इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022
कोलकाता की रसगुल्ले वाली चाय
मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022
बाबिया, एक शाकाहारी मगरमच्छ
मंदिर के पदाधिकारियों के अनुसार वर्षों पहले भी इस झील में एक मगरमच्छ रहता था। जिसे बाबिया कह कर पुकारा जाता था। 1942 में उसे एक ब्रिटिश अधिकारी मार कर अपने साथ ले गया था ! पर कुछ ही दिनों बाद उसकी सांप के काटने से मौत हो गयी थी ! इस घटना के बाद आश्चर्यजनक रूप से झील में एक और मादा मगर दिखाई पड़ने लगी ! भक्तों ने उसका नाम भी बाबिया रख दिया ! वह यही बाबिया थी, जिसने भक्तों तथा मंदिर द्वारा प्रदत्त प्रसाद पर ही अपनी तक़रीबन दो तिहाई जिंदगी गुजार दी ! पर जाते-जाते भी वह यह संदेश दे गई कि कदाचार से सदाचार, आचरण बदलते ही जीव वंदनीय हो जाता है ...........!
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मगरमच्छ, वह भी शाकाहारी ! सहसा विश्वास ही नहीं होता ! यह ठीक वैसा ही लगता है जैसे कोई कहे कि शेर घास खा कर जिंदा है ! ज्यादातर पानी में रहने वाले, इस डरावने उभयचर का नाम सुनते ही डर से रोंगटे खड़े हो जाते हैं ! जिस प्राणी से पानी में शेर और हाथी जैसे ताकतवर जानवर भी सामना करने से कतराएं ! जिसके खूंखार दांत एक झटके में किसी के भी टुकड़े-टुकड़े कर सकने में सक्षम हों ! जो पानी में रहने वाले जीवों का काल हो ! वह शाकाहारी .....! पर हमारा संसार भरा पड़ा है, विस्मित करने वाले आश्चर्यजनक, अविश्वसनीय, हैरतंगेज कारनामों से ! इस जगत में क्या कुछ नहीं हो सकता !
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| बाबिया |
केरल के कासरगोड जिले के माजेश्वरम नामक स्थान में स्थित आनंदपद्मनाभ स्वामी मंदिर ! ऐसी मान्यता है कि पद्मनाभस्वामी जी का पूजास्थल तिरुवंतपुरम में जरूर है पर उनका मूलस्थान यह मंदिर है। इसी की एक गुफा में प्रभु अंतर्ध्यान हुए थे ! इसी की झील में एक मादा मगरमच्छ रहा करती थी, नाम था बाबिया ! लोक मत है कि बाबिया इस मंदिर और इसकी गुफा की रखवाली पिछले सत्तर साल से करती आ रही थी। मंदिर प्रशासन के अनुसार वह पूर्णतया शाकाहारी थी और सिर्फ मंदिर का प्रसाद ही खाती थी। यहां तक कि उसने झील में रहने वाले किसी अन्य प्राणी को किसी भी तरह का कभी भी कोई नुकसान नहीं पहुंचाया ! इतने सालों में किसी ने भी उसे मछली तक खाते नहीं देखा !
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| आनंदपद्मनाभ मंदिरऔर झील |
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| प्रसाद ग्रहण |
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| अद्भुत |
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| उमड़ते लोग |
मंगलवार, 11 अक्टूबर 2022
लेपाक्षी मंदिर का हवा में झूलता खंबा
कुर्मासेलम की पहाडियों पर बना कछुए के आकार का यह पूजास्थल पुरातन काल से अपने खंभों की विशेषता के कारण आज तक लोगों की उत्सुकता का विषय बना हुआ है। बड़े अचंभे की बात है कि 70 खंभों पर बने इस मंदिर का एक खंभा जमीन को छूता ही नहीं है बल्कि उससे करीब आधा इंच ऊपर हवा में झूलता रहता है। यही वजह है कि इस मंदिर को हैंगिंग टेंपल के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर के ये अनोखे खंभे आकाश स्तंभ के नाम से भी जाने जाते हैं...........!
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हमारा देश में धर्म की अपनी महत्ता है ! सो यहां मंदिरों को तो होना ही है ! वह भी इतने कि गिनती कम पड़ जाए ! उस पर ऐसी कलात्मकता, विशालता, भव्यता कि देखने वाले को अपनी ही आँखों पर विश्वास ना हो ! कुछ की कारीगरी ऐसी है कि यकीन ही नहीं होता कि ये इंसानों के द्वारा बनाए गए होंगे ! कुछ इतने दुर्गम कि वहां पहुँचने में अच्छे-अच्छे जीवटधारी हिम्मत नहीं कर पाते ! कुछ अपने आप में ऐसे रहस्य समेटे हैं, जिनका पार पाना आज की मानव बुद्धि के वश में नहीं लगता ! एक ऐसा ही विलक्षण मंदिर आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में, बेंगलुरु शहर से करीब 120 किमी दूर स्थित है, जो भगवान शिव के वीरभद्र स्वरूप और रामायण के श्रीराम-जटायु प्रसंग से संबंधित है ! दुनिया भर के वैज्ञानिक अब तक इसके खंबों के रहस्य को सुलझाने में नाकामयाब रहे हैं !
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| जमीन से करीब आधा इंच उठा हुआ स्तंभ |
इस मंदिर का जिक्र रामायण में भी मिलता है ! यही वह जगह है जहां रावण से युद्ध के दौरान जटायु घायल हो गिर गए थे ! जब श्री राम सीता जी को खोजते यहां पहुंचे तो उन्होंने घायल जटायु को गोद में ले सहारा देते हुए कहा था, पक्षी उठो-पक्षी उठो ! तेलगु भाषा में इसका अनुवाद लेपाक्षी होता है, इसीलिए इस जगह का नाम लेपाक्षी पड़ा। इसी जगह जटायु जी ने श्रीराम को सारी घटना बता परलोक गमन किया था !
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| चरण चिन्ह |
बुधवार, 5 अक्टूबर 2022
रावण का मरना भी असंभव है
रावण को मारने के लिए राम का होना जरुरी है और राम ऐसे ही कोई नहीं बन जाता ! उसके लिए उसमें प्रबल शक्ति का होना तो अवश्यंभावी है ही, साथ ही उसे कर्त्वयनिष्ठ, सत्यनिष्ठ, दृढ़निश्चयी, करुणामय, ज्ञानी, वचन पालक, संयमी, ईर्ष्या मुक्त, विवेकी, निरपेक्ष, शरणागत वत्सल, दयालु, समदर्शी, काम-क्रोध-मोह विहीन होना भी बहुत जरुरी है
शुक्रवार, 23 सितंबर 2022
मिसिंग टाइल सिंड्रोम, जो पास नहीं है उसका दुःख
यह टाइल वाली बात एक मनोवैज्ञानिक समस्या है, जिसे ''मिसिंग टाइल सिंड्रोम'' नाम दिया गया है और जो कमोबेस तकरीबन हर इंसान में मौजूद होती है ! किसी चीज की ''मिसिंग'' पर ही हमारा ध्यान जाना, हमारी जिंदगी के दुःख का सबसे बड़ा कारण है ! जो हमारे पास है, उससे हम उतना खुश नहीं होते जितना कि जो हमारे पास नहीं है उसके लिए दुखी होते हैं
रविवार, 18 सितंबर 2022
चीते आ गए, स्वागत है
छाता प्रजाति जीवों की उन विशेष श्रेणी को कहा जाता है, जिनके संरक्षण से धरती की अन्य प्रजातियों को भी संरक्षित कर पर्यावरण को संतुलित करने में सहायता मिलती है ! इनमें पशु और पक्षी दोनों ही सामान रूप से सम्मिलित होते हैं ! ये संरक्षण क्षेत्रों के आकार, संरचना और पारिस्थितिक तंत्र को बचाए रखने में भी मदद करते हैं। ये भले ही अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, अन्य जीवों को रहत पहुंचते हैं, इसीलिए इन्हें छाता या अंब्रेला प्रजाति कहा जाता है .......!
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हमारे यहां एक प्रथा कुछ वर्षों से काफी चलन में है, वह है विरोध ! सरकार द्वारा कुछ भी हो रहा हो या किया जाए तुरंत एक खास पूर्वाग्रही, कुंठित, विघ्नसंतोषी तबका उसके विरोध में चिल्ल-पों मचाना शुरू कर देता है ! उस काम के औचित्य पर, उसके प्रयोजन पर, उसके परिणाम पर सवाल उठाने आरंभ कर दिए जाते हैं ! भले ही वह काम देश के या लोगों के हित में ही क्यों ना हो ! अभी देश की ग्रासलैंड इकोलॉजी को सुधारने के लिए विलुप्त हो चुके चीतों के पुनर्स्थापन की योजना के तहत नामीबिया से आठ चीते, जिनमें पांच मादा तथा तीन नर हैं, लाए गए ! इस पर उनको लाने और जगह विशेष में बसाने पर भी ऐसे लोगों को राजनीती नजर आने लगी ! जबकि यह पर्यावरण के लिए बहुत आवश्यक था !
किसी भी देश से दूसरे देश में जीवों को लाने ले जाने के IUCN (International Union for Conservation of Nature) के कुछ नियम हैं, जिनका पालन करना जरुरी होता है ! उसी के तहत चीतों के लिए पांच राज्यों के 10 जगहों को तय किया गया था ! जो सात अलग-अलग तरह के लैंडस्केप पर मौजूद हैं. छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास नेशनल पार्क ! गुजरात में बन्नी ग्रासलैंड्स ! मध्यप्रदेश में डुबरी वाइल्डलाइफ सेंचुरी, संजय नेशनल पार्क, बागडारा वाइल्डलाइफ सेंचुरी, नॉराडेही वाइल्डलाइफ सेंचुरी और कूनो नेशनल पार्क ! राजस्थान में डेजर्ट नेशनल पार्क वाइल्डलाइफ सेंचुरी और शाहगढ़ ग्रासलैंड्स और उत्तर प्रदेश की कैमूर वाइल्डलाइफ सेंचुरी !
फिर काफी सोच-विचार मश्शकत के बाद राजस्थान के मुकुंदारा हिल्स टाइगर रिजर्व, शेरगढ़ वाइल्डलाइफ सेंचुरी और भैंसरोर गढ़ वाइल्डलाइफ सेंचुरी तथा मध्यप्रदेश की गांधी सागर वाइल्डलाइफ सेंचुरी, माधव नेशनल पार्क को भी आजमाया गया ! पर अंत में हर दृष्टिकोण से श्योपुर स्थित कूनो नॅशनल पार्क ही हर कसौटी पर खरा उतरा ! जहां स्पेशल हवाई जहाज से, विशेष व्यवस्था और निगरानी के तहत नए मेहमानों को ला कर, प्रधान मंत्री मोदी जी द्वारा उनके इस नए आवास में छोड़ा गया !
चीते का हमारे संस्कृत ग्रंथों में चित्रक यानी चित्तीदार के रूप में विवरण मिलता है ! नवपाषाण युग की गुफाओं में भी इनके चित्र मिलते हैं ! आशा है, करीब सत्तर साल बाद आए, दुनिया के सबसे तेज धावक, हमारे इन नए मेहमानों को यहां स्थाई निवासी बनने, रहने, पनपने में कोई अड़चन नहीं आएगी ! उनका परिवार फलेगा-फूलेगा ! इसके साथ ही इस इलाके में पर्यटन बढ़ेगा ! लोग चीतों को देखने आएंगे ! जिससे राज्य और देश को भी फायदा होगा !
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से, आभार
मंगलवार, 6 सितंबर 2022
प्लास्टिक को पहचानें उस पर दिए गए कोड से
आज प्लास्टिक को बिलकुल नकार दिया जाना सम्भव नहीं है। हालंकि इनमें से कुछ पर्यावरण के तथा इंसान के लिए हानिरहित भी हैं। पर अधिकतर हमारे लिए हानिकारक ही हैं। इन्हें कभी भी गर्म नहीं करना चाहिए, जब तक उस पर ऐसा करना हानिरहित न लिखा हो। ज़रा सी टूट-फूट होते ही इन्हें प्रयोग से बाहर कर देना ही उचित है ! वैसे भी प्लास्टिक का उपयोग खूब सोच-समझ कर ही करना चाहिए। इसकी श्रेणियों में क्रमांक 1, 2, 4, 5 को उपयोग के लिए सुरक्षित और 3, 6, 7, खासकर 7 को हानिकारक मान कर उनका कम ही काम में लाया जाना उचित है .......!
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