pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 14 मई 2020

क्या अग्नि भी मोक्ष दिला पाई, धृतराष्ट्र को

एक लंबे समय के बाद इस दुर्घटना की खबर हस्तिनापुर पहुंची। भाइयों समेत युधिष्ठिर वन में जा जिस जगह अग्निकांड हुआ था, अन्दाजतन वहां से अपने परिजनों की अस्थियां ला, सारे संस्कार, दान-पुण्य, श्राद्ध कर्म पूरे कर उन्हें गंगा में प्रवाहित कर देते हैं। परंतु धृतराष्ट्र जैसे पात्र के अवशेषों का उचित संस्कार हो भी पाया होगा ! उस दिन के भीषण दावानल में और भी बहुतेरे पशु-पक्षी-वनवासी प्राणियों की मृत्यु हुई होगी ! फिर अग्निकांड और अस्थि चयन के बीच समय का लम्बा अंतराल भी तो रहा था। अब यह तो प्रभु ही जानते होंगे कि उस दिन किस-किस की अस्थियों का संस्कार हुआ होगा ! क्या उस युग के इस भयानक तीसरे अग्नि-तांडव में खुद को होम होते देख धृतराष्ट्र को उन पहली दो, लाक्षागृह और खांडव वन में घटे अग्निकांडों की याद आई होगी ! जिनके घटने में किसी ना किसी तरह उसकी भी भागीदारी रही थी.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
दोपहर से उठा झंझावात थमने का नाम ही नहीं ले रहा था ! भरी दोपहरी में भी घना अंधेरा छा गया था। चीत्कार करती हुई हवाएं अपनी प्रचंड गति से सब कुछ तहस-नहस करने पर उतारू थीं ! आकाशीय मेघों की विद्युत जिव्हाएं लपक-लपक कर धरा तक पहुंचने को आतुर हो रही थीं !छोटे-मोटे पादप तो कब के धराशाई हो चुके थे। विशाल घने वृक्ष प्रेतोंकी तरह झूम-झूम कर एक दूसरे से टकरा रहे थे ! जैसे खुद ही एक-दूसरे को उखाड़ फेंकने पर उतारू हों ! पशु-पक्षी डर से लरजते अपनी जान को बचाते कहीं ना कहीं दुबके पड़े थे। ऐसे में चार मानव आकृतियां, दो पुरुष तथा दो महिलाएं, सघन अरण्य में बनी अपनी कुटियों की तरफ बढ़ने की जद्दोजहद में लगीं हुई थीं। ऐसा लग रहा था जैसे एक पुरुष और एक महिला दृष्टिहीन हों, क्योंकि उन्हें दूसरा पुरुष और महिला सहारा देकर आगे बढ़ाने की जी तोड़ कोशिश कर रहे थे। इतने में ही एक कान को बहरा कर देने वाले जोरदार धमाके के साथ पास में ही आकाशीय बिजली गिरी और पेड़ों में आग लग गयी ! हवा का दामन थाम आग ने पल भर में ही दावानल का रूप ले लिया ! सारा जंगल धू-धू कर अग्नि के हवाले हो गया ! हर चीज जल कर राख होती चली गई। हर चीज....!    
दावानल 
युद्धोपरांत महात्मा विदुर ने धृतराष्ट्र को सब कुछ त्याग संन्यासश्रम अपनाने की सलाह दी थी। जिसमें वह खुद गांधारी और कुंती भी साथ चलने को तैयार थे। यदि उस समय धृतराष्ट्र ने अपने अनुज की बात मान ली होती तो संभवतया उनका कुछ गौरव तो जरूर बना रहता ! परंतु उनकी राजसुख की लालसा ने द्रौपदी के निवेदन और कुछ युधिष्ठिर की प्रार्थना को आड़ बना वनगमन को टाल, अपने पुत्रों के हत्यारों और चिर-दुश्मनों के आश्रित के रूप में रहना स्वीकार कर लिया। समय के साथ-साथ उनका और गांधारी का पुत्र शोक कम होता गया और वे दोनों ही पाण्डुपुत्रों से पुत्रवत व्यवहार करने लगे। युधिष्ठिर उनकी सुख-सुविधा का पल-पल ख्याल रखते थे ! सभी को यह कठोर हिदायत थी कि धृतराष्ट्र और गांधारी को लेश मात्र भी कष्ट या असुविधा न हो। युधिष्ठिर राज-काज में भी उनकी सलाह के बिना कोई काम नहीं करते थे। एक तरह से उन्हें युद्ध पूर्व जैसा ही सम्मान और माहौल प्रदान करने की चेष्टा रहती थी। पर भीम के मन में  दोनों को देखते ही दुर्भावना आ जाती थी, और वह उसका प्रदर्शन करने, अपमान सूचक कटाक्ष करने तथा अपशब्द कहने से कभी भी चूकता ना था। समय के साथ कम होने की बजाय भीम के मन में धृतराष्ट्र के प्रति और धृतराष्ट्र के मन में भीम के प्रति दुर्भाव बढ़ता ही चला गया। उन दोनों को एक-दूसरे की बात काँटों की तरह चुभने लगी। इसी तरह पंद्रह वर्ष बीत गए। जब अति हो गई और सहना मुश्किल हो गया तो धृतराष्ट्र ने वनवास जाने का निर्णय कर ही लिया।      
हर तरह की मान-मनौवल, विनती, रुदन, समझाइश के बावजूद धृतराष्ट्र इस बार अपनी बात पर अटल रहे। अंत में हार कर सबने उनकी बात मान ली। वनागमन के लिए गांधारी, कुंती, विदुर तथा संजय भी साथ हो लिए। नगर छोड़ने के पश्चात इन्होंने कुरुक्षेत्र के पास वन में रहने का निश्चय किया। ये सारे लोग अति वृद्ध थे सो युधिष्ठिर को उनकी सदा चिंता बनी रहती थी, सो बीच-बीच में वे उनकी खोज-खबर लेते रहते थे। धीरे-धीरे दो वर्ष बीतने को आए। ऐसे में युधिष्ठिर खुद एक बार सबकी खोज-खबर लेने गए तो वहां विदुर को ना पा उनके बारे में पूछने पर कुंती ने उनके अन्न-जल-वस्त्र त्यागने की बात बताई और बताया कि जब तक प्राण हैं, वह सिर्फ वायु पर ही निर्भर है। इतना सुनते ही युधिष्ठिर अरण्य में उनको खोजने के लिए पैठ गए ! काफी देर बाद उन्होंने विदुर को एक वृक्ष से टेक लगाए खड़े पाया। उनका शरीर अस्थिपिंजर रह गया था, रंग काला, आँखें कोटर में धंसी हुई, विवस्त्र, भावहीन ! युधिष्ठिर के उनके पास पहुंचते ही किसी शिरा में अटकी सांस निकल कर युधिष्ठिर में समा गई। इस बात की सुन वेदव्यास जी ने बताया कि विदुर धर्मराज के अवतार थे और युधिष्ठिर भी धर्मराज के अंश हैं, इसीलिए विदुर जी के प्राण युधिष्ठिर में समा गए। 
वनवासी विदुर 

संन्यासाश्रम के दो साल व्यतीत हो चुके थे। एक दिन धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती और संजय गंगा स्नान और पूजा ध्यान कर अपनी कुटियों की ओर लौट रहे थे कि अचानक एक भयंकर तूफ़ान ने पूरे अरण्य को घेर लिया ! क्रुद्ध हवाओं ने सारे जंगल को तहस-नहस कर रख दिया। छोटे-मोटे पेड़-पौधे, लता-गुल्म सब भू-लुंठित हो गए ! बड़े, विशाल वृक्षों के अस्तित्व पर भी बन आई ! दिन में ही अंधियारी छा गयी। सुनना-दिखना सब बाधित हो गया ! इतने में वृक्षों की आपसी रगड़ से आग उत्पन्न हो गयी, जिसने पल भर में ही दावानल का भयंकर रूप ले लिया।धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती और संजय उस आग में बुरी तरह घिर गए। ऐसे में जब संजय ने तीनों को इस विपदा से निकालने की कोशिश की तो धृतराष्ट्र ने साफ़ मना कर दिया ! उन्होंने संजय से कहा कि अब समय आ गया है कि मैं अपने पापों से मुक्ति पा मोक्ष पाने का यत्न करूं ! वैसे भी अब मेरे जीने का कोई उद्देश्य नहीं बचा है ! जीवन के हर रंग देख चुका हूँ ! थक गया हूँ ! अब मैं यहीं अग्नि समाधि ले लेना चाहता हूँ। इसलिए हे संजय ! तुम हमारी चिंता ना करो; यही हमारा प्रारब्ध है ! तुम्हें मेरा आदेश है कि तुम इस दावानल से अपनी रक्षा करो। इस तरह जबरदस्ती संजय को भेज तीनों ने अग्नि स्नान कर खुद को पंचतत्व में विलीन कर लिया। संजय ने किसी तरह वन के बाहर आ ऋषियों को धृतराष्ट्र के बारे में बता, हिमालय जा एक संन्यासी की तरह अपना बाकी जीवन व्यतीत किया। क्या उस युग के इस भयानक तीसरे अग्नि-तांडव में खुद को होम होते देख धृतराष्ट्र को उन पहली दो, लाक्षागृह और खांडव वन में घटे अग्निकांडों की याद आई होगी ! जिनके घटने में किसी ना किसी तरह उसकी भी भागीदारी रही थी ! 
अग्निस्नान 
एक लंबे समय के बाद इस दुर्घटना की खबर हस्तिनापुर पहुंची। भाइयों समेत युधिष्ठिर ने वन में जा जिस जगह अग्निकांड हुआ था, अंदाजतन वहां से अपने परिजनों की अस्थियां ला, सारे संस्कार, दान-पुण्य, श्राद्ध कर्म पूरे कर उन्हें गंगा में प्रवाहित कर दिया ! परंतु क्या धृतराष्ट्र जैसे पात्र के अवशेषों का उचित संस्कार हो भी पाया होगा ! क्योंकि उस दिन के भीषण दावानल में और भी बहुतेरे पशु-पक्षी-वनवासी प्राणियों की मृत्यु हुई होगी ! फिर अग्निकांड और अस्थि चयन के बीच समय का लम्बा अंतराल भी तो रहा था। अब यह तो प्रभु ही जानते होंगे कि उस दिन किस-किस की अस्थियों का संस्कार हुआ था.......!  

रविवार, 10 मई 2020

माँ एक शब्द नहीं पूरी दुनिया है

वैसे माँ को कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके लिए कोई ख़ास दिन बनाया गया है कि नहीं। उसे न तोहफों की लालसा होती है नाहीं उपहारों की ख्वाहिश। मिल जाएं तो ठीक, ना मिलें तो और भी ठीक। भगवान से भले ही वह नाखुश हो जाए पर अपने बच्चों के लिए उसके मुख पर सदा आशीष ही रहती है। इसीलिए  ऊपर वाले से कुछ मांगना हो तो सदा हमें अपनी माँ की सलामती मांगनी चाहिए, हमारे लिए तो माँ हर वक़्त दुआ मांगती ही रहती है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
माँ एक शब्द नहीं पूरी दुनिया है, जो सिर्फ देना जानती है, लेना नहीं ! उसकी ममता का, निस्वार्थ प्रेम कोई ओर-छोर नहीं होता। सागर से गहरे, धरती से सहनशील और आकाश से भी विशाल उसके स्नेहसिक्त आँचल में तो तीनों लोक समाए रहते हैं। मनुष्य को प्रकृति प्रदत्त यह सबसे बड़ी नेमत है, जिसका कोई सिला नहीं ! माँ इस धरती पर ईश्वर का प्रत्यक्ष रूप है। जिस घर में माँ खुश रहती है, वहां खुशियों का खजाना कभी खाली नहीं होता। कोई कष्ट, कोई व्याधि, कोई मुसीबत नहीं व्यापति ! अपने बच्चों को खुश देख खुश रह लेने वाली माँ अपनी ख़ुशी के एवज में भी बच्चों की ख़ुशी ही मांगती है !
माँ, पिकासो की अमर कृति 
जिस माँ के बिना इस दुनिया की कल्पना नहीं की जा सकती; उसी के लिए हमने एक दिन निर्धारित कर दिया....! माँ या उसका ममत्व कोई चीज या वस्तु नहीं है कि उसके संरक्षण की जरुरत हो ! नाहीं वह कोई त्यौहार या पर्व है कि चलो एक दिन मना लेते हैं ! अरे ! जब भगवान के लिए कोई दिन निर्धारित नहीं है; तो फिर माँ के लिए क्यों ? भगवान भी माँ से बड़ा नहीं होता ! वह तो खुद माँ के चरणों में पड़ा रह खुद को धन्य मानता है !
वैसे माँ को कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके लिए कोई ख़ास दिन बनाया गया है कि नहीं। उसे न तोहफों की लालसा होती है नाहीं उपहारों की ख्वाहिश। मिल जाएं तो ठीक, ना मिलें तो और भी ठीक। वह तो निस्वार्थ रह बिना किसी चाहत के अपना प्यार उड़ेलती रहेगी। ख़ुशी में सबके साथ खुश और दुःख में आगे बढ़, ढाढस दे आंसू पोछंती रहेगी। भगवान से भले ही वह नाखुश हो जाए पर अपने बच्चों के लिए उसके मुख पर सदा आशीष ही रहती है। इसीलिए ऊपर वाले से कुछ मांगना हो तो सदा हमें अपनी माँ की सलामती मांगनी चाहिए, हमारे लिए तो माँ हर वक़्त दुआ मांगती ही रहती है।

शनिवार, 9 मई 2020

यह वृक्ष का घमंड था या अन्याय का प्रतिरोध

बहुत बार मन में आया कि उस ज्ञानी पुरुष ने अपने शिष्यों को जो सबक सिखाया क्या वह सही था। वह यह भी तो बता सकते थे कि इसे कहते हैं वीरता, बहादुरी, अन्यायी के सामने ना झुकने का संकल्प। देखो और सीखो इस वृक्ष से। जिसने मरना मंजूर किया पर अन्याय के सामने झुका नहीं। वहीं यह मौकापरस्त घास है, जो लहलहा तो रही है पर हर कोई उसे रौंदता चला जाता है.........


#हिन्दी_ब्लागिंग 

बचपन की कई किस्से कहानियों का पुनरावलोकन करने पर लगता है कि जैसे उनके मुख्य पात्र के साथ न्याय ना हुआ हो ! कहीं ना कहीं उसका संदेश अनकहा रह गया हो ! ऐसी ही एक कहानी है उस  वृक्ष की जो तूफ़ान का सामना करते हुए धराशाई हो गया था। 

वर्षों से एक कहानी पढाई/सुनाई जाती है कि किसी उपवन में एक छायादार आम का वर्षों पुराना वृक्ष था। विशाल, घना, सदाबहार, जिसकी छाया में इंसान हो या पशु सभी आश्रय व राहत पाते थे। उसकी ड़ालियों पर हजारों पक्षियों का बसेरा था। तने और जड़ में भी नाना प्रकार के जीव-जंतुओं ने आश्रय ले रखा था। उस पर लगने वाले फल बिना भेदभाव के सब की क्षुधा शांत करते थे। वह वृक्ष, वृक्ष ना होकर जैसे उन सब का अभिभावक सा बन गया था। 

समय का फेर। बरसात का मौसम था। रोज ही आंधी-पानी ने मिल कर जीवों का जीना दूभर कर रखा था। पर पेड़ की सघनता उनके लिए कवच का काम कर रही थी। जैसे कह रही हो कि मेरे रहते तुम सभी सुरक्षित हो। पर एक शाम, शायद उस दिन काल-वैसाखी थी, एक जबरदस्त तूफान उठा ! चारों और अंधेरा छा गया ! मूसलाधार पानी बरसने लगा ! आकाशीय बिजली लपलपा कर धरती छूने लगी ! वाओं ने तो जैसे सब कुछ उड़ा ले जाने की ठान ली थी ! छोटे-मोठे पेड़ तो कब के भू-लुंठित हो चुके थे ! ऐसा लगता था कि आज सारी कायनात ही खत्म हो कर रह जाएगी। ऐसे में भी वह वृक्ष अपने शरणागतों को साहस बंधाता खड़ा था ! जैसे कह रहा हो कि मेरे रहते तुम पर आंच नहीं आ सकती ! पर इधर तूफ़ान का जोर बढ़ता ही जा रहा था ! पानी लगातार बरसे जा रहा था ! हवाऐं और-और तेज होती जा रही थीं ! पूरी कोशिश के बावजूद भी वह पुराना, बुजुर्ग पादप प्रकृति के इस प्रचंड प्रकोप को सह नहीं पाया और जड़ से उखड़ गया।

दूसरे दिन उधर से एक ज्ञानी पुरुष अपने शिष्यों के साथ निकले। उस विशाल वृक्ष का हश्र देख उन्होंने अपने शिष्यों को उसे दिखा कर कहा कि देखो अहंकारी का अंत ऐसा ही होता है। घमंड़ के कारण यह विनाशकारी तूफान के सामने भी अकड़ा खड़ा रहा और मृत्यु को प्राप्त हुआ। उधर वह कोमल घास विपत्ति के समय झुक गयी और अब लहलहा रही है। इसे कहते हैं बुद्धिमत्ता।

बहुत बार मन में आया कि उस ज्ञानी पुरुष ने अपने शिष्यों को जो सबक सिखाया क्या वह सही था। वह यह भी तो बता सकते थे कि इसे कहते हैं वीरता, बहादुरी, अन्यायी के सामने ना झुकने का संकल्प। देखो और सीखो इस वृक्ष से। जिसने मरना मंजूर किया पर अन्याय के सामने झुका नहीं। वहीं यह मौकापरस्त घास है, जो लहलहा तो रही है पर हर कोई उसे रौंदता चला जाता है।

मंगलवार, 5 मई 2020

शैवतीर्थ उनाकोटी, जहां बिखरी पड़ी हैं असंख्य मूर्तियां और प्रतिमाएं

तेज प्रवाह वाली नदियों, उबड़ खाबड़ पहाड़ियों, दूर तक फैले घने जंगलों, दलदली इलाकों के बीहड़ के बीच  अज्ञात सा, अद्भुत रहस्यमय स्थान, उनाकोटी ! जहां जंगल की क्षीणकाय, नामालूम सी पगडंडियों पर चल कर ही पहुंचा जा सकता है। अभी भी इसके और इसके जंगलों के बीच अफरात में फैले शैलचित्रों और मूर्तियों के भंडार और उनकी खासियत के बारे में बहुतेरे देशवासियों को कोई खबर नहीं है  

#हिन्दी_ब्लागिंग  
उनाकोटि हमारे देश के त्रिपुरा राज्य का एक विचित्र, अनोखा, रोमांचक, रहस्यमय, अज्ञात सा एक ऐसा अद्भुत स्थान, जिसकी आज भी अधिकांश देशवासियों को कोई खबर नहीं है ! छविमुड़ा गांव के आगे घोर जंगलों के बीचोबीच, मानव बस्तियों से दूर बीहड़ में मौजूद असंख्य हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं। ऐसा अनोखा, भव्य और असीमित मूर्ति भंडार देश के किसी भी और हिस्से में उपलब्ध नहीं है ! जिन्हें पहाड़ी को काट कर या उन्हीं पर उकेर कर बनाया गया है। उन्हें देख यह किसी इंसानी हाथ का काम नहीं लगता।  






तेज प्रवाह वाली नदियों, उबड़-खाबड़ पहाड़ियों, दूर-दूर तक फैले घने जंगलों, दलदली इलाकों के बीहड़ के बीच स्थित है यह अज्ञात सा,अद्भुत रहस्यमय स्थान उनाकोटी। जहां जंगल की क्षीणकाय, नामालूम सी पंगडंडियों पर चल कर ही पहुंचा जा सकता है। अभी भी इसके और इसके जंगलों के बीच अफरात में फैले शैलचित्रों और मूर्तियों के भंडार और उनकी खासियत के बारे में बहुतेरे देशवासियों को कोई खबर नहीं है। जनशून्य जगह में, बीहड़ के बीचोबीच, किसी साधन की उपलब्धता के आसार के बिना, इतनी मात्रा में भव्य मूर्तियों का निर्मित होना लंबे समय से खोज व शोध का विषय बना हुआ है ! स्थानीय लोगों के अनुसार यह सब कुछ दैवीय कृपा से ही संभव हो पाया है !








यहां की मुख्य मूर्ति शिव जी की उनाकोटेश्वर कालभैरव नामक करीब 30-35 फुट की विशाल प्रतिमा है, जिस पर उकेरा गया मुकुट ही दस फुट का है ! इनके दोनों ओर दो स्त्री विग्रह हैं जिनमें एक सिंहारूढ दुर्गा जी की मूर्ति है। यहीं विष्णु जी की वृहदाकार मूर्ति के साथ ही गणेश जी की चार भुजाओं व तीन दांतों तथा आठ भुजाओं और चार दाँतों वाली कहीं और ना पायी जाने वाली दुर्लभ मूर्तियों के अलावा माँ दुर्गा, माँ काली की हैरान कर देने वाली प्रतिमाओं के साथ-साथ नंदी और अन्य देवताओं की भी ढेर सारी अनगिनत मूर्तियां बनी हुई हैं। मान्यता के अनुसार गिनती में ये एक कम, एक करोड़ हैं।  





स्थानीय लोगों के अनुसार, जो यहां आ कर इन प्रतिमाओं की पूजा भी करते हैं, इन सभी कलाकृतियों का संबंध पौराणिक कथाओं से है। उनके अनुसार हजारों साल पहले कालू नामक एक महान शिव भक्त मूर्तिकार हुआ करता था। वह अपने आप को शिव-गौरी का पुत्र मान उनके पास कैलाश जाना चाहता था। उसकी जिद को देख देवताओं ने एक शर्त रखी कि यदि वह एक रात में एक करोड़ मूर्तियों का निर्माण कर देगा तो उसे कैलाश भेज दिया जाएगा। कालू प्रस्ताव मान काम में जुट गया ! उसने रात भर मेहनत कर काम पूरा कर दिया, पर उससे गिनती में जरा सी भूल हो गयी ! प्रस्तावित संख्या से एक मूर्ति कम बनी थी ! यानी एक करोड़ में एक मूर्ति कम रह गयी और इस कारण शिल्पकार कालू धरती पर ही रह गया। स्थानीय भाषा में एक करोड़ में एक कम संख्या को उनाकोटि कहते हैं। इसलिए इस जगह का नाम उनाकोटि पड़ गया। 







त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से यह लगभग 125 किमी की दूरी पर स्थित है। यहां सड़क मार्ग द्वारा आराम से पहुंचा जा सकता है। यहां का नजदीकी हवाई अड्डा अगरतला एयरपोर्ट है। रेल मार्ग से जाने पर कुमारघाट या धर्मनगर रेलवे स्टेशन पर उतरना ठीक रहता है। 

@सभी चित्र अंतरजाल के सौजन्य से 

शनिवार, 2 मई 2020

गधे की गदहागिरी से मुल्ला नसीरुद्दीन को मिला सबक

आज के वेदव्यास अपने से ज्यादा दूसरे को विद्वान समझने की गलतफहमी नहीं पालते ! इसलिए सिर्फ अपना पढवाने की होड़ है ! इक्के-दुक्के अपवादों को छोड़, पढ़ता भी कौन है ! बस सब लिखे जा रहे हैं ! लिख्खाड़ों की भरमार हो गई है ! विश्वास ना हो तो कोई भी पत्रिका उठा उसमें पैवस्त रचनाओं को देख लें ! दौड़ में बने रहने की मारम-मार है ! अब थोक के प्रोडक्शन में माल कहां से आ रहा है इसकी चिंता नहीं है ! ऑरिजिनल मिलता नहीं ज्यादातर असेम्बलिंग होती है ! ऐसे में गुणवत्ता का क्या काम ! कोई अपेक्षा भी नहीं करता.............! ऐसी ही एक असेम्बल्ड गल्प; अब यह आप पर है कि आप इस गल्प को किस तरह लेते हैं  

#हिन्दी_ब्लागिंग     
कुछ दिनों पहले मुल्ला नसीरुद्दीन की एक कहानी को साझा करने चला तो अचानक आड़े-टेढ़े ख्यालों ने भरमा कर दिमाग को मुख्य पटरी से लूप लाइन पर धकेल दिया ! सो कहानी वहीं की वहीं रह गई। अब ख्याल भले ही आंके-बांके हों पर कुछ ना कुछ सच्चाई तो होती ही है उनमें भी, जो यह बता रही थी कि इस सीधी-सादी गल्प का भी आजकल के विद्वान कुछ का कुछ अर्थ निकाल इसको कहीं के कहीं ले जाएंगे ! फिर सोचा अपने यहां खुद को छोड़ बाकियों को कुछ भी समझने-समझाने की आजादी है..........! अब यह आप पर है कि आप इस गल्प को किस तरह लेते हैं।  तो कहानी कुछ इस प्रकार है कि -
एक दिन मुल्ला नसीरुद्दीन को बैठे-बैठे यह ख्याल आया कि जैसे मैं सांझ-सबेरे छत पर चढ़ कर दुनिया-जहान का लुत्फ़ उठाता हूँ, उसका जायजा लेने का हक़ उसके प्यारे गधे को भी है ! सो दूसरे दिन अल-सुबह वह गधे को छत पर चढ़ाने को तैयार हो गया। गधे के लिए यह एक नई मुसीबत थी, वह सीढ़ी पर पैर रखने तक को तैयार नहीं था ! काफी मेहनत-मशक्कत, लाड-प्यार, धक्कम-धुक्की, खींच-तान के बाद किसी तरह मुल्ला ने गधे को छत पर ला खड़ा कर ही दिया। अब गधा तो गधा वह इस मुकाम की अहमियत जाने बिना वहां भी सर झुकाए चुपचाप खड़ा रहा ! कुछ देर बाद जब मुल्ला ने देखा कि उसके गधे को छत से दिखती नियामतों में कोई रूचि नहीं है तो उसने नीचे उतरने के लिए जब गधे को पुचकारा तो वह अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। मुल्ला ने हर तरकीब आजमा ली पर गधे को हिलना तक गवारा नहीं था। जैसे बदला ले रहा हो अपने को छत पर चढाने का ! थक-हार कर मुल्ला उसको वहीं छोड़ नीचे चला आया। पर कुछ देर बाद ही ऊपर से अजीब सी आवाजें आने लगीं जैसे कोई कुछ तोड़ रहा हो ! मुल्ला जब दौड़ कर ऊपर पहुंचा तो उसने देखा कि उनका प्यारा गधा अपनी दुलत्तियों से छत तोड़ने को आमादा है ! छत कच्ची थी, कहीं टूट ही ना जाए इस डर से मुल्ला ने गधे को हटाना चाहा तो उसने दुलत्ती मार उसी को नीचे गिरा दिया ! जब तक मुल्ला संभले तब तक गधा भी छत तोड़ नीचे आ गिरा !

मुल्ला नसीरुद्दीन ने इस हादसे पर काफी दिमाग लड़ाया और इस नतीजे पर पहुंचे कि कभी भी गधे को ऊँचे मकाम पर नहीं ले जाना चाहिए ! ऐसा करने पर वह उसी जगह को बर्बाद करता है ! ले जाने वाले को भी लतिया कर गिरा देता है और सबसे बड़ी बात खुद भी सर के बल नीचे आ गिरता है। यानी दान, ज्ञान और सम्मान सुयोग्य पात्र को ही देना चाहिए।
@संदर्भ - भास्कर     

शुक्रवार, 1 मई 2020

लक्ष्य भेद ! चाहे जैसे भी चिड़िया की आँख भेदनी पड़े

अब सत्यजीत रे साहब तो इतने बड़े, महान, विश्वविख्यात कलाकार थे; जब उनकी कलाकृति की दस तरह की व्याख्याएं कर दी गयीं तो हमारे जैसे लोगों की क्या हैसियत, जो अपनी आधे से ज्यादा रचनाओं को दूसरों की प्रेणना से प्रेरित हो, क्लेवर बदल अपने नाम से धकेल देते हैं ! दीपावली की मिठाई की तरह ! और यदि कोई ऐसे लिखे को किसी भी कारणवश पढ़ कुछ टिपियाता भी  देता  है तो किसी अघोषित नियमावली के अनुसार वह टिपियाया जाना सिर्फ प्रशंसात्मक, सराहनीय, प्रशस्तिनुमा ही होता है ! क्योंकि दूसरे हाथ से लेना भी तो होता है ना कभी न कभी ! अब वह भी क्या करे, क्या ध्यान दे ! वह भी तो उसी बगीचे की सैर में शामिल लोगों में से एक होता है जहां से यह फूल लिया गया है................!  

#हिन्दी_ब्लागिंग  
आज के बुद्धीजीवी लोगों से दिक्कत बहुत है ! सीधा सरल भी कुछ लिखा-कहा जाता है तो उसका  ऐसा-ऐसा अर्थ निकाल देते हैं जिसको कभी लिखने-कहने वाले के खानदान ने भी नहीं सोचा होता ! जैसे एक बार हमारे सर्वकालीन महान फिल्म डायरेक्टर सत्यजीत रे साहब ने एक शुद्ध बाल फिल्म ''गुपी गाईन, बाघा बाईन'' बच्चों के लिए बनाई थी ! रिलीज होते ही महान आलोचकों ने उसके विषय का बतंगड़ बना डाला ! कोई उसे महान राजनितिक व्यंग्य बताने लगा, तो कोई पुराने ग्रंथों से संबंध जोड़ने लगा, किसी ने गूढ़ दार्शनिक अर्थ निकाल कर रख दिए ! तंग आ कर कुछ दिन बाद रे साहब को आखिर विज्ञप्ति जारी करनी पड़ी कि मैं सभी विद्वानों का आदर करता हूँ ! पर अचंभित हूँ उनके इतने व्यापक दृष्टिकोण से ! यह फिल्म मेरे नानाजी की एक बाल कथा पर आधारित सिर्फ बच्चों की कहानी का चित्रांकन है इसमें कोई गूढ़ संदेश ना छिपा हुआ है ना हीं दिया गया है।

अब रे साहब तो इतने बड़े, महान, विश्वविख्यात कलाकार थे; जब उनकी कलाकृति की दस तरह की व्याख्याएं कर दी गयीं तो हमारे जैसे लोगों की क्या हैसियत, जो अपनी आधे से ज्यादा रचनाओं को दूसरों की प्रेणना से प्रेरित हो, क्लेवर बदल अपने नाम से धकेल देते हैं, दीपावली की मिठाई की तरह ! और यदि कोई ऐसे लिखे को किसी भी कारणवश पढ़ कुछ टिपियाता भी है तो, किसी अघोषित नियमावली के अनुसार वह टिपियाया जाना सिर्फ प्रशंसात्मक, सराहनीय, प्रशस्तिनुमा ही होता है, क्योंकि दूसरे हाथ से लेना भी तो होता है ना कभी न कभी ! अब वह भी क्या करे, हालांकि वह तथाकथित रचना के शब्दों की हेराफेरी के जाल में फंसा होता है पर साथ ही उसे यह भी लगता रहता है कि ऐसा कुछ पहले भी कहीं पढ़ा जा चुका है ! पर कौन ध्यान दे ! वह भी तो उसी बगीचे की सैर में शामिल लोगों में से एक होता है जहां से यह फूल लिया गया है !  

वैसे किया भी क्या जा सकता है ! मारम-मार ही इतनी है ! सबको अपना पढवाने की होड़ है ! दूसरों के लिए समय कहां है ! फिर अपने से ज्यादा दूसरे को विद्वान समझने की गलतफहमी भी कोई नहीं पालता ! सो पढ़ता कौन है ! बस सब लिखे जा रहे हैं ! लिखे जा रहे हैं ! अब थोक के प्रोडक्शन में गुणवत्ता का क्या काम ! कोई अपेक्षा भी नहीं करता ! हाँ, लिखने वाला अपने आप को वेदव्यास से कम नहीं समझता सो अपने रचे हादसों को संजो कर पुस्तकाकार कर देता है। इसके फायदे भी घणे हैं ! एक तो घर में सजी किताबों को देख कर मेहमानों पर रुआब ग़ालिब हो जाता है। बैठे-बिठाए ना होते हुए भी लेखकों में नाम शुमार हो जाता है। नाम के साथ पुस्तकों की संख्या जुड़ती जाती है ! तब यह नहीं देखा जाता कि क्या लिखा, तब इस पर ध्यान दिया जाता है कि कितना लिखा ! जितनी ज्यादा किताबें उतना बड़ा नाम। अब नाम बड़ा तो एकाधिक पत्रों में लिखने का मौका हासिल होने लगता है, सभा-सोसायिटियों का बुलावा आने लगता है। लोगों द्वारा जानने का दायरा बढ़ने लगता है ! और यदि उसी समय सूर्य और शुक्र सहाई हो जाएं तो राजनीतिक क्षेत्र की ओर से भी ठंडी बयार आने में देर नहीं लगती जो अपने साथ कुछ भी ला सकती है पद, सम्मान, प्रतिष्ठा....कुछ भी ! तो यदि शब्दों से थोड़ी बहुत भी जान पहचान है तो लिखते रहिए, कुछ भी, चिंता न करें गुणवत्ता की ! तुक मिलने ना मिलने की ! बात समझने की समझाने की ! मकसद एक ही होना चाहिए लक्ष्य भेद ! फिर चाहे खुद ही पेड़ पर चढ़ तीर को चिड़िया की आँख में भोंकना पड़े !     

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

समय पर दोषी को दंड मिलना भी जरुरी है

चौथा वर्ग समाज और देश के दुश्मनों का है ! ये जान-बूझ कर अवाम को खतरे में धकेलने का उपक्रम करता है। बेवजह घर के बाहर निकलना, रक्षा कर्मियों के साथ बदसलूकी, अक्खड़पन, उद्दंडता से भरपूर ये लोग बार-बार समझाने को अपनी जीत और व्यवस्था की कमजोरी समझने की भूल करने लगते हैं। ऐसे शठों को उन्हीं की भाषा में समझाना जरुरी है। लंका अभियान पर समुंद्र के आड़े आने पर तीन दिन बाद ही प्रभु राम ने और शिशुपाल के हद लांघने पर श्री कृष्ण जैसे अवतारी पुरुषों ने भी दंड देने में कोताही नहीं बरती थी ! ज्ञात्वय है कि उनका बैर सिर्फ एक इंसान से था ये लोग तो पूरी जात-बिरादरी और समाज के दुश्मन हैं फिर इतनी ढिलाई क्यों ...........? 

#हिन्दी_ब्लागिंग  
देश या दुनिया में यदि कभी कुछ अप्रत्याशित घटता है तो हर बार उसके कई तरह के परिणाम देखने को मिलते हैं ! अब जैसे इस कोरोना रूपी दानव के आतंक से विश्व भर में त्राहि-त्राहि मची हुई है ! आबालवृद्ध सभी आक्रांत हैं, भयभीत हैं !  तथाकथित विश्व के अग्रणी, शक्तिशाली, विकसित देश भी आज घुटनों पर आ गए हैं। वहीं गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, भूख, असंतोष, भ्रष्टाचार, षडयंत्र, चिकित्सा साधनों की कमी से त्रस्त हमारे देश ने इस विकट आपदा में बहुत बड़ी हद तक अपने को इस संकट से बचा, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिसाल कायम की है। जिसके कारण विश्व भर में उसकी सराहना की जा रही है। साथ ही पचास से ऊपर देशों को कुनैन  की दवा भेज एक त्राता के रूप में भी उभर कर सामने आया है। यह कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं है। परंतु अपने ही देश में कुछ लोगों के लिए यह बात अपच का कारण बन गई है।   

आज लगभग सारे राज्य और उनके मुख्य मंत्री केंद्र की सलाह को मान उसका पालन कर रहे हैं, पर एक-दो कुतर्की, पूर्वाग्रही अभी भी जनता की सहायता के बदले उसे मिल रही सुविधाओं में कमियां खोजने में लगे हुए हैं। हालांकि उनकी बेढब बातों पर कोई ध्यान नहीं देता फिर भी वे अपने बचे-खुचे अस्तित्व के प्रदर्शन और सिर्फ विरोध के लिए विरोध करने को अपना बेतुका राग अलाप देते हैं। इन छुटभइयों और इनके आकाओं को यह समझ नहीं आता कि यही समय अवाम की सहायता कर उसके दिल को जीतने का है। ये मुफ्त में राशन, बिना काम वेतन, कर्ज माफ़ी, मजदूरों की वापसी की मांग तो करते हैं पर उसके लिए पैसा कहां से आएगा ये नहीं बता पाते ! यदि पैसों के इंतजाम के लिए सरकार कुछ करती है तो फिर ये बुद्धिहीन उसका विरोध शुरू कर समझते हैं कि हमने लोगों का दिल जीत लिया जबकि होता बिल्कुल विपरीत है। काश दूसरों की मीन-मेख निकालने और बातें बनाने की जगह की जगह कुछ अपनी तरफ से भी सकारात्मक सहयोग की पहल की होती। 

इसी जमात के साथ समाज के चार और वर्ग इस दौर में सामने आए हैं। पहला, जो सबसे आदरणीय है वह है सेवा कर्म में जुटे लोग ! फिर वे चाहे डॉक्टर हों, सेवाकर्मी हों, सफाईकर्मी हों, जरुरत का सामान बेचने वाले हों या बेसहारा लोगों को भोजन प्रदान करने वाले ! वे सब आज देवतुल्य हैं।

दूसरे वर्ग में वे तमाम आम जन हैं जो स्वस्थ रहने के लिए दी गई हिदायतों का पूरी तरह पालन करते हैं। ये सब भी प्रशंसा के पात्र हैं क्योंकि इन्हीं की वजह से आज देश अपने आप को संभालने में सफल हो पाया है। 

तीसरे वर्ग में वे मासूम लोग आते हैं जो हाल-बेहाल हो परिस्थितिवश अपने आश्रय से निकल बाहर आने को मजबूर हो जाते हैं। इनका ध्यान रखना सरकार और समाज दोनों की प्राथमिकता होनी चाहिए। यही वे लोग हैं जो सबसे ज्यादा उपेक्षित होते हुए भी समाज की रीढ़ हैं।

चौथा वर्ग समाज और देश के दुश्मनों का है ! ये जान-बूझ कर अवाम को खतरे में धकेलने का उपक्रम करता है। बेवजह घर के बाहर निकलना, रक्षा कर्मियों के साथ बदसलूकी, अक्खड़पन, उद्दंडता से भरपूर ये लोग बार-बार समझाने को अपनी जीत और व्यवस्था की कमजोरी समझने की भूल करने लगते हैं। ऐसे शठों को उन्हीं की भाषा में समझाना जरुरी है। पता नहीं क्यों व्यवस्था ने इतनी ढ़ील दे रखी है। लंका अभियान पर समुंद्र के आड़े आने पर तीन दिन बाद ही प्रभु राम ने और शिशुपाल के हद लांघने पर श्री कृष्ण जैसे अवतारी पुरुषों ने भी दंड देने में कोताही नहीं बरती थी ! ज्ञात्वय है कि उनका बैर सिर्फ एक इंसान से था ये लोग तो पूरी जात-बिरादरी और समाज के दुश्मन हैं फिर इतनी ढिलाई क्यों  ? 

आज जनता प्रत्यक्ष हर चीज देखना चाहती है चाहे वह छूट हो, सहायता हो या फिर दंड ! दोषी को दंड मिलता देख ही दूसरे दोषियों को सबक मिलेगा और भय रहेगा कुकर्म करते समय और समाज को संतोष और विश्वास की प्राप्ति होगी व्यवस्था के प्रति !!    

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