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शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

ड्राई फ्रूट्स और सूखे मेवे ! फर्क है जरा सा दोनों में

जो भी हो, हैं तो सभी पौष्टिक आहार ही ! इन दोनों श्रेणियों में ही विटामिन, मिनरल तथा अन्य पोषक पदार्थ भरपूर मात्रा में होते हैं, जो हम सब को सेहतमंद तो बनाते ही हैं ना ! तो सर्दियों में इन सब का संतुलित मात्रा में उपयोग जरूर करें ! ध्यान यह भी रहे कि ''अति सर्वत्र वर्जयेत्''..............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग  

वैसे तो इनकी बारहों महीने मांग रहती है पर सर्दियों में पूछ कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है ! पर इधर मीडिया पर आई पोषण, खान-पान संबंधित सलाहकारों की बहार के डराने-धमकाने पर आम इंसान मिठाइयां, केक, चॉकलेट छोड़ इनकी तरफ कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो गया है ! जी हाँ, ड्राई फ्रूट ! जिनका नाम सामने आते ही काजू, बादाम, किसमिस, अखरोट आदि की तस्वीरें सामने आ जाती हैं ! पर क्या नाम के अनुसार ये सभी ड्राई फ्रूट हैं ?   

नट्स 

ड्राई फ्रूट्स 

देखा जाए तो ड्राई फ्रूट का अर्थ होता है, सूखे फल, जैसे किसमिस, खजूर, अंजीर, खुबानी इत्यादि। ऐसे फल जिन्हें धूप में या व्यावसायिक ड्रायर मशीनों में सुखा कर तैयार किया जाता है। काजू, बादाम वगैरह तो नट्स या बीज होते हैं। यहां भी हमारी भाषा की समृद्धि सामने आती है ! जहां इन्हें मेवा कहा जाता है ! इन सभी का अपना-अपना पौष्टिक महत्व है और इन्हें आहार में शामिल भी किया जाता है, लेकिन इनकी परिभाषा अलग-अलग है। 

 

प्रकृति की नेमत 
इनमें मुख्य अंतर यह है कि ड्राई फ्रूट्स वो फल होते हैं जिनकी नमी हटा, सुखा कर तैयार किया जाता है, जैसे अंजीर, खजूर, किसमिस, खुबानी इत्यादि ! दूसरी तरफ बादाम, काजू, अखरोट, पिस्ता आदि कठोर छिलके वाले फल के अंदर के बीज या उनका हिस्सा होते हैं ! इस तरह देखा जाए तो काजू, बादाम औरअखरोट इत्यादि तकनीकी रूप से मेवे हैं, जो अक्सर ड्राई फ्रूट्स के साथ ही खाए जाते हैं, लेकिन सूखे फल मेवों की श्रेणी में नहीं आते, पर सभी को सुविधा के लिए ड्राई फ्रूट्स कह दिया जाता है। 

पौष्टिकता 

जो भी हो, हैं तो सभी पौष्टिकता से भरपूर आहार ही ! इन दोनों श्रेणियों में ही विटामिन, मिनरल तथा अन्य पोषक पदार्थ भरपूर मात्रा में होते हैं, जो हम सब को सेहतमंद तो बनाते ही हैं ना ! तो सर्दियों में इन सब का संतुलित मात्रा में उपयोग जरूर करें ! ध्यान यह भी रहे कि ''अति सर्वत्र वर्जयेत् !'' 

स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें !

@अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

शनिवार, 18 जनवरी 2025

भइया ! अतिथि आने वाले हैं

इन्हें बदपरहेजी से सख्त नफरत है। दुनिया के किसी भी कोने में इन्हें अपनी शर्तों का उल्लंघन होते दिखता है तो ये अपने को रोक नहीं पाते और वहां बिना किसी जान-पहचान या रिश्तेदारी के पहुंच जाते हैं। देश-परदेस, जात-पात, भाषा-रंग, अमीर-गरीब, राजा-रंक किसी का भी भेद ना करने वाले ऐसे दरियादिल को लोग अलग-अलग जगहों में भिन्न-भिन्न नामों से जानते हैं, आप  इन्हें   किस नाम से जानते हैं ? बताइएगा 😇

#हिन्दी_ब्लागिंग 

सर्दी की चरमावस्था का जब करीब आधे से ज्यादा समय निकल गया ! ऐसे में कुछ दिनों पहले गले में जरा सी खराश और नाक के द्वार पर कुछ हलचल सी महसूस होने लगी ! जैसे कोई जबरन पैठना चाहता हो ! तन-मन पूर्णतया स्वस्थ लग रहा था ! सो दिल्ली के प्रदूषण पर दोष डाल निश्चिंतता बनी रही ! ऐसे मौसम में एक-दो छींकों को भी नजरंदाज कर दिया जाता है ! पर दूसरे दिन जो छींक आई तो उसके साथ उसका पांच-छह जनों का भरापुरा परिवार भी था ! तभी रूमालों ने भी आद्र हो-हो कर संकेत दे दिया कि भइया ! अतिथि आने वाले हैं !  

उनके आने का आभास तो शुक्रवार सुबह ही हो गया था और शाम तक तो उपस्थिति भी दर्ज हो चुकी थी। पर नौकरी-पेशा लोगों की कुछ मजबूरियां होती हैं, पर इसका अहसास उन्हें क्यूंकर हो सकता था ! उन्हें तो सिर्फ अपनी खातिरदारी और मेहमानवाजी से मतलब था ! उस पर, उनके आ पहुंचने की जानकारी के बावजूद, मेरे शनिवार को काम पर चले जाने को उन्होंने अपनी उपेक्षा के रूप में ले लिया, और नाराज हो गए ! वैसे उनका नाराज होना बनता भी था इसलिए जायज भी था ! पर मेरी तो मति ही मारी हुई थी !

तीसरा दिन रविवार का था। छुट्टी के कारण मैं उनके साथ ही था पर पूरे दिन वे भृकुटियां ताने वक्री बने रहे। अपने को फिर भी बात कुछ खास समझ नहीं आई और सोमवार को फिर उन्हें अनदेखा कर कार्यालय जाने की भूल दोहरा दी। गल्ती तो सरासर मेरी थी ही ! अब  बाहर से आए मेहमान की ना तो कोई खातिरदारी की, नाहीं फल-फुंगा भेंट किया, नाहीं ढंग से समय दिया ! ऐसे में तो कोई भी नाराज हो ही जाएगा ना ! 

फिर क्या था वे अपने रौद्र रूप में आ गए ! मेरा पूरा तन-बदन अपनी गिरफ्त में ले लिया। हर अंग पर उन्होंने अपनी पकड़ और जकड़ बना ली ! हिलना-डुलना तक दूभर कर डाला। जब चहूँ ओर से मार पड़ी तब जा कर अपुन को अपनी गल्तियों का अहसास हुआ। मंगल तथा बुधवार पूरी तरह से उनपर न्योछावर कर डाले। "प्रसाद" ला कर मान-मनौवल किया। इस पर कुछ बात बनती दिखी ! क्योंकि दिखने में वे कितने भी उग्र दिखते हों, स्वभाव से उतने हैं नहीं ! इसीलिए मेरे इतने से प्रयास से ही ढीले पड गए और बुध की शाम को अपने-आप वापस हो लिए !

ये बिना किसी तिथि के आने वाले अतिथि ऐसे हैं जिनके आने से कोई भी खुश नहीं होता ! कोई नहीं चाहता कि वे उनके घर किसी भी बहाने से आएं। इनके रुकने का समय भी तो निर्धारित नहीं होता, ना हुआ तो दूसरे दिन ही चल दें और कहीं मन रम गया तो दसियों दिन लगा दें। पर  इन दसेक दिनों में घर-बाहर वालों की ऐसी की तैसी कर धर देते हैं। 

वैसे इनके पक्ष से देखा जाए तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे ये चाहते हों या इनकी मंशा, ध्येय या लक्ष्य यह है कि संसार में सब जने स्वस्थ प्रसन्न रहें, कोई अपने प्रति लापरवाही ना बरते, अनियमित दिनचर्या ना अपनाए, अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखे, किसी तरह की काहली को जीवन में स्थान ना दे। इन्हें बदपरहेजी से भी सख्त नफरत है। दुनिया के किसी भी कोने में इन्हें अपनी शर्तों का उल्लंघन होते दिखता है तो ये अपने को रोक नहीं पाते और वहां बिना किसी जान-पहचान या रिश्तेदारी के पहुंच जाते हैं।

देश-परदेस, जात-पात, भाषा-रंग, अमीर-गरीब, राजा-रंक किसी का भी भेद ना करने वाले ऐसे समदर्शी, दरियादिल को लोग अलग-अलग जगहों में भिन्न-भिन्न नामों से जानते हैं। कोई बुखार कहता है, कोई ताप, कोई फिवर, कोई जुकाम तो कोई हरारत ! आप  इन्हें  किस नाम से जानते हैं ? बताइएगा 😇

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

बुधवार, 31 जनवरी 2024

सर्दी पर भारी पड़ती, पाव भर की रजाई

पहाड़ी इलाकों में तो चार-चार किलो की या उससे भी भारी रजाईयां होना आम बात है। ज्यादा सर्दी या बर्फ पड़ने पर तो बजुर्गों या अशक्त लोगों को दो-दो रजाईयां भी लेनी पड़ती हैं। जिनके भार से बिस्तर पर हिलना ड़ुलना भी बेहाल हो जाता है। ऐसे में कोई पाव भर, भार वाली रजाई से ठंड दूर करने की बात करे तो आश्चर्य ही होगा ...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

इस बार सर्दी कुछ ज्यादा ही खिंच गई ! खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही ! सोशल मीडिया पर रजाई का आविष्कार करने वाले व्यक्ति को याद कर उसके प्रति आभार व्यक्त करने वालों की तादाद बढ़ती ही जा रही है ! यदि उसकी खोज और रजाई के इतिहास की बात करेंगे तो एक ग्रंथ ही बन जाएगा ! हाँ, योरोप में इसकी ईजाद तब हुई, जब वहां के लोगों ने तुर्कों को सुरक्षा और ठंड से बचाव हेतु अपने कवच के नीचे कपड़े की परतों को लपेटे देखा ! अपने देश में भी रजाई का उपयोग सैंकड़ों वर्षों से होता आया है ! पर आज बात करते हैं जयपुरी रजाई की जिसकी शुरुआत तकरीबन तीन सौ साल पहले हुई थी, राजस्थान के जयपुर शहर से ! 

सर्दी की दस्तक पड़ते ही  गर्म कपड़े, कंबल और रजाईयां भी आल्मारियों से बाहर आने को आतुर हो जाते हैं ! कड़ाके की ठंड में रजाई ही है जो इंसान का सर्दी से बचाव का जरिया बनती है ! रजाई का नाम सुनते ही रूई से भरे एक भारी-भरकम ओढ़ने के काम आने वाले लिहाफ का ख्याल आ जाता है, जो जाड़ों में ठंड रोकने का आम जरिया होता है। पहाड़ी इलाकों में तो चार-चार किलो की या उससे भी भारी रजाईयां होना आम बात है। ज्यादा सर्दी या बर्फ पड़ने पर तो बजुर्गों या अशक्त लोगों को दो-दो रजाईयां भी लेनी पड़ती हैं। जिनके भार से बिस्तर पर हिलना ड़ुलना भी बेहाल हो जाता है। ऐसे में कोई पाव भर, भार वाली रजाई से ठंड दूर करने की बात करे तो आश्चर्य ही होगा !  
वैसे भी कभी-कभी एक बात सोचने को मजबूर करती है कि पुराने समय में रानी-महारानियाँ और उनके परिवार के सदस्य ठंड से कैसे बचाव करते होंगे। ठीक है सर्दी दूर करने के और भी उपाय हैं या थे, पर सर्दी से बचाव के लिए ओढ़ने को कभी न कभी, कुछ-न कुछ तो चाहिये ही होता होगा। उस पर अवध के नवाबों की नजाकत और नफासत तो जमाने भर में मशहूर रही है। वे क्यूंकर इतना भार सहते होंगे ! 

तभी सामने आती हैं जयपुरी रजाइयां ! जो अपने हल्केपन और तेज ठंड में भी गर्माहट देने के लिए विश्वप्रसिद्ध हैं ! एक तरह से उनकी ईजाद राजा-महाराजाओं को मद्दे नजर रख कर ही की गई थी ! ये खास तरह की रजाईयां, खास तरीकों से, खास कारीगरों द्वारा सिर्फ खास लोगों के लिये बनाई जाती थीं।  जिनका वजन होता था, सिर्फ एक पाव या उससे भी कम ! जी हां, एक पाव की रजाई, पर कारगर इतनी कि ठंड छू भी ना जाए ! धीरे-धीरे इसके फनकारों को जयपुर में आश्रय मिला और आज राजस्थान की ये जयपुरी रजाईयां दुनिया भर में मशहूर हैं।

आपकी आँखें हमारे लिए अनमोल हैं 
कहते हैं कि राजा सवाई जयसिंह ने जयपुर को बसाने के बाद विभिन्न कला के शिल्पियों को भी यहां आश्रय प्रदान किया था। उन्हीं शिल्पियों में एक थे, इलाही बक्श। जिनके वंशजों ने राजघराने के सदस्यों के लिए रजाइयां बनाने का काम शुरू किया था। जयपुर की इन रजाईयों का इतिहास करीब 300 साल पुराना है। ऐसी रजाई पहली बार कादर बक्श नमक शिल्पी ने 1723 में बनाई थी। जिसके बाद जयपुर की इस रजाई की गर्माहट को देश-विदेश के अनेकों गणमान्य लोगों ने महसूस किया ! आज भी इनके वंशज जयपुर के हवामहल मार्ग पर स्थित हाट में अपना शिल्प कौशल लिए उपलब्ध हैं ! 
इन हल्की रजाईयों को पहले हाथों से बनाया जाता था। जिसमें बहुत ज्यादा मेहनत, समय और लागत आती थी। समय के साथ-साथ बदलाव भी आया। अब इसको बनाने में मशीनों की सहायता ली जाती है। सबसे पहले रुई को बहुत बारीकी से अच्छी तरह साफ किया जाता है। फिर एक खास अंदाज से उसकी धुनाई की जाती है, जिससे रूई का एक-एक रेशा अलग हो जाता है। इसके बाद उन रेशों को व्यवस्थित किया जाता है फिर उसको बराबर बिछा कर कपड़े में इस तरह भरा जाता है कि उसमें से हवा बिल्कुल भी ना गुजर सके। फिर उसकी सधे हुए हाथों से सिलाई कर दी जाती है। सारा कमाल रूई के रेशों को व्यवस्थित करने और कपड़े में भराई का है जो कुशल कारीगरों के ही बस की बात है। रूई जितनी कम होगी रजाई बनाने में उतनी ही मेहनत, समय और लागत बढ़ जाती है। क्योंकि रूई के रेशों को जमाने में उतना ही वक्त बढता चला जाता है। 
 
जयपुरी रजाई बनने के दौर में 
छपाई वाले सूती कपड़े की रजाई सबसे गर्म होती है क्योंकि मलमल के सूती कपड़े से रूई बिल्कुल चिपक जाती है। सिल्क वगैरह की रजाईयां देखने में सुंदर जरूर होती हैं पर उनमें उतनी गर्माहट नही होती। वैसे भी ये कपड़े थोड़े भारी होते हैं जिससे रजाई का भार बढ जाता है। तो अब जब भी राजस्थान जाना हो तो पाव भर की रजाई की खोज-खबर जरूर लिजिएगा। 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...