याद आता जाता है, घटनाएं उतनी ही बढ़ती चली जाती हैं !
वह सिर्फ धन्यवाद लेता है ! यश किसी और को दिलवा देता है ! मैं आस्तिक जरूर हूँ ! आस्था भी है ! पर अंध विश्वास नहीं है ! नियमित पूजा-पाठ या मंदिर गमन भी नहीं हो पाता ! 15-20 मिनट ध्यान लगाने की कोशिश करता भी हूँ तो अपने सुविधानुसार ! जब कुछ विपरीत, निराशाजनक या तनाव दायक होता है, लगता है कि अन्याय हो रहा है, अति होती है तो शिकायत भी उसी से करता हूँ ! मुझे लगता है कि वह मुझे सुन रहा है ! लगता है कि उसे जब भी फुर्सत होगी मुझ अकिंचन की तरफ भी जरूर ध्यान देगा ! फिर इंसान उसे नहीं पुकारेगा तो और किसके पास जाएगा अपना दुखड़ा ले कर !
अभी क्या हुआ कि वर्षों से चली आ रही मेरे बंद नाक की समस्या अचानक दूर हो गई ! मुझे लगता है कि किलो से भी ज्यादा होम्योपैथी की गोलियां, उस पैथी की और दवाओं के साथ निगल चुका होऊंगा ! महीनों आयुर्वेद की औषधियों का भी सेवन किया ! एक्यूप्रेशर सिर्फ दिलो-दिमाग पर प्रेशर डाल कर रह गया !एलोपैथी वाले सिर्फ ऑपरेशन ही एकमात्र इलाज बतलाते थे, दोबारा फिर व्याधि के उभर आने के खतरे के साथ ! सो चल रहा था जैसे-तैसे, मुंह से सांस लेते, दसियों अड़चनों के साथ !
ऐसे में पिछले दिनों कुछ खांसी-कफ की शिकायत हुई ! पांच-सात दिन तो, अपने-आप ठीक हो जाएगी, की आश्वस्तता के साथ निकल जाने के बावजूद प्रकोप कम ना हुआ तो आजकल के दिन-काल की गंभीरता को देख डॉक्टर की शरण में जाना पड़ा ! खांसी के साथ ही उनसे लगे हाथ नाक के पॉलिप का जिक्र भी कर दिया ! उन्होंने दस दिन की दवा दी और बोले, चिंता ना करें ठीक हो जाएगा ! मैंने पूछा भी कि क्या ऑपरेशन जरुरी है ? तो बोले ऐसा कुछ जरुरी नहीं है, दवा से ही राहत मिल जाएगी ! और फिर चमत्कार ही हो गया, खांसी तो तीन दिन में ही ठीक हो गई और वर्षों-वर्ष से चौबीसों घंटे बुरी तरह ''चोक'' रहने वाले नाक के द्वार भी खुल गए ! कितने सालों बाद मिली इस राहत की ख़ुशी को ब्यान करना मेरे लिए मुश्किल लग रहा है !
जिस एलोपैथी के तीन-तीन डाक्टरों ने सिर्फ ऑपरेशन को ही अंतिम उपाय बताया था ! उसी की दवाओं से बिना शरीर पर चाक़ू चले रोग ठीक हो गया ! यह कैसे संभव हुआ.....! याद आता है कि तकलीफ बहुत बढ़ने पर कई बार गुहार की थी, ''क्या प्रभु ! यह जरा सा रोग नहीं दूर हो पा रहा !'' ऐसे ही पता नहीं, पिछले दिनों कब और कैसे रात सोते वक्त नाक पर हाथ रख, मन ही मन ''नासै रोग हरे सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा'' का तीन बार जप करना शुरू हो गया था ! मेरा डॉक्टर और दवाइयों से यथाशक्ति परहेज ही रहता आया है ! तो क्या खांसी इसलिए शुरू हुई कि उसके बहाने मुझे अस्पताल जाना पड़े ! क्योंकि इसके पहले कभी भी इतने लंबे समय तक इसका प्रकोप नहीं हुआ था ! वहां जाने पर खांसी के चलते नाक की दवा भी मिली और वर्षों से चली आ रही ''एक्यूट'' तकलीफ से छुटकारा मिला ! अब यह क्या था........!
अपने हर दुःख, दर्द, तकलीफ की अति में हमें एक ही सहारा नजर आता है, भगवान ! अपने साथ कुछ गलत होते ही हम अनायास ही उसको याद करने लगते हैं ! कष्टों से मुक्ति, मुसीबतों से छुटकारा, कठिन परिस्थितियों से निजात दिलाने के लिए गुहार लगाते हैं ! हमें आशा रहती है, किसी चमत्कार की कि इधर हम बोले, उधर उसने मदद भेजी ! गोया कि वह बेल्ला बैठा, हमारी पुकार का इंतजार ही कर रहा हो ! उस पर यदि कुछ समय यूँ ही गुजर जाता है और अपनी स्थिति में कुछ सुधार होता नहीं दिखता तो लग जाते हैं, उसी को भला-बुरा कहने ! कई तो उसके अस्तित्व को ही नकारने लगते हैं ! जबकि बचपन से ही यह सुनते आए हैं कि उसके दरबार में देर भले ही हो सकती है, लेकिन अंधेर कभी नहीं ! पर बुरे समय में हमारी बुद्धि भी घास चरने चली जाती है ! विश्वास डगमगाने लग जाता है ! पर वह किसी को भी, कभी भी मंझधार में नहीं छोड़ता !
गुरुवार, 24 फ़रवरी 2022
कहां पगड़ी और कहां हिजाब
अक्ल के अंधे और गाँठ के पूरे, अपने को देश वासियों से अलग और ऊपर मानने वाले कुछ फिल्मी लोग भी अपनी समझदानी की डिबिया खोल ज्ञान बघारने लगे ! तुलना करने वालों को मुंह खोलते शर्म भी नहीं आई ! कहां पगड़ी और कहां हिजाब ! यह पगड़ी यानी दस्तार सिर्फ कपडे का टुकड़ा नहीं है ! सिक्ख धर्म का अनिवार्य हिस्सा है ! यह उस बहादुर कौम के शरीर का ही एक अंग है ! यह सबसे बड़ी पहचान है, सिक्खों की, जिसे वर्षों तक अत्याचारों, अन्यायों, शोषणों व ज्यादितियों के विरुद्ध असंख्य कुर्बानियों, शहादतों व त्यागों के बाद हासिल किया गया है ! गुरु आज्ञा से धारण किया जाने वाला दस्तार सिखों की मान-मर्यादा-सम्मान और गौरव का प्रतीक है.............. !
#हिन्दी_ब्लागिंग
देश के टुकड़े हो गए ! अंग्रेज स्थूल रूप से चले गए, पर जिन्होंने राज हथियाया, उन पर उनका प्रतीयमान सदा हावी रहा ! ''फूट डालो और राज करो'' को गुरु मंत्र की तरह अंगीकार कर लिया गया ! राज करने वालों की सिर्फ चमड़ी का रंग बदला, कार्य प्रणाली वही रही ! आजादी पाने की ख़ुशी में सब कुछ भूले अवाम को इस कदर अपने आभा मंडल से सम्मोहित कर दिया गया कि उसे "हर तरफ तू ही तू" नजर आने लगा ! धीरे-धीरे धर्म-जाति-भाषा रूपी अफीम चटाई जाने लगी ! लिहाजा वो अवाम जो कभी देश के लिए एक आवाज पर एकजुट हो कंधे से कंधा मिला खड़ा हो जाता था, अब बड़े से बड़े घटनाक्रम पर भी आँख मीचे अपने खोल में दुबका रहने लगा है ! सत्ता-पिपासु जो चाहते थे, वही हुआ !
अब चुनाव लियाकत की बजाय भीड़ की बदौलत जीते जाने लगे हैं ! उस भीड़ को बरगलाने के लिए तरह-तरह की शोशेबाजियों का सहारा लिया जाने लगा है ! कोई भी चुनाव आते ही तरह-तरह जुमले उछलने लगते हैं ! साधारण सी स्थानीय बात को कुछ लोगों की अज्ञानता का लाभ उठा, उनकी भावनाओं को भड़का, पैसे के बल पर राष्ट्रीय मुद्दा बना देश में अराजकता फैलाने का कुत्सित प्रयास शुरू हो जाता है ! हाल के पांच राज्यों के चुनाव में यह खेल फिर नजर आया है ! इस बार हिजाब का सहारा ले लोगों को भड़काने का कुचक्र रचा गया है ! मूर्खता की अति तो तब हो गई, जब इसकी तुलना सिक्खों की पगड़ी से कर दी गई ! जबकि दोनों कि कोई तुलना हो ही नहीं सकती ! क्योंकि एक है जो देश-दुनिया में शान से अपनी पहचान उजागर करवाती है तो दूसरी ओर वह है जो पहचान को छुपाने का काम करता है !
तुलना करने वाली इस जमात में तथाकथित बुद्धिजीवी, सदा से देश के खिलाफ रहे साम्यवादी, मौकापरस्त राजनीतिज्ञ, पैसे के गुलाम न्याय-भक्षक या देश विरोधी ताकतें तो शामिल थी हीं, साथ ही अक्ल के अंधे और गाँठ के पूरे, अपने को देश वासियों से अलग और ऊपर मानने वाले कुछ फिल्मी लोग भी अपनी समझदानी की डिबिया खोल ज्ञान बघारने लगे ! तुलना करने वालों को मुंह खोलते शर्म भी नहीं आई ! कहां पगड़ी और कहां हिजाब ! यह पगड़ी यानी दस्तार सिर्फ कपडे का टुकड़ा नहीं है ! सिक्ख धर्म का अनिवार्य हिस्सा है ! यह सबसे बड़ी पहचान है सिक्खों की, जिसे वर्षों तक अत्याचारों, अन्यायों, शोषणों व ज्यादितियों के खिलाफ असंख्य कुर्बानियों, शहादतों व त्यागों के बाद हासिल किया गया है ! यह उस बहादुर कौम के शरीर का ही एक अंग है ! गुरु आज्ञा से धारण किया जाने वाला दस्तार सिखों की मान-मर्यादा-सम्मान और गौरव का प्रतीक है !
दूसरी तरफ हिजाब महिलाओं द्वारा लोगों से बात करते समय ओट के लिए काम आने वाला एक पर्दा है ! ठीक है, कई तरह के लोगों से महिलाओं का वास्ता पड़ता है, इससे अवांछित लोगों से आड़ बनी रहती है ! इससे आज तक किसी को कोई परेशानी भी नहीं थी ! पर अब इसी की आड़ में असमाजिक तत्वों द्वारा अपनी पहचान छुपा देश-समाज में अराजकता फैलाने की कोशिश हो रही है ! इसीलिए यह अब विवाद का विषय बन गया है ! वैसे इसे किसी के निजी जीवन से हटाने की किसी की मंशा नहीं है पर विद्यालय-महाविद्यालय जैसी जगहों में जहां अनुशासन प्राथमिकता है वहां के लिए जिद करना बेमानी है ! यदि इसके पक्ष में खुद के परिधान पहनने की मौलिक अधिकार की दुहाई दी जा रही है, तो "एमयू" के द्वारा जारी ड्रेस-कोड को क्या कहा जाएगा, जिसमें वहां की छात्राओं को सिर्फ सलवार-कमीज और दुपट्टा ही पहनना अनिवार्य है ! इसे क्या कहेंगे ! वहां क्यों नहीं विरोध होता ? दोहरी मानसिकता तो कबूल नहीं की जा सकती !
जिनका है वे तो हिजाब के पक्ष में खड़े होंगे ही, शुरू से ही उन्हें इसकी आदत है ! पर सिर्फ अपने मतलब के लिए इस विवाद को हवा दे, उनका साथ देने वाले विघ्नसंतोषी, मौकापरस्त ! क्या उन्हें अपना इतिहास नहीं मालुम ? क्या उन्हें सिक्ख धर्म की स्थापना क्यों और कैसे हुई, इसका ज्ञान नहीं ? क्या भूल गए ये लोग गुरुओं की परपरा को, उनकी वाणी को, उनके त्याग को, उनकी कुर्बानियों को ? क्या इन कुटिलों को पगड़ी की महत्ता का एहसास नहीं है ? क्या उन्हें नहीं मालुम की एक सिक्ख जान दे सकता है पर अपनी पगड़ी अपने दस्तार पर आंच नहीं आने दे सकता ! एक बार मुंह खोलते समय तनिक भी हिचकिचाहट नहीं हुई इन लोगों को तुलना करते हुए कि मैं क्या बोलने जा रहा हूँ ! क्रोध नहीं, घिन्न आती है ऐसे लोगों पर !
सही बात तो यह है कि अब आम देशवासी भी सब देखने समझने लग गया है ! उसे पहले की तरह भरमा या बेवकूफ बना कर नहीं रखा जा सकता ! इस खेल को भी सब समझ रहे हैं कि कौन-कैसे अपनी ओछी मानसिकता और लिप्सा के कारण क्यों और क्या कर रहा है ! किसको देश-समाज-सर्वहारा की चिंता है और किसे सिर्फ और सिर्फ अपनी ! आशा है हाशिए पर सरका दिए जाने के बावजूद अपने गुमान के नशे में खोए लोग जल्द असलियत की धरती पर उतर उसकी कठोरता का आभास पा सकेंगे !
गुरुवार, 17 फ़रवरी 2022
एक दल अर्श से फर्श के भी नीचे
बुधवार, 9 फ़रवरी 2022
हमारी लता जी, कुछ छुए-अनछुए पहलू
इतनी बड़ी हस्ती के बारे में जितना भी लिखा जाए वह कम ही लगेगा ! कितना भी शोध कर लीजिए, कुछ न कुछ छूट ही जाएगा ! कितनी भी बातें कर लीजिए, कम ही रह जाएंगी ! इतने विशाल व्यक्तित्व को शब्दों में सहेजना मुमकिन नहीं है ! पर जो भी हो यह सच है कि वे सदा हमारे हृदयों पर राज करती रहेंगी, ससम्मान ! जब भी गीत-संगीत की बात होगी उनका नाम प्रमुखता से लिया जाएगा ! जब तक प्रकृति में संगीत रहेगा तब तक लता जी भी हम सब के बीच रहेंगी...........!!
#हिन्दी_ब्लागिंग
यह शाश्वत सत्य है कि जो भी इस धरा पर जन्म लेगा, चाहे वह कोई भी हो, चल-अचल, जड़-चेतन, उसकी मृत्यु निश्चित है ! इसीलिए इसे मृत्युलोक भी कहा जाता है। यहां रोज हजारों-लाखों लोग मरते हैं जिनकी कोई खोज-खबर नहीं होती ! कुछ विशेष लोगों की खबर कुछ लोगों तक पहुंचती है, कुछ दिनों बाद लोग उन्हें भूल-भाल जाते हैं ! पर कुछ महान, दिव्य हस्तियां ऐसी भी होती हैं, जिनका अस्तित्व भौतिक रूप से विलीन हो जाने के बावजूद यहां लोगों के जेहन में सदा मौजूद रहता है ! ऐसी ही दिव्यात्मा थीं हमारी लता जी ! जिनको भुला पाना शायद ही कभी संभव हो पाए ! एक ऐसी हस्ती जिसके लिए देश ही नहीं, विदेशों में भी लोग शोकग्रस्त हो गए !
महान लोगों का जीवन एक खुली किताब सा हो जाता है। लोगों की उनमें दिलचस्पी के कारण उनकी हर बात सार्वजनिक हो जाती है ! कुछ बातें बेहद आम हो जाती हैं पर कुछ फिर भी ऐसी होती हैं जो बहुत से लोगों तक नहीं पहुँच पातीं ! लता जी से संबंधित ऐसी ही कुछ बातों का, जो सोशल माध्यम पर उपलब्ध होने के बावजूद बेहद आम नहीं हुईं है। आज श्रद्धांजलि स्वरूप कुछ ऐसी ही बातों का यहां जिक्र, जिससे उनकी याद यहां सदा दर्ज रहे !
उनके पिता दीनानाथ और मां शेवांति जी ने अपनी इस पहली संतान का नाम हेमा रखा था। पर बाद में उनके पिताजी ने अपने एक नाटक भाव-बंधन के एक अति लोकप्रिय किरदार लतिका से प्रभावित हो उनका नाम लता कर दिया।
लता जी अपने स्कूल के पहले दिन अपनी छोटी बहन आशा को भी साथ ले गईं थीं ! पर जब स्कूल द्वारा दोनों की फीस मांगी गई तब उन्होंने खुद भी स्कूल न जाने का फैसला कर लिया ! उनकी शिक्षा घर पर ही संपन्न हुई ! हालांकि उन्हें जीवन में छह-छह यूनिवर्सिटियों से मानद उपाधि द्वारा नवाजा गया।
लता जी तब 5-6 वर्ष की थीं तो पिता की अनुपस्थिति में उनके शिष्य को एक राग गलत गाते सुन, उसको सही तरह गा कर बताया ! उनके पिता जी को तब तक लता जी के हुनर का पता नहीं था ! उनको एक जटिल राग को सहजता से गाता देख वे आश्चर्यचकित रह गए ! तभी से उन्होंने लता जी को प्रशिक्षित करना शुरू कर दिया।
लता जी को रेडिओ सुनने का बहुत शौक था ! पर जिस दिन वह अपना पहला रेडियो घर ला उसे सुनने बैठीं तो पहली खबर ही सहगल जी के देहावसान की मिली, उन्होंने रेडिओ ही वापस कर दिया !
लता जी के लिए गायन एक पूजा थी, आराधना थी ! वे जब भी कोई गाना रिकॉर्ड करती थीं तो अपने जूते या चप्पल जो भी पहने होती थीं, उतार देती थीं।
फिल्म जगत से जुड़ी दो ही हस्तियों को भारत रत्न और दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया है ! लता जी के अलावा यह गौरव सत्यजीत रे जी को ही मिला है !
वे हर काम को पूर्णरूपेण सही ढंग से करने में विश्वास रखती थीं यानी जूनून की हद तक पूरी परफेक्शनिस्ट थीं ! पूरी गहराई तक जा-समझ कर ही उसे पूरा करती थीं। फिर चाहे वह गायन हो या फोटोग्राफी। गायन की तरह ही वे बेहद कुशल फोटोग्राफर थीं ! जो उनका बेहद पसंदीदा शौक था !
लताजी को स्वर कोकिला की उपाधि देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल जी ने बड़ी आत्मीयता के साथ दी थी।
वैसे तो बड़े से बड़े संगीत विशेषज्ञ उनके गायन में कोई त्रुटि नहीं ढूंढ पाते, पर लता जी कभी भी अपनी रचनाओं से पूर्णतया संतुष्ट नहीं होती थीं, उन्हें सदैव लगता था कि इस से भी बेहतर किया जा सकता है ! एक बार उन्होंने बताया था कि मैं अपने गाने नहीं सुनती क्योंकि मुझे लगता है कि उनमें मुझे कोई न कोई कमी नजर आ जाएगी ! उनका नाम 1974 की गिनीज बुक में as the most recorded artist के रूप में दर्ज किया गया था।
क्रिकेट के शौक ने ही उन्हें राज सिंह डूंगरपुर से मिलवाया था। राज सिंह जी लता जी के क्रिकेट प्रेमी और खिलाड़ी भाई हृदयनाथ जी के दोस्त थे। उन्हीं ने दोनों को मिलवाया था ! इन दोनों के संबंधों की अनेक बातें हैं। जिनकी चर्चा सोशल मिड़िया, संगीत की दुनिया या कहीं होती भी है तो बड़े अदब के साथ की जाती है। यह भी कि दोनों ने आजीवन विवाह नहीं किया और राज सिंह जी लताजी को अक्सर ''मिठू'' कह कर बुलाया करते थे !
लता जी ने भारतीय सेना को समर्पित अपना अंतिम गाना ''सौगंध मुझे इस मिटटी की'' रेकॉर्ड करवाया था जो 30 मार्च 2019 रिलीज किया गया था।
सोमवार, 31 जनवरी 2022
येड़ा बन कर पेड़ा खाना
बातचीत के दौरान ही माधवजी सोनू को आवाज लगाते और उसके आने पर सबके सामने उसे एक दो रुपये का और एक पांच रुपये का सिक्का दिखला कर कोई एक उठाने को कहते थे ! जिस पर सोनू झट से दोनों सिक्कों में कुछ बड़ा दो रुपये का सिक्का ही उठाता था ! इस बात पर सब हंसने लगते, सोनू की कमअक्ली पर ! पर सोनू पर उनके हंसने या अपने मजाक बनने का कोई असर नहीं होता, वह तो सिक्का उठा, यह जा; वह जा.................!
#हिन्दी_ब्लागिंग
मुहावरे जिंदगी के तजुर्बों पर ही बनते हैं ! इनमें समाज और लोगों के अनुभवों का सार होता है। ऐसा ही एक मुहावरा है, ''येड़ा बन कर पेड़ा खाना !'' वैसे तो यह एक बंबइया मुहावरा है, जिसका मतलब होता है, खुद को बेवकूफ जतला कर अपना अभिलाषित या वांछित पा लेना ! पर आज कल ऐसे येड़े देश भर में अपने पेड़ों की तलाश में विचरते नजर आ रहे हैं ! बस जरा सा फर्क है कि वे दूसरों को येड़ा बना पेड़ा खुद खा रहे हैं ! इसी मंजर पर एक पुरानी बात याद आ गई ! आशा है गुदगुदाएगी जरूर !
जिस दिन मैंने पांच का सिक्का उठा लिया, उसी दिन यह खेल बंद हो जाएगा और मेरी आमदनी भी
रायपुर में मेरी रिहाइश के दौरान मेरे एक पडोसी थे, माधव जी ! मिलनसार, हंसमुख, खुश मिजाज ! अच्छा-खासा परिवार ! उनके स्वभाव के कारण उनके मित्रों की भी अच्छी-खासी जमात थी ! घर में किसी न किसी का आना-जाना लगा ही रहता था। उनके सात और पांच साल के दो लड़के थे ! बड़े को प्यार से सोनू तथा छोटे को छोटू कह कर बुलाया जाता था। अपने मजाकिया स्वभाव के कारण माधव जी अक्सर अपने घर आने वालों को सोनू की 'बुद्धिमंदता' का खेल दिखलाते रहते थे ! होता क्या था कि बातचीत के दौरान ही माधवजी सोनू को आवाज लगाते और उसके आने पर सबके सामने उसे एक दो रुपये का और एक पांच रुपये का सिक्का दिखला कर कोई एक उठाने को कहते थे ! जिस पर सोनू झट से दोनों सिक्कों में कुछ बड़ा दो रुपये का सिक्का ही उठाता था ! इस बात पर सब हंसने लगते, सोनू की कमअक्ली पर ! पर सोनू पर उनके हंसने या अपने मजाक बनने का कोई असर नहीं होता, वह तो सिक्का उठा, यह जा, वह जा।माधवजी भी मजे ले-ले कर बताते कि बचपन से ही सोनू बड़ा सिक्का ही उठाता है, बिना उसकी कीमत जाने ! जबकि छोटू को इसकी समझ है। यह खेल काफी समय से चला आ रहा है, पर सोनू वैसे का वैसा ही है !
पर सोनू की माँ, श्रीमती माधव को यह सब अच्छा नहीं लगता था कि कोई उनके बेटे का मजाक बनाए। पर कई बार कहने, समझाने के बावजूद भी माधवजी अपने इस खेल को बंद नहीं करते थे। एक बार सोनू के मामाजी इनके यहाँ आए। बातों-बातों में बहन ने भाई को इस बारे में भी बताया। मामाजी को भी यह बात खली। उन्होंने अकेले में सोनू को बुलाया और कहा, बेटा तुम बड़े हो गए हो ! स्कूल जाते हो, पढाई में भी ठीक हो, तो तुम्हें क्या यह नहीं पता कि दो रुपये, पांच रुपयों से कम होते हैं ?
पता है, सोनू ने कहा !
तब तुम सदा लोगों के सामने दो रुपये ही क्यों उठाते हो ? लोग तुम्हारा मजाक बनाते हैं ? मामाजी ने आश्चर्य चकित हो पूछा।
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