सोमवार, 10 फ़रवरी 2025

कोलकाता का अद्भुत फोर्ट विलियम, अब विजय दुर्ग 😇

किला शब्द सुनते ही ऊंचाई पर बनी एक व्यापक, विशाल संरचना की तस्वीर दिमाग में बनती है ! ऊँची-ऊँची, अभेद्य, मजबूत दीवारें ! उन पर हथियारों के लिए बने झरोखे ! दीर्घकाय, कीलों मढ़े दरवाजे ! उन तक पहुंचने के लिए अनगिनत सीढ़ियां ! पर फोर्ट विलियम यानी विजय दुर्ग में ऐसा कुछ नहीं है, यह बिलकुल अलग है ! ऊंचाई की तो छोड़ें, कुछ दूरी से तो यह दिखलाई भी नहीं पड़ता, क्योंकि इसका निर्माण भूमि-तल से नीचे किया गया है.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग      

कलकत्ता, अब का कोलकाता ! महलों के शहर की ख्याति के बावजूद, एक धीर-गंभीर शहर ! इसने कभी भी औरों की तरह शोर नहीं मचाया कि मेरा क़ुतुब मीनार देखो, मेरा ताजमहल देखो, मेरा गेटवे ऑफ इंडिया देखो, मेरा गोल्डन बीच देखो या मेरा चार मीनार देखो ! इसने कभी गर्वोक्ति नहीं की कि देखो, देश में पहली बार मेरे यहां यह-यह हुआ ! जबकि इसके पास ऐसा बताने को, दिखाने को कई दर्जन उदाहरण मौजूद हैं ! 

विक्टोरिया मेमोरियल 

हावड़ा ब्रिज 

आज उन्हीं में से एक की बात ! वह है 1781 के कलकत्ता में अंग्रेजों द्वारा करीब 170 एकड़ में निर्मित एक अद्भुत किला, फोर्ट विलियम। जिसका नामकरण ब्रिटिश सम्राट विलियम III के नाम पर किया गया था। यह भारतीय सेना के पूर्वी कमान का मुख्यालय है। उसकी चर्चा इसलिए भी सामयिक है, क्योंकि पिछले साल दिसम्बर में उसका नाम बदल कर, महाराष्ट्र के सिंधु-दुर्ग तट पर स्थित शिवाजी के मजबूत नौसैनिक अड्डे से प्रेरणा ले विजय दुर्ग कर दिया गया है। जो भारतीय इतिहास और राष्ट्रवाद के प्रतीक छत्रपति शिवाजी को श्रद्धांजलि के रूप में समर्पित है। इसके साथ ही अपनी सेना के नायकों को सम्मान देने हेतु,  इसके भीतर की कुछ इमारतों  के नाम भी बदल दिए गए हैं ! 

किले का एक प्रवेश द्वार 

अंदरूनी भाग 

फोर्ट विलियम ! कोलकाता के दिल धर्मतल्ला से विक्टोरिया मेमोरियल की तरफ बढ़ें, तो इस महानगर का इकलौता हरियालियुक्त स्थान, मैदान शुरू हो जाता है, जो कि किले का ही एक हिस्सा है ! उसी मैदान और हुगली (गंगा) नदी के पूर्वी किनारे के बीच के इलाके पर, जो उस समय के बंगाल के गवर्नर जनरल वैरेन हेस्टिंग के नाम पर हेस्टिंग कहलाता है, वहीं खिदिरपुर रोड़ पर यह किला स्थित है। जो कोलकाता के प्रसिद्ध व विख्यात स्थानों में से एक है। 

खिदिरपुर रोड का बाहरी हिस्सा 

अंदर की भव्य ईमारत 

किला शब्द सुनते ही ऊंचाई पर बनी एक व्यापक, विशाल संरचना की तस्वीर दिमाग में बनती है जिसके सामने हर चीज बौनी नजर आती हो ! ऊँची-ऊँची, अभेद्य, मजबूत दीवारें ! उन पर हथियारों के लिए बने झरोखे ! दीर्घकाय, कीलों मढ़े दरवाजे ! उन तक पहुंचने के लिए अनगिनत सीढ़ियां ! पर फोर्ट विलियम यानी विजय दुर्ग इससे बिलकुल अलग है ! ऊंचाई की तो छोड़ें, कुछ दूरी से तो यह दिखलाई भी नहीं पड़ता, क्योंकि इसका निर्माण भूमि-तल से नीचे किया गया है। जब तक इसके पास ना पहुंचो, पता ही नहीं चलता कि यहां कोई विशाल परिसर भी बना हुआ है ! 

शस्त्र म्यूजियम 
वास्तुकला 
ब्लैक होल त्रासदी ! अब किला है तो उसका ताल्लुक युद्ध, नर संहार, विभीषिका से भी होना ही है ! इसके साथ भी एक ऐसी किवदंती जुडी हुई है। 1756 में नवाब सिराज्जुदौला ने अंग्रेजों पर हमला कर इस किले को अपने कब्जे में ले, 146 बंदियों को एक 18 x 15 (लगभग) के कमरे में बंद कर दिया था ! तीन दिन बाद जब उसे खोला गया तो सिर्फ 23 लोग ही जिंदा बचे थे ! वैसे इस घटना को इतिहासकार प्रमाणिक नहीं मानते उनके अनुसार यह मनघड़ंत घटना अंग्रेजों द्वारा प्लासी के युद्ध का कारण और उसका औचित्य बनाए रखने के लिए गढ़ी गई थी ! बात चाहे झूठी ही हो पर किले के साथ उसकी चर्चा जरूर होती है।
ब्लैक होल, स्मारक 

खूबसूरत परिसर 

विजय दुर्ग में दस हजार जवानों के रहने की सर्वसुविधा युक्त व्यवस्था है ! जिनमें स्विमिंग पूल, फायरिंग रेंज, बॉक्सिंग स्टेडियम, कई गोल्फ कोर्स, सिनेमा इत्यादि शामिल हैं। इसके छह मुख्य द्वार हैं ! आम नागरिक इजाजत पत्र लेकर किले के कुछ चुनिंदा स्थानों को देख सकते हैं ! प्रवेश नि:शुल्क है और समय सुबह 10 बजे से शाम 5.30 तक निर्धारित है। कभी समय और मौका हो तो इस ऐतिहासिक धरोहर को जरूर देखना चाहिए।

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2025

अमेरिका की कार्रवाई से जुड़े - यदि, तो, जैसे कुछ अंदेशे

सबसे भयावक है कि जिस मैक्सिको की सीमा से कूद-फांद कर ये लोग अमेरिका में घुसे थे, यदि उसी मैक्सिको में वापस फेंक दिए जाते तो ? पनामा के जंगलों में घटने वाली जो थोड़ी-बहुत बातें बाहर आती हैं, वे इतनी डरावनी, भयानक व हृदय-विदारक हैं कि उनका विवरण भी नहीं किया जा सकता ! वापस तो आना दूर, वहां जो नारकीयता इन पर बीतती उसका तो अंदाज भी नहीं लगाया जा सकता ! खासकर युवतियों-महिलाओं की मुसीबतों, उनके शारीरिक-मानसिक उत्पीड़न के बारे में...........!!

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पिछले दिनों अमेरिका ने अपने यहां चोरी-छुपे, अनैतिक तथा गैर कानूनी रूप से घुसने वाले कुछ ऐसे लोगों को वापस भारत भिजवा दिया, जिन्हें ना यहां की सरकार ने, ना समाज ने, ना ही उनकी लियाकत ने इजाजत दी थी ''खच्चर वाले रास्ते'' से वहां जाने की ! ना ही जहां ये जा रहे थे, वहां की सरकार ने, या समाज ने या किसी और ने न्योता था, अपने यहां आने को ! 

जैसा कि अपने देश में होता आया है, जहां कुछ लोग मौतों में भी अपने लिए अवसर तलाशने लगते हैं, इस घटना पर भी उनके बचाव में पिंकी-गुड्डू जैसे गैंग उतर आए ! उन जैसों से ही यह सवाल है कि भाई रात के अंधेरे में यदि आपके घर कोई दिवार टाप कर अंदर घुसता है, तो क्या आप उसे डिनर खिला, उपहार दे, अपनी गाड़ी में उसके घर छोड़ने जाओगे या पहले खुद छितरैल कर पुलिस के हवाले करोगे ? 

हताशा में, बेघर हुए, नकारे हुए, हाशिए पर सरका दिए गए कुछ लोग सच को झूठ और झूठ को महा झूठ बना कर, अपने को फिर स्थापित करने का मौका तलाशते रहते हैं ! भले ही हर बार बेइज्जत हो (चाटने वाली बात कुछ भदेश हो जाती है) मुंह की खानी पड़ती हो ! ऐसे मौकापरस्तों, अवसरवादियों को किनारे कर (already they are) कुछ आशंकाओं पर नजर डाल, उनके परिणाम के बारे में सोचें तो रोंगटे खड़े हो जाएंगे !   

मान लीजिए, लौटाए गए ऐसे लोगों को, जिनका ना कोई रेकॉर्ड होता है, ना ही गिनती, ना ही दस्तावेज, उन्हें कैद कर सालों-साल के लिए जेल में डाल  दिया जाता  तो ? 

आप दुनिया के सबसे ताकतवर देश में, उसकी इजाजत के बगैर, अवैध रूप से घुस-पैठ करते पकड़े जाते हो ! यदि वह अपने देश में अराजकता और हिंसा फैलाने का दोष लगा गोली ही मार देता तो, पता भी नहीं चलता ! होती किसी की हिम्मत पूछने की ? वैसे भी कितने ही मार दिए जाते हों, क्या पता ! मार कर दुर्घटना का रूप दे दिया जाता हो, क्या पता ! कितने कैसी सजा भुगत रहे हों, क्या पता !

सबसे भयावक है कि जिस मैक्सिको की सीमा से कूद-फांद कर ये लोग अमेरिका में घुसे थे, यदि उसी मैक्सिको में वापस फेंक दिए जाते तो ? पनामा के जंगल जो मानव तस्करी करने वाले सबसे खतरनाक, निष्ठुर, माफियाओं के गढ़ हैं ! जहां माफियाओं द्वारा पैसे के लिए नृशंस, पाश्विक कृत्य जानवरों तक को दहला देते हैं ! वहां घटने वाली जो थोड़ी-बहुत बातें बाहर आती हैं, वे इतनी डरावनी, भयानक व हृदय-विदारक होती हैं कि उनका विवरण भी नहीं किया जा सकता ! वहां से इनका वापस आना तो दूर, वहां जिन्दा रह पाना भी मुश्किल होता ! जो नारकीयता इन पर बीतती उसका तो अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता ! खासकर युवतियों-महिलाओं की मुसीबतों, उनके शारीरिक-मानसिक उत्पीड़न के बारे में ! उनकी तो जिंदगी नर्क बन कर रह जाती !

रही एजेंटों की बात तो वे पहुंचाने के पैसे लेते हैं, लौटा कर लाने के नहीं ! सोचने की बात है जो घुस-पैठ करवाने के ही पचास-पचास लाख ले लेते हों वे उस बदतरीन परिस्थिति में क्या नहीं मांग सकते ! वैसे भी ऐसे बदनसीबों की तलाश वहां के माफिया को रहती है जो शरीर के अंगों की तस्करी करते हैं ! उनको तो एक ही शरीर से करोड़ों की आमदनी हो जाती है ! तो...................................!!

माँ-बाप को, घर के बड़ों को, परिवार को, दूसरों की शिकायत या और किसी पर दोष मढ़ने की बजाय शुक्र मनाना चाहिए कि बच्चे सशरीर घर वापस आ गए हैं ! इसके साथ ही देश के ऐसे ''गरीबों'' को सबक लेना चाहिए कि लाखों-करोड़ों खर्च कर चौबीस घंटे किसी अनहोनी के डर से आशंकित रह, 14-14 घंटे की ड्यूटी करने से कहीं बेहतर है कि बाहर जाने की लालसा त्याग, यदि देश में ही परिवार के संग रह, उन्हीं पैसों से देश में ही कुछ कर सकून की जिंदगी बसर कर ली जाए !   

बुधवार, 5 फ़रवरी 2025

ललिता का बेटा

बिना किसी अपेक्षा के, अपनी अंतरात्मा की आवाज पर, निस्वार्थ भाव से किसी के लिए किया गया कोई भी कर्म जिंदगी भर आपको संतोष प्रदान करता रहता है। यह रचना काल्पनिक नहीं बल्कि सत्य पर आधारित है। श्रीमती जी शिक्षिका रह चुकी हैं। उसी दौरान उनका एक संस्मरण उन्हीं के शब्दों में ...........!   

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अभी अपने स्कूल पहुंची ही थी कि राजेंद्र को एक छोटे से बच्चे के साथ आते देखा ! अंदाज हो गया कि बच्चा उसी का होगा ! कुछ ही देर में इसकी पुष्टि भी हो गई ! उसने बताया कि वह अपने बच्चे का दाखिला करवाने आया है ! मेरी आँखों के सामने पिछले पैंतीस साल किसी फिल्म की तरह गुजर गए ! तब मुझे साल भर ही हुआ था, छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर शहर के इस स्कुल में शिक्षिका के रूप में काम करते, जब ललिता अपने इसी बेटे राजेंद्र को मेरे पास लाई थी, स्कुल में प्रवेश के हेतु। आज वही राजेंद्र मेरे सामने खड़ा है, अपने बेटे का हाथ थामे और आज साल भर ही  रह गया है, मेरे रिटायरमेंट में ! अजब संयोग था !
काफी पुरानी बात है, उस समय कुकुरमुत्तों की तरह गली-गली स्कूली दुकानें नहीं खुली थीं। हमारा विद्यालय भी एक संस्था द्वारा संचालित था। जहां बच्चों का दाखिला उनकी योग्यता के अनुसार ही किया जाता था। यहां की सबसे अच्छी बात थी कि इस स्कूल में समाज के हर तबके के परिवार के बच्चे बिना किसी भेद-भाव के शिक्षा पाते थे। कार से आने वाले बच्चे पर भी उतना ही ध्यान दिया जाता था, जितना मेहनत-मजदूरी करने वाले के घर से आने वाले बच्चे पर। फीस के अलावा किसी भी तरह का अतिरिक्त आर्थिक भार किसी पर नहीं डाला जाता था। फीस से ही सारे खर्चे पूरे करने की कोशिश की जाती थी। इसीलिए स्टाफ की तनख्वाह कुछ कम ही थी। पर माहौल का अपनापन और शांति, यहां बने रहने के लिए काफी था। हालांकि करीब तीस साल की लम्बी अवधि में मेरे पास विभिन्न जगहों से कई नियुक्ति प्रस्ताव आए पर इस अपने परिवार जैसे माहौल को छोड़ कर जाने की कभी भी इच्छा नहीं हुई। स्कूल में कार्य करने के दौरान तरह-तरह के अनुभवों और लोगों से दो-चार होने का मौका मिलता रहता था।इसीलिए इतना लंबा समय कब गुजर गया पता ही नहीं चला।
पर इतने लम्बे कार्यकाल में सैकड़ों बच्चों को अपने सामने बड़े होते और जिंदगी में सफल होते देख खुशी और तसल्ली जरूर मिलती है। ऐसा कई बार हो चुका है कि किसी यात्रा के दौरान या बिलकुल अनजानी जगह पर अचानक कोई युवक आकर मेरे पैर छूता है और अपनी पत्नी को मेरे बारे में बतलाता है तो आँखों में ख़ुशी के आंसू आए बिना नहीं रहते। गर्व भी होता है कि मेरे पढ़ाए हुए बच्चे आज देश के साथ विदेशों में भी सफलता पूर्वक अपना जीवन यापन कर रहे हैं। खासकर उन बच्चों की सफलता को देख कर खुशी चौगुनी हो जाती है, जिन्होंने गरीबी में जन्म ले, अभावग्रस्त होते हुए भी अपने बल-बूते पर अपने जीवन को सफल बनाया।
ऐसा ही एक छात्र था, राजेन्द्र, उसकी माँ ललिता हमारे स्कूल में ही आया का काम करती थी। एक दिन वह अपने चार-पांच साल के बच्चे का पहली कक्षा में दाखिला करवा उसे मेरे पास ले कर आई और एक तरह से उसे मुझे सौंप दिया। वक्त गुजरता गया। मेरे सामने वह बच्चा, बालक और फिर युवा हो बारहवीं पास कर महाविद्यालय में दाखिल हो गया। इसी बीच ललिता को तपेदिक की बीमारी ने घेर लिया। पर उसने लाख मुसीबतों के बाद भी राजेन्द्र की पढ़ाई में रुकावट नहीं आने दी। उसकी मेहनत रंग लाई, राजेन्द्र द्वितीय श्रेणी में सनातक की परीक्षा पास कर एक जगह काम भी करने लग गया। 

वह लड़का बहुत कम बोलता था ! अपने मन की बात भी जाहिर नहीं होने देता था ! पर उसकी सदा यही इच्छा रहती थी कि जिस तरह भी हो वह अपने माँ-बाप को सदा खुश रख सके। अच्छे चरित्र के उस लडके ने अपने अभिभावकों की सेवा में कोई कसर नहीं रख छोड़ी। उससे जितना बन पड़ता था अपने माँ-बाप को हर सुख-सुविधा देने की कोशिश करता रहता था। माँ के लाख कहने पर भी अपना परिवार बनाने को वह टालता रहता था। उसका एक ही ध्येय था, माँ-बाप की ख़ुशी। ऐसा पुत्र पा वे दोनों भी धन्य हो गए थे। यही वजह थी कि वह बच्चा मुझे सदा याद रहा !

विधि का अपना विधान होता है ! इस परिवार ने कुछ समय के लिए ही जरा सा सुख देखा था कि एक दिन ललिता के पति का देहांत हो गया। इस विपदा के बाद तो बेटा अपनी माँ के प्रति पूरी तरह से समर्पित हो गया। पर भगवान को कुछ और ही मंजूर था ! ललिता अपने पति का बिछोह और अपनी बिमारी का बोझ ज्यादा दिन नहीं झेल पाई और पति की मौत के साल भर के भीतर ही वह भी उसके पास चली गयी। राजेन्द्र बिल्कुल टूट सा गया। मेरे पास अक्सर आ बैठा रहता था। जितना भी और जैसे भी हो सकता था मैं उसे समझाने और उसका दुःख दूर करने की चेष्टा करती थी। समय और हम सब के समझाने पर धीरे-धीरे वह नॉर्मल हुआ। काम में मन लगाने लगा। सम्मलित प्रयास से उसकी शादी भी करवा दी गयी। 

प्रभु की कृपा और अपने माँ-बाप के आशीर्वाद उसका गृहस्थ जीवन सुखमय रहा। जब कभी भी मुझसे मिलता, तो उसकी विनम्रता, विनयशीलता मुझे अंदर तक छू जाती ! आज वही राजेन्द्र अपने बच्चे के साथ मेरे सामने खड़ा था और मुझे उस बच्चे में वर्षों पहले का राजेंद्र नजर आ रहा था, जो पहली बार ऐसे ही मुझसे मिला था ! ऊपर से उसके माँ-बाप भी उसे देखते होंगे तो उनकी आत्मा भी उसे ढेरों आशीषों से नवाजती होगी। मुझे भी उसका अपने माँ-बाप के प्रति समर्पण कभी भूलता नहीं है। 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शनिवार, 1 फ़रवरी 2025

वर्षों से चुगलखोरी की सजा भुगतती, एक मजार

भोलू सैय्यद तो मर गया ! पर उसको दी गई वह अनोखी सजा, उसकी जर्जरावस्था तक पहुंच चुकी मजार आज भी भुगत रही है। जो ना जाने कब से दी जा रही है और ना जाने कब तक दी जाती रहेगी। उस समय तो राजाओं ने अक्लमंदी से काम ले एक बड़ी विपदा टाल दी थी ! पर आज के राजा तो खुद भोलू सैय्यद बने हुए हैं ! इनके द्वारा लाई गईं विपदाएं कौन टालता है, यही देखना है ! उस समय तो राजा ने प्रजा को सजा दी थी, आज प्रजा राजा को उसकी करनी का दंड दे दे, तो कोई अचरज नहीं.............!     

#हिन्दी_ब्लागिंग 

ईर्ष्या, द्वेष, वैमनस्य, प्रतिशोध जैसी भावनाऐं हर शख्स के मन में कमोबेश होती ही हैं ! बिरले संत-महात्मा ही इससे निजात पा सकते हैं ! इन्ही भावनाओं के तहत चुगली और झूठ जैसी आदतें भी आती हैं, जिनका सहारा अक्सर अपने व्यक्तिगत हित-लाभ के लिए लिया जाता रहा है ! इसके लिए किसी को कोई बड़ी सजा भी नहीं मिलती है। पर इतिहास में अपवाद स्वरूप चुगली के कारण दी गई एक अनोखी सजा का विवरण मिलता है जो दोषी के मरणोपरांत भी वर्षों से बाकायदा जारी है ! 

उपेक्षित, जर्जर इमारत 

मध्य प्रदेश के इटावा-फर्रुखाबाद मार्ग पर दतावली गांव के पास जुगराम जी का एक प्रसिद्ध मंदिर है। उसी से जरा आगे जाने पर खेतों में भोलू सैय्यद का मकबरा बना हुआ है। जो अपने नाम और खुद से जुड़ी प्रथा के कारण खासा मशहूर है। इसे चुगलखोर की मजार के नाम से जाना जाता है और प्रथा यह है कि यहां से गुजरने वाला हर शख्स इसकी कब्र पर कम से कम पांच जूते जरूर मारता है। क्योंकि यहां के लोगों में ऐसी धारणा है कि इसे जूते मार कर आरंभ की गयी यात्रा निर्विघ्न पूरी होती है। अब यह धारणा कैसे और क्यूँ बनी, कहा नहीं जा सकता। इसके बारे में अलग-अलग किंवदंतियां प्रचलित हैं !

वीरानगी 
ऐसा क्यों है इसकी कोई निश्चित प्रामाणिकता तो नहीं है पर जैसा यहां के लोग बताते हैं कि बहुत पहले इस विघ्नसंतोषी, सिरफिरे इंसान ने अपने किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए इटावा के राजा तथा अटरी के हुक्मरान को गलत अफवाहें फैला कर लड़वा दिया था। वह तो युद्ध के दौरान ही सच्चाई का पता चल गया और व्यापक जनहानि होने से बच गयी। इसे पकड़ मंगवाया गया और मौत की सजा दे दी गई। पर ऐसा नीच कृत्य करने वाले को मर कर भी चैन ना मिले इसलिये उसका मकबरा बनवा कर यह फर्मान जारी कर दिया गया कि इधर से हर गुजरने वाला इस कब्र पर पांच जूते मार कर ही आगे जायेगा। जिससे भविष्य में और कोई ऐसी घिनौनी हरकत ना करे।

दूसरों को दंडित करने की तत्परता 
इसके अलावा इसे 1129 में हुई राजा जयचंद और मुहम्मद गोरी की लड़ाई से भी जोड़ा जाता है ! कहते हैं उस समय यहां राजा सुमेर सिंह का राज था जिन्होंने इस युद्ध में राजा जयचंद का साथ दिया था ! युद्ध के दौरान उनकी खुफिया जानकारियां, वहां फकीर के रूप में रह रहे एक जासूस भोला सैय्यास ने गोरी तक पहुंचाईं थीं ! भेद खुलने पर राजा सुमेरसिंह ने उसे मृत्यु दंड दिया था, जिसमें उसकी जान जाने तक पत्थरों-जूतों से मारने की सजा थी ! उसके बाद उसकी मजार बनवा उस पर पत्थर लगवा कर उस पर चुगल खोर की मजार लिख, यह फर्मान जारी किया गया कि जो भी इधर से गुजरे वह इसको जूतों से मार कर ही आगे जाए ! तब से ऐसा ही चला आ रहा है ! पर अब बहुत कम हो चुका है !  

इंसानों के दिल-ओ-दिमाग का भी जवाब नहीं है ! मजार है ! इसलिए धीरे-धीरे लोग यहां मन्नत मांगने भी आने लगे हैं। हालांकि उसके लिए भी कब्र को फूल या चादर के बदले जूतों की पिटाई ही नसीब होती है ! इसके अलावा इधर से यात्रा करने वाले कुछ लोगों का मानना है कि यह रास्ता बाधित है इसलिए भी लोग खुद और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए मजार की जूतम-पैजार कर के ही अपनी यात्रा जारी रखते हैं ! 

भोलू सैय्यद तो मर गया, पर उसको दी गई वह अनोखी सजा, उसकी जर्जरावस्था तक पहुंच चुकी मजार आज भी भुगत रही है। जो ना जाने कब से दी जा रही है और ना जाने कब तक दी जाती रहेगी। उस समय तो राजाओं ने अक्लमंदी से काम ले एक बड़ी विपदा टाल दी थी ! पर आज के राजा तो खुद भोलू सैय्यद बने हुए हैं ! इनके द्वारा लाई गईं विपदाएं कौन टालता है, यही देखना है ! इतिहास खुद को दोहराता तो है पर कभी-कभी थोड़ी बहुत तबदीली भी तो हो ही जाती है ! उस समय तो राजा ने प्रजा को सजा दी थी, आज प्रजा राजा को उसकी करनी का दंड दे दे, तो कोई अचरज नहीं.............!     

@चित्र, संदर्भ, अंतर्जाल के सौजन्य से 

रविवार, 26 जनवरी 2025

पुलिसिया खौफ

अरे, कैसे बौड़म हो तुम ! जरा सी भी अक्ल नहीं है क्या ? रोज ही कुल्हाड़ी खोज-खोज कर अपना पैर उस पर जा मारने से बाज नहीं आते ! कभी तो दिमाग से काम ले लिया करो ! मैं स्तब्ध ! ऐसा क्या कर दिया मैंने ! धीरे से पूछा कि क्या हो गया ?'' क्या हो गया ?'' अरे, पूछो क्या नहीं हो गया !" कभी सोचा है तुमने कि जो पुलिस कुत्ते को भैंस में तब्दील कर सकती है, भैंस को कुत्ता बता कैद कर सकती है ! उसे तुम्हें भैंस और फिर कुत्ता साबित कर गिरफ्तार करने में कितनी देर लगेगी ! वैसे भी  तुम्हारा रंग काला ना सही, गहरा सांवला तो है ही ना.............!!        

#हिन्दी_ब्लागिंग           

अभी पूरा अँधेरा हुआ नहीं था ! पर ठंड के कारण बाहर इक्का-दुक्का लोग ही नज़र आ रहे थे ! श्रीमती जी उम्र के इस दौर की जरुरत के मुताबिक मंदिर में अर्जी लगाने गईं हुईं थीं। तभी मुख्य द्वार एक झन्नाटेदार आवाज के साथ खुला, लगा कोई भारी-भरकम चीज टकराई हो ! आवाज सुन बाहर निकला तो लॉन में एक भैंस को खड़े पाया, जो शायद गफलत में मुख्य द्वार खुला रहने की वजह से अंदर आ गई थी ! पास जाने की तो हिम्मत नहीं पड़ी सो दूर से ही हुश्शsssहुश्श की आवाज के साथ, हाथ वगैरह हिलाए पर वह जाने की बजाए मेरे और नजदीक आ गई !  

यही थीं 
मुझसे ना अंदर जाते बन रहा था ना हीं वहां खड़े रहते ! खुद को सभ्य, शांतिप्रिय, भाईचारे का हिमायती मानने वाले मुझ जैसे लोग किसी प्रकार का डंडा-लाठी भी अपने घर में नहीं रखते, पर आज अपनी स्वरक्षा के लिए ऐसी किसी चीज की जरुरत शिद्दत से महसूस हो रही थी ! इसी बीच भैंस बोल उठी, भाई साब, मुझे बचा लो ! मुझे एक झटका सा लगा ! पर मैं जैसे किसी दूसरे लोक में सपना देख रहा होऊं ! पता नहीं क्यों उसके इस तरह बोलने पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ, उलटे मैंने उससे पूछा कि क्या बात है, तुम घबराई सी क्यों हो ?

उसने बताना शुरू किया कि सुबह घोसी मोहल्ले में पुलिस आई थी जो किसी काले रंग के कुत्ते को खोज रही थी, जिसने किसी बड़े, रसूखदार आदमी को काट लिया था ! कुत्ता तो उन्हें नहीं मिला पर उनका हवलदार मुझे जैसे देखता हुआ गया, उससे मैं बहुत ही घबड़ा गई ! मैं बहुत ही डरपोक टाइप की भैंस हूं ! रंग भी मेरा काला है ! यदि पुलिस मुझे पकड़ कर ले गई और मेरी कुटाई कर मुझसे कुबुलवा लिया कि मैं भैस नहीं कुत्ता हूँ, तो मेरा क्या होगा ! इसी डर से मैं तबेले से भाग आई और आपका दरवाजा खुला देख अंदर आ गई ! अब आप ही मुझे बचा सकते हैं !

मेरी दबी-ढकी इंसानियत और पशुप्रेम ने अंगड़ाई ली ! मैंने उसे बाल्टी भर पानी पीने को दिया और पिछवाड़े के किचन गार्डन में ले जा कर कहा तुम यहां सुरक्षित महसूस करो, यदि भूख लगी हो तो यह घास वगैरह भी खा सकती हो ! वर्षों की पड़ी हुई मुफ्तखोरी की आदत यहां भी परोपकार के बहाने मुफ्त में झाड़-झंखाड़ की सफाई करवा लेने से बाज नहीं आई !  

अभी अपनी टुच्ची चतुराई पर खुश हो ही रहा था कि श्रीमती जी का आगमन हो गया ! आते ही बरस पड़ीं, बाहर का दरवाजा खुला पड़ा है और तुम यहां बैठे कम्प्यूटर टिपटिपा रहे हो ! कोई जानवर वगैरह घुस आया तो ? इतना भी नहीं कि जरा देख-दाख लिया करो, जनाब को फुरसत ही नहीं रहती ! इतने में उनकी नजर किचन गार्डन में घास चरती भैंसिया पर जा पड़ी, वहीं से चिल्लाईं, मैंने कहा था ना कि पशु-मवेशी घुस आएगा ! लो देखो, भैंस सारा लॉन चर गई है ! निकालो इसे !

मैंने उन्हें शांत करते हुए सारी बात बता कर कहा कि इसीलिए मैंने उसे अंदर लिया है ! मैंने सोचा था कि इस बात पर तो वे मेरी तारीफ करेंगी ही, पर यहां तो सदा की तरह फिर पासा उलटा पड़ गया ! श्रीमती जी ने सारी बात सुन अपना माथा पीट लिया, बोलीं, अरे कैसे बौड़म हो तुम ! जरा सी भी अक्ल नहीं है क्या ?तुमसे अक्लमंद तो ये भैंस है जिसने खतरा भांप लिया ! एक तुम हो जो कुल्हाड़ी खोज-खोज कर अपना पैर उस पर जा मारने से बाज नहीं आते ! कभी तो दिमाग से काम ले लिया करो ! 

मैं स्तब्ध ! ऐसा क्या कर दिया मैंने ! धीरे से पूछा कि क्या हो गया ?'' क्या हो गया ?'' अरे, पूछो क्या नहीं हो गया !" कभी सोचा है तुमने कि जो पुलिस कुत्ते को भैंस में तब्दील कर सकती है, भैंस को कुत्ता बता कैद कर सकती है ! उसे तुम्हें भैंस और फिर कुत्ता साबित कर गिरफ्तार करने में कितनी देर लगेगी ! वैसे भी  तुम्हारा रंग काला ना सही, गहरा सांवला तो है ही ना ! खुद तो अंदर जाओगे ही, मुझे भी परेशानी में डालोगे ! अगले हफ्ते मेरी तीन-तीन किटी पार्टियां हैं, क्या मुंह दिखाउंगी वहां !

अब बदहवास होने की मेरी बारी थी ! करूँ तो क्या करूँ ? मेरा तो कहीं छिपने का ठिकाना भी नहीं है ! कहाँ जाऊं ? ऐसे में AI का ख्याल आया। डूबते को तिनके का सहारा ! कम्प्यूटर खोल, AI के सामने अपनी समस्या रखी और उसका हल पूछा ! एक बार तो लगा कि वह भी सकते में आ गया है ! पर कुछ समय बाद उसका जवाब आया कि संसार में यदि कहीं की भी पुलिस किसी के पीछे पड़ जाए तो वह किसी भी हालत में बच नहीं सकता ! वही हाल आपका है। बचने का एक ही उपाय है ! आप कुत्तों की थोड़ी सी बोली सीख, अपने को कुत्ता डिक्लेयर कर, सरेंडर कर दो ! चकित हो मैंने पूछा इससे क्या होगा ? जवाब आया, इससे आप पुलिस की मार से बच जाएंगे और जब आपको कोर्ट में कुत्ते के रूप में पेश किया जाएगा तो आप भौंक कर दिखा जज को भी अपने श्वानपुत्र होने का विश्वास दिला देंगे ! फिर जो थोड़ी-बहुत सजा होगी उसे पूरा कर वापस आ जाइएगा ! मरता क्या ना करता ! कम्प्यूटर से ही सीखने की कोशिश कर रहा हूँ,

भौं-भौं....भौं.....भौं-भौं-भौं 

शनिवार, 18 जनवरी 2025

भइया ! अतिथि आने वाले हैं

इन्हें बदपरहेजी से सख्त नफरत है। दुनिया के किसी भी कोने में इन्हें अपनी शर्तों का उल्लंघन होते दिखता है तो ये अपने को रोक नहीं पाते और वहां बिना किसी जान-पहचान या रिश्तेदारी के पहुंच जाते हैं। देश-परदेस, जात-पात, भाषा-रंग, अमीर-गरीब, राजा-रंक किसी का भी भेद ना करने वाले ऐसे दरियादिल को लोग अलग-अलग जगहों में भिन्न-भिन्न नामों से जानते हैं, आप  इन्हें   किस नाम से जानते हैं ? बताइएगा 😇

#हिन्दी_ब्लागिंग 

सर्दी की चरमावस्था का जब करीब आधे से ज्यादा समय निकल गया ! ऐसे में कुछ दिनों पहले गले में जरा सी खराश और नाक के द्वार पर कुछ हलचल सी महसूस होने लगी ! जैसे कोई जबरन पैठना चाहता हो ! तन-मन पूर्णतया स्वस्थ लग रहा था ! सो दिल्ली के प्रदूषण पर दोष डाल निश्चिंतता बनी रही ! ऐसे मौसम में एक-दो छींकों को भी नजरंदाज कर दिया जाता है ! पर दूसरे दिन जो छींक आई तो उसके साथ उसका पांच-छह जनों का भरापुरा परिवार भी था ! तभी रूमालों ने भी आद्र हो-हो कर संकेत दे दिया कि भइया ! अतिथि आने वाले हैं !  

उनके आने का आभास तो शुक्रवार सुबह ही हो गया था और शाम तक तो उपस्थिति भी दर्ज हो चुकी थी। पर नौकरी-पेशा लोगों की कुछ मजबूरियां होती हैं, पर इसका अहसास उन्हें क्यूंकर हो सकता था ! उन्हें तो सिर्फ अपनी खातिरदारी और मेहमानवाजी से मतलब था ! उस पर, उनके आ पहुंचने की जानकारी के बावजूद, मेरे शनिवार को काम पर चले जाने को उन्होंने अपनी उपेक्षा के रूप में ले लिया, और नाराज हो गए ! वैसे उनका नाराज होना बनता भी था इसलिए जायज भी था ! पर मेरी तो मति ही मारी हुई थी !

तीसरा दिन रविवार का था। छुट्टी के कारण मैं उनके साथ ही था पर पूरे दिन वे भृकुटियां ताने वक्री बने रहे। अपने को फिर भी बात कुछ खास समझ नहीं आई और सोमवार को फिर उन्हें अनदेखा कर कार्यालय जाने की भूल दोहरा दी। गल्ती तो सरासर मेरी थी ही ! अब  बाहर से आए मेहमान की ना तो कोई खातिरदारी की, नाहीं फल-फुंगा भेंट किया, नाहीं ढंग से समय दिया ! ऐसे में तो कोई भी नाराज हो ही जाएगा ना ! 

फिर क्या था वे अपने रौद्र रूप में आ गए ! मेरा पूरा तन-बदन अपनी गिरफ्त में ले लिया। हर अंग पर उन्होंने अपनी पकड़ और जकड़ बना ली ! हिलना-डुलना तक दूभर कर डाला। जब चहूँ ओर से मार पड़ी तब जा कर अपुन को अपनी गल्तियों का अहसास हुआ। मंगल तथा बुधवार पूरी तरह से उनपर न्योछावर कर डाले। "प्रसाद" ला कर मान-मनौवल किया। इस पर कुछ बात बनती दिखी ! क्योंकि दिखने में वे कितने भी उग्र दिखते हों, स्वभाव से उतने हैं नहीं ! इसीलिए मेरे इतने से प्रयास से ही ढीले पड गए और बुध की शाम को अपने-आप वापस हो लिए !

ये बिना किसी तिथि के आने वाले अतिथि ऐसे हैं जिनके आने से कोई भी खुश नहीं होता ! कोई नहीं चाहता कि वे उनके घर किसी भी बहाने से आएं। इनके रुकने का समय भी तो निर्धारित नहीं होता, ना हुआ तो दूसरे दिन ही चल दें और कहीं मन रम गया तो दसियों दिन लगा दें। पर  इन दसेक दिनों में घर-बाहर वालों की ऐसी की तैसी कर धर देते हैं। 

वैसे इनके पक्ष से देखा जाए तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे ये चाहते हों या इनकी मंशा, ध्येय या लक्ष्य यह है कि संसार में सब जने स्वस्थ प्रसन्न रहें, कोई अपने प्रति लापरवाही ना बरते, अनियमित दिनचर्या ना अपनाए, अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखे, किसी तरह की काहली को जीवन में स्थान ना दे। इन्हें बदपरहेजी से भी सख्त नफरत है। दुनिया के किसी भी कोने में इन्हें अपनी शर्तों का उल्लंघन होते दिखता है तो ये अपने को रोक नहीं पाते और वहां बिना किसी जान-पहचान या रिश्तेदारी के पहुंच जाते हैं।

देश-परदेस, जात-पात, भाषा-रंग, अमीर-गरीब, राजा-रंक किसी का भी भेद ना करने वाले ऐसे समदर्शी, दरियादिल को लोग अलग-अलग जगहों में भिन्न-भिन्न नामों से जानते हैं। कोई बुखार कहता है, कोई ताप, कोई फिवर, कोई जुकाम तो कोई हरारत ! आप  इन्हें  किस नाम से जानते हैं ? बताइएगा 😇

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

मंगलवार, 14 जनवरी 2025

पत्रकारिता, लोकतंत्र का चौथा बंबू

पत्रकारिता के लिए एक बात बहुत उछाली जाती है कि यह लोकतंत्र का चौथा खंभा है ! कहां से आई यह उक्ति ? संविधान में तो जनतंत्र की सहायक एक तिपाई, TRIPOD, कार्यपालिका, विधायिका और सिर्फ न्यायपालिका का ही उल्लेख है, मीडिया का कोई जिक्र नहीं है, तब इस स्वयंभू चौथे बंबू की बात कैसे और किसके द्वारा थोपी गई ? जाहिर है कुटिल, सत्तालोलुप नेताओं, काला बाजारियों, भ्रष्ट व्यापारियों, बिचौलियों इत्यादि को ही इसकी जरुरत थी ! जिससे आम इंसान को बेवकूफ बना उनकी छवि बेदाग बनाए रखी जा सके ..............!!         

#हिन्दी_ब्लागिंग                                     

कुछ साल पहले तक समाचार पत्रों में छपी खबरों पर आम इंसान आँख मूँद कर विश्वास कर लिया करता था ! क्योंकि उसे मालूम था कि इन समाचारों को उन तक पहुंचाने वाले इंसान निर्भीक, निष्पक्ष, निडर व सत्य  के पक्षधर हैं ! रेड़िओ पर पढ़ी जाने वाली सरकारी खबरें भी बहुत हद तक दवाब-विहीन ही होती थीं ! पर धीरे-धीरे इस विधा में भी मतलबपरस्त, चापलूस, धन-लोलूप खलनायकों का दखल शुरू हो गया और आज हालत यह है कि संप्रेषण के किसी भी माध्यम पर, चाहे वह छपने वाला हो या दिखने वाला, किसी को भी पूर्ण विश्वास नहीं है ! इसी बीच व्हाट्सएप, युट्यूबर जैसी एक और खतरनाक मंडली भी उभर कर आई हुई है ! जिसका भ्रामक असर अति व्यापक, घातक और मारक है !

आज के समय में तकरीबन हर अखबार, हर टीवी चैनल, किसी ना किसी राजनैतिक दल का भौंपू बन कर रह गया है ! उनकी भी अपनी मजबूरी है ! आज कौन चाहेगा निष्पक्ष पत्रकारिता या सच को उजागर करने के चक्कर में अपना तंबू-लोटा समेट घर बैठना और तन-धन को जोखिम में डालना ! जबकि जरा सी चापलूसी, जी-हजूरी के बदले गाड़ी, घोड़ा, बंगला, जमीन, विदेशयात्रा, संरक्षता, मान-सम्मान, पुरस्कार, प्रतिष्ठा सभी कुछ हासिल हो रहा हो ! इसीलिए ऐसी गंगा में सभी हाथ धोने की बजाय पूरी डुबकियां लगाने से परहेज नहीं करते !

आम जनता भी अब जानकारी के लिए नहीं बल्कि समय गुजारने या मनोरंजन के लिए खबरिया चैनलों के सामने बैठने लगी है ! पर वहां की स्तरहीन, मक्कारी भरी, तथ्यहीन वार्ता और उसमें विभिन्न दलों के तथाकथित वार्ताकारों का ज्ञान, उनकी मानसिकता, उनकी शब्दावली, उनकी कुंठा, उनकी चारणिकता, उनके पूर्वाग्रहों को देख दर्शकों का रक्त-चाप ही  बढ़ता है ! मेहमान पर नहीं मेजबान पर कोफ्त होती है !
    
अर्से से पत्रकारिता के लिए एक बात बहुत उछाली जाती है कि यह लोकतंत्र का चौथा खंभा है ! कहां से आई यह उक्ति ? संविधान में तो जनतंत्र की सहायक एक तिपाई, TRIPOD, कार्यपालिका, विधायिका और सिर्फ न्यायपालिका का ही उल्लेख है, मीडिया का कोई जिक्र नहीं है ! तब इस स्वयंभू चौथे बंबू की बात कैसे और किसके द्वारा थोपी गई ? जाहिर है कुटिल, सत्तालोलुप नेताओं, काला बाजारियों, भ्रष्ट व्यापारियों, बिचौलियों इत्यादि को ही इसकी जरुरत थी ! जिससे आम इंसान को बेवकूफ बना उनकी छवि बेदाग बनाए रखी जा सके ! सो एक मंच तैयार किया गया, पर वही आज सच्चाई, विश्वास, नैतिकता, निष्पक्षता यहां तक कि देशहित को भी भस्मासुर की तरह स्वाहा करने पर उतारू है ! 

एक कहावत है कि हर चीज के बिकने की एक कीमत होती है ! तो कीमत लगी, माल खरीदा गया और उसे तरह-तरह के नाम और अलग-अलग तरह की थालों में रख, दुकानों में सजा दिया गया ! इधर पब्लिक अपनी उसी पुरानी भेड़चाल के तहत, अपने-अपने मिजाजानुसार उन दुकानों पर बिकते असबाबों की परख किए बगैर, उनकी गुणवत्ता को नजरंदाज कर, उनके रंग-रूप-चकाचौंध पर फिदा हो अपने सर पर लाद अपने-अपने घरों तक लाती रही ! भले ही बाद में पछताना ही पड़ रहा हो !

घोर विपरीत परिस्थितियों के बावजूद यह आशा बनी हुई है कि अभी भी  ऐसे लोग जरूर होंगे, जिनमें अभी भी जिम्मेवारी का एहसास बचा हुआ होगा ! जिनकी आत्मा रोती होगी आज के हालात देख कर ! जिनकी कर्त्तव्यपरायणता अभी भी सुप्तावस्था में नहीं चली गई होगी ! क्या ऐसे लोगों का जमीर उन्हें कभी कचोटता नहीं होगा ? क्या उनकी बची-खुची गरिमा उन्हें सोने देती होगी ? क्या कभी उन्हें अपनी उदासीनता पर ग्लानि नहीं होती होगी ? क्या उन्हें कभी ऐसा विचार नहीं आता होगा कि जिस विधा का काम समसामयिक विषयों पर लोगों को जागरूक करने और उनकी राय बनवाने में बड़ी भूमिका निभाना है और जिस कारणवश आज विश्व में मीडिया एक अलग शक्ति के रूप में उभरा है, उसी का अभिन्न अंग होते हुए भी वे उसका दुरूपयोग होते देख रहे हैं ! ऐसे लोगों को तो आगे आना ही पड़ेगा ! इस घोर अंधकार को मिटाने के लिए सच का दीपक प्रज्ज्वलित करना होगा ! छद्म संप्रेषण का चक्रव्यूह नष्ट कर निडर, निर्भीक, निर्लेप, विश्वसनीय निष्पक्षता का आलम फिर से स्थापित करना होगा !  

पर क्या ऐसा होगा ? क्या कोई ऐसी हिम्मत जुटा पाएगा ? क्या वर्तमान ताकतों का मायाजाल छिन्न-भिन्न हो सकेगा ? ऐसे बहुत सारे क्या हैं ! क्या इन क्याओं का उत्तर मिल पाएगा ? क्या अपने हित को दरकिनार कर, अपने नुक्सान की परवाह ना कर, देश, समाज, अवाम के हितार्थ सच के पैरोकार आगे आएंगे ? सुन तो रखा है कि बुराई पर अच्छाई की और झूठ पर सच की सदा विजय होती है ! 
देखें.........!!

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